Lulla Family

अंग 1099

अंग
1099
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
खटु दरसन भ्रमते फिरहि नह मिलीऐ भेखं ॥
वरत करहि चंद्राइणा से कितै न लेखं ॥
बेद पड़हि संपूरना ततु सार न पेखं ॥
तिलकु कढहि इसनानु करि अंतरि कालेखं ॥
भेखी प्रभू न लभई विणु सची सिखं ॥
भूला मारगि सो पवै जिसु धुरि मसतकि लेखं ॥
तिनि जनमु सवारिआ आपणा जिनि गुरु अखी देखं ॥13॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: छे भेखों के साधू (व्यर्थ) भटकते फिरते हैं। प्रभू भेष से नहीं मिलता। (कई लोग) चँद्रायण व्रत रखते हैं। पर उनका कोई लाभ नहीं (वह किसी गिनती में नहीं)। जो सारे के सारे वेद पढ़ते हैं। वे भी सच्चाई को नहीं देख सकते। कई स्नान कर के (माथे पर) तिलक लगाते हैं। पर उनके मन में (विकारों की) कालिख होती है (उनको भी रॅब नहीं मिलता)। परमात्मा भेषों से नहीं मिलता। (गुरू के) सच्चे उपदेश के बिना नहीं मिलता। जिस मनुष्य के माथे पर धुर से (बख्शिश का लिखा) लेख उघड़ आए। वह (पहले अगर) गलत रास्ते पर पड़ा हुआ (हो तो भी ठीक) रास्ते पर आ जाता है। जिस मनुष्य ने अपनी आँखों से गुरू के दर्शन कर लिए। उसने अपना जन्म सफल कर लिया है। 13।
डखणे मः 5 ॥
सो निवाहू गडि जो चलाऊ न थीऐ ॥
कार कूड़ावी छडि संमलु सचु धणी ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ जो (मालिक-प्रभू) साथ छोड़ जाने वाला नहीं है उस तोड़ निभाने वाले को (दिल में) पक्का कर के रख। सदा-स्थिर रहने वाले मालिक को (मन में) संभाल के रख। (जो काम उसकी याद को भुलाए। उस) झूठी कार को छोड़ दे (माया संबंधी काम में चित्त को नहीं बसा)। 1।
मः 5 ॥
हभ समाणी जोति जिउ जल घटाऊ चंद्रमा ॥
परगटु थीआ आपि नानक मसतकि लिखिआ ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! प्रभू की ज्योति हर जगह समाई हुई है (मौजूद है) जैसे पानी के घड़ों में चँद्रमा (का प्रतिबिंब) है। (पर माया ग्रसित जीव को अपने अंदर उसका दीदार नहीं होता)। जिस मनुष्य के माथे पर (पूर्बले) लिखे लेख जागते हैं। उसके अंदर प्रभू की ज्योति प्रत्यक्ष हो जाती है। 2।
मः 5 ॥
मुख सुहावे नामु चउ आठ पहर गुण गाउ ॥
नानक दरगह मंनीअहि मिली निथावे थाउ ॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! जो मनुष्य प्रभू का नाम सिमरते हैं जो आठ पहर प्रभू की सिफत सालाह करते हैं उनके मुँह सुंदर (दिखते) हैं। हे नानक ! (भाग्यशाली) बंदे प्रभू की हजूरी में सम्मान पाते हैं। जिस मनुष्य को (पहले) कहीं भी आसरा नहीं था मिलता (नाम की बरकति से) उसको (हर जगह) आदर मिलता है। 3।
पउड़ी ॥
बाहर भेखि न पाईऐ प्रभु अंतरजामी ॥
इकसु हरि जीउ बाहरी सभ फिरै निकामी ॥
मनु रता कुटंब सिउ नित गरबि फिरामी ॥
फिरहि गुमानी जग महि किआ गरबहि दामी ॥
चलदिआ नालि न चलई खिन जाइ बिलामी ॥
बिचरदे फिरहि संसार महि हरि जी हुकामी ॥
करमु खुला गुरु पाइआ हरि मिलिआ सुआमी ॥
जो जनु हरि का सेवको हरि तिस की कामी ॥14॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ ईश्वर बाहरी भेषों से नहीं मिलता (क्योंकि) वह हरेक के दिल की जानता है। और। एक रॅब के मिलाप के बिना सारी सृष्टि व्यर्थ विचरती है। जिन लोगों का मन परिवार के मोह में रंगा रहता है। वे सदा अहंकार में फिरते हैं। माया-धारी बंदे जगत में अकड़-अकड़ के चलते हैं। पर उनका अहंकार किसी अर्थ का नहीं। (क्योंकि) जगत से चलने के वक्त माया जीव के साथ नहीं जाती। छिन पल में ही साथ छोड़ जाती है। ऐसे लोग परमात्मा की रजा के अनुसार संसार में (व्यर्थ ही) जीवन गुजार जाते हैं। जिस मनुष्य पर प्रभू की मेहर (का दरवाजा) खुलता है। उसको गुरू मिलता है (गुरू के द्वारा) उसको मालिक प्रभू मिल जाता है। जो मनुष्य प्रभू का सेवक बन जाता है। प्रभू उसका काम सँवारता है। 14।
डखणे मः 5 ॥
मुखहु अलाए हभ मरणु पछाणंदो कोइ ॥
