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अंग 114

अंग
114
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
अनदिनु सदा रहै भै अंदरि भै मारि भरमु चुकावणिआ ॥5॥
भरमु चुकाइआ सदा सुखु पाइआ ॥
गुर परसादि परम पदु पाइआ ॥
अंतरु निरमलु निरमल बाणी हरि गुण सहजे गावणिआ ॥6॥
सिम्रिति सासत बेद वखाणै ॥
भरमे भूला ततु न जाणै ॥
बिनु सतिगुर सेवे सुखु न पाए दुखो दुखु कमावणिआ ॥7॥
आपि करे किसु आखै कोई ॥
आखणि जाईऐ जे भूला होई ॥
नानक आपे करे कराए नामे नामि समावणिआ ॥8॥7॥8॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: वह मनुष्य हर रोज हर समय परमात्मा के डर अदब में टिका रहता है, और उस डर अदब की बरकति से अपने मन को मार के (विकारों को मार के विकारों की तरफ की) दौड़-भाग दूर करे रखता है।5। जिस मनुष्य ने (अपने मन की विकारों की ओर की) दौड़-भाग खत्म कर ली, उसने सदा आत्मिक आनंद प्राप्त किया। गुरू की कृपा से उसने सब से ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर ली। जीवन को पवित्र करने वाली गुरबाणी की सहायता से उसका मन पवित्र हो गया। वह आत्मिक अडोलता में टिक के सदा परमात्मा के गुण गाता रहता है।6। (पंडित) वैद शास्त्र स्मृतियों (आदि धर्म पुस्तकें) औरों को पढ़ पढ़ के सुनाता रहता है, पर स्वयं माया की भटकना में पड़ के कुमार्ग पर चलता है, वह असलियत को नहीं समझता। गुरू की बताई सेवा किए बगैर वह आत्मिक आनंद नहीं प्राप्त कर सकता, दुख ही दुख (पैदा करने वाली) कमाई करता रहता है।7। (पर ये सारी खेल परमात्मा के अपने हाथ में है। सब जीवों में व्यापक हो के परमात्मा) स्वयं ही (सब कुछ) करता है। किसे कौन कह सकता है (कि आप कुमार्ग पर जा रहा है) ? किसी को समझाने की जरूरत तभी पड़ सकती है, यदि वह (स्वयं) कुमार्ग पर पड़ा हुआ हो। हे नानक ! परमात्मा स्वयं ही (सब जीवों में व्यापक हो के सब कुछ) कर रहा है और (जीवों से) करा रहा है, वह स्वयं ही (सर्व-व्यापक हो के अपने) नाम में ही लीन हो सकता है।8।7।8।
माझ महला 3 ॥
आपे रंगे सहजि सुभाए ॥
गुर कै सबदि हरि रंगु चड़ाए ॥
मनु तनु रता रसना रंगि चलूली भै भाइ रंगु चड़ावणिआ ॥1॥
हउ वारी जीउ वारी निरभउ मंनि वसावणिआ ॥
गुर किरपा ते हरि निरभउ धिआइआ बिखु भउजलु सबदि तरावणिआ ॥1॥ रहाउ ॥
मनमुख मुगध करहि चतुराई ॥
नाता धोता थाइ न पाई ॥
जेहा आइआ तेहा जासी करि अवगण पछोतावणिआ ॥2॥
मनमुख अंधे किछू न सूझै ॥
मरणु लिखाइ आए नही बूझै ॥
मनमुख करम करे नही पाए बिनु नावै जनमु गवावणिआ ॥3॥
सचु करणी सबदु है सारु ॥
पूरै गुरि पाईऐ मोख दुआरु ॥
अनदिनु बाणी सबदि सुणाए सचि राते रंगि रंगावणिआ ॥4॥
रसना हरि रसि राती रंगु लाए ॥
मनु तनु मोहिआ सहजि सुभाए ॥
सहजे प्रीतमु पिआरा पाइआ सहजे सहजि मिलावणिआ ॥5॥
जिसु अंदरि रंगु सोई गुण गावै ॥
गुर कै सबदि सहजे सुखि समावै ॥
हउ बलिहारी सदा तिन विटहु गुर सेवा चितु लावणिआ ॥6॥
सचा सचो सचि पतीजै ॥
गुर परसादी अंदरु भीजै ॥
बैसि सुथानि हरि गुण गावहि आपे करि सति मनावणिआ ॥7॥
जिस नो नदरि करे सो पाए ॥
गुर परसादी हउमै जाए ॥
नानक नामु वसै मन अंतरि दरि सचै सोभा पावणिआ ॥8॥8॥9॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ प्रभू स्वयं ही (जिन मनुष्यों को) आत्मिक अडोलता के (रंग) में रंगता है, श्रेष्ठ प्यार (के रंग) में रंगता है, जिन्हें गुरू के शबद में (जोड़ के यह) रंग चढ़ाता है, उनका मन रंग जाता है, उनका शरीर रंगा जाता है। उनकी जीभ (नाम-) रंग में गहरी लाल हो जाती है। गुरू उन्हें प्रभू के डर-अदब में रख के प्रभू के प्यार में जोड़ के नाम-रंग चढ़ाता है।1। मैं सदा उनसे सदके कुर्बान जाता हूँ जो उस परमात्मा को अपने मन में बसाते हैं, जिसे किसी का डर खतरा नहीं। जिन्होंने गुरू की कृपा से निरभउ परमात्मा का ध्यान धरा है। परमात्मा उन्हें गुरू शबद में जोड़ के जहर रूपी संसार समुंदर से पार लंघा लेता है (भाव, उस संसार समुंदर से पार लंघाता है जिस का मोह आत्मिक जीवन वास्ते जहर जैसा है)।