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अंग ११२१ · केदारा

अंग
1121
केदारा
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  1. गुन गोपाल उचारु रसना टेव एह परी ॥1॥
  2. प्रीतम बसत रिद महि खोर ॥
  3. रसना राम राम बखानु ॥
  4. हरि के नाम को आधारु ॥
  5. हरि के नाम बिनु ध्रिगु स्रोत ॥
  6. संतह धूरि ले मुखि मली ॥
  7. केदारा महला 5 ॥

गुन गोपाल उचारु रसना टेव एह परी ॥1॥

अंग ११२० से चला आ रहा अंश

गुन गोपाल उचारु रसना टेव एह परी ॥1॥
महा नाद कुरंक मोहिओ बेधि तीखन सरी ॥
प्रभ चरन कमल रसाल नानक गाठि बाधि धरी ॥2॥1॥9॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! अपनी जीभ से पृथ्वी के पालनहार प्रभू के गुण गाया कर। (जो मनुष्य सदा हरी-गुण उचारता है। उसको) यह आदत ही बन जाती है (फिर वह गुण उचारे बिना रह नहीं सकता)। 1। हे भाई ! (प्रीत का और भी करिश्मा देखो !) हिरन (घंडेहेड़े की) आवाज़ से मोहित हो जाता है (उसमें इतना मस्त होता है कि शिकारी के) नुकीले तीरों से छिद जाता है। (इसी तरह) हे नानक ! (जिस मनुष्य को) प्रभू के सुंदर चरण मधुर लगते हैं। (वह मनुष्य इन चरणों से अपनी पक्की) गाँठ बाँध लेता है। 2। 1। 9।

प्रीतम बसत रिद महि खोर ॥

केदारा महला 5 ॥
प्रीतम बसत रिद महि खोर ॥
भरम भीति निवारि ठाकुर गहि लेहु अपनी ओर ॥1॥ रहाउ ॥
अधिक गरत संसार सागर करि दइआ चारहु धोर ॥
संतसंगि हरि चरन बोहिथ उधरते लै मोर ॥1॥
गरभ कुंट महि जिनहि धारिओ नही बिखै बन महि होर ॥
हरि सकत सरन समरथ नानक आन नही निहोर ॥2॥2॥10॥

हिन्दी अर्थ: केदारा महला 5॥ हे प्रीतम प्रभू ! (मेरे) हृदय में कोरापन (खोट) बसा हुआ है (जो आपके चरणों से प्यार बनने नहीं देता)। हे ठाकुर ! (मेरे अंदर से) भटकना की दीवार दूर कर (ये दीवार मुझे आपके से दूर रख रही है)। (मेरा हाथ) पकड़ के मुझे अपने साथ (जोड़) ले (अपने चरणों में जोड़ ले)। 1। रहाउ। हे प्रीतम ! (आपके इस) संसार-समुंद्र में (विकारों के) अनेकों गड्ढे हैं। मेहर कर के (मुझे इनसे बचा के) किनारे पर चढ़ा ले। हे हरी ! संतजनों की संगति में (रख के मुझे अपने) चरणों के जहाज़ (में चढ़ा ले)। (आपके ये चरण) मुझे पार उतारने के समर्थ हैं। 1। हे भाई ! जिस परमात्मा ने माँ के पेट में बचाए रखा। विषय-विकारों के समुंद्र में (डूबते को बचानें वाला भी उसके बिना) कोई और नहीं। हे नानक ! परमात्मा सब ताकतों का मालिक है। शरण आए को बचाने में समर्थ है। (जो मनुष्य उसकी शरण आ पड़ता है। उसको) मुथाज़ी नहीं रह जाती। 2। 2। 10।

रसना राम राम बखानु ॥

केदारा महला 5 ॥
रसना राम राम बखानु ॥
गुन गोुपाल उचारु दिनु रैनि भए कलमल हान ॥ रहाउ ॥
तिआगि चलना सगल संपत कालु सिर परि जानु ॥
मिथन मोह दुरंत आसा झूठु सरपर मानु ॥1॥
सति पुरख अकाल मूरति रिदै धारहु धिआनु ॥
नामु निधानु लाभु नानक बसतु इह परवानु ॥2॥3॥11॥

हिन्दी अर्थ: केदारा महला 5॥ हे भाई ! (अपनी) जीभ से हर वक्त परमात्मा का नाम जपा कर। दिन-रात सृष्टि के पालनहार प्रभू के गुण गाया कर। (जो मनुष्य ये उद्यम करता है। उसके सारे) पाप नाश हो जाते हैं। रहाउ। हे भाई ! सारा धन-पदार्थ छोड़ के (आखिर हरेक प्राणी ने यहाँ से) चले जाना है। हे भाई ! मौत को (सदा अपने) सिर पर (खड़ी हुई) समझ। हे भाई ! नाशवंत पदार्थों का मोह। कभी ना खत्म होने वाली आशाएं - इनके निष्चित तौर पर नाशवंत मान। 1। हे भाई ! (अपने) हृदय में उस परमात्मा का ध्यान धरा कर जो सदा कायम रहने वाला है जो सर्व-व्यापक है और जो नाशवंत अस्तित्व वाला है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) परमात्मा का नाम (ही असल) खजाना है (असल) कमाई है। यह वस्तु (परमात्मा की हजूरी में) कबूल होती है। 2। 3। 11।

