अनदिनु जलदी फिरै दिनु राती बिनु पिर बहु दुखु पावणिआ ॥2॥ देही जाति न आगै जाए ॥ जिथै लेखा मंगीऐ तिथै छुटै सचु कमाए ॥ सतिगुरु सेवनि से धनवंते ऐथै ओथै नामि समावणिआ ॥3॥ भै भाइ सीगारु बणाए ॥ गुर परसादी महलु घरु पाए ॥ अनदिनु सदा रवै दिनु राती मजीठै रंगु बणावणिआ ॥4॥ सभना पिरु वसै सदा नाले ॥ गुर परसादी को नदरि निहाले ॥ मेरा प्रभु अति ऊचो ऊचा करि किरपा आपि मिलावणिआ ॥5॥ माइआ मोहि इहु जगु सुता ॥ नामु विसारि अंति विगुता ॥ जिस ते सुता सो जागाए गुरमति सोझी पावणिआ ॥6॥ अपिउ पीऐ सो भरमु गवाए ॥ गुर परसादि मुकति गति पाए ॥ भगती रता सदा बैरागी आपु मारि मिलावणिआ ॥7॥ आपि उपाए धंधै लाए ॥ लख चउरासी रिजकु आपि अपड़ाए ॥ नानक नामु धिआइ सचि राते जो तिसु भावै सु कार करावणिआ ॥8॥4॥5॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: (माया के मोह के कारण जिंद) हर समय दिन रात जलती व भटकती है। प्रभू पति (के मिलाप) के बगैर बहुत दु:ख झेलती है।2। प्रभू की हजूरी में (मनुष्य का) शरीर नहीं जा सकता, ऊँची जाति भी नहीं पहुँच सकती (जिसका मनुष्य इतना गुमान करता है)। जहाँ (परलोक में हरेक मनुष्य से उसके द्वारा किए कर्मों का) हिसाब मांगा जाता है। वहाँ तो सदा स्थिर प्रभू के नाम सिमरन की कमाई करके सुर्खरू होते हैं। जो मनुष्य गुरू की बताई सेवा करते हैं, वे (प्रभू के नाम धन से) धनाढ बन जाते हैं। वे इस लोक में भी और परलोक में भी सदा प्रभू के नाम में ही लीन रहते हैं।3। जो मनुष्य प्रभू के डर अदब में रह के प्रभू के प्रेम में मगन हो के (प्रभू के नाम को अपने जीवन का) गहना बनाता है, वह गुरू की कृपा से प्रभू चरणों में ठिकाना बना लेता है। प्रभू चरणों में घर प्राप्त कर लेता है। वह हर रोज दिन रात परमात्मा का नाम सिमरता है (वह अपनी जिंद को) मजीठा जैसा (पक्का प्रभू का) नाम रंग चढ़ा लेता है।4। (हे भाई !) प्रभू पति सदा सभ जीवों के साथ (सब के अंदर) बसता है, पर कोई विरला जीव गुरू की कृपा से (उसे हर जगह) अपनी आँखों से देखता है। (हे भाई !) प्यारा प्रभू बहुत ही ऊँचा है (बेअंत ऊँचे आत्मिक जीवन का मालिक है, और हम जीव नीच-जीवन के है) वह स्वयं ही मेहर करके (जीवों को अपने चरणों में) मिलाता है।5। ये जगत माया के मोह में फंस कर सोया हुआ है (आत्मिक जीवन की ओर से बेफिक्र हो रहा है)। परमात्मा का नाम भुला के आखिर खुआर ही होता है। (फिर भी ये इस नींद में से जागता नहीं। जागे भी कैसे? इसके बस की बात नहीं) जिसके हुकम के अनुसार (जगत माया के मोह की नींद में) सो रहा है, वही इसे जगाता है (वह प्रभू स्वयं ही इसे) गुरू की मति पे चला के (आत्मिक जीवन की) समझ बख्शता है।6। जो मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल पीता है। वह (माया के मोह वाली) भटकना दूर कर लेता है। गुरू की कृपा से वह माया के मोह से खलासी पा लेता है। वह उच्च अवस्था प्राप्त कर लेता है। वह मनुष्य परमात्मा की भगती (के रंग) में रंगा जाता है, (इस की बरकति से वही) माया के मोह से निर्लिप रहता है और सवै-भाव मार केवह अपने आप को प्रभू चरणों में मिला लेता है।7। हे नानक ! प्रभू खुद ही जीवों को पैदा करता है और खुद ही माया की दौड़ भाग में जोड़ देता है। चौरासी लाख जोनियों के जीवों को रिजक भी प्रभू स्वयं ही पहुँचाता है। पर जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमर के उस सदा स्थिर प्रभू (के नाम रंग) में रंगे रहते हैं। वे वही कार करते हैं जो उस परमात्मा को परवान होती है।