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- जितु लाईअनि तितै लगदीआ नह खिंजोताड़ा ॥
- डखणे मः 5 ॥
- कपड़ भोग विकार ए हभे ही छार ॥
- किआ तकहि बिआ पास करि हीअड़े हिकु अधारु ॥
- विणु करमा हरि जीउ न पाईऐ बिनु सतिगुर मनूआ न लगै ॥
- डखणे मः 5 ॥
- माणिकू मोहि माउ डिंना धणी अपाहि ॥
- मू थीआऊ सेज नैणा पिरी विछावणा ॥
- मनु लोचै हरि मिलण कउ किउ दरसनु पाईआ ॥
- डखणे मः 5 ॥
- पिरीआ संदड़ी भुख मू लावण थी विथरा ॥
- ठगा नीहु मत्रोड़ि जाणु गंध्रबा नगरी ॥
- अकल कला नह पाईऐ प्रभु अलख अलेखं ॥
जितु लाईअनि तितै लगदीआ नह खिंजोताड़ा ॥
जितु लाईअनि तितै लगदीआ नह खिंजोताड़ा ॥
जो इछी सो फलु पाइदा गुरि अंदरि वाड़ा ॥
गुरु नानकु तुठा भाइरहु हरि वसदा नेड़ा ॥10॥
जो इछी सो फलु पाइदा गुरि अंदरि वाड़ा ॥
गुरु नानकु तुठा भाइरहु हरि वसदा नेड़ा ॥10॥
हिन्दी अर्थ: अब इन्हें जिस तरफ लगाता हूँ उधर ही लगती हैं। कोई खींचतान नहीं (करतीं)। गुरू ने (मेरे मन को) अंदर की ओर पलटा दिया है। अब मैं जो कुछ इच्छा करता हूँ वही फल प्राप्त कर लेता हूँ। हे भाइयो ! मेरे ऊपर गुरू नानक प्रसन्न हो गया है। (उसकी मेहर से) मुझे प्रभू (अपने) नजदीक बसता दिखता है। 10।
डखणे मः 5 ॥
डखणे मः 5 ॥
जा मूं आवहि चिति तू ता हभे सुख लहाउ ॥
नानक मन ही मंझि रंगावला पिरी तहिजा नाउ ॥1॥
जा मूं आवहि चिति तू ता हभे सुख लहाउ ॥
नानक मन ही मंझि रंगावला पिरी तहिजा नाउ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ हे नानक ! (कहें-) हे पति-प्रभू ! जब आप मेरे हृदय में आ बसते हैं। तो मुझे सारे सुख मिल जाते हैं। आपका नाम मुझे अपने मन में मीठा प्यारा लगने लगता है (और सुख देता है)। 1।
कपड़ भोग विकार ए हभे ही छार ॥
मः 5 ॥
कपड़ भोग विकार ए हभे ही छार ॥
खाकु लोुड़ेदा तंनि खे जो रते दीदार ॥2॥
कपड़ भोग विकार ए हभे ही छार ॥
खाकु लोुड़ेदा तंनि खे जो रते दीदार ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (प्रभू की याद से टूट के निरे) खान-पान पहरावों (के पदार्थ) विकार (पैदा करते हैं। इसलिए असल में) ये सारे राख के समान हैं (बिल्कुल व्यर्थ हैं)। (तभी तो) मैं उन लोगों की चरण-धूल ढूँढता हूँ। जो प्रभू के दीदार में रंगे हुए हैं। 2।
किआ तकहि बिआ पास करि हीअड़े हिकु अधारु ॥
मः 5 ॥
किआ तकहि बिआ पास करि हीअड़े हिकु अधारु ॥
थीउ संतन की रेणु जितु लभी सुख दातारु ॥3॥
किआ तकहि बिआ पास करि हीअड़े हिकु अधारु ॥
थीउ संतन की रेणु जितु लभी सुख दातारु ॥3॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे मेरी जिंदे ! (प्रभू को छोड़ के सुखों की खातिर) और-और आसरे क्यों ताकती हैं। केवल एक प्रभू को अपना आसरा बनाएँ। (और। उस प्रभू की प्राप्ति के वास्ते उसके) संत जनों के चरणों की धूड़ बनें। जिसकी बरकति से सुखों को देने वाला सुखदाता प्रभू मिल जाए। 3।
विणु करमा हरि जीउ न पाईऐ बिनु सतिगुर मनूआ न लगै ॥
पउड़ी ॥
विणु करमा हरि जीउ न पाईऐ बिनु सतिगुर मनूआ न लगै ॥
धरमु धीरा कलि अंदरे इहु पापी मूलि न तगै ॥
अहि करु करे सु अहि करु पाए इक घड़ी मुहतु न लगै ॥
चारे जुग मै सोधिआ विणु संगति अहंकारु न भगै ॥
हउमै मूलि न छुटई विणु साधू सतसंगै ॥
तिचरु थाह न पावई जिचरु साहिब सिउ मन भंगै ॥
जिनि जनि गुरमुखि सेविआ तिसु घरि दीबाणु अभगै ॥
हरि किरपा ते सुखु पाइआ गुर सतिगुर चरणी लगै ॥11॥
विणु करमा हरि जीउ न पाईऐ बिनु सतिगुर मनूआ न लगै ॥
