पउड़ी ॥ तुधु रूपु न रेखिआ जाति तू वरना बाहरा ॥ ए माणस जाणहि दूरि तू वरतहि जाहरा ॥ तू सभि घट भोगहि आपि तुधु लेपु न लाहरा ॥ तू पुरखु अनंदी अनंत सभ जोति समाहरा ॥ तू सभ देवा महि देव बिधाते नरहरा ॥ किआ आराधे जिहवा इक तू अबिनासी अपरपरा ॥ जिसु मेलहि सतिगुरु आपि तिस के सभि कुल तरा ॥ सेवक सभि करदे सेव दरि नानकु जनु तेरा ॥5॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! आपका कोई (खास) रूप नहीं कोई चक्र-चिन्ह नहीं। आपकी कोई (विशेष) जाति नहीं। (ब्राहमण खत्री आदि) आपका कोई (खास) वर्ण नहीं। ये मनुष्य आपको कहीं दूर जगह पर बसता समझते हैं। आप (तो) हर जगह मौजूद है। सब जीवों में व्यापक हैं के पदार्थ भोग रहा है। (फिर भी) आपको माया का असर छू नहीं सकता। आप सदा आनंद में रहने वाला है। बेअंत है। सबमें व्यापक है। सबमें आपकी ज्योति टिकी हुई है। हे सृजनहार ! हे परमात्मा ! सारे देवताओं में आप स्वयं ही देवता (प्रकाश करने वाला) है। आप परे से परे है। आप नाश रहित है। मेरी एक जीभ आपकी आराधना करने के समर्थ नहीं। हे प्रभू ! जिस मनुष्य को आप गुरू मिला देता है। उसकी सारी कुलों का उद्धार हैं जाता है। आपके सारे सेवक आपकी सेवा करते हैं। मैं आपका दास नानक (भी आपके ही) दर पर (पड़ा हूँ)। 5।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ गाफ़ल मनुष्य का घास से बना हुआ शरीर-छप्पर तृष्णा की आग में जल रहा है। जिन लोगों के माथे पर अच्छे भाग्य जागते हैं। उन्हें गुरू का सहारा मिल जाता है (और वे तृष्णा की आग से बच जाते हैं)। 1।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! (नियाज़ आदि देने के लिए श्रद्धालु मुसलमान आटा) पिसा के पका के खाना सँवार के तैयार ला के रखता है। (पर जब तक पीर आ के) दुआ (ना पढ़े। वह) बैठा झाकता है। (जैसे मनुष्य अनेकों धार्मिक साधन करता है। पर) जब तक गुरू ना मिले मनुष्य रॅब की रहमत का बैठा इन्जार करता है। 2।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! (अगर कोई मनुष्य इतने ही गरीब हैं कि रसोई चौका आदि प्रयोग करने की जगह) धरती पर ही रोट पका लेते हैं और थाल में डाल लेते हैं। अगर उन्होंने (अपने) गुरू को खुश कर लिया है (अगर गुरू के बताए हुए राह पर चल के उन्होंने अपने गुरू की प्रसन्नता हासिल कर ली है) तो वह उन भुसरियों को धरती पर पकाई हुई रोटियों को ही स्वाद लगा के खाते हैं (भाव। गरीब मनुष्यों को गरीबी में ही सुखी जीवन अनुभव होता है अगर वे गुरू के रास्ते पर चल के गुरू की प्रसन्नता प्राप्त कर लेते हैं)। 3।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! तूने जीवों के अंदर अहंम डाल दिया है। (और इस तरह) जगत में एक तमाशा रच दिया है। यह मनुष्य शरीर एक है (इसमें) कामादिक पाँच चोर हैं जो सदा ही बुराई करते रहते हैं। (एक तरफ) मन अकेला है। (इसके साथ) दस इन्द्रियां हैं। ये दसों ही (माया के) स्वाद में फसी हुई हैं। इस मोहनी माया ने इनको मोहा हुआ है (इस वास्ते ये) सदा भटकती फिरती हैं। (पर) ये दोनों तरफें तूने खुद ही बनाई हैं। जीवात्मा और माया की खेल तूने ही रची है। हे हरी ! आपको ऐसा ही अच्छा लगा है कि जीवात्मा माया के मुकाबले में हार रही है। पर जिनको तूने सत्संग में जोड़ा है उनको तूने माया में से बचा लिया है (और अपने चरणों में लीन कर रखा है) जैसे पानी में से बुलबुला पैदा होता है और पानी में ही लीन हो जाता है (वह आपके अंदर लीन हुए रहते हैं)। 6।
