अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (प्रभू के दर्शनों से वंचित) मैं दुखी हूँ। मेरे अंदर अनेकों पीड़ाएं हैं। हे पति ! मेरे दिल की पीड़ा आप ही जानता है। पर चाहे मुझे लाख पता हैं (कि आप मेरी वेदना जानता है। फिर भी) मुझे सुख की सांस तभी आती है जब मैं आपके दर्शन करूँ। 2।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (संसार नदी में विकारों ने ढाह लगाई हुई है गिराने पर जोर दिया हुआ है। नदी का) किनारा गिरता जा रहा है। (विकारों के) बहाव में अनेकों लोग मैंने (खुद) बहते हुए देखे हैं। वही सही-सलामत रहते हैं। जिनको सतिगुरू मिल जाता है। 3।
पउड़ी ॥ जिसु जन तेरी भुख है तिसु दुखु न विआपै ॥ जिनि जनि गुरमुखि बुझिआ सु चहु कुंडी जापै ॥ जो नरु उस की सरणी परै तिसु कंबहि पापै ॥ जनम जनम की मलु उतरै गुर धूड़ी नापै ॥ जिनि हरि भाणा मंनिआ तिसु सोगु न संतापै ॥ हरि जीउ तू सभना का मितु है सभि जाणहि आपै ॥ ऐसी सोभा जनै की जेवडु हरि परतापै ॥ सभ अंतरि जन वरताइआ हरि जन ते जापै ॥8॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! जिस मनुष्य को आपके नाम की चाहत है उस मनुष्य को कोई दुख छू नहीं सकता। जिस सेवक ने गुरू की शरण पड़ कर आपके साथ सांझ डाली है वह सारे जगत में प्रकट हैं जाता है। (फिर) जो मनुष्य उस सेवक की शरण पड़ता है उसके नजदीक भी कोई पाप नहीं फटकते। गुरू के चरणों की धूड़ में स्नान करके उसकी कई जन्मों की (विकारों की) मैल उतर जाती है। जिस मनुष्य ने प्रभू की रजा को (मीठा करके) मान लिया है उसको कोई चिंता-फिक्र दुख नहीं दे सकता। हे प्रभू जी ! आप सारे जीवों का मित्र है। सारे जीवों को आप अपने समझता है। प्रभू के सेवक की शोभा उतनी ही बड़ी हैं जाती है जितना बड़ा प्रभू का अपना तेज-प्रताप है। प्रभू अपने सेवक की वडिआई सब जीवों के अंदर टिका देता है। प्रभू अपने सेवक से ही पहचाना जाता है। 8।
डखणे मः 5 ॥ जिना पिछै हउ गई से मै पिछै भी रविआसु ॥ जिना की मै आसड़ी तिना महिजी आस ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ (माया का अजीब प्रभाव है। सब माया की खातिर भटकते फिरते हैं। माया के लिए) जिन लोगों के पीछे मैं जाता हूँ (जिनकी मुथाजी मैं कर रहा हूँ। जब मैं उनकी ओर देखता हूँ। तब) वह भी मेरे पीछे-पीछे चलते फिरते हैं। जिनकी सहायता की मैं आस रखे फिरता हूँ। वह मुझसे आस बनाए बैठे हैं। 1।
मः 5 ॥ गिली गिली रोडड़ी भउदी भवि भवि आइ ॥ जो बैठे से फाथिआ उबरे भाग मथाइ ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ चिप-चिप करती गुड़ की भेली पर मक्खी बार-बार उड़ के आ बैठती है (और आखिर गुड़ के साथ ही चिपक के वही मर जाती है। यही हाल है माया का।) जो जो लोग (माया के नजदीक हो-हो) उठते-बैठते हैं (इसके मोह में) फस जाते हैं। (सिर्फ) वही बचते हैं जिनके माथे के भाग्य (जागते हैं)। 2।
