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1101
मारू
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- सुख समूहा भोग भूमि सबाई को धणी ॥
- हिकस कूं तू आहि पछाणू भी हिकु करि ॥
- निहचलु एकु नराइणो हरि अगम अगाधा ॥
- जो डुबंदो आपि सो तराए किन॑ खे ॥
- जिथै कोइ कथंनि नाउ सुणंदो मा पिरी ॥
- मेरी मेरी किआ करहि पुत्र कलत्र सनेह ॥
- नैनी देखउ गुर दरसनो गुर चरणी मथा ॥
- लगड़ीआ पिरीअंनि पेखंदीआ ना तिपीआ ॥
- कथड़ीआ संताह ते सुखाऊ पंधीआ ॥
- डूंगरि जला थला भूमि बना फल कंदरा ॥
- हरि जी माता हरि जी पिता हरि जीउ प्रतिपालक ॥
· मारू की वार, डखणे सलोक · राग मारू
सुख समूहा भोग भूमि सबाई को धणी ॥
मः 5 ॥
सुख समूहा भोग भूमि सबाई को धणी ॥
नानक हभो रोगु मिरतक नाम विहूणिआ ॥2॥
सुख समूहा भोग भूमि सबाई को धणी ॥
नानक हभो रोगु मिरतक नाम विहूणिआ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ अगर किसी मनुष्य को सारे सुख भोगने को मिले हों। और वह सारी धरती का मालिक हो। (पर) हे नानक! अगर वह प्रभू के नाम से वंचित है उसकी आत्मा मुर्दा है। सारे सुख उसके लिए रोग के (समान) हैं। 2।
· मारू की वार, डखणे सलोक · राग मारू
हिकस कूं तू आहि पछाणू भी हिकु करि ॥
मः 5 ॥
हिकस कूं तू आहि पछाणू भी हिकु करि ॥
नानक आसड़ी निबाहि मानुख परथाई लजीवदो ॥3॥
हिकस कूं तू आहि पछाणू भी हिकु करि ॥
नानक आसड़ी निबाहि मानुख परथाई लजीवदो ॥3॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक! सिर्फ एक परमात्मा को मिलने की चाहत रखें। एक परमात्मा को ही अपना मित्र बनाएँ। वही आपकी आशा पूरी करने वाला है। किसी मनुष्य का आसरा लेना लज्जा का कारण बनता है। 3।
· मारू की वार, पउड़ी · राग मारू
निहचलु एकु नराइणो हरि अगम अगाधा ॥
पउड़ी ॥
निहचलु एकु नराइणो हरि अगम अगाधा ॥
निहचलु नामु निधानु है जिसु सिमरत हरि लाधा ॥
निहचलु कीरतनु गुण गोबिंद गुरमुखि गावाधा ॥
सचु धरमु तपु निहचलो दिनु रैनि अराधा ॥
दइआ धरमु तपु निहचलो जिसु करमि लिखाधा ॥
निहचलु मसतकि लेखु लिखिआ सो टलै न टलाधा ॥
निहचल संगति साध जन बचन निहचलु गुर साधा ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन सदा सदा आराधा ॥19॥
निहचलु एकु नराइणो हरि अगम अगाधा ॥
निहचलु नामु निधानु है जिसु सिमरत हरि लाधा ॥
निहचलु कीरतनु गुण गोबिंद गुरमुखि गावाधा ॥
सचु धरमु तपु निहचलो दिनु रैनि अराधा ॥
दइआ धरमु तपु निहचलो जिसु करमि लिखाधा ॥
निहचलु मसतकि लेखु लिखिआ सो टलै न टलाधा ॥
निहचल संगति साध जन बचन निहचलु गुर साधा ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन सदा सदा आराधा ॥19॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ सिर्फ अपहुँच और अथाह हरी-परमात्मा ही सदा-स्थिर रहने वाला है। उस हरी का नाम-खजाना भी ना खत्म होने वाला है। नाम सिमरने से परमात्मा मिल जाता है। गुरू की शरण पड़ के गाए हुए परमात्मा के गुणों का कीर्तन भी (ऐसा खजाना है जो) सदा कायम रहता है। दिन-रात प्रभू का सिमरन करना चाहिए। यही है सदा-स्थिर धर्म और यही है सदा कायम रहने वाला तप। पर यह अटल तप। दया और धर्म उसी को मिलता है जिसके भाग्यों में प्रभू की मेहर से लिखा गया है। माथे पर लिखा हुआ ये लेख ऐसा है कि किसी के टाले नहीं टल सकता। साध जनों की संगत (भी मनुष्य के जीवन के लिए एक) अटल (रास्ता) है। गुरू-साधु के वचन भी (मनुष्य की अगुवाई के लिए) अटॅल (बोल) हैं। पूर्बले जन्म में किए कर्मों के लेख जिनके माथे पर उघड़े हैं। उन्होंने सदा ही (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा का सिमरन किया है। 19।
