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अंग 113

अंग
113
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तूं आपे ही घड़ि भंनि सवारहि नानक नामि सुहावणिआ ॥8॥5॥6॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) आप स्वयं ही बना-तोड़ के सँवारता है, तूं स्वयं ही अपने नाम की बरकत से (जीवों के जीवन) सुंदर बनाता है।8।5।6।
माझ महला 3 ॥
सभ घट आपे भोगणहारा ॥
अलखु वरतै अगम अपारा ॥
गुर कै सबदि मेरा हरि प्रभु धिआईऐ सहजे सचि समावणिआ ॥1॥
हउ वारी जीउ वारी गुर सबदु मंनि वसावणिआ ॥
सबदु सूझै ता मन सिउ लूझै मनसा मारि समावणिआ ॥1॥ रहाउ ॥
पंच दूत मुहहि संसारा ॥
मनमुख अंधे सुधि न सारा ॥
गुरमुखि होवै सु अपणा घरु राखै पंच दूत सबदि पचावणिआ ॥2॥
इकि गुरमुखि सदा सचै रंगि राते ॥
सहजे प्रभु सेवहि अनदिनु माते ॥
मिलि प्रीतम सचे गुण गावहि हरि दरि सोभा पावणिआ ॥3॥
एकम एकै आपु उपाइआ ॥
दुबिधा दूजा त्रिबिधि माइआ ॥
चउथी पउड़ी गुरमुखि ऊची सचो सचु कमावणिआ ॥4॥
सभु है सचा जे सचे भावै ॥
जिनि सचु जाता सो सहजि समावै ॥
गुरमुखि करणी सचे सेवहि साचे जाइ समावणिआ ॥5॥
सचे बाझहु को अवरु न दूआ ॥
दूजै लागि जगु खपि खपि मूआ ॥
गुरमुखि होवै सु एको जाणै एको सेवि सुखु पावणिआ ॥6॥
जीअ जंत सभि सरणि तुमारी ॥
आपे धरि देखहि कची पकी सारी ॥
अनदिनु आपे कार कराए आपे मेलि मिलावणिआ ॥7॥
तूं आपे मेलहि वेखहि हदूरि ॥
सभ महि आपि रहिआ भरपूरि ॥
नानक आपे आपि वरतै गुरमुखि सोझी पावणिआ ॥8॥6॥7॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ (हे भाई !) सारे शरीरों में (व्यापक हो के प्रभू) स्वयं ही (जगत के सारे पदार्थ) भोग रहा है। (फिर भी वह) अदृष्ट रूप में मौजूद है अपहुँच है और बेअंत है। उस प्यारे हरि प्रभू को गुरू के शबद में जोड़ के सिमरना चाहिए। (जो मनुष्य सिमरते हैं वह) आत्मिक अडोलता में सदा स्थिर प्रभू में समाए रहते हैं।1। (हे भाई !) मैं सदा उस मनुष्य के सदके कुर्बान जाता हूँ जो सतिगुरू के शबद को (अपने) मन में बसाता है। जब गुरू का शबद मनुष्य के अंतर आत्मे टिकता है, तो वह अपने मन से टकराव करता है, और मन की कामना मार के (प्रभू चरनों में) लीन रहता है।1।रहाउ। (हे भाई ! कामादिक) पाँच वैरी, जगत (के आत्मिक जीवन) को लूट रहे हैं। पर, अपने मन के पीछे चलने वाले और माया के मोह में अंधे हुए मनुष्य को ना अकल है ना ही (इस लूट की) खबर है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है, वह अपना घर बचा लेता है। वह गुरू के शबद में टिक के इन पाँच वैरियों का नाश कर लेता है।2। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होते हैं, वे सदैव सदा स्थिर प्रभू के प्रेम रंग में रंगे रहते हैं। वे आत्मिक अडोलता में मस्त हर समय प्रभू का सिमरन करते हैं। वे प्रभू प्रीतम को मिल के उस सदा स्थिर प्रभू के गुण गाते हैं और प्रभू के दर से आदर हासिल करते हैं।3। पहले प्रभू अकेला स्वयं (निर्गुण स्वरूप) था। उसने अपने आप को प्रगट किया। इस तरह फिर दो किस्मों वाला (निर्गुण और सर्गुण स्वरूप वाला) बन गया और उस के तीन गुणों वाली माया रच दी। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है, उसका आत्मिक ठिकाना माया के तीन गुणों (के प्रभाव) से ऊपर ऊँचा रहता है। वह सदैव सदा स्थिर प्रभू का नाम सिमरन की कमाई करता रहता है।4। अगर सदा स्थिर प्रभू की रजा हो (तो जिस मनुष्य पर वह मेहर करता है, उसे यह निश्चय हो जाता है कि) सदा स्थिर परमात्मा हर जगह मौजूद है। (प्रभू की मेहर से) जिस मनुष्य ने सदा कायम रहने वाले प्रभू के साथ सांझ डाल ली, वह आत्मिक अडोलता में लीन रहता है। (हे भाई !) गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों का कर्तव्य ही ये है कि वे सदा स्थिर प्रभू का सिमरन करते रहते हैं और सदा स्थिर प्रभू में ही जा के लीन हो जाते हैं।5। