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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 10 · सो दरु · सो पुरखु

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अंग
10
सो दरु · सो पुरखु
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  1. जिनि दिनु करि कै कीती राति ॥
  2. हरि के जन सतिगुर सतपुरखा बिनउ करउ गुर पासि ॥
  3. काहे रे मन चितवहि उदमु जा आहरि हरि जीउ परिआ ॥
  4. सो पुरखु निरंजनु हरि पुरखु निरंजनु हरि अगमा अगम अपारा ॥

गुरु नानक देव जी · शबद

जिनि दिनु करि कै कीती राति ॥

अंग 9 से चला आ रहा अंश

जिनि दिनु करि कै कीती राति ॥
खसमु विसारहि ते कमजाति ॥
नानक नावै बाझु सनाति ॥4॥3॥

हिन्दी अर्थ: आप ही हैं जिन्होंने दिन बनाया है और रात बनाई है। हे नानक! वे लोग नीच जीवन वाले बन जाते हैं जो (ऐसे) खसम प्रभू को भुला देते हैं। नाम से रहित जीव ही नीच हैं। 4। 3।

गुरु राम दास जी · शबद

हरि के जन सतिगुर सतपुरखा बिनउ करउ गुर पासि ॥

रागु गूजरी महला 4 ॥
हरि के जन सतिगुर सतपुरखा बिनउ करउ गुर पासि ॥
हम कीरे किरम सतिगुर सरणाई करि दइआ नामु परगासि ॥1॥
मेरे मीत गुरदेव मो कउ राम नामु परगासि ॥
गुरमति नामु मेरा प्रान सखाई हरि कीरति हमरी रहरासि ॥1॥ रहाउ ॥
हरि जन के वड भाग वडेरे जिन हरि हरि सरधा हरि पिआस ॥
हरि हरि नामु मिलै त्रिपतासहि मिलि संगति गुण परगासि ॥2॥
जिन हरि हरि हरि रसु नामु न पाइआ ते भागहीण जम पासि ॥
जो सतिगुर सरणि संगति नही आए ध्रिगु जीवे ध्रिगु जीवासि ॥3॥
जिन हरि जन सतिगुर संगति पाई तिन धुरि मसतकि लिखिआ लिखासि ॥
धनु धंनु सतसंगति जितु हरि रसु पाइआ मिलि जन नानक नामु परगासि ॥4॥4॥

हिन्दी अर्थ: रागु गूजरी महला 4 ॥ हे महापुरख गुरू! हे प्रभू के भक्त सत्गुरू! मैं, हे गुरू! आपके आगे विनती करता हूँ: कृपा करके (मेरे अंदर) प्रभू के नाम का प्रकाश पैदा करें। हे सत्गुरू! मैं निमाणा आपकी शरण आया हूँ। 1। हे मेरे मित्र गुरू! मुझे प्रभू के नाम का प्रकाश बख्शें। गुरू की बताई मति द्वारा मिला हुआ हरि नाम मेरे जीवन का साथी बना रहे, ईश्वर की सिफत सलाह मेरी जिंदगी के सफर के लिए राशि पूँजी बनी रहे। 1। रहाउ। प्रभू के उन सेवकों के बड़े ही ऊँचे भाग्य हैं जिनके अंदर प्रभू के नाम के वास्ते श्रद्धा है, खिचाव है। जब उन्हें प्रमात्मा का नाम प्राप्त होता है वे (माया की तृष्णा से) त्रिप्त हो जाते हैं, साध-संगति में मिल के (उनके अंदर भले गुण) पैदा होते हैं। 2। पर जिन मनुष्यों को परमात्मा के नाम का स्वाद नहीं आया, जिन को प्रभू का नाम नहीं मिला, वे बद्-किस्मत हैं, उन्हें जमों के वश (में समझें, उनके सिर पर आत्मिक मौत हमेशा सवार रहती है)। जो मनुष्य गुरू की शरण में नहीं आते, जो साध-संगति में नहीं बैठते, लाहनत है उनके जीवन को, उनका जीना तिरस्कार योग्य है। 3। जिन प्रभू के सेवकों को गुरू की संगति में बैठना नसीब हुआ है, (समझें) उनके माथे पर धुर से ही भाग्यशाली लेख लिखे हुए हैं। हे नानक! धन्य है सत्संग! जिस में (बैठने से) प्रभू के नाम का आनन्द मिलता है, जहाँ गुरमुखों को मिलने से (हृदय में परमात्मा का) नाम आ बसता है। 4। 4।