· मारू की वार, डखणे सलोक · राग मारू
जो डुबंदो आपि सो तराए किन॑ खे ॥
सलोक डखणे मः 5 ॥
जो डुबंदो आपि सो तराए किन॑ खे ॥
तारेदड़ो भी तारि नानक पिर सिउ रतिआ ॥1॥
जो डुबंदो आपि सो तराए किन॑ खे ॥
तारेदड़ो भी तारि नानक पिर सिउ रतिआ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक डखणे महला 5॥ जो मनुष्य स्वयं ही (संसार-समुंद्र के विकारों की लहरों में) डूब रहा है। वह और किसी को (कैसे) तैरा सकता है। हे नानक! जो मनुष्य पति-परमात्मा (के प्यार) में रंगे हुए हैं वे (इन मुश्किलों में से) स्वयं भी पार हो जाते हैं और औरों का भी उद्धार कर लेते हैं। 1।
· मारू की वार, डखणे सलोक · राग मारू
जिथै कोइ कथंनि नाउ सुणंदो मा पिरी ॥
मः 5 ॥
जिथै कोइ कथंनि नाउ सुणंदो मा पिरी ॥
मूं जुलाऊं तथि नानक पिरी पसंदो हरिओ थीओसि ॥2॥
जिथै कोइ कथंनि नाउ सुणंदो मा पिरी ॥
मूं जुलाऊं तथि नानक पिरी पसंदो हरिओ थीओसि ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ जिस जगह (भाव, साध-संगति में) कोई (गुरमुख लोग) मेरे पति-प्रभू का नाम सुनते उचारते हों। मैं भी वहीं (चल के) जाऊँ। (क्योंकि) हे नानक! (साध-संगति में) पिर का दीदार कर के (अपना आप) हरा हो जाता है (आत्मिक जीवन मिल जाता है)। 2।
· मारू की वार, डखणे सलोक · राग मारू
मेरी मेरी किआ करहि पुत्र कलत्र सनेह ॥
मः 5 ॥
मेरी मेरी किआ करहि पुत्र कलत्र सनेह ॥
नानक नाम विहूणीआ निमुणीआदी देह ॥3॥
मेरी मेरी किआ करहि पुत्र कलत्र सनेह ॥
नानक नाम विहूणीआ निमुणीआदी देह ॥3॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ मोह में फस के आप क्यों ये कहे जा रहे हैं कि ये मेरी स्त्री है यह मेरा पुत्र है। हे नानक! (मोह में फस के) प्रभू के नाम से वंचित रहके ये शरीर जिसकी कोई बुनियाद नहीं (बिसात नहीं) (व्यर्थ चला जाएगा)। 3।
· मारू की वार, पउड़ी · राग मारू
नैनी देखउ गुर दरसनो गुर चरणी मथा ॥
पउड़ी ॥
नैनी देखउ गुर दरसनो गुर चरणी मथा ॥
पैरी मारगि गुर चलदा पखा फेरी हथा ॥
अकाल मूरति रिदै धिआइदा दिनु रैनि जपंथा ॥
मै छडिआ सगल अपाइणो भरवासै गुर समरथा ॥
गुरि बखसिआ नामु निधानु सभो दुखु लथा ॥
भोगहु भुंचहु भाईहो पलै नामु अगथा ॥
नामु दानु इसनानु दिड़ु सदा करहु गुर कथा ॥
सहजु भइआ प्रभु पाइआ जम का भउ लथा ॥20॥
नैनी देखउ गुर दरसनो गुर चरणी मथा ॥
पैरी मारगि गुर चलदा पखा फेरी हथा ॥
अकाल मूरति रिदै धिआइदा दिनु रैनि जपंथा ॥
मै छडिआ सगल अपाइणो भरवासै गुर समरथा ॥
गुरि बखसिआ नामु निधानु सभो दुखु लथा ॥
भोगहु भुंचहु भाईहो पलै नामु अगथा ॥
नामु दानु इसनानु दिड़ु सदा करहु गुर कथा ॥
सहजु भइआ प्रभु पाइआ जम का भउ लथा ॥20॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ मैं आँखों से गुरू के दर्शन करता हूँ। अपना माथा गुरू के चरणों में धरता हूँ। पैरों से मैं गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलता हूँ। हाथों से मैं (गुरू की संगति को) पंखा करता हूँ। (इस संयम में रह कर) मैं परमात्मा का स्वरूप अपने हृदय में टिकाता हूँ और दिन-रात (उसका नाम) जपता हूँ। सब ताकतों के मालिक गुरू में श्रद्धा धार के मैंने (माया वाली) सारा (मोह भरा) अपनत्व दूर कर लिया है। गुरू ने मुझे प्रभू का नाम-खजाना दिया है। (अब) मेरा दुख-कलेश उतर गया है। हे भाइयो! (आप भी) अकथ प्रभू के नाम-खजाने को (खुले दिल) से इस्तेमाल करें। और एकत्र करें। सदा गुरू की कहानियाँ करें। नाम जपें। सेवा करें और अपना आचरण पवित्र बनाएँ। (इस तरह जब) मन की अडोलता बन जाती है, तब ईश्वर मिल जाता है। (फिर) मौत का डर भी दूर हो जाता है (आत्मिक मौत नजदीक नहीं फटकती)। 20।
