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अंग 1124

अंग
1124
राग केदारा
राग: केदारा · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
चलत कत टेढे टेढे टेढे ॥
असति चरम बिसटा के मूंदे दुरगंध ही के बेढे ॥1॥ रहाउ ॥
राम न जपहु कवन भ्रम भूले तुम ते कालु न दूरे ॥
अनिक जतन करि इहु तनु राखहु रहै अवसथा पूरे ॥2॥
आपन कीआ कछू न होवै किआ को करै परानी ॥
जा तिसु भावै सतिगुरु भेटै एको नामु बखानी ॥3॥
बलूआ के घरूआ महि बसते फुलवत देह अइआने ॥
कहु कबीर जिह रामु न चेतिओ बूडे बहुतु सिआने ॥4॥4॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: (हे अंजान जीव !) क्यों अकड़-अकड़ के चलता है। है तो आप हड्डियों। चमड़ी और विष्ठा से भरा हुआ। और र्दुगंध से लिबड़ा हुआ। 1। रहाउ। (हे अंजान !) आप प्रभू को नहीं सिमरता। किन भुलेखों में भूला हुआ है। (क्या आपका यह ख्याल है कि मौत नहीं आएगी।) मौत आपसे दूर नहीं। जिस शरीर को अनेकों यतन करके पाल रहा है। यह उम्र पूरी होने पर ढह जाएगा। 2। (पर) जीव के भी क्या वश। जीव का अपना किया कुछ नहीं हो सकता। जब प्रभू की रजा होती है (जीव को) गुरू मिलता है (और। गुरू की मेहर से) ये प्रभू के नाम को ही सिमरता है। 3। हे अंजान ! (यह आपका शरीर रेत के घर के समान है) आप रेत के घर में बसता है। और इस शरीर पर गर्व करता है। हे कबीर ! कह- जिन लोगों ने प्रभू का सिमरन नहीं किया। वह बड़े-बड़े समझदार भी (संसार-समुंद्र में) डूब गए। 4। 4।
टेढी पाग टेढे चले लागे बीरे खान ॥
भाउ भगति सिउ काजु न कछूऐ मेरो कामु दीवान ॥1॥
रामु बिसारिओ है अभिमानि ॥
कनिक कामनी महा सुंदरी पेखि पेखि सचु मानि ॥1॥ रहाउ ॥
लालच झूठ बिकार महा मद इह बिधि अउध बिहानि ॥
कहि कबीर अंत की बेर आइ लागो कालु निदानि ॥2॥5॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: (अहंकार में) टेढ़ी पगड़ी बाँधता है। अकड़ कर चलता है। पान के बीड़े खाता है। (और कहता है-) मेरा काम है हकूमत करनी। परमात्मा से प्यार अथवा प्रभू की भक्ति की मुझे कोई जरूरत नहीं। 1। मनुष्य अहंकार में (आ के) परमात्मा को भुला देता है। सोना और बड़ी सुंदर स्त्री देख के ये मान बैठता है कि ये सदा रहने वाले हैं। 1। रहाउ। (माया का) लालच। झूठ। विकार। बड़ा अहंकार- इन बातों से ही (सारी) उम्र गुजर जाती है। कबीर कहता है-आखिर उम्र खत्म होने पर मौत (सिर पर) आ ही पहुँचती है। 2। 5।
चारि दिन अपनी नउबति चले बजाइ ॥
इतनकु खटीआ गठीआ मटीआ संगि न कछु लै जाइ ॥1॥ रहाउ ॥
दिहरी बैठी मिहरी रोवै दुआरै लउ संगि माइ ॥
मरहट लगि सभु लोगु कुटंबु मिलि हंसु इकेला जाइ ॥1॥
वै सुत वै बित वै पुर पाटन बहुरि न देखै आइ ॥
कहतु कबीरु रामु की न सिमरहु जनमु अकारथु जाइ ॥2॥6॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: मनुष्य (यदि राजा भी बन जाए तो भी) थोड़े ही दिन राज भोग के (यहाँ से) चल पड़ता है। यदि इतना धन भी जोड़ ले तो भी कोई चीज़ (आखिर में जीव के) साथ नहीं जाती। 1। रहाउ। (जब मर जाता है तब) घर की दहलीज़ पर बैठी पत्नी रोती है। बाहरी दरवाजे तक उसकी माँ (उसके मुर्दा शरीर का) साथ करती है। मरघट तक और लोग व परिवार के व्यक्ति जाते हैं। पर जीवात्मा अकेली ही जाती है। 1। वह (अपने) पुत्र। धन। नगर शहर वापस कभी आ के नहीं देख सकता। कबीर कहता है- (हे भाई !) परमात्मा का सिमरन क्यों नहीं करता। (सिमरन के बिना) जीवन व्यर्थ चला जाता है। 2। 6।
रागु केदारा बाणी रविदास जीउ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
खटु करम कुल संजुगतु है हरि भगति हिरदै नाहि ॥
चरनारबिंद न कथा भावै सुपच तुलि समानि ॥1॥
रे चित चेति चेत अचेत ॥
काहे न बालमीकहि देख ॥
किसु जाति ते किह पदहि अमरिओ राम भगति बिसेख ॥1॥ रहाउ ॥
सुआन सत्रु अजातु सभ ते क्रि्रस्न लावै हेतु ॥
लोगु बपुरा किआ सराहै तीनि लोक प्रवेस ॥2॥
अजामलु पिंगुला लुभतु कुंचरु गए हरि कै पासि ॥
ऐसे दुरमति निसतरे तू किउ न तरहि रविदास ॥3॥1॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: रागु केदारा बाणी रविदास जीउ की सतिगुर प्रसादि॥ अगर कोई मनुष्य ऊँचे ब्राहमण कुल का हो। और। नित्य छह कर्म करता हो; पर अगर उसके हृदय में परमात्मा की भक्ति नहीं। यदि उसको प्रभू के सुंदर चरणों की बातें अच्छी नहीं लगतीं। तो वह चण्डाल के बराबर है। चण्ण्डाल जैसा है। 1। हे मेरे गाफिल मन ! प्रभू को सिमर। हे मन ! आप बाल्मीकि की तरफ क्यों नहीं देखता। एक नीच जाति से बहुत बड़े दर्जे पर पहुँच गया-ये महिमा परमात्मा की भक्ति के कारण ही थी। 1। रहाउ। (बाल्मीक) कुक्तों का वैरी था। सब लोगों से ज्यादा चण्डाल था। पर उसने प्रभू से प्यार किया। बेचारा जगत उसकी क्या उस्तति कर सकता है। उसकी शोभा तीनों लोकों में बिखर गई। 2। अजामल। पिंगुला। शिकारी। कुंचर- ये सारे (मुक्त हो के) प्रभू-चरणों में जा पहुँचे। हे रविदास ! अगर ऐसी बुरी मति वालों का उद्धार हो गया तो आप (इस संसार-सागर से) क्यों ना पार लांघेगा। 3। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे अंजान जीव !) क्यों अकड़-अकड़ के चलता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।