धरमु धीरा कलि अंदरे इहु पापी मूलि न तगै ॥
अहि करु करे सु अहि करु पाए इक घड़ी मुहतु न लगै ॥
चारे जुग मै सोधिआ विणु संगति अहंकारु न भगै ॥
हउमै मूलि न छुटई विणु साधू सतसंगै ॥
तिचरु थाह न पावई जिचरु साहिब सिउ मन भंगै ॥
जिनि जनि गुरमुखि सेविआ तिसु घरि दीबाणु अभगै ॥
हरि किरपा ते सुखु पाइआ गुर सतिगुर चरणी लगै ॥11॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ प्रभू की मेहर के बिना प्रभू से मिलाप नहीं होता (प्रभू की मेहर से ही गुरू मिलता है। और) गुरू के बिना मनुष्य का माया-ग्रसित मन (प्रभू चरणों में) जुड़ता ही नहीं। संसार में धर्म ही सदा एक-रस रहता है। पर यह मन (जब तक) पापों में प्रवृत्त है बिल्कुल अडोलता में टिका नहीं रह सकता। (क्योंकि किए विकारों का मानसिक नतीजा निकलते) रक्ती भर समय नहीं लगता। जो कुछ ये हाथ करता है उसका फल यही हाथ पा लेता है। (जब से दुनिया बनी है) चारों ही युगों के समय को विचार के मैंने देख लिया है कि मन का अहंकार संगति के बगैर दूर नहीं होता। गुरमुखों की संगति के बिना अहंकार बिल्कुल खत्म नहीं हो सकता। (जब तक मन में अहंकार है। तब तक मालिक प्रभू से दूरी है) जब तक मालिक प्रभू से दूरी है तब तक मनुष्य उसके गुणों की गहराई में टिक नहीं सकता। जिस मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर प्रभू का सिमरन किया है उसके हृदय में ही अविनाशी प्रभू का दरबार लग जाता है। प्रभू की मेहर से ही मनुष्य गुरू चरणों में जुड़ता है। और मेहर से ही आत्मिक सुख प्राप्त करता है। 11।
डखणे मः 5 ॥
डखणे मः 5 ॥
लोड़ीदो हभ जाइ सो मीरा मीरंन सिरि ॥
हठ मंझाहू सो धणी चउदो मुखि अलाइ ॥1॥
लोड़ीदो हभ जाइ सो मीरा मीरंन सिरि ॥
हठ मंझाहू सो धणी चउदो मुखि अलाइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ वह मालिक प्रभू शाहों के सिर पर पातशाह है। मैं उसको (बाहर) हर जगह तलाशता फिरता था; पर अब जब मैं मुँह से उसके गुण उचारता हूँ। वह मुझे मेरे हृदय में ही दिखाई दे रहा है। 1।
माणिकू मोहि माउ डिंना धणी अपाहि ॥
मः 5 ॥
माणिकू मोहि माउ डिंना धणी अपाहि ॥
हिआउ महिजा ठंढड़ा मुखहु सचु अलाइ ॥2॥
माणिकू मोहि माउ डिंना धणी अपाहि ॥
हिआउ महिजा ठंढड़ा मुखहु सचु अलाइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे माँ ! मालिक प्रभू ने स्वयं ही मुझे अपना नाम मोती दिया। (अब) मुँह से उस सदा-स्थिर प्रभू का नाम उचार-उचार के मेरा हृदय ठंडा-ठार हो गया है। 2।
मू थीआऊ सेज नैणा पिरी विछावणा ॥
मः 5 ॥
मू थीआऊ सेज नैणा पिरी विछावणा ॥
जे डेखै हिक वार ता सुख कीमा हू बाहरे ॥3॥
मू थीआऊ सेज नैणा पिरी विछावणा ॥
जे डेखै हिक वार ता सुख कीमा हू बाहरे ॥3॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ मैंने अपने हृदय को प्रभू-पति (के बिराजने) के लिए सेज बना दी है। अपनी आँखों को (उस सेज का) बिछौना बनाया है। जब वह एक बार भी (मेरी ओर) देखता है। मुझे ऐसे सुख का अनुभव होता है जो अमूल्य है (जो किसी भी कीमत से नहीं मिल सकता)। 3।
मनु लोचै हरि मिलण कउ किउ दरसनु पाईआ ॥
पउड़ी ॥
मनु लोचै हरि मिलण कउ किउ दरसनु पाईआ ॥
मै लख विड़ते साहिबा जे बिंद बोुलाईआ ॥
मै चारे कुंडा भालीआ तुधु जेवडु न साईआ ॥
मै दसिहु मारगु संतहो किउ प्रभू मिलाईआ ॥
मनु अरपिहु हउमै तजहु इतु पंथि जुलाईआ ॥
नित सेविहु साहिबु आपणा सतसंगि मिलाईआ ॥
सभे आसा पूरीआ गुर महलि बुलाईआ ॥
तुधु जेवडु होरु न सुझई मेरे मित्र गोुसाईआ ॥12॥