डखणे मः 5 ॥ आगाहा कू त्राघि पिछा फेरि न मुहडड़ा ॥ नानक सिझि इवेहा वार बहुड़ि न होवी जनमड़ा ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ (हे भाई !) आगे बढ़ने की तमन्ना कर। पीछे को कंधा ना मोड़ (जीवन को और-और ऊँचा उठाने के लिए उद्यम कर। नीच ना होने दे)। हे नानक ! इसी जन्म में कामयाब हो (जीवन-खेल जीत) ताकि दोबारा जन्म ना लेना पड़े। 1।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ मेरा मित्र-प्रभू प्यार भरे दिल वाला है। हर किसी का मित्र है (हरेक के साथ प्यार करता है)। सारे ही जीव उस प्रभू को अपना (मित्र) मानते हैं। वह किसी का दिल नहीं तोड़ता। 2।
मः 5 ॥ गुझड़ा लधमु लालु मथै ही परगटु थिआ ॥ सोई सुहावा थानु जिथै पिरीए नानक जी तू वुठिआ ॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (प्रभू-पति की मेहर हुई। तब वह प्रभू-) लाल मेरे अंदर छुपा हुआ ही मुझे मिल गया। (इसकी बरकति से) मेरे माथे पर प्रकाश हो गया (भाव। मेरा मन तन खिल उठा)। हे नानक ! (कह-) हे प्रभू पति ! जिस हृदय में आप आ बसता है। वह हृदय सुंदर हैं जाता है। 3।
पउड़ी ॥ जा तू मेरै वलि है ता किआ मुहछंदा ॥ तुधु सभु किछु मैनो सउपिआ जा तेरा बंदा ॥ लखमी तोटि न आवई खाइ खरचि रहंदा ॥ लख चउरासीह मेदनी सभ सेव करंदा ॥ एह वैरी मित्र सभि कीतिआ नह मंगहि मंदा ॥ लेखा कोइ न पुछई जा हरि बखसंदा ॥ अनंदु भइआ सुखु पाइआ मिलि गुर गोविंदा ॥ सभे काज सवारिऐ जा तुधु भावंदा ॥7॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! जब आप मेरी सहायता में हैं तो मुझे किसी और की मुथाजी नहीं रह जाती। जब मैं आपका सेवक बनता हूँ। तब आप मुझे सब कुछ दे देता है। मुझे धन-पदार्थ की कोई कमी नहीं रहती मैं (आपका यह नाम-धन) बाँटता हूँ और एकत्र भी करता हूँ। धरती के चौरासी लाख जीव ही मेरी सेवा करने लग जाते हैं। आप वैरियों को भी मेरे मित्र बना देता है। कोई भी मेरा बुरा नहीं चितवते। हे हरी ! जब आप मुझे बख्शने वाला हैं। तो कोई भी मुझसे मेरे कर्मों का हिसाब नहीं पूछता। क्योंकि गोविंद-रूप गुरू को मिल के मेरे अंदर ठंड पड़ जाती है मुझे सुख प्राप्त हो जाता है। जब आपकी रज़ा हैं। तो मेरे सारे काम सवर जाते हैं। 7।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ हे (मेरे) मालिक ! आपका मुँह कैसा है। मैं आपका मुख देखने के लिए बहुत चाहवान था। (माया-वश हैं के) मैं किस बुरे हाल में भटकता फिरता हूँ। पर जब से आपका मुंह मैंने देख लिया। तो मेरा मन (माया की ओर से) तृप्त हैं गया। 1।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पउड़ी॥ हे प्रभू ! आपका कोई (खास) रूप नहीं कोई चक्र-चिन्ह नहीं।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।