जितु लाईअनि तितै लगदीआ नह खिंजोताड़ा ॥ जो इछी सो फलु पाइदा गुरि अंदरि वाड़ा ॥ गुरु नानकु तुठा भाइरहु हरि वसदा नेड़ा ॥10॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: अब इन्हें जिस तरफ लगाता हूँ उधर ही लगती हैं। कोई खींचतान नहीं (करतीं)। गुरू ने (मेरे मन को) अंदर की ओर पलटा दिया है। अब मैं जो कुछ इच्छा करता हूँ वही फल प्राप्त कर लेता हूँ। हे भाईयो ! मेरे ऊपर गुरू नानक प्रसन्न हो गया है। (उसकी मेहर से) मुझे प्रभू (अपने) नजदीक बसता दिखता है। 10।
डखणे मः 5 ॥ जा मूं आवहि चिति तू ता हभे सुख लहाउ ॥ नानक मन ही मंझि रंगावला पिरी तहिजा नाउ ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ हे नानक ! (कह-) हे पति-प्रभू ! जब आप मेरे हृदय में आ बसता है। तो मुझे सारे सुख मिल जाते हैं। आपका नाम मुझे अपने मन को मीठा प्यारा लगने लगता है (और सुख देता है)। 1।
मः 5 ॥ कपड़ भोग विकार ए हभे ही छार ॥ खाकु लोुड़ेदा तंनि खे जो रते दीदार ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (प्रभू की याद से टूट के निरे) खान-पान पहरावों (के पदार्थ) विकार (पैदा करते हैं। इसलिए असल में) ये सारे राख के समान हैं (बिल्कुल व्यर्थ हैं)। (तभी तो) मैं उन लोगों की चरण-धूल ढूँढता हूँ। जो प्रभू के दीदार में रंगे हुए हैं। 2।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे मेरी जिंदे ! (प्रभू को छोड़ के सुखों की खातिर) और-और आसरे क्यों ताकती है। केवल एक प्रभू को अपना आसरा बना। (और। उस प्रभू की प्राप्ति के वास्ते उसके) संत जनों के चरणों की धूड़ बन। जिसकी बरकति से सुखों के देने वाला सुखदाता प्रभू मिल जाए। 3।
पउड़ी ॥ विणु करमा हरि जीउ न पाईऐ बिनु सतिगुर मनूआ न लगै ॥ धरमु धीरा कलि अंदरे इहु पापी मूलि न तगै ॥ अहि करु करे सु अहि करु पाए इक घड़ी मुहतु न लगै ॥ चारे जुग मै सोधिआ विणु संगति अहंकारु न भगै ॥ हउमै मूलि न छुटई विणु साधू सतसंगै ॥ तिचरु थाह न पावई जिचरु साहिब सिउ मन भंगै ॥ जिनि जनि गुरमुखि सेविआ तिसु घरि दीबाणु अभगै ॥ हरि किरपा ते सुखु पाइआ गुर सतिगुर चरणी लगै ॥11॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ प्रभू की मेहर के बिना प्रभू से मिलाप नहीं होता (प्रभू की मेहर से ही गुरू मिलता है। और) गुरू के बिना मनुष्य का माया-ग्रसित मन (प्रभू चरणों में) जुड़ता ही नहीं। संसार में धर्म ही सदा एक-रस रहता है। पर यह मन (जब तक) पापों में प्रवृक्त है बिल्कुल अडोलता में टिका नहीं रह सकता। (क्योंकि किए विकारों का मानसिक नतीजा निकलते) रक्ती भर समय नहीं लगता। जो कुछ ये हाथ करता है उसका फल यही हाथ पा लेता है। (जब से दुनिया बनी है) चारों ही युगों के समय को विचार के मैंने देख लिया है कि मन का अहंकार संगति के बगैर दूर नहीं होता। गुरमुखों की संगति के बिना अहंकार बिल्कुल खत्म नहीं हो सकता। (जब तक मन में अहंकार है। तब तक मालिक प्रभू से दूरी है) जब तक मालिक प्रभू से दूरी है तब तक मनुष्य उसके गुणों की गहराई में टिक नहीं सकता। जिस मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर प्रभू का सिमरन किया है उसके हृदय में ही अविनाशी प्रभू का दरबार लग जाता है। प्रभू की मेहर से ही मनुष्य गुरू चरणों में जुड़ता है। और मेहर से ही आत्मिक सुख प्राप्त करता है। 11।