मः 5 ॥ डिठा हभ मझाहि खाली कोइ न जाणीऐ ॥ तै सखी भाग मथाहि जिनी मेरा सजणु राविआ ॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (ये आश्चर्यजनक खेल है कि जीव माया के मोह में फस जाते हैं। क्या इनके अंदर रॅब नहीं बसता। जो इन्हें बचा ले। परमात्मा को तो मैंने) हरेक के अंदर बसता देखा है। कोई भी जीव ऐसा नहीं जिसमें वह नहीं बसता। पर सिर्फ उन (सत्संगी) सहेलियों के माथे के भाग्य ही जागते हैं (और वही माया के प्रभाव से बचती हैं) जिन्होंने प्यारे मित्र-प्रभू के मिलाप का रस लिया है। 3।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ अगर हरी प्रभू को अच्छा लगे (यदि प्रभू की रजा हो। मेहर हो) तो मैं ढाढी (उसके) दर पर (उसके) गुण गाता हूँ। मेरा प्रभू सदा-स्थिर ठिकाने वाला (सदा कायम) है। और (सृष्टि) पैदा होती मरती है। हे धरती के साई ! मैं (आपसे) वह दान माँगता हूँ जिससे मेरी (माया की) भूख दूर हैं जाए। हे प्रभू जी ! मुझे अपने दर्शन दो जिससे मैं ढाढी (माया की तृष्णा से) तृप्त हो जाऊँ। दातार प्रभू ने (मेरी) अरदास सुन ली और (मुझ) ढाढी को अपने महल में बुला लिया (बुलाता है); प्रभू का दीदार करते ही मेरी (माया वाली) भूख व अन्य दुख दूर हो गए। मुझढाढी को ये चेते ही ना रहा कि मैं कुछ माँगू। प्रभू के चरणों में लग के मेरी सारी ही कामनाएं पूरी हो गई (मेरी कोई वासना ही ना रही)। उस प्रभू-पुरख ने मुझ निमाणे गुण-हीन ढाढी को बख्श लिया। 9।
डखणे मः 5 ॥ जा छुटे ता खाकु तू सुंञी कंतु न जाणही ॥ दुरजन सेती नेहु तू कै गुणि हरि रंगु माणही ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ (हे मेरी काया !) जब (आपका और इस आत्मा का संबंध) समाप्त हैं जाएगा। तब आप मिट्टी हैं जाएगी। (उस वक्त) प्राण के बगैर आप पति-प्रभू के साथ सांझ नहीं डाल सकेगी। (अब) आपका प्यार विकारों से है। (बता !) आप किस गुण बरकति से हरी (के मिलाप) का आनंद ले सकती है। 1।
मः 5 ॥ नानक जिसु बिनु घड़ी न जीवणा विसरे सरै न बिंद ॥ तिसु सिउ किउ मन रूसीऐ जिसहि हमारी चिंद ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! जिस (प्रभू की याद) के बिना एक घड़ी भी सुख की सांस नहीं आती (दुनिया के चिंता-फिक्र ही जान खा जाते हैं)। जिसको विसारने से एक पल भर भी जीवन-निर्वाह नहीं हो सकता। (फिर) हे मन ! जिस प्रभू को (हर वक्त) हमारा फिक्र है। उससे रूठना ठीक नहीं। 2।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! जो लोग परम ज्योति प्रभू (पारब्रहम) के प्यार में रंगे जाते हैं। उनका तन-मन (प्यार में) गाढ़ा लाल हो जाता है। (प्रभू के प्यार को घटाने वाला) जितना भी और और ध्यान है। वह प्रभू के नाम की याद से वंचित रखता है और (मन को) मैला करता है। 3।
पवड़ी ॥ हरि जीउ जा तू मेरा मित्रु है ता किआ मै काड़ा ॥ जिनी ठगी जगु ठगिआ से तुधु मारि निवाड़ा ॥ गुरि भउजलु पारि लंघाइआ जिता पावाड़ा ॥ गुरमती सभि रस भोगदा वडा आखाड़ा ॥ सभि इंद्रीआ वसि करि दितीओ सतवंता साड़ा ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे हरी जी ! जब आप मेरा मित्र है। तो मुझे कोई चिंता-फिकर नहीं रह सकता। (क्योंकि) जिन (कामादिक) ठगों ने जगत को ठग लिया है वह तूने (मेरे अंदर से) मार के भगा दिए हैं। गुरू के द्वारा तूने मुझे संसार-समुंद्र से पार लंघा दिया है। मैंने माया के जंजाल जीत लिए हैं। अब मैं गुरू के उपदेश पर चल के सारे रंग माणता हूँ। मैंने इस बड़े जगत-आखाड़े (को जीत लिया है)। आप मेरा सतवंता साई (मेरे सिर ऊपर) है। तूने मेरी सारी इन्द्रियाँ मेरे काबू में कर दी हैं।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 11 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “महला 5॥ (प्रभू के दर्शनों से वंचित) मैं दुखी हूँ।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।