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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1099 · मारू

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अंग
1099
मारू
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  1. खटु दरसन भ्रमते फिरहि नह मिलीऐ भेखं ॥
  2. डखणे मः 5 ॥
  3. हभ समाणी जोति जिउ जल घटाऊ चंद्रमा ॥
  4. मुख सुहावे नामु चउ आठ पहर गुण गाउ ॥
  5. बाहर भेखि न पाईऐ प्रभु अंतरजामी ॥
  6. डखणे मः 5 ॥
  7. जाणु वसंदो मंझि पछाणू को हेकड़ो ॥
  8. मतड़ी कांढकु आह पाव धोवंदो पीवसा ॥
  9. निरभउ नामु विसारिआ नालि माइआ रचा ॥
  10. डखणे मः 5 ॥
  11. देह अंधारी अंधु सुंञी नाम विहूणीआ ॥
  12. लोइण लोई डिठ पिआस न बुझै मू घणी ॥

खटु दरसन भ्रमते फिरहि नह मिलीऐ भेखं ॥

अंग 1098 से चला आ रहा अंश

खटु दरसन भ्रमते फिरहि नह मिलीऐ भेखं ॥
वरत करहि चंद्राइणा से कितै न लेखं ॥
बेद पड़हि संपूरना ततु सार न पेखं ॥
तिलकु कढहि इसनानु करि अंतरि कालेखं ॥
भेखी प्रभू न लभई विणु सची सिखं ॥
भूला मारगि सो पवै जिसु धुरि मसतकि लेखं ॥
तिनि जनमु सवारिआ आपणा जिनि गुरु अखी देखं ॥13॥

हिन्दी अर्थ: छे भेखों के साधू (व्यर्थ) भटकते फिरते हैं। प्रभू भेष से नहीं मिलता। (कई लोग) चँद्रायण व्रत रखते हैं। पर उनका कोई लाभ नहीं (वह किसी गिनती में नहीं)। जो सारे के सारे वेद पढ़ते हैं। वे भी सच्चाई को नहीं देख सकते। कई स्नान कर के (माथे पर) तिलक लगाते हैं। पर उनके मन में (विकारों की) कालिख होती है (उनको भी रॅब नहीं मिलता)। परमात्मा भेषों से नहीं मिलता। (गुरू के) सच्चे उपदेश के बिना नहीं मिलता। जिस मनुष्य के माथे पर धुर से (बख्शिश का लिखा) लेख उघड़ आए। वह (पहले अगर) गलत रास्ते पर पड़ा हुआ (हो तो भी ठीक) रास्ते पर आ जाता है। जिस मनुष्य ने अपनी आँखों से गुरू के दर्शन कर लिए। उसने अपना जन्म सफल कर लिया है। 13।

डखणे मः 5 ॥

डखणे मः 5 ॥
सो निवाहू गडि जो चलाऊ न थीऐ ॥
कार कूड़ावी छडि संमलु सचु धणी ॥1॥

हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ जो (मालिक-प्रभू) साथ छोड़ जाने वाला नहीं है उस तोड़ निभाने वाले को (दिल में) पक्का कर के रख। सदा-स्थिर रहने वाले मालिक को (मन में) संभाल के रख। (जो काम उसकी याद को भुलाए। उस) झूठी कार को छोड़ दे (माया संबंधी काम में चित्त को नहीं बसा)। 1।

हभ समाणी जोति जिउ जल घटाऊ चंद्रमा ॥

मः 5 ॥
हभ समाणी जोति जिउ जल घटाऊ चंद्रमा ॥
परगटु थीआ आपि नानक मसतकि लिखिआ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! प्रभू की ज्योति हर जगह समाई हुई है (मौजूद है) जैसे पानी के घड़ों में चँद्रमा (का प्रतिबिंब) है। (पर माया ग्रसित जीव को अपने अंदर उसका दीदार नहीं होता)। जिस मनुष्य के माथे पर (पूर्बले) लिखे लेख जागते हैं। उसके अंदर प्रभू की ज्योति प्रत्यक्ष हो जाती है। 2।