गुरु अर्जन देव जी · शबद

काहे रे मन चितवहि उदमु जा आहरि हरि जीउ परिआ ॥

रागु गूजरी महला 5 ॥
काहे रे मन चितवहि उदमु जा आहरि हरि जीउ परिआ ॥
सैल पथर महि जंत उपाए ता का रिजकु आगै करि धरिआ ॥1॥
मेरे माधउ जी सतसंगति मिले सु तरिआ ॥
गुर परसादि परम पदु पाइआ सूके कासट हरिआ ॥1॥ रहाउ ॥
जननि पिता लोक सुत बनिता कोइ न किस की धरिआ ॥
सिरि सिरि रिजकु संबाहे ठाकुरु काहे मन भउ करिआ ॥2॥
ऊडे ऊडि आवै सै कोसा तिसु पाछै बचरे छरिआ ॥
तिन कवणु खलावै कवणु चुगावै मन महि सिमरनु करिआ ॥3॥
सभि निधान दस असट सिधान ठाकुर कर तल धरिआ ॥
जन नानक बलि बलि सद बलि जाईऐ तेरा अंतु न पारावरिआ ॥4॥5॥

हिन्दी अर्थ: रागु गूजरी महला 5 ॥ हे मन! (आपकी खातिर) जिस आहर में प्रमात्मा स्वयं लगा हुआ है, उस वास्ते आप क्यों सदा चिंता-फिक्र करते रहते हैं? जो जीव प्रभू ने चट्टानों में पत्थरों में पैदा किए हैं, उनका भी रिजक (भोजन) उसने (उनको पैदा करने से) पहले ही बना रखा है। 1। हे मेरे प्रभू जी! जो मनुष्य साध-संगति में मिल बैठते हैं, वो (व्यर्थ की चिंता-फिक्र से) बच जाते हैं। गुरू की कृपा से जिस मनुष्य को यह (अडोलता वाली) उच्च आत्मिक अवस्था मिल जाती है, वह (मानों) सूखी लकड़ी हरी हो गई। 1। रहाउ। (हे मन!) माता, पिता, पुत्र, लोग, पत्नी, कोई भी किसी का आसरा नहीं। हे मन! आप क्यों डरते हैं? पालनहार प्रमात्मा हरेक जीव को स्वयं ही रिजक पहुँचाता है। 2। (हे मन! देखें! कूंज) उड़ उड़ के सैकड़ों ही कोसों से आ जाती हैं, पीछे उसके बच्चे (अकेले) छोड़े हुये होते हैं। उन्हें कोई खिलाने वाला नहीं, कोई उन्हें चोगा नहीं चुगाता। वह कूंज अपने बच्चों का ध्यान अपने मन में धरी रखती है (और, इसी को प्रभू उनके लालन पालन का वसीला बनाता है)। 3। हे पालनहार प्रभू! जगत के सारे खजाने और अठारह सिद्धियां (मानो) आपके हाथों की तलियों पर रखे हुये हैं। हे दास नानक! ऐसे प्रभू से सदा सदके हों, सदा कुर्बान हों, (और कहें, हे प्रभू!) आपकी बुर्जुगी के इस पार के और उस पार के छोर का अंत नहीं पाया जा सकता। 4। 5।

गुरु राम दास जी · शबद

सो पुरखु निरंजनु हरि पुरखु निरंजनु हरि अगमा अगम अपारा ॥

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रागु आसा महला 4 सो पुरखु
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सो पुरखु निरंजनु हरि पुरखु निरंजनु हरि अगमा अगम अपारा ॥
सभि धिआवहि सभि धिआवहि तुधु जी हरि सचे सिरजणहारा ॥
सभि जीअ तुमारे जी तूं जीआ का दातारा ॥
हरि धिआवहु संतहु जी सभि दूख विसारणहारा ॥
हरि आपे ठाकुरु हरि आपे सेवकु जी किआ नानक जंत विचारा ॥1॥

हिन्दी अर्थ: राग आसा महला 4 सो पुरखु ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। वह परमात्मा सारे जीवों में व्यापक है (फिर भी) माया के प्रभाव से ऊपर है, अपहुँच है और बेअंत है। हे सदा कायम रहने वाले और सभ जीवों को पैदा करने वाले हरी! सारे जीव आपको हमेशा सिमरते हैं, आपका ध्यान धरते हैं। हे प्रभू! सारे जीव आपके ही पैदा किये हुए हैं, आप ही सभ जीवों के दाता हैं। हे संत जनों! डस प्रमात्मा का ध्यान धरा करें, वह सारे दुखों का नाश करने वाला है। वह (सभी जीवों में व्यापक होने के कारण) स्वयं ही मालिक है और स्वयं ही सेवक है। हे नानक! उस के बिना जीव बिचारे क्या हैं? (उस हरि से अलग जीवों का कोई वजूद नहीं)। 1।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 4: गुरु राम दास जी; महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 10 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।