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के बिना कोई और दूसरा (आत्मिक आनंद देने वाला नहीं है) जगत (उसे विसार के और सुख की खातिर) माया के मोह में फस के दुखी हो के आत्मिक मौत ले लेता है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है, वह एक परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल लेता है। वह एक परमात्मा का ही सिमरन करके आत्मिक आनंद लेता है।6। (हे प्रभू ! जगत के) सारे जीव आपका ही आसरा देख सकते हैं (हे प्रभू ! ये आपका रचा हुआ जगत, मानो चौपड़ की खेल है), आप स्वयं ही (इस चौपड़ पे) कच्ची-पक्की नर्दें (भाव, ऊँचे और कच्चे जीवन वाले जीव) रच के इनकी संभाल करता है। (हे भाई !) हर रोज (हर वक्त) प्रभू स्वयं ही (जीवों में व्यापक हो के जीवों से) कार करवाता है, और स्वयं ही अपने चरणों में मिलाता है।7। (हे भाई !) आप स्वयं ही जीवों के अंग संग हैं के सबकी संभाल करता है और अपने चरणों में जोड़ता है। (हे भाई !) सब जीवों में प्रभू स्वयं ही हाजिर नाजिर मौजूद है। हे नानक ! सब जगह प्रभू स्वयं ही बरत रहा है। गुरू के सन्मुख रहने वाले लोगों को ये समझ आ जाती है।8।6।7।
माझ महला 3 ॥
अंम्रित बाणी गुर की मीठी ॥
गुरमुखि विरलै किनै चखि डीठी ॥
अंतरि परगासु महा रसु पीवै दरि सचै सबदु वजावणिआ ॥1॥
हउ वारी जीउ वारी गुर चरणी चितु लावणिआ ॥
सतिगुरु है अंम्रित सरु साचा मनु नावै मैलु चुकावणिआ ॥1॥ रहाउ ॥
तेरा सचे किनै अंतु न पाइआ ॥
गुर परसादि किनै विरलै चितु लाइआ ॥
तुधु सालाहि न रजा कबहूं सचे नावै की भुख लावणिआ ॥2॥
एको वेखा अवरु न बीआ ॥
गुर परसादी अंम्रितु पीआ ॥
गुर कै सबदि तिखा निवारी सहजे सूखि समावणिआ ॥3॥
रतनु पदारथु पलरि तिआगै ॥
मनमुखु अंधा दूजै भाइ लागै ॥
जो बीजै सोई फलु पाए सुपनै सुखु न पावणिआ ॥4॥
अपनी किरपा करे सोई जनु पाए ॥
गुर का सबदु मंनि वसाए ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ सतिगुरू की बाणी आत्मिक जीवन देने वाली है और जीवन में मिठास भरने वाली है। पर, किसी विरले गुरमुखि ने इस बाणी का रस ले के ये तब्दीली देखी है। जो मनुष्य गुरू की बाणी का श्रेष्ठ रस लेता है, उसके अंदर सही जीवन की सूझ पैदा हो जाती है। वह सदैव सदा सिथर प्रभू के दर पर टिका रहता है। उसके अंदर गुरू का शबद अपना पूरा प्रभाव डाले रखता है।1। मैं सदा उस मनुष्य के सदके कुर्बान जाता हूँ, जो गुरू के चरणों में अपना चित्त जोड़े रखते हैं। सतिगुरू आत्मिक जीवन देने वाले जल का कुण्ड है, वह कुण्ड सदा कायम रहने वाला भी है। (जिस मनुष्य का) मन (उस कुण्ड में) स्नान करता है, (वह अपने मन की विकारों की) मैल दूर कर लेता है।1।रहाउ। हे सदा स्थिर रहने वाले प्रभू ! किसी भी जीव को आपके गुणों का अंत नहीं मिला। किसी विरले मनुष्य ने ही गुरू की कृपा से ही (आपके चरणों में अपना) चित्त जोड़ा है। (हे प्रभू ! मेहर कर कि) मैं आपकी सिफत-सालाह करते करते कभी भी ना तृप्त होऊँ। आपके सदा स्थिर रहने वाले नाम की भूख मुझे हमेशा लगी रहे।2। अब मैं हर जगह एक परमात्मा को ही देखता हूँ। (उसके बिना मुझे) कोई और नहीं (दिखता)। (हे भाई !) गुरू की कृपा से मैंने आत्मिक जीवन देने वाले हरी नाम रस को पिया है। गुरू के शबद में जुड़ के मैंने माया की तृष्णा दूर कर ली है, अब मैं आत्मिक अडोलता मैं आत्मिक आनंद में लीन रहता हूँ।3। वह परमात्मा के नाम रतन को (दुनिया के सब पदार्थों से श्रेष्ठ) पदार्थ को तरोई की नाड़ियों के बदले में हाथों से गवाता रहता है। माया के मोह में अंधा हुआ मनुष्य अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (प्रभू को भुला के) माया के प्यार में फंसा रहता है, जो (दुखदायी बीज) वह मनमुख बीजता है, उसका वही (दुखदायी) फल वह हासिल करता है। वह सुपने में भी आत्मिक आनंद नही पाता।4। जिस मनुष्य पर परमात्मा अपनी कृपा करता है वही मनुष्य (आत्मिक आनंद) प्राप्त करता है (क्योंकि वह) गुरू का शबद अपने मन में बसाए रखता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) आप स्वयं ही बना-तोड़ के सँवारता है, तूं स्वयं ही अपने नाम की बरकत से (जीवों के जीवन) सुंदर बनाता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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