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अंग 111

अंग
111
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
लख चउरासीह जीअ उपाए ॥
जिस नो नदरि करे तिसु गुरू मिलाए ॥
किलबिख काटि सदा जन निरमल दरि सचै नामि सुहावणिआ ॥6॥
लेखा मागै ता किनि दीऐ ॥
सुखु नाही फुनि दूऐ तीऐ ॥
आपे बखसि लए प्रभु साचा आपे बखसि मिलावणिआ ॥7॥
आपि करे तै आपि कराए ॥
पूरे गुर कै सबदि मिलाए ॥
नानक नामु मिलै वडिआई आपे मेलि मिलावणिआ ॥8॥2॥3॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: परमात्मा ने चौरासी लाख जूनियों में बेअंत जीव पैदा किए हुये हैं। जिस जीव पे वह मेहर की नजर करता है, उसे गुरू मिला देता है। (गुरू चरणों में जुड़े हुए) लोग अपने पाप दूर करके सदा पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं, और सदा स्थिर प्रभू के दर पे प्रभू के नाम की बरकति से शोभा पाते हैं।6। (हम जीव सदा ही भूल करने वाले हैं) यदि प्रभू (हमारे किए कर्मों का) हिसाब मांगने लगे, तो कोई जीव हिसाब नहीं दे सकता (अर्थात, लेखे में पूरा नही उतर सकता)। (अपने किए कर्मों का) लेखा गिनाने से (भाव, लेखे में सुर्ख-रू होने की आस से) किसी को आत्मिक आनंद नहीं मिल सकता। …… प्रभू स्वयं ही मेहर करके (अपने चरणों में) मिला लेता है।7। (सब जीवों में व्यापक हो के) प्रभू स्वयं ही (सब कुछ) करता है और स्वयं ही (प्रेरना करके जीवों से) करवाता है। प्रभू स्वयं ही पूरे गुरू के शबद में जोड़ के अपने चरणों में मिलाता है। हे नानक ! जिस मनुष्य को (उसके दर से उसका) नाम मिलता है, उसे (उसकी हजूरी में) आदर मिलता है, प्रभू स्वयं हीउसको अपने चरणों में जोड़ लेता है।8।2।3।
माझ महला 3 ॥
इको आपि फिरै परछंना ॥
गुरमुखि वेखा ता इहु मनु भिंना ॥
त्रिसना तजि सहज सुखु पाइआ एको मंनि वसावणिआ ॥1॥
हउ वारी जीउ वारी इकसु सिउ चितु लावणिआ ॥
गुरमती मनु इकतु घरि आइआ सचै रंगि रंगावणिआ ॥1॥ रहाउ ॥
इहु जगु भूला तैं आपि भुलाइआ ॥
इकु विसारि दूजै लोभाइआ ॥
अनदिनु सदा फिरै भ्रमि भूला बिनु नावै दुखु पावणिआ ॥2॥
जो रंगि राते करम बिधाते ॥
गुर सेवा ते जुग चारे जाते ॥
जिस नो आपि देइ वडिआई हरि कै नामि समावणिआ ॥3॥
माइआ मोहि हरि चेतै नाही ॥
जमपुरि बधा दुख सहाही ॥
अंना बोला किछु नदरि न आवै मनमुख पापि पचावणिआ ॥4॥
इकि रंगि राते जो तुधु आपि लिव लाए ॥
भाइ भगति तेरै मनि भाए ॥
सतिगुरु सेवनि सदा सुखदाता सभ इछा आपि पुजावणिआ ॥5॥
हरि जीउ तेरी सदा सरणाई ॥
आपे बखसिहि दे वडिआई ॥
जमकालु तिसु नेड़ि न आवै जो हरि हरि नामु धिआवणिआ ॥6॥
अनदिनु राते जो हरि भाए ॥
मेरै प्रभि मेले मेलि मिलाए ॥
सदा सदा सचे तेरी सरणाई तूं आपे सचु बुझावणिआ ॥7॥
जिन सचु जाता से सचि समाणे ॥
हरि गुण गावहि सचु वखाणे ॥
नानक नामि रते बैरागी निज घरि ताड़ी लावणिआ ॥8॥3॥4॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ (दृष्टमान जगतरूपी पर्दे में) ढका हुआ परमात्मा स्वयं ही स्वयं (सारे जगत में) विचर रहा है। जिन लोगों ने गुरू की शरण पड़ कर (उस गुप्त प्रभू को) जब देख लिया तब उनका मन (उसके प्रेम रस में) भीग गया। (माया की) तृष्णा त्याग के उन्होंने आत्मिक अडोलता का आनंद हासिल कर लिया। एक परमात्मा ही परमात्मा उनके मन में बस गया। मैं उन मनुष्यों से सदा सदके हूँ कुर्बान हूँ, जो एक परमात्मा के साथ चित्त जोड़ते हैं। गुरू की शिक्षा लेकर जिनका मन परमात्मा के चरणों में टिक गया है, वे सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के प्रेम रंग में (सदा के लिए) रंगे गए।1।रहाउ। (हे प्रभू !) ये जगत गलत रास्ते पर पड़ा हुआ है (पर इसके क्या वश?) तूने खुद ही इसे गलत रास्ते पर डाला हुआ है। आपको एक को भूल के माया के मोह में फंसा हुआ है। भटकन के कारण कुमार्ग पर पड़ा हुआ जगत सदा हर वक्त भटकता फिरता है, और आपके नाम से टूट के दु:ख सह रहा है।