करमु होवै गुरु किरपा करै ॥ इहु मनु जागै इसु मन की दुबिधा मरै ॥4॥ मन का सुभाउ सदा बैरागी ॥ सभ महि वसै अतीतु अनरागी ॥5॥ कहत नानकु जो जाणै भेउ ॥ आदि पुरखु निरंजन देउ ॥6॥5॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जब परमात्मा की मेहर होती है। गुरू (जीव पर) कृपा करता है। (जीव का) यह मन (माया की मोह की नींद में से) जाग उठता है। इस मन की मेर-तेर समाप्त हो जाती है। 4। हे भाई ! (जीव के) मन की असलियत वह प्रभू है जो माया से सदा निर्लिप रहता है। जो सबमें बसता है जो विरक्त है जो निर्मोह है। 5। नानक कहता है- जो मनुष्य (अपने इस असल के बारे में) यह भेद समझ लेता है वह (परमात्मा की याद में जुड़ के परमात्मा के नाम की बरकति से अपने अंदर से ममता की दुबिधा आदि को समाप्त करके) उस परमात्मा का रूप बन जाता है जो सबमें व्यापक है और जो माया के मोह से निर्लिप प्रकाश-रूप है। 6। 5।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 3॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम दुनिया का उद्धार करता है (जीवों को) संसार-समुंद्र से पार लंघाने की समर्था रखने वाला है। 1। हे भाई ! गुरू की कृपा से (गुरू की कृपा का पात्र बन के) परमात्मा का नाम (अपने हृदय में) संभाल। यह हरी-नाम सदा ही आपका साथ देगा। 1। रहाउ। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मूर्ख मनुष्य परमात्मा का नाम नहीं सिमरते। नाम के बिना वह किसी तरह भी (संसार के विकारों से) पार नहीं लांघ सकते। 2। (पर। हे भाई ! ये किसी के वश की बात नहीं) नाम की बख्शिश दातार प्रभू स्वयं ही करता है। (इस वास्ते) देने की समर्था वाले प्रभू के आगे ही सिर निवाना चाहिए (प्रभू से ही नाम की दाति माँगनी चाहिए)। 3। हे नानक ! जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर की निगाह करता है। उसको गुरू से मिलाता है। और वह मनुष्य अपने हृदय में प्रभू का नाम बसाता है। 4। 6।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 3॥ हे भाई ! जिन मनुष्यों को गुरू के माध्यम से परमात्मा का नाम मिल जाता है (वे विकारों से बच जाते हैं)। हे भाई ! चौदह भवनों के जितने भी जीव हैं। वे सारे परमात्मा के नाम से ही विकारों से बचते हैं। 1। हे भाई ! (जिस मनुष्य पर) परमात्मा अपनी कृपा करता है। उसको गुरू की शरण डाल कर (अपना) नाम देता है (यही है असल) इज्जत। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा के नाम में जिन मनुष्यों की प्रीति है जिनका प्यार है। वे स्वयं विकारों से बच गए। (उनमें से हरेक अपनी) सारी कुलों को बचाने के योग्य हो गया। 2। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य परमात्मा के नाम से टूट के जमराज के देश में जाते हैं। वे दुखी होते। (और नित्य विकारों की) चोटें सहते हैं। 3। हे नानक ! जिस मनुष्य को करतार स्वयं ही (नाम की दाति) देता है (उसको ही उसका) नाम मिलता है। 4। 7।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 3॥ हे भाई ! सनक। सनंदन। सनातन। सनतकुमार- ब्रहमा के इन चार पुत्रों – ने गुरू के शबद से परमात्मा को अपने मन में बसाया। परमात्मा के (चरणों के इस) प्यार ने उनको संसार-समुंदर से पार लंघा दिया। 