नानक तिना खाकु जिना यकीना हिक सिउ ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ सारी सृष्टि ही मुँह से कहती है (कि) मौत (सिर पर खड़ी है)। पर कोई विरला बंदा (ये बात यकीन से) समझता है। हे नानक ! (कह-) मैं उन (गुरमुखों) की चरण-धूड़ (माँगता) हूँ जो (मौत को सच जान के) एक परमात्मा के साथ संबंध जोड़ते हैं। 1।
मः 5 ॥
जाणु वसंदो मंझि पछाणू को हेकड़ो ॥
तै तनि पड़दा नाहि नानक जै गुरु भेटिआ ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ अंतरजामी परमात्मा (हरेक जीव के) अंदर बसता है। पर इस बात को कोई विरला व्यक्ति ही समझता है। हे नानक ! (जिस) मनुष्य को गुरू मिल जाता है उसके हृदय में (शरीर में परमात्मा से) दूरी नहीं रह जाती (और वह परमात्मा को अपने अंदर देख लेता है)। 2।
मः 5 ॥
मतड़ी कांढकु आह पाव धोवंदो पीवसा ॥
मू तनि प्रेमु अथाह पसण कू सचा धणी ॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ सदा कायम रहने वाले मालिक के दर्शन करने के लिए मेरे हृदय में अथाह प्रेम है (पर मेरी खोटी मति दर्शनों के रास्ते पर रोक डालती है); जो मनुष्य मेरी इस खोटी मति को (मेरे अंदर से) निकाल दे। मैं उसके पैर धो-धो के पीऊँगा। 3।
पउड़ी ॥
निरभउ नामु विसारिआ नालि माइआ रचा ॥
आवै जाइ भवाईऐ बहु जोनी नचा ॥
बचनु करे तै खिसकि जाइ बोले सभु कचा ॥
अंदरहु थोथा कूड़िआरु कूड़ी सभ खचा ॥
वैरु करे निरवैर नालि झूठे लालचा ॥
मारिआ सचै पातिसाहि वेखि धुरि करमचा ॥
जमदूती है हेरिआ दुख ही महि पचा ॥
होआ तपावसु धरम का नानक दरि सचा ॥15॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जिस मनुष्य ने निर्भय प्रभू का नाम भुला दिया है और जो माया में ही मस्त रहता है। वह जनम-मरण के चक्कर में पड़ जाता है वह अनेकों जूनियों में भटकता है। (माया में मस्त मनुष्य यदि कोई) वचन करता है तो उससे फिर जाता है। सदा झूठी बात ही करता है। वह झूठा अपने मन में से खाली होता है (उसकी नीयत पहले ही बुरी होती है। इस वास्ते) उसकी (हरेक बात) झूठी होती है गॅप होती है। ऐसा बंदा झूठी लालच में फस के निर्वैर व्यक्ति के साथ भी वैर कमा लेता है। शुरू से ही उस लालची के कामों को देख के सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू-पातिशाह ने (उसकी ज़मीर को) मार दिया हुआ है। ऐसा मनुष्य सदा जमदूतों की ताक में रहता है। दुखों में ही ख़्वार होता है। हे नानक ! सच्चे प्रभू के दर पर धर्म का इन्साफ (ही) होता है। 15।
डखणे मः 5 ॥
परभाते प्रभ नामु जपि गुर के चरण धिआइ ॥
जनम मरण मलु उतरै सचे के गुण गाइ ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ (हे भाई !) अमृत बेला में उठ के प्रभू का नाम सिमर। और अपने गुरू के चरणों का ध्यान धर (भाव। प्रभू के नाम में जोड़ने वाले गुरू का आदर सत्कार पूरी विनम्रता से अपने दिल में टिका)। सदा कायम रहने वाले प्रभू की सिफत सालाह करने से जनम-मरण के चक्कर में डालने वाली विकारों की मैल मन से उतर जाती है। 1।
मः 5 ॥
देह अंधारी अंधु सुंञी नाम विहूणीआ ॥
नानक सफल जनंमु जै घटि वुठा सचु धणी ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ नाम से टूटा हुआ शरीर (आत्मिक जीवन से) वंचित रहता है। पूरी तौर पर (आत्मिक जीवन की सूझ से) अंधा हो जाता है (भाव। सारी ज्ञानेन्द्रियां सदाचारी उपयोग से अंधी हो के विकारों में प्रवृति हुई रहती हैं)। हे नानक ! जिस मनुष्य के हृदय में सदा-स्थिर मालिक प्रभू आ बसता है। उसकी जिंदगी मुबारक है। 2।
मः 5 ॥
लोइण लोई डिठ पिआस न बुझै मू घणी ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (ज्यों-ज्यों) मैं इन आँखों से (निरे) जगत को (भाव। दुनिया के पदार्थों को) देखता हूँ (इन पदार्थों के प्रति) मेरी लालसा और भी बढ़ती जाती है। लालसा खत्म नहीं होती।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 12 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “छे भेखों के साधू (व्यर्थ) भटकते फिरते हैं।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।