· मारू की वार, डखणे सलोक · राग मारू
लगड़ीआ पिरीअंनि पेखंदीआ ना तिपीआ ॥
सलोक डखणे मः 5 ॥
लगड़ीआ पिरीअंनि पेखंदीआ ना तिपीआ ॥
हभ मझाहू सो धणी बिआ न डिठो कोइ ॥1॥
लगड़ीआ पिरीअंनि पेखंदीआ ना तिपीआ ॥
हभ मझाहू सो धणी बिआ न डिठो कोइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक डखणे महला 5॥ (मेरी आँखें) पति प्रभू के साथ लग गई हैं (अब ये आँखें उसको) देख-देख के तृप्त नहीं होतीं (थकती नहीं हैं)। वह मालिक प्रभू (अब मुझे) सबमें (दिखाई दे रहा है)। (मैंने कहीं भी उसके बिना उस जैसा) कोई दूसरा नहीं देखा। 1।
· मारू की वार, डखणे सलोक · राग मारू
कथड़ीआ संताह ते सुखाऊ पंधीआ ॥
मः 5 ॥
कथड़ीआ संताह ते सुखाऊ पंधीआ ॥
नानक लधड़ीआ तिंनाह जिना भागु मथाहड़ै ॥2॥
कथड़ीआ संताह ते सुखाऊ पंधीआ ॥
नानक लधड़ीआ तिंनाह जिना भागु मथाहड़ै ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ संत-जनों के उपदेश-मयी वचन सुख दिखाने वाली राह हैं; (पर) हे नानक! ये बचन उनको ही मिलते हैं जिनके माथे पर (पूर्बले भले कर्मों के) भाग्य (उघड़ते हैं)। 2।
· मारू की वार, डखणे सलोक · राग मारू
डूंगरि जला थला भूमि बना फल कंदरा ॥
मः 5 ॥
डूंगरि जला थला भूमि बना फल कंदरा ॥
पाताला आकास पूरनु हभ घटा ॥
नानक पेखि जीओ इकतु सूति परोतीआ ॥3॥
डूंगरि जला थला भूमि बना फल कंदरा ॥
पाताला आकास पूरनु हभ घटा ॥
नानक पेखि जीओ इकतु सूति परोतीआ ॥3॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ पहाड़ों में, समुंद्रों में। रेतीली जगहों में। धरती में, जंगलों में, फलों में, गुफाओं में। पाताल आकाश में, सारे ही शरीरों में (परमात्मा) व्यापक है। हे नानक! जिस प्रभू ने (सारी ही रचना को) एक ही धागे में (भाव, हुकम में, मर्यादा में) पिरो के रखा है उसको देख-देख के मुझे आत्मिक जीवन मिलता है। 3।
· मारू की वार, पउड़ी · राग मारू
हरि जी माता हरि जी पिता हरि जीउ प्रतिपालक ॥
पउड़ी ॥
हरि जी माता हरि जी पिता हरि जीउ प्रतिपालक ॥
हरि जी मेरी सार करे हम हरि के बालक ॥
सहजे सहजि खिलाइदा नही करदा आलक ॥
अउगणु को न चितारदा गल सेती लाइक ॥
मुहि मंगां सोई देवदा हरि पिता सुखदाइक ॥
हरि जी माता हरि जी पिता हरि जीउ प्रतिपालक ॥
हरि जी मेरी सार करे हम हरि के बालक ॥
सहजे सहजि खिलाइदा नही करदा आलक ॥
अउगणु को न चितारदा गल सेती लाइक ॥
मुहि मंगां सोई देवदा हरि पिता सुखदाइक ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ परमात्मा मेरा माता पिता है (माता-पिता की तरह मुझे) पालने वाला है। प्रभू मेरी संभाल करता है। हम प्रभू के बच्चे हैं। मुझे मेरा हरी अडोल अवस्था में टिका के जीवन-खेल खिला रहा है। (इस बात से रक्ती भर भी) आलस नहीं करता। मेरे किसी अवगुण को याद नहीं रखता। (सदा) अपने गले से (मुझे) लगाए रखता है। जो कुछ मैं मुँह से माँगता हूँ। मेरा सुखदायी पिता-प्रभू वही-वही दे देता है।
रचयिता और स्रोत
यह मारू राग के क्रम का अंग 1101 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1101 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।