1। हे प्रभू जी ! (मेरे ऊपर) अपनी कृपा बनाए रख। ता कि गुरू की शरण पड़ कर (मेरा) प्यार (आपके) नाम में ही बना रहे। 1। रहाउ। हे भाई ! पूरे गुरू से जिस मनुष्य के अंदर परमात्मा की सदा कायम रहने वाली प्रीति-भक्ति पैदा होती है। परमात्मा के साथ उसका मिलाप हो जाता है। 2। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर (जिस मनुष्य के) मन में परमात्मा का नाम आ बसता है। वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के। प्रभू-प्यार में टिक के। प्रभू की हजूरी में निवास करे रखता है। 3। हे नानक ! सब जीवों की संभाल करने के समर्थ जो प्रभू स्वयं ही (सबकी) संभाल कर रहा है। उसका नाम अपने हृदय में परोए रख। 4। 8।
भैरउ महला 3 ॥ कलजुग महि राम नामु उर धारु ॥ बिनु नावै माथै पावै छारु ॥1॥ राम नामु दुलभु है भाई ॥ गुर परसादि वसै मनि आई ॥1॥ रहाउ ॥ राम नामु जन भालहि सोइ ॥ पूरे गुर ते प्रापति होइ ॥2॥ हरि का भाणा मंनहि से जन परवाणु ॥ गुर कै सबदि नाम नीसाणु ॥3॥ सो सेवहु जो कल रहिआ धारि ॥ नानक गुरमुखि नामु पिआरि ॥4॥9॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 3॥ हे भाई ! इस विकारों-भरे जगत में (विकारों से बचने के लिए) परमात्मा का नाम (अपने) हृदय में बसाए रख। (जो मनुष्य) नाम से खाली (रहत है। वह लोक-परलोक की) निरादरी ही कमाता है। 1। हे भाई ! (और पदार्थों के मुकाबले में) परमात्मा का नाम बहुत मुश्किल से मिलता है। (यह तो) गुरू की कृपा से (किसी भाग्यशाली के) मन में आ बसता है। 1। रहाउ। पर। हे भाई ! (किसी के वश की बात नहीं) पूरे गुरू से (जिन मनुष्यों के भाग्यों में) हरी-नाम की प्राप्ति (लिखी हुई है)। सिर्फ वह मनुष्य ही परमात्मा का नाम तलाशते हैं। 2। हे भाई ! गुरू के शबद की बरकति से (जिन मनुष्यों को) हरी-नाम (की प्राप्ति) का परवाना (मिल जाता है) वह मनुष्य परमात्मा की रज़ा को (मीठा कर के) मानते हैं। वह मनुष्य (परमात्मा की हजूरी में) आदर पाते हैं। 3। हे नानक ! जो परमात्मा सारी सृष्टि की मर्यादा को अपनी सक्ता (कला) से चला रहा है उसकी सेवा-भक्ति करो। गुरू के द्वारा उसके नाम को प्यार करो। 4। 9।
भैरउ महला 3 ॥ कलजुग महि बहु करम कमाहि ॥ ना रुति न करम थाइ पाहि ॥1॥ कलजुग महि राम नामु है सारु ॥ गुरमुखि साचा लगै पिआरु ॥1॥ रहाउ ॥ तनु मनु खोजि घरै महि पाइआ ॥ गुरमुखि राम नामि चितु लाइआ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 3॥ जो (कर्म-काण्डी लोग) कलयुग में भी और-और (मिथे हुए धार्मिक) कर्म करते हैं। उनके वह कर्म (परमात्मा की हजूरी में) कबूल नहीं होते (क्योंकि शास्त्रों के अनुसार भी सिमरन के बिना और किसी कर्म की अब) ऋतु नहीं। 1। (अगर शास्त्रों की मर्यादा की तरफ़ भी देखो। तो भी) कलियुग में परमात्मा का नाम (जपना) श्रेष्ठ (कर्म) है। गुरू की शरण पड़ कर (नाम सिमरने से परमात्मा के साथ) सदा कायम रहने वाला प्यार बन जाता है। 1। रहाउ। जिस मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा के नाम में चित्त जोड़ा। उसने अपना तन अपना मन खोज के हृदय-घर में ही प्रभू को पा लिया। 2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जब परमात्मा की मेहर होती है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।