मुख सुहावे नामु चउ आठ पहर गुण गाउ ॥

मः 5 ॥
मुख सुहावे नामु चउ आठ पहर गुण गाउ ॥
नानक दरगह मंनीअहि मिली निथावे थाउ ॥3॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! जो मनुष्य प्रभू का नाम सिमरते हैं जो आठ पहर प्रभू की सिफत सालाह करते हैं उनके मुँह सुंदर (दिखते) हैं। हे नानक ! (भाग्यशाली) बंदे प्रभू की हजूरी में सम्मान पाते हैं। जिस मनुष्य को (पहले) कहीं भी आसरा नहीं था मिलता (नाम की बरकति से) उसको (हर जगह) आदर मिलता है। 3।

बाहर भेखि न पाईऐ प्रभु अंतरजामी ॥

पउड़ी ॥
बाहर भेखि न पाईऐ प्रभु अंतरजामी ॥
इकसु हरि जीउ बाहरी सभ फिरै निकामी ॥
मनु रता कुटंब सिउ नित गरबि फिरामी ॥
फिरहि गुमानी जग महि किआ गरबहि दामी ॥
चलदिआ नालि न चलई खिन जाइ बिलामी ॥
बिचरदे फिरहि संसार महि हरि जी हुकामी ॥
करमु खुला गुरु पाइआ हरि मिलिआ सुआमी ॥
जो जनु हरि का सेवको हरि तिस की कामी ॥14॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ ईश्वर बाहरी भेषों से नहीं मिलता (क्योंकि) वह हरेक के दिल की जानता है। और। एक रॅब के मिलाप के बिना सारी सृष्टि व्यर्थ विचरती है। जिन लोगों का मन परिवार के मोह में रंगा रहता है। वे सदा अहंकार में फिरते हैं। माया-धारी बंदे जगत में अकड़-अकड़ के चलते हैं। पर उनका अहंकार किसी अर्थ का नहीं। (क्योंकि) जगत से चलने के वक्त माया जीव के साथ नहीं जाती। छिन पल में ही साथ छोड़ जाती है। ऐसे लोग परमात्मा की रजा के अनुसार संसार में (व्यर्थ ही) जीवन गुजार जाते हैं। जिस मनुष्य पर प्रभू की मेहर (का दरवाजा) खुलता है। उसको गुरू मिलता है (गुरू के द्वारा) उसको मालिक प्रभू मिल जाता है। जो मनुष्य प्रभू का सेवक बन जाता है। प्रभू उसका काम सँवारता है। 14।

डखणे मः 5 ॥

डखणे मः 5 ॥
मुखहु अलाए हभ मरणु पछाणंदो कोइ ॥
नानक तिना खाकु जिना यकीना हिक सिउ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ सारी सृष्टि ही मुँह से कहती है (कि) मौत (सिर पर खड़ी है)। पर कोई विरला बंदा (ये बात यकीन से) समझता है। हे नानक ! (कह-) मैं उन (गुरमुखों) की चरण-धूड़ (माँगता) हूँ जो (मौत को सच जान के) एक परमात्मा के साथ संबंध जोड़ते हैं। 1।

जाणु वसंदो मंझि पछाणू को हेकड़ो ॥

मः 5 ॥
जाणु वसंदो मंझि पछाणू को हेकड़ो ॥
तै तनि पड़दा नाहि नानक जै गुरु भेटिआ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ अंतरजामी परमात्मा (हरेक जीव के) अंदर बसता है। पर इस बात को कोई विरला व्यक्ति ही समझता है। हे नानक ! (जिस) मनुष्य को गुरू मिल जाता है उसके हृदय में (शरीर में परमात्मा से) दूरी नहीं रह जाती (और वह परमात्मा को अपने अंदर देख लेता है)। 2।