2। जीवों को किए कर्मों अनुसार पैदा करने वाले परमात्मा के प्रेम रंग में जो लोग मस्त रहते हैं, वे गुरू की बताई सेवा के कारण सदा के लिए प्रसिद्ध हो जाते हैं। (पर ये उसकी अपनी ही मेहर है) परमात्मा जिस मनुष्य को खुद ही इज्जत देता है, वह मनुष्य परमात्मा के नाम में जुड़ा रहता है।3। जो मनुष्य माया के मोह में फंस के परमात्मा को याद नहीं रखता, वह (अपने किए कर्मों) के विकारों में बंधा हुआ यम की नगरी में (आत्मिक मौत के कब्जे में आया हुआ) दु:ख सहता है। माया के मोह में अंधा हुआ वह मनुष्य (परमात्मा की सिफत सलाह) सुनने से अस्मर्थ रहता है। (माया के बगैर) उसे और कुछ दिखता भी नहीं। अपने मन के पीछे चलने वाले बंदे पाप (वाले जीवन) में ही जलते रहते हैं।4। (हे प्रभू !) जिनमें तूने खुद, अपने नाम की लगन लगाई है, वे आपके प्रेम रंग में रंगे रहते हैं। (आपके चरणों के साथ) प्रेम के कारण (आपकी) भक्ति के कारण वह आपको आपके मन में प्यारे लगते हैं। वह मनुष्य आत्मिक आनंद देने वाले गुरू की बताई हुई सेवा करते हैं हे प्रभू ! आप स्वयं ही उनकी हरेक इच्छा पूरी करता है।5। हे प्रभू जी ! मैं सदा ही आपका आसरा देखता हूँ। आप जीवों को बड़प्पन दे के खुद ही बख्शिश करता है। (हे भाई !) जो मनुष्य सदा परमात्मा का नाम सिमरता है, आत्मिक मौत उसके नजदीक नहीं फटक सकती।6। जो मनुष्य परमात्मा को प्यारे लगते हैं, वे हर समय (हर रोज) उसके प्रेम में मस्त रहते हैं। मेरे प्रभू ने उनको अपने साथ मिला लिया है, अपने चरणों में जोड़ लिया है। हे सदा स्थिर रहने वाले प्रभू ! वे मनुष्य सदा ही सदा ही आपका पल्ला पकड़े रहते हैं, आप स्वयं ही उन्हें अपने नाम की सूझ प्रदान करता है।7। जिन लोगों ने सदा स्थिर प्रभू के साथ गहरी सांझ डाली है, वह सदा स्थिर प्रभू का नाम उचार उचार के सदैव उसके गुण गाते हैं। हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम में रंगे रहते हैं, वो माया के मोह की ओर से विरक्त हो जाते हैं, वह (बाहर माया के पीछे भटकने की जगह) अपने हृदय धर में टिके रहते हैं।8।3।4।
माझ महला 3 ॥
सबदि मरै सु मुआ जापै ॥
कालु न चापै दुखु न संतापै ॥
जोती विचि मिलि जोति समाणी सुणि मन सचि समावणिआ ॥1॥
हउ वारी जीउ वारी हरि कै नाइ सोभा पावणिआ ॥
सतिगुरु सेवि सचि चितु लाइआ गुरमती सहजि समावणिआ ॥1॥ रहाउ ॥
काइआ कची कचा चीरु हंढाए ॥
दूजै लागी महलु न पाए ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के (स्वै भाव की ओर से) मरता है, वह (स्वै भाव की ओर से) मरा हुआ मनुष्य (जगत में) आदर मान पाता है। उसे आत्मिक मौत (अपने पंजे में) फंसा नहीं सकती, उसे कोई दु:ख कलेश दुखी नहीं कर सकता। प्रभू की ज्योति में मिल के उसकी सुरति प्रभू में ही लीन रहती है। और हे मन ! वह मनुष्य (प्रभू की सिफत-सालाह) सुन के सदा स्थिर परमात्मा में समाया रहता है।1। मैं सदा उन पे से सदके जाता हूँ, जो परमात्मा के नाम में जुड़ के (लोक परलोक में) शोभा कमाते हैं। जो गुरू की बताई हुई सेवा कर-कर के सदा स्थिर प्रभू में चित्त जोड़ते हैं और गुरू की मति पर चल के आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं।1।रहाउ। ये शरीर नाशवंत है। जैसे कमजोर सा कपड़ा है (पर मनुष्य की जिंद इस) जरजर कपड़े को ही इस्तेमाल करती रहती है (भाव, जिंद शारीरिक भोगों में ही मगन रहती है)। (जिंद) माया के प्यार में लगी रहती है (इस वास्ते यह प्रभू चरणों में) ठिकाना हासिल नही कर सकती।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “परमात्मा ने चौरासी लाख जूनियों में बेअंत जीव पैदा किए हुये हैं।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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