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- नानक से अखड़ीआ बिअंनि जिनी डिसंदो मा पिरी ॥3॥
- जिनि जनि गुरमुखि सेविआ तिनि सभि सुख पाई ॥
- डखणे मः 5 ॥
- सजण मुखु अनूपु अठे पहर निहालसा ॥
- सजण सचु परखि मुखि अलावणु थोथरा ॥
- धरति आकासु पातालु है चंदु सूरु बिनासी ॥
- डखणे मः 5 ॥
- आसकु आसा बाहरा मू मनि वडी आस ॥
- विछोड़ा सुणे डुखु विणु डिठे मरिओदि ॥
- तट तीरथ देव देवालिआ केदारु मथुरा कासी ॥
- सै नंगे नह नंग भुखे लख न भुखिआ ॥
नानक से अखड़ीआ बिअंनि जिनी डिसंदो मा पिरी ॥3॥
नानक से अखड़ीआ बिअंनि जिनी डिसंदो मा पिरी ॥3॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (तृष्णा-मारी आँखों से प्यारा प्रभू दिखाई नहीं दे सकता) वे आँखें (इन तृष्णा-ग्रसित आँखों से अलग) और ही किस्म की हैं। जिनसे प्यारा प्रभू-पति दिखाई देता है। 3।
जिनि जनि गुरमुखि सेविआ तिनि सभि सुख पाई ॥
पउड़ी ॥
जिनि जनि गुरमुखि सेविआ तिनि सभि सुख पाई ॥
ओहु आपि तरिआ कुटंब सिउ सभु जगतु तराई ॥
ओनि हरि नामा धनु संचिआ सभ तिखा बुझाई ॥
ओनि छडे लालच दुनी के अंतरि लिव लाई ॥
ओसु सदा सदा घरि अनंदु है हरि सखा सहाई ॥
ओनि वैरी मित्र सम कीतिआ सभ नालि सुभाई ॥
होआ ओही अलु जग महि गुर गिआनु जपाई ॥
पूरबि लिखिआ पाइआ हरि सिउ बणि आई ॥16॥
जिनि जनि गुरमुखि सेविआ तिनि सभि सुख पाई ॥
ओहु आपि तरिआ कुटंब सिउ सभु जगतु तराई ॥
ओनि हरि नामा धनु संचिआ सभ तिखा बुझाई ॥
ओनि छडे लालच दुनी के अंतरि लिव लाई ॥
ओसु सदा सदा घरि अनंदु है हरि सखा सहाई ॥
ओनि वैरी मित्र सम कीतिआ सभ नालि सुभाई ॥
होआ ओही अलु जग महि गुर गिआनु जपाई ॥
पूरबि लिखिआ पाइआ हरि सिउ बणि आई ॥16॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिस मनुष्य ने गुरू के सन्मुख हो के प्रभू को सिमरा है उसने सारे सुख पा लिए हैं। वह अपने परिवार समेत स्वयं भी (संसार-समुंद्र से) पार हो जाता है। सारे जगत को भी पार लगा लेता है। उस मनुष्य ने परमात्मा का नाम धन इतना जोड़ा है कि माया वाली सारी ही तृष्णा उसने मिटा ली है। उसने दुनिया के सारे लालच छोड़ दिए हैं (लालच में नहीं फसता) उसने प्रभू-चरणों में सुरति जोड़ी हुई है। उसके हृदय में सदा खुशी-आनंद है। प्रभू सदा उसका मित्र है सहायता करने वाला है। उसने वैरी और मित्र एक-समान समझ लिए हैं (हरेक को मित्र समझता है)। सबके साथ अच्छा बरताव करता है। वह मनुष्य गुरू से मिले उपदेश को सदा चेते रखता है और जगत में नामवाला हो जाता है। पिछले जन्मों में किए भले कर्मों के लेख उसके माथे पर उघड़ आते हैं और (इस जन्म में) परमात्मा के साथ बिल्कुल ही पक्की प्रीति बन जाती है। 16।
डखणे मः 5 ॥
डखणे मः 5 ॥
सचु सुहावा काढीऐ कूड़ै कूड़ी सोइ ॥
नानक विरले जाणीअहि जिन सचु पलै होइ ॥1॥
सचु सुहावा काढीऐ कूड़ै कूड़ी सोइ ॥
नानक विरले जाणीअहि जिन सचु पलै होइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ हे नानक ! हर कोई कहता है कि (परमात्मा का) नाम-धन सुख देने वाला है और दुनियावी धन (के एकत्र करने) में कोई ना कोई झगड़े-दूषणबाजी वाली उपाधि वाली खबर ही सुनी जाती है। फिर भी। ऐसे लोग विरले ही मिलते हैं। जिन्होंने नाम-धन इकट्ठा किया हो (हर कोई उपाधि-मूल दुनियावी धन के पीछे ही दौड़ रहा है)। 1।
सजण मुखु अनूपु अठे पहर निहालसा ॥