8।4।5।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ परमात्मा ने हरेक के शरीर के अंदर (अपना ज्योति-रूपी) हीरा लाल टिकाया हुआ है। (पर चुनिंदा भाग्यशालियों ने) गुरू के शबद द्वारा (उस हीरे लाल की) परख करके (साध-संगति में) परख कराई है। जिनके हृदय में सदा स्थिर प्रभू का नाम-हीरा बस गया है, वे सदा स्थिर नाम सिमरते हैं। वे (अपने आत्मिक जीवन की परख के वास्ते) सदा स्थिर नाम को ही कसौटी (के तौर पर) इस्तेमाल करते हैं।1। मैं सदा उनके सदके जाता हूँ, जो गुरू की बाणी को अपने मन में बसाते हैं। उन्होंने माया में विचरते हुए ही (इस बाणी की बरकति से) निरंजन प्रभू को ढूंढ लिया है, वे अपनी सुरति को प्रभू की ज्योति में मिलाए रखते हैं।1।रहाउ। (एक तरफ) इस मानव शरीर में (माया का) बहुत खिलारा बिखरा हुआ है। (दूसरी तरफ) प्रभू माया के प्रभाव सेऊपर है, अपहुँच है, बेअंत है। उसका नाम (मनुष्य को कैसे प्राप्त हो?)। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है, वही (निरंजन के नाम को) प्राप्त करता है। प्रभू स्वयं ही मेहर करके (उसे अपने चरणों में) मिला लेता है।2। पालणहारा प्यारा प्रभू (जिस मनुष्य के हृदय में अपना) सदा स्थिर नाम दृढ़ करता है। वह मनुष्य गुरू की कृपा से सदा स्थिर प्रभू में अपना मन जोड़ता है। (उसे यकीन बन जाता है कि) सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा ही सभी जगहों में मौजूद है, वह सदा कायम रहने वाले परमात्मा में लीन रहता है।3। (हे भाई !) मेरा प्यारा प्रभू सदा कायम रहने वाला है, उसे किसी किस्म की मुथाजी भी नहीं। वह सब जीवों के पाप और औगुण दूर करने की ताकत रखता है। प्रेम प्यार से उसका ध्यान धरना चाहिए। उसके डर अदब में रह के प्यार से उसकी भगती (अपने हृदय में) पक्की करनी चाहिए।4। हे सदा स्थिर प्रभू ! आपकी भक्ति (की दाति जीव को तभी मिलती है यदि) आपकी रजा हैं। (हे भाई ! भक्ति व अन्य सांसारिक पदार्थों की दाति) प्रभू स्वयं ही (जीवों को) देता है। (दे दे के वह) पछताता भी नहीं। (क्योंकि) सब जीवों को दातें देने वाला वह खुद ही खुद है। गुरू के शबद से (जीव को विकारों की ओर से) मार के सवयं ही आत्मिक जीवन देने वाला है।5। हे हरी ! आपके बिना मुझे (अपना) कोई और (सहारा) नहीं दिखता। हे हरी ! मैं आपकी ही सेवा भगती करता हूँ। मैं आपकी ही सिफत-सालाह करता हूँ। हे सदा कायम रहने वाले प्रभू ! आप स्वयं ही मुझे अपने चरणों से जोड़े रख। आपकी पूरी मेहर से ही आपको मिल सकते हैं।6। हे प्रभू ! आपके जैसा मुझे और कोई नहीं दिखता। आपकी मेहर की निगाह से ही (अगर आपकी भगती की दाति मिले तो आपका यह) शरीर सफल हैं सकता है। हे हरी ! आप स्वयं ही हर समय जीवों की संभाल करके (विकारों से) रक्षा करता है। (आपकी मेहर से) जो लोग गुरू की शरण पड़ते हैं, वे आत्मिक अडोलता में लीन रहते हैं।7। हे प्रभू ! आपके बराबर का मुझे और कोई नही दिखाई देता। तूने खुद ही रचना रची हैख् आप स्वयं ही इसका नाश करता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(माया के मोह के कारण जिंद) हर समय दिन रात जलती व भटकती है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।