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अंग 1100

अंग
1100
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नानक से अखड़ीआ बिअंनि जिनी डिसंदो मा पिरी ॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (तृष्णा-मारी आँखों से प्यारा प्रभू दिखाई नहीं दे सकता) वह आँखें (इन तृष्णा-ग्रसित आँखों से अलग) औैर ही किस्म की हैं। जिनसे प्यारा प्रभू-पति दिखाई देता है। 3।
पउड़ी ॥
जिनि जनि गुरमुखि सेविआ तिनि सभि सुख पाई ॥
ओहु आपि तरिआ कुटंब सिउ सभु जगतु तराई ॥
ओनि हरि नामा धनु संचिआ सभ तिखा बुझाई ॥
ओनि छडे लालच दुनी के अंतरि लिव लाई ॥
ओसु सदा सदा घरि अनंदु है हरि सखा सहाई ॥
ओनि वैरी मित्र सम कीतिआ सभ नालि सुभाई ॥
होआ ओही अलु जग महि गुर गिआनु जपाई ॥
पूरबि लिखिआ पाइआ हरि सिउ बणि आई ॥16॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिस मनुष्य ने गुरू के सन्मुख हो के प्रभू को सिमरा है उसने सारे सुख पा लिए हैं। वह अपने परिवार समेत स्वयं भी (संसार-समुंद्र से) पार हो जाता है। सारे जगत को भी पार लगा लेता है। उस मनुष्य ने परमात्मा का नाम धन इतना जोड़ा है कि माया वाली सारी ही तृष्णा उसने मिटा ली है। उसने दुनिया के सारे लालच छोड़ दिए हैं (लालच में नहीं फसता) उसने प्रभू-चरणों में सुरति जोड़ी हुई है। उसके हृदय में सदा खुशी-आनंद है। प्रभू सदा उसका मित्र है सहायता करने वाला है। उसने वैरी और मित्र एक-समान समझ लिए हैं (हरेक को मित्र समझता है)। सबके साथ अच्छा बरताव करता है। वह मनुष्य गुरू से मिले उपदेश को सदा चेते रखता है और जगत में नामवाला हो जाता है। पिछले जन्मों में किए भले कर्मों के लेख उसके माथे पर उघड़ आते हैं और (इस जन्म में) परमात्मा के साथ बिल्कुल ही पक्की प्रीति बन जाती है। 16।
डखणे मः 5 ॥
सचु सुहावा काढीऐ कूड़ै कूड़ी सोइ ॥
नानक विरले जाणीअहि जिन सचु पलै होइ ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ हे नानक ! हर कोई कहता है कि (परमात्मा का) नाम-धन सुख देने वाला है और दुनियावी धन (के एकत्र करने) में कोई ना कोई झगड़े-दूषणबाजी वाली उपाधि वाली खबर ही सुनी जाती है। फिर भी। ऐसे लोग विरले ही मिलते हैं। जिन्होंने नाम-धन इकट्ठा किया हैं (हर कोई उपाधि-मूल दुनियावी धन के पीछे ही दौड़ रहा है)। 1।
मः 5 ॥
सजण मुखु अनूपु अठे पहर निहालसा ॥
सुतड़ी सो सहु डिठु तै सुपने हउ खंनीऐ ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ सोई हुई ने मैंने उस पति-प्रभू को (सपने में) देखा। सज्जन का मुँह बहुत ही अच्छा (लगा)। हे सपने ! मैं आपसे सदके जाती हूँ। (अब मेरी तमन्ना है कि) मैं आठों पहर (सज्जन का मुँह) देखती रहूँ। 2।
मः 5 ॥
सजण सचु परखि मुखि अलावणु थोथरा ॥
मंन मझाहू लखि तुधहु दूरि न सु पिरी ॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे मित्र ! (सिर्फ) मुँह से कहना व्यर्थ है। नाम-धन को (अपने हृदय में) परख। अपने अंदर झाँक मार के देख। वह पति-प्रभू आपसे दूर नहीं है (आपके अंदर ही बसता है)। 3।
पउड़ी ॥
धरति आकासु पातालु है चंदु सूरु बिनासी ॥
बादिसाह साह उमराव खान ढाहि डेरे जासी ॥
रंग तुंग गरीब मसत सभु लोकु सिधासी ॥
काजी सेख मसाइका सभे उठि जासी ॥
पीर पैकाबर अउलीए को थिरु न रहासी ॥
रोजा बाग निवाज कतेब विणु बुझे सभ जासी ॥
लख चउरासीह मेदनी सभ आवै जासी ॥