मः 5 ॥
सजण मुखु अनूपु अठे पहर निहालसा ॥
सुतड़ी सो सहु डिठु तै सुपने हउ खंनीऐ ॥2॥
सजण मुखु अनूपु अठे पहर निहालसा ॥
सुतड़ी सो सहु डिठु तै सुपने हउ खंनीऐ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ सोई हुई ने मैंने उस पति-प्रभू को (सपने में) देखा। सज्जन का मुँह बहुत ही अच्छा (लगा)। हे सपने ! मैं आपसे सदके जाती हूँ। (अब मेरी तमन्ना है कि) मैं आठों पहर (सज्जन का मुँह) देखती रहूँ। 2।
सजण सचु परखि मुखि अलावणु थोथरा ॥
मः 5 ॥
सजण सचु परखि मुखि अलावणु थोथरा ॥
मंन मझाहू लखि तुधहु दूरि न सु पिरी ॥3॥
सजण सचु परखि मुखि अलावणु थोथरा ॥
मंन मझाहू लखि तुधहु दूरि न सु पिरी ॥3॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे मित्र ! (सिर्फ) मुँह से कहना व्यर्थ है। नाम-धन को (अपने हृदय में) परखें। अपने अंदर झाँक मार के देखें। वह पति-प्रभू आपसे दूर नहीं है (आपके अंदर ही बसता है)। 3।
धरति आकासु पातालु है चंदु सूरु बिनासी ॥
पउड़ी ॥
धरति आकासु पातालु है चंदु सूरु बिनासी ॥
बादिसाह साह उमराव खान ढाहि डेरे जासी ॥
रंग तुंग गरीब मसत सभु लोकु सिधासी ॥
काजी सेख मसाइका सभे उठि जासी ॥
पीर पैकाबर अउलीए को थिरु न रहासी ॥
रोजा बाग निवाज कतेब विणु बुझे सभ जासी ॥
लख चउरासीह मेदनी सभ आवै जासी ॥
निहचलु सचु खुदाइ एकु खुदाइ बंदा अबिनासी ॥17॥
धरति आकासु पातालु है चंदु सूरु बिनासी ॥
बादिसाह साह उमराव खान ढाहि डेरे जासी ॥
रंग तुंग गरीब मसत सभु लोकु सिधासी ॥
काजी सेख मसाइका सभे उठि जासी ॥
पीर पैकाबर अउलीए को थिरु न रहासी ॥
रोजा बाग निवाज कतेब विणु बुझे सभ जासी ॥
लख चउरासीह मेदनी सभ आवै जासी ॥
निहचलु सचु खुदाइ एकु खुदाइ बंदा अबिनासी ॥17॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ धरती। आकाश, पाताल, चाँद और सूरज- ये सब नाशवंत हैं। शाह-बादशाह अमीर जागीरदार (सब अपने) महल माढ़ियाँ छोड़ के (यहाँ से) चले जाएँगे। कंगाल, अमीर, ग़रीब, मायाग्रसित (कोई भी हो) सारा जगत ही (यहाँ से) चला जाएगा। काजी, शेख, सम्पन्न लोग सभी दुनिया से चले जाएँगे। पीर-पैग़बर बड़े-बड़े धार्मिक आगू - इनमें से कोई भी यहाँ सदा टिका नहीं रहेगा। जिन्होंने रोज़े रखे। बाँगें दीं, नमाज़ें पढ़ीं। धार्मिक पुस्तकें पढ़ीं। वे भी जिन्होंने इनकी सार ना समझी वे भी। सारे (जगत से आखिर) चले जाएँगे। धरती की चौरासी लाख जूनों के सारे ही जीव (जगत में) आते हैं और फिर यहाँ से चले जाते हैं। सिर्फ एक सच्चा ख़ुदा ही सदा कायम रहने वाला है। ख़ुदा का बँदा (भगत) भी जनम-मरण के चक्करों में नहीं पड़ता। 17।
डखणे मः 5 ॥
डखणे मः 5 ॥
डिठी हभ ढंढोलि हिकसु बाझु न कोइ ॥
आउ सजण तू मुखि लगु मेरा तनु मनु ठंढा होइ ॥1॥
डिठी हभ ढंढोलि हिकसु बाझु न कोइ ॥
आउ सजण तू मुखि लगु मेरा तनु मनु ठंढा होइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ मैंने सारी सृष्टि तलाश के देख ली है। (हे प्रभू !) एक आपके (दीदार के) बिना और कोई भी (पदार्थ मुझे आत्मिक शांति) नहीं (देता)। हे मित्र प्रभू ! आएँ। आप मुझे दर्शन दें। (आपके दर्शन करने से) मेरे तन मन में ठंड पड़ती है। 1।
आसकु आसा बाहरा मू मनि वडी आस ॥
मः 5 ॥
आसकु आसा बाहरा मू मनि वडी आस ॥
आस निरासा हिकु तू हउ बलि बलि बलि गईआस ॥2॥
आसकु आसा बाहरा मू मनि वडी आस ॥