1। रहाउ। अपने मन के पीछे चलने वाले मूर्ख मनुष्य चतुराईयां करते हैं (और कहते हैं कि हम तीर्थ-स्नान आदि पुंन्य कर्म करते हैं पर अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य) बाहर से कितना ही पवित्र कर्म करने वाला हो (परमात्मा की हजूरी में) परवान नहीं होता। (वह जगत में आत्मिक जीवन से) जैसा (खाली आता है) वैसा ही (खाली) चला जाता है। (जगत में) अवगुण कर करके (आखिर) पछताता ही (चला जाता) है।2। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य को, माया के मोह में अंधे हुए मनुष्य को (सही जीवन युक्ति के बारे में) कुछ नही सूझता। (पिछले जन्मों में मनमुखता के अधीन किए कर्मों के अनुसार) आत्मिक मौत (के संस्कार अपने मन की तख्ती पर) लिखा के वह (जगत में) आता है (यहां भी उसे) समझ नहीं आती, अपने मन के पीछे चल के ही कर्म करता रहता है और (सही जीवन जुगति की सूझ) हासिल नहीं करता, और परमात्मा के नाम से वंचित रह के मानस जनम को व्यर्थ गवा जाता है।3। (हे भाई !) सदा स्थिर प्रभू का नाम सिमरन ही करने योग्य काम है। गुरू का शबद (हृदय में बसाना ही) श्रेष्ठ (उद्यम) है। पूरे गुरू द्वारा ही विकारों से खलासी पाने का दरवाजा मिलता है। (गुरू जिनको) हर समय अपनी बाणी के द्वारा (परमात्मा की सिफत-सालाह) सुनाता रहता है, वे सदा स्थिर प्रभू के नाम के रंग में रंगे जाते हैं। वे उसके प्रेम रंग में रंगे जाते है।4। जिस मनुष्य की जीभ पूरी लगन लगा के परमात्मा के नाम रस में रंगी जाती है, उसका मन आत्मिक अडोलता में मस्त रहता है, उसका शरीर प्रेम रंग में मगन रहता है। आत्मिक अडोलता में टिक के वह प्यारे प्रीतम प्रभू को मिल लेता है, वह सदा ही आत्मक अडोलता में लीन रहता है।5। जिस मनुष्य के हृदय में लगन है, वही सदा परमात्मा की सिफत-सालाह के गीत गाता है। वह गुरू के शबद में जुड़ के आत्मिक अडोलता में आत्मिक आनंद में मगन हुआ रहता है। मैं सदा उन लोगों से सदके जाता हूँ, जिन्होंने गुरू द्वारा बताई कार में अपना चित्त लगाया हुआ है।6। जिनका मन सदा स्थिर प्रभू का नाम सिमर के सदा स्थिर की याद में पसीजा रहता है गुरू की कृपा से जिन मनुष्यों का हृदय (सिफत-सालाह के रस से) भीगा रहता है, वे श्रेष्ठ अंतरात्में में टिक के परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। प्रभू स्वयं ही उनको ये श्रद्धा बख्शता है कि सिफत-सालाह की कार ही सही जीवन कार है।7। पर, प्रभू का नाम सिमरने की सूझ वही मनुष्य हासिल करता है, जिस पर प्रभू मेहर की निगाह करता है। गुरू की कृपा से (नाम सिमरने से) उसका अहंकार दूर हो जाता है। हे नानक ! उस मनुष्य के मन में प्रभू का नाम बस जाता है, सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के दर पे उसको शोभा मिलती है।8।8।9।
माझ महला 3 ॥
सतिगुरु सेविऐ वडी वडिआई ॥
हरि जी अचिंतु वसै मनि आई ॥
हरि जीउ सफलिओ बिरखु है अंम्रितु जिनि पीता तिसु तिखा लहावणिआ ॥1॥
हउ वारी जीउ वारी सचु संगति मेलि मिलावणिआ ॥
हरि सतसंगति आपे मेलै गुर सबदी हरि गुण गावणिआ ॥1॥ रहाउ ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ अगर (मनुष्य) गुरू को (अपनी जिंदगी का) आसरा परना (अंगोछा) बना ले, तो उसको ये भारी इज्जत मिलती है कि वह परमात्मा उसके मन में आ बसता है जिसे दुनिया की कोई भी चिंता छू नही सकती। (हे भाई !) परमात्मा (मानो) एक फलदार वृक्ष है जिस में से आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस रिसता है। जिस मनुष्य ने (वह रस) पी लिया, नाम रस ने उसकी (माया की) प्यास दूर कर दी।1। मैं सदके हूँ कुर्बान हूँ (परमात्मा से)। वह सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा साध-संगति में मिला के (अपने चरणों में) जोड़ लेता है। परमात्मा खुद ही साध-संगति का मेल करता है। (जो मनुष्य साध-संगति में जुड़ता है वह) गुरू के शबद से परमात्मा के गुण गाता है।1। रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह मनुष्य हर रोज हर समय परमात्मा के डर अदब में टिका रहता है, और उस डर अदब की बरकति से अपने मन को मार के (विकारों को मार के विकारों की तरफ की) दौड़-भाग दूर करे रखता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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