निहचलु सचु खुदाइ एकु खुदाइ बंदा अबिनासी ॥17॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ धरती। आकाश। पाताल। चाँद और सूरज- ये सब नाशवंत हैं। शाह-बादशाह अमीर जागीरदार (सब अपने) महल माढ़ियाँ छोड़ के (यहाँ से) चले जाएंगे। कंगाल। अमीर। ग़रीब। मायाग्रसित (कोई भी हो) सारा जगत ही (यहाँ से) चला जाएगा। काजी, शेख, सम्पन्न लोग सभी दुनिया से चले जाएँगे। पीर-पैग़बर बड़े-बड़े धार्मिक आगू – इनमें से कोई भी यहाँ सदा टिका नहीं रहेगा। जिन्होंने रोज़े रखे। बाँगें दीं। नमाज़ें पढ़ीं। धार्मिक पुस्तकें पढ़ीं। वह भी जिन्होंने इनकी सार ना समझी वह भी। सारे (जगत से आखिर) चले जाएंगें। धरती की चौरासी लाख जूनों के सारे ही जीव (जगत में) आते हैं और फिर यहाँ से चले जाते हैं। सिर्फ एक सच्चा ख़ुदा ही सदा कायम रहने वाला है। ख़ुदा का बँदा (भगत) भी जनम-मरण के चक्करों में नहीं पड़ता। 17।
डखणे मः 5 ॥
डिठी हभ ढंढोलि हिकसु बाझु न कोइ ॥
आउ सजण तू मुखि लगु मेरा तनु मनु ठंढा होइ ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ मैंने सारी सृष्टि तलाश के देख ली है। (हे प्रभू !) एक आपके (दीदार के) बिना और कोई भी (पदार्थ मुझे आत्मिक शांति) नहीं (देता)। हे मित्र प्रभू ! आ। आप मुझे दर्शन दे। (आपके दर्शन करने से) मेरे तन मन में ठंढ पड़ती है। 1।
मः 5 ॥
आसकु आसा बाहरा मू मनि वडी आस ॥
आस निरासा हिकु तू हउ बलि बलि बलि गईआस ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (हे प्रभू !) (आपके चरणों का सच्चा) प्रेमी वही हैं सकता है जिसको दुनियावी आशा ना छू सकें। पर मेरे मन में तो बड़ी-बड़ी आशाएं हैं। सिर्फ आप ही है जो मुझे (दुनियावी) आशाओं से उपराम कर सकता है। मैं आपसे ही कुर्बान जाता हूँ (आप स्वयं ही मेहर कर)। 2।
मः 5 ॥
विछोड़ा सुणे डुखु विणु डिठे मरिओदि ॥
बाझु पिआरे आपणे बिरही ना धीरोदि ॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (प्रभू चरणों का अमल) प्रेमी वह है जिसको यह सुन के ही दुख प्रतीत हो कि प्रभू से विछोड़ा होने लगा है। दीदार के बिना सच्चा प्रेमी आत्मिक मौत महसूस करता है। अपने प्यारे प्रभू से विछुड़ के प्रेमी का मन ठहरता नहीं (मन विहवल रहता है)। 3।
पउड़ी ॥
तट तीरथ देव देवालिआ केदारु मथुरा कासी ॥
कोटि तेतीसा देवते सणु इंद्रै जासी ॥
सिम्रिति सासत्र बेद चारि खटु दरस समासी ॥
पोथी पंडित गीत कवित कवते भी जासी ॥
जती सती संनिआसीआ सभि कालै वासी ॥
मुनि जोगी दिगंबरा जमै सणु जासी ॥
जो दीसै सो विणसणा सभ बिनसि बिनासी ॥
थिरु पारब्रहमु परमेसरो सेवकु थिरु होसी ॥18॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। देवताओं के मन्दिर। केदार मथुरा काशी आदि तीर्थ। तैंतिस करोड़ देवते। इन्द्र देवता भी- आखिर नाशवंत हैं। चार वेद स्मृतियां शास्त्र आदि धार्मिक पुस्तकों (के पढ़ने वाले) और छहों भेषों के साधु जन भी अंत में चले जाएंगे। पुस्तकों के विद्वान। गीतों कविताओं के लिखने वाले कवि भी जगत से कूच कर जाएंगे। जती सती सन्यासी -ये सभी मौत के अधीन हैं। समाधियाँ लगाने वाले। जोगी। नांगे। जमदूत- ये भी नाशवंत हैं। (सिरे की बात) (जगत में) जो कुछ दिखाई दे रहा है वह नाशवंत है। हरेक ने अवश्य नाश हो जाना है। सदा कायम रहने वाला केवल पारब्रहम परमेश्वर ही है। उसका भक्त ही पैदा होने-मरने से रहित हो जाता है। 18।
सलोक डखणे मः 5 ॥
सै नंगे नह नंग भुखे लख न भुखिआ ॥
डुखे कोड़ि न डुख नानक पिरी पिखंदो सुभ दिसटि ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक डखणे महला 5॥ उसको नंग की परवाह नहीं रहती चाहे सैकड़ों बार नंगा रहना पड़े। उसको भूख नहीं चुभती चाहे लाखों बार भूखा रहना पड़े। उसको कोई दुख नहीं व्यापता चाहे करोड़ों बार दुख व्यापें हे नानक ! (जिस मनुष्य की ओर) प्रभू-पति मेहर भरी निगाह से देखे। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 11 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (तृष्णा-मारी आँखों से प्यारा प्रभू दिखाई नहीं दे सकता) वह आँखें (इन तृष्णा-ग्रसित आँखों से अलग) औैर ही किस्म की हैं।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।