मतड़ी कांढकु आह पाव धोवंदो पीवसा ॥

मः 5 ॥
मतड़ी कांढकु आह पाव धोवंदो पीवसा ॥
मू तनि प्रेमु अथाह पसण कू सचा धणी ॥3॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ सदा कायम रहने वाले मालिक के दर्शन करने के लिए मेरे हृदय में अथाह प्रेम है (पर मेरी खोटी मति दर्शनों के रास्ते पर रोक डालती है); जो मनुष्य मेरी इस खोटी मति को (मेरे अंदर से) निकाल दे। मैं उसके पैर धो-धो के पीऊँगा। 3।

निरभउ नामु विसारिआ नालि माइआ रचा ॥

पउड़ी ॥
निरभउ नामु विसारिआ नालि माइआ रचा ॥
आवै जाइ भवाईऐ बहु जोनी नचा ॥
बचनु करे तै खिसकि जाइ बोले सभु कचा ॥
अंदरहु थोथा कूड़िआरु कूड़ी सभ खचा ॥
वैरु करे निरवैर नालि झूठे लालचा ॥
मारिआ सचै पातिसाहि वेखि धुरि करमचा ॥
जमदूती है हेरिआ दुख ही महि पचा ॥
होआ तपावसु धरम का नानक दरि सचा ॥15॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जिस मनुष्य ने निर्भय प्रभू का नाम भुला दिया है और जो माया में ही मस्त रहता है। वह जनम-मरण के चक्कर में पड़ जाता है वह अनेकों जूनियों में भटकता है। (माया में मस्त मनुष्य यदि कोई) वचन करता है तो उससे फिर जाता है। सदा झूठी बात ही करता है। वह झूठा अपने मन में से खाली होता है (उसकी नीयत पहले ही बुरी होती है। इस वास्ते) उसकी (हरेक बात) झूठी होती है गॅप होती है। ऐसा बंदा झूठी लालच में फस के निर्वैर व्यक्ति के साथ भी वैर कमा लेता है। शुरू से ही उस लालची के कामों को देख के सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू-पातिशाह ने (उसकी ज़मीर को) मार दिया हुआ है। ऐसा मनुष्य सदा जमदूतों की ताक में रहता है। दुखों में ही ख़्वार होता है। हे नानक ! सच्चे प्रभू के दर पर धर्म का इन्साफ (ही) होता है। 15।

डखणे मः 5 ॥

डखणे मः 5 ॥
परभाते प्रभ नामु जपि गुर के चरण धिआइ ॥
जनम मरण मलु उतरै सचे के गुण गाइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ (हे भाई !) अमृत बेला में उठ के प्रभू का नाम सिमर। और अपने गुरू के चरणों का ध्यान धर (भाव। प्रभू के नाम में जोड़ने वाले गुरू का आदर सत्कार पूरी विनम्रता से अपने दिल में टिका)। सदा कायम रहने वाले प्रभू की सिफत सालाह करने से जनम-मरण के चक्कर में डालने वाली विकारों की मैल मन से उतर जाती है। 1।

देह अंधारी अंधु सुंञी नाम विहूणीआ ॥

मः 5 ॥
देह अंधारी अंधु सुंञी नाम विहूणीआ ॥
नानक सफल जनंमु जै घटि वुठा सचु धणी ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ नाम से टूटा हुआ शरीर (आत्मिक जीवन से) वंचित रहता है। पूरी तौर पर (आत्मिक जीवन की सूझ से) अंधा हो जाता है (भाव। सारी ज्ञानेन्द्रियां सदाचारी उपयोग से अंधी हो के विकारों में प्रवृति हुई रहती हैं)। हे नानक ! जिस मनुष्य के हृदय में सदा-स्थिर मालिक प्रभू आ बसता है। उसकी जिंदगी मुबारक है। 2।

लोइण लोई डिठ पिआस न बुझै मू घणी ॥

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मः 5 ॥
लोइण लोई डिठ पिआस न बुझै मू घणी ॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (ज्यों-ज्यों) मैं इन आँखों से (निरे) जगत को (भाव। दुनिया के पदार्थों को) देखता हूँ (इन पदार्थों के प्रति) मेरी लालसा और भी बढ़ती जाती है। लालसा खत्म नहीं होती।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1099 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1099 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।