मनु लोचै हरि मिलण कउ किउ दरसनु पाईआ ॥
मै लख विड़ते साहिबा जे बिंद बोुलाईआ ॥
मै चारे कुंडा भालीआ तुधु जेवडु न साईआ ॥
मै दसिहु मारगु संतहो किउ प्रभू मिलाईआ ॥
मनु अरपिहु हउमै तजहु इतु पंथि जुलाईआ ॥
नित सेविहु साहिबु आपणा सतसंगि मिलाईआ ॥
सभे आसा पूरीआ गुर महलि बुलाईआ ॥
तुधु जेवडु होरु न सुझई मेरे मित्र गोुसाईआ ॥12॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ प्रभू को मिलने के लिए मेरा मन बहुत तरसता है (पर समझ नहीं आती कि) कैसे दर्शन करूँ। हे (मेरे) मालिक ! अगर आप मुझे थोड़ी सी भी आवाज लगाएँ तो (मैं समझता हूँ कि) मैंने लाखों रुपए कमा लिए हैं। हे मेरे साई ! मैंने चारों तरफ सारी सृष्टि खोज के देख ली है कि आपके जितना और कोई नहीं। हे संत जनो ! (आप ही) मुझे रास्ता बताएँ कि मैं प्रभू को कैसे मिलूँ। (संतजन राह बताते हैं कि) मन (प्रभू को) भेटा करें अहंकार को दूर करें (और कहते हैं कि) मैं इस रास्ते पर चलूँ। (संत उपदेश देते हैं कि) सदा अपने मालिक प्रभू को याद करें (और कहते हैं कि) मैं सत्संग में मिलूँ। जब प्रभू की हजूरी में गुरू ने बुला लिया। तो सारी आशाएँ पूरी हो जाएँगी। हे मेरे मित्र ! हे धरती के मालिक ! मुझे आपके जितना और कोई नहीं मिलता (आप मेहर करें। और दीदार दें)। 12।
डखणे मः 5 ॥
डखणे मः 5 ॥
मू थीआऊ तखतु पिरी महिंजे पातिसाह ॥
पाव मिलावे कोलि कवल जिवै बिगसावदो ॥1॥
मू थीआऊ तखतु पिरी महिंजे पातिसाह ॥
पाव मिलावे कोलि कवल जिवै बिगसावदो ॥1॥
हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ हे मेरे पति पातशाह ! मैंने (आपके बैठने के लिए) अपने हृदय में तख़्त बनाया है। जब आप अपने चरणों से मेरे हृदय-तख़्त को छूते हैं। मैं कमल के फूल की तरह खिल उठता हूँ। 1।
पिरीआ संदड़ी भुख मू लावण थी विथरा ॥
मः 5 ॥
पिरीआ संदड़ी भुख मू लावण थी विथरा ॥
जाणु मिठाई इख बेई पीड़े ना हुटै ॥2॥
पिरीआ संदड़ी भुख मू लावण थी विथरा ॥
जाणु मिठाई इख बेई पीड़े ना हुटै ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ प्यारे पति-प्रभू को मिलने की भूख मिटाने के लिए मेरा स्वै-भाव नमकीन बन जाए। मैं ऐसी गन्ने की मिठास बनना सीख लूँ कि (गन्ने को) बार-बार पेरे जाने से भी ना खत्म हो (भाव। मैं आपा-भाव मिटा दूँ। और स्वै न्यौछावर करते हुए कभी ना थकूँ। कभी ना तृप्त होऊँ)। 2।
ठगा नीहु मत्रोड़ि जाणु गंध्रबा नगरी ॥
मः 5 ॥
ठगा नीहु मत्रोड़ि जाणु गंध्रबा नगरी ॥
सुख घटाऊ डूइ इसु पंधाणू घर घणे ॥3॥
ठगा नीहु मत्रोड़ि जाणु गंध्रबा नगरी ॥
सुख घटाऊ डूइ इसु पंधाणू घर घणे ॥3॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (हे भाई !) दुनिया का मोह अच्छी तरह तोड़ दें। (इस दुनिया को) धुएँ का पहाड़ समझें। (दुनिया का) दो घड़ियों का सुख (भोगने से) इस जीव-राही को अनेकों जूनियों (में भटकना पड़ता है)। 3।
अकल कला नह पाईऐ प्रभु अलख अलेखं ॥
पउड़ी ॥
अकल कला नह पाईऐ प्रभु अलख अलेखं ॥
अकल कला नह पाईऐ प्रभु अलख अलेखं ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जिस प्रभू का कोई चक्र-चिन्ह नहीं। जिसका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। जो बढ़ता-घटता नहीं है उसका भेद (कला) नहीं पाया जा सकता।
रचयिता और स्रोत
यह मारू राग के क्रम का अंग 1098 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1098 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।