आस निरासा हिकु तू हउ बलि बलि बलि गईआस ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (हे प्रभू !) (आपके चरणों का सच्चा) प्रेमी वही हो सकता है जिसको दुनियावी आशा ना छू सके। पर मेरे मन में तो बड़ी-बड़ी आशाएँ हैं। सिर्फ आप ही हैं जो मुझे (दुनियावी) आशाओं से उपराम कर सकते हैं। मैं आपसे ही कुर्बान जाता हूँ (आप स्वयं ही मेहर करें)। 2।
विछोड़ा सुणे डुखु विणु डिठे मरिओदि ॥
मः 5 ॥
विछोड़ा सुणे डुखु विणु डिठे मरिओदि ॥
बाझु पिआरे आपणे बिरही ना धीरोदि ॥3॥
विछोड़ा सुणे डुखु विणु डिठे मरिओदि ॥
बाझु पिआरे आपणे बिरही ना धीरोदि ॥3॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (प्रभू चरणों का असल) प्रेमी वह है जिसको यह सुन के ही दुख प्रतीत हो कि प्रभू से विछोड़ा होने लगा है। दीदार के बिना सच्चा प्रेमी आत्मिक मौत महसूस करता है। अपने प्यारे प्रभू से विछुड़ के प्रेमी का मन ठहरता नहीं (मन विहवल रहता है)। 3।
तट तीरथ देव देवालिआ केदारु मथुरा कासी ॥
पउड़ी ॥
तट तीरथ देव देवालिआ केदारु मथुरा कासी ॥
कोटि तेतीसा देवते सणु इंद्रै जासी ॥
सिम्रिति सासत्र बेद चारि खटु दरस समासी ॥
पोथी पंडित गीत कवित कवते भी जासी ॥
जती सती संनिआसीआ सभि कालै वासी ॥
मुनि जोगी दिगंबरा जमै सणु जासी ॥
जो दीसै सो विणसणा सभ बिनसि बिनासी ॥
थिरु पारब्रहमु परमेसरो सेवकु थिरु होसी ॥18॥
तट तीरथ देव देवालिआ केदारु मथुरा कासी ॥
कोटि तेतीसा देवते सणु इंद्रै जासी ॥
सिम्रिति सासत्र बेद चारि खटु दरस समासी ॥
पोथी पंडित गीत कवित कवते भी जासी ॥
जती सती संनिआसीआ सभि कालै वासी ॥
मुनि जोगी दिगंबरा जमै सणु जासी ॥
जो दीसै सो विणसणा सभ बिनसि बिनासी ॥
थिरु पारब्रहमु परमेसरो सेवकु थिरु होसी ॥18॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। देवताओं के मन्दिर। केदार मथुरा काशी आदि तीर्थ। तैंतीस करोड़ देवते। इन्द्र देवता भी- आखिर नाशवंत हैं। चार वेद स्मृतियाँ शास्त्र आदि धार्मिक पुस्तकों (के पढ़ने वाले) और छहों भेषों के साधु जन भी अंत में चले जाएँगे। पुस्तकों के विद्वान। गीतों कविताओं के लिखने वाले कवि भी जगत से कूच कर जाएँगे। जती सती सन्यासी -ये सभी मौत के अधीन हैं। समाधियाँ लगाने वाले। जोगी। नांगे। जमदूत- ये भी नाशवंत हैं। (सिरे की बात) (जगत में) जो कुछ दिखाई दे रहा है वह नाशवंत है। हरेक ने अवश्य नाश हो जाना है। सदा कायम रहने वाला केवल पारब्रहम परमेश्वर ही है। उसका भक्त ही पैदा होने-मरने से रहित हो जाता है। 18।
सै नंगे नह नंग भुखे लख न भुखिआ ॥
सलोक डखणे मः 5 ॥
सै नंगे नह नंग भुखे लख न भुखिआ ॥
डुखे कोड़ि न डुख नानक पिरी पिखंदो सुभ दिसटि ॥1॥
सै नंगे नह नंग भुखे लख न भुखिआ ॥
डुखे कोड़ि न डुख नानक पिरी पिखंदो सुभ दिसटि ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक डखणे महला 5॥ उसको नंग की परवाह नहीं रहती चाहे सैकड़ों बार नंगा रहना पड़े। उसको भूख नहीं चुभती चाहे लाखों बार भूखा रहना पड़े। उसको कोई दुख नहीं व्यापता चाहे करोड़ों बार दुख व्यापें। हे नानक ! (जिस मनुष्य की ओर) प्रभू-पति मेहर भरी निगाह से देखे। 1।
रचयिता और स्रोत
यह मारू राग के क्रम का अंग 1100 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1100 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।