हरि के नाम को आधारु ॥

केदारा महला 5 ॥
हरि के नाम को आधारु ॥
कलि कलेस न कछु बिआपै संतसंगि बिउहारु ॥ रहाउ ॥
करि अनुग्रहु आपि राखिओ नह उपजतउ बेकारु ॥
जिसु परापति होइ सिमरै तिसु दहत नह संसारु ॥1॥
सुख मंगल आनंद हरि हरि प्रभ चरन अंम्रित सारु ॥
नानक दास सरनागती तेरे संतना की छारु ॥2॥4॥12॥

हिन्दी अर्थ: केदारा महला 5॥ हे भाई ! (जिस मनुष्य को सदा) परमात्मा के नाम का आसरा रहता है। जो मनुष्य संत जनों की संगति में रहके हरी-नाम का वणज करता है। (दुनिया के) झगड़े-कलेश (इनमें से) कोई भी उस पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकते। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा स्वयं मेहर कर के जिस मनुष्य की रक्षा करता है। उसके अंदर कोई विकार पैदा नहीं होता। हे भाई ! जिस मनुष्य को नाम की दाति धुर-दरगाह से मिलती है। वही हरी-नाम सिमरता है। फिर उस (के आत्मिक जीवन) को संसार (भाव। संसार के विकारों की आग) जला नहीं सकती। 1। हे भाई ! हरी-प्रभू के चरण आत्मिक जीवन देने वाले हैं। इनको अपने हृदय में संभाल। (आपके अंदर) आत्मिक सुख खुशियां आनंद (पैदा होंगे)। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) आपका दास आपकी शरण आया है आपके संत जनों की चरण-धूड़ (माँगता है)। 2। 4। 12।

हरि के नाम बिनु ध्रिगु स्रोत ॥

केदारा महला 5 ॥
हरि के नाम बिनु ध्रिगु स्रोत ॥
जीवन रूप बिसारि जीवहि तिह कत जीवन होत ॥ रहाउ ॥
खात पीत अनेक बिंजन जैसे भार बाहक खोत ॥
आठ पहर महा स्रमु पाइआ जैसे बिरख जंती जोत ॥1॥
तजि गोुपाल जि आन लागे से बहु प्रकारी रोत ॥
कर जोरि नानक दानु मागै हरि रखउ कंठि परोत ॥2॥5॥13॥

हिन्दी अर्थ: केदारा महला 5॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम सुने बिना (मनुष्य के) कान धिक्कार-योग्य हैं (क्योंकि ये फिर निंदा-चुगली में ही व्यस्त रहते हैं)। हे भाई ! जो मनुष्य सारे जगत के जीवन प्रभू को भुला के जीते हैं (जिंदगी के दिन गुजारते हैं)। उनका जीना कैसा है। (उनके जीने को जीना नहीं कहा जा सकता)। रहाउ। हे भाई ! (हरी-नाम को बिसार के जो मनुष्य) अनेकों अच्छे-अच्छे खाने खाते-पीते हैं। (वे ऐसे ही हैं) जैसे भार ढोने वाले गधे। (हरी-नाम को बिसारने वाले) आठों पहर (माया की खातिर दौड़-भाग करते हुए) बहुत थकते हैं। जैसे कोई बैल कोल्हू के आगे जोता हुआ होता है। 1। हे भाई ! सृष्टि के पालनहार (का नाम) त्याग के जो मनुष्य अन्य आहरों में लगे रहते हैं। वे कई तरीकों से दुखी होते रहते हैं। हे नानक ! (कह-) हे हरी ! (आपका दास दोनों) हाथ जोड़ कर (आपके नाम का) दान माँगता है (अपना नाम दे)। मैं (इसको अपने) गले में परो के रखूँ। 2। 5। 13।

संतह धूरि ले मुखि मली ॥

केदारा महला 5 ॥
संतह धूरि ले मुखि मली ॥
गुणा अचुत सदा पूरन नह दोख बिआपहि कली ॥ रहाउ ॥
गुर बचनि कारज सरब पूरन ईत ऊत न हली ॥
प्रभ एक अनिक सरबत पूरन बिखै अगनि न जली ॥1॥
गहि भुजा लीनो दासु अपनो जोति जोती रली ॥
प्रभ चरन सरन अनाथु आइओ नानक हरि संगि चली ॥2॥6॥14॥

हिन्दी अर्थ: केदारा महला 5॥ हे भाई ! (जिस मनुष्य ने) संतजनों की चरण-धूड़ लेकर (अपने) माथे पर मल ली (और। संतों की संगति में जिसने परमात्मा के गुण गाए)। अविनाशी और सर्व-व्यापक प्रभू के गुण हृदय में बसाने की बरकति से जगत के विकार उस पर अपना जोर नहीं डाल सकते। रहाउ। हे भाई ! (जिस मनुष्य ने संतों की चरण-धूड़ अपने माथे पर लगाई) गुरू के उपदेश का सदका उसके सारे काम सिरे चढ़ जाते हैं। उसका मन इधर-उधर नहीं डोलता। (उसको इस तरह दिख जाता है कि) एक परमात्मा अनेकों रूपों में सब जगह व्यापक है। वह मनुष्य विकारों की आग में नहीं जलता (उसका आत्मिक जीवन विकारों की आग में तबाह नहीं होता)। 1। हे नानक ! (कह- हे भाई !) प्रभू अपने जिस दास को (उसकी) बाँह पकड़ कर अपने चरणों में जोड़ लेता है। उसकी जिंद प्रभू के चरणों में लीन हो जाती है। जो अनाथ (प्राणी भी) प्रभू के चरणों की शरण में आ जाता है। वह प्राणी प्रभू की याद में ही जीवन-राह पर चलता है। 2। 6। 14।

केदारा महला 5 ॥

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केदारा महला 5 ॥

हिन्दी अर्थ: केदारा महला 5॥

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ११२१ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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