डखणे मः 5 ॥ लोड़ीदो हभ जाइ सो मीरा मीरंन सिरि ॥ हठ मंझाहू सो धणी चउदो मुखि अलाइ ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ वह मालिक प्रभू शाहों के सिर पर पातशाह है। मैं उसको (बाहर) हर जगह तलाशता फिरता था; पर अब जब मैं मुँह से उसके गुण उचारता हॅूँ। वह मुझे मेरे हृदय में ही दिखाई दे रहा है। 1।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे माँ ! मालिक प्रभू ने स्वयं ही मुझे अपना नाम मोती दिया। (अब) मुँह से उस सदा-स्थिर प्रभू का नाम उचार-उचार के मेरा हृदय ठंडा-ठार हो गया है। 2।
मः 5 ॥ मू थीआऊ सेज नैणा पिरी विछावणा ॥ जे डेखै हिक वार ता सुख कीमा हू बाहरे ॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ मैंने अपने हृदय को प्रभू-पति (के बिराजने) के लिए सेज बना दी है। अपनी आँखों को (उस सेज का) बिछौना बनाया है। जब वह एक बार भी (मेरी ओर) देखता है। मुझे ऐसे सुख का अनुभव होता है जो अमूल्य है (जो किसी भी कीमत से नहीं मिल सकता)। 3।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ प्रभू को मिलने के लिए मेरा मन बहुत तरसता है (पर समझ नहीं आती कि) कैसे दर्शन करूँ। हे (मेरे) मालिक ! अगर आप मुझे थोड़ी सी भी आवाज लगाए तो (मैं समझता हूँ कि) मैंने लाखों रुपए कमा लिए हैं। हे मेरे साई ! मैंने चारों तरफ सारी सृष्टि खोज के देख लिया है कि आपके जितना और कोई नहीं। हे संत जनो ! (आप ही) मुझे रास्ता बताओ कि मैं प्रभू को कैसे मिलूँ। (संतजन राह बताते हैं कि) मन (प्रभू को) भेटा करो अहंकार को दूर करो (और कहते हैं कि) मैं इस रास्ते पर चलूँ। (संत उपदेश देते हैं कि) सदा अपने मालिक प्रभू को याद करो (और कहते हैं कि) मैं सत्संग में मिलूँ। जब प्रभू की हजूरी में गुरू ने बुला लिया। तो सारी आशाएं पूरी हो जाएंगी। हे मेरे मित्र ! हे धरती के मालिक ! मुझे आपके जितना और कोई नहीं मिलता (आप मेहर कर। और दीदार दे)। 12।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ हे मेरे पति पातशाह ! मैंने (आपके बैठने के लिए) अपने हृदय में तख़्त बनाया है। जब आप अपने चरण मेरे हृदय-तख़्त पर स्पर्श करता है। मैं कमल के फूल की तरह खिल उठता हूँ।
मः 5 ॥ पिरीआ संदड़ी भुख मू लावण थी विथरा ॥ जाणु मिठाई इख बेई पीड़े ना हुटै ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ प्यारे पति-प्रभू को मिलने की भूख मिटाने के लिए मेरा स्वै-भाव नमकीन बन जाए। मैं ऐसी गन्ने की मिठास बनना सीख लूँ कि (गन्ने को) बार-बार पीढ़ने से भी ना खत्म हो (भाव। मैं आपा-भाव मिटा दूँ। और स्वै न्यौछावर करते हुए कभी ना थकूँ। कभी ना तृप्त होऊँ)। 2।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (हे भाई !) दुनिया का मोह अच्छी तरह तोड़ दे। (इस दुनिया को) धूएं का पहाड़ समझ। (दुनिया का) दो घड़ियों का सुख (भोगने से) इस जीव-राही को अनेकों जूनियों (में भटकना पड़ता है)। 3।
पउड़ी ॥ अकल कला नह पाईऐ प्रभु अलख अलेखं ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जिस प्रभू का कोई चक्र-चिन्ह नहीं। जिसका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। जो बढ़ता-घटता नहीं है उसका भेद (कला) नहीं पाया जा सकता।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 13 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अब इन्हें जिस तरफ लगाता हूँ उधर ही लगती हैं।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।