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मारू
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- तुधु रूपु न रेखिआ जाति तू वरना बाहरा ॥
- गहडड़ड़ा त्रिणि छाइआ गाफल जलिओहु भाहि ॥
- नानक पीठा पका साजिआ धरिआ आणि मउजूदु ॥
- नानक भुसरीआ पकाईआ पाईआ थालै माहि ॥
- तुधु जग महि खेलु रचाइआ विचि हउमै पाईआ ॥
- आगाहा कू त्राघि पिछा फेरि न मुहडड़ा ॥
- सजणु मैडा चाईआ हभ कही दा मितु ॥
- गुझड़ा लधमु लालु मथै ही परगटु थिआ ॥
- जा तू मेरै वलि है ता किआ मुहछंदा ॥
- डेखण कू मुसताकु मुखु किजेहा तउ धणी ॥
· मारू की वार, पउड़ी · राग मारू
तुधु रूपु न रेखिआ जाति तू वरना बाहरा ॥
पउड़ी ॥
तुधु रूपु न रेखिआ जाति तू वरना बाहरा ॥
ए माणस जाणहि दूरि तू वरतहि जाहरा ॥
तू सभि घट भोगहि आपि तुधु लेपु न लाहरा ॥
तू पुरखु अनंदी अनंत सभ जोति समाहरा ॥
तू सभ देवा महि देव बिधाते नरहरा ॥
किआ आराधे जिहवा इक तू अबिनासी अपरपरा ॥
जिसु मेलहि सतिगुरु आपि तिस के सभि कुल तरा ॥
सेवक सभि करदे सेव दरि नानकु जनु तेरा ॥5॥
तुधु रूपु न रेखिआ जाति तू वरना बाहरा ॥
ए माणस जाणहि दूरि तू वरतहि जाहरा ॥
तू सभि घट भोगहि आपि तुधु लेपु न लाहरा ॥
तू पुरखु अनंदी अनंत सभ जोति समाहरा ॥
तू सभ देवा महि देव बिधाते नरहरा ॥
किआ आराधे जिहवा इक तू अबिनासी अपरपरा ॥
जिसु मेलहि सतिगुरु आपि तिस के सभि कुल तरा ॥
सेवक सभि करदे सेव दरि नानकु जनु तेरा ॥5॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू! आपका कोई (खास) रूप नहीं कोई चक्र-चिन्ह नहीं। आपकी कोई (विशेष) जाति नहीं। (ब्राहमण खत्री आदि) आपका कोई (खास) वर्ण नहीं। ये मनुष्य आपको कहीं दूर जगह पर बसता समझते हैं। आप (तो) हर जगह मौजूद हैं। सब जीवों में व्यापक हो के पदार्थ भोग रहे हैं। (फिर भी) आपको माया का असर छू नहीं सकता। आप सदा आनंद में रहने वाले हैं। बेअंत हैं। सबमें व्यापक हैं। सबमें आपकी ज्योति टिकी हुई है। हे सृजनहार! हे परमात्मा! सारे देवताओं में आप स्वयं ही देवता (प्रकाश करने वाले) हैं। आप परे से परे हैं। आप नाश रहित हैं। मेरी एक जीभ आपकी आराधना करने के समर्थ नहीं। हे प्रभू! जिस मनुष्य को आप गुरू मिला देते हैं। उसकी सारी कुलों का उद्धार हो जाता है। आपके सारे सेवक आपकी सेवा करते हैं। मैं आपका दास नानक (भी आपके ही) दर पर (पड़ा हूँ)। 5।
· मारू की वार, डखणे सलोक · राग मारू
गहडड़ड़ा त्रिणि छाइआ गाफल जलिओहु भाहि ॥
डखणे मः 5 ॥
गहडड़ड़ा त्रिणि छाइआ गाफल जलिओहु भाहि ॥
जिना भाग मथाहड़ै तिन उसताद पनाहि ॥1॥
गहडड़ड़ा त्रिणि छाइआ गाफल जलिओहु भाहि ॥
जिना भाग मथाहड़ै तिन उसताद पनाहि ॥1॥
हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ गाफ़ल मनुष्य का घास से बना हुआ शरीर-छप्पर तृष्णा की आग में जल रहा है। जिन लोगों के माथे पर अच्छे भाग्य जागते हैं। उन्हें गुरू का सहारा मिल जाता है (और वे तृष्णा की आग से बच जाते हैं)। 1।
· मारू की वार, डखणे सलोक · राग मारू
नानक पीठा पका साजिआ धरिआ आणि मउजूदु ॥
मः 5 ॥
नानक पीठा पका साजिआ धरिआ आणि मउजूदु ॥
बाझहु सतिगुर आपणे बैठा झाकु दरूद ॥2॥
नानक पीठा पका साजिआ धरिआ आणि मउजूदु ॥
बाझहु सतिगुर आपणे बैठा झाकु दरूद ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक! (नियाज़ आदि देने के लिए श्रद्धालु मुसलमान आटा) पिसा के पका के खाना सँवार के तैयार ला के रखता है। (पर जब तक पीर आ के) दुआ (ना पढ़े। वह) बैठा झाकता है। (जैसे मनुष्य अनेकों धार्मिक साधन करता है। पर) जब तक गुरू ना मिले मनुष्य रॅब की रहमत का बैठा इन्तज़ार करता है। 2।
· मारू की वार, डखणे सलोक · राग मारू
नानक भुसरीआ पकाईआ पाईआ थालै माहि ॥
मः 5 ॥
नानक भुसरीआ पकाईआ पाईआ थालै माहि ॥
जिनी गुरू मनाइआ रजि रजि सेई खाहि ॥3॥
नानक भुसरीआ पकाईआ पाईआ थालै माहि ॥
जिनी गुरू मनाइआ रजि रजि सेई खाहि ॥3॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक! (अगर कुछ मनुष्य इतने ही गरीब हैं कि रसोई चौका आदि प्रयोग करने की जगह) धरती पर ही रोट पका लेते हैं और थाल में डाल लेते हैं। अगर उन्होंने (अपने) गुरू को खुश कर लिया है (अगर गुरू के बताए हुए राह पर चल के उन्होंने अपने गुरू की प्रसन्नता हासिल कर ली है) तो वे उन भुसरियों को, धरती पर पकाई हुई रोटियों को ही, स्वाद लगा के खाते हैं (भाव, गरीब मनुष्यों को गरीबी में ही सुखी जीवन अनुभव होता है अगर वे गुरू के रास्ते पर चल के गुरू की प्रसन्नता प्राप्त कर लेते हैं)। 3।
· मारू की वार, पउड़ी · राग मारू
तुधु जग महि खेलु रचाइआ विचि हउमै पाईआ ॥
पउड़ी ॥
तुधु जग महि खेलु रचाइआ विचि हउमै पाईआ ॥
एकु मंदरु पंच चोर हहि नित करहि बुरिआईआ ॥
दस नारी इकु पुरखु करि दसे सादि लोुभाईआ ॥
एनि माइआ मोहणी मोहीआ नित फिरहि भरमाईआ ॥
हाठा दोवै कीतीओ सिव सकति वरताईआ ॥
सिव अगै सकती हारिआ एवै हरि भाईआ ॥
इकि विचहु ही तुधु रखिआ जो सतसंगि मिलाईआ ॥
जल विचहु बिंबु उठालिओ जल माहि समाईआ ॥6॥
तुधु जग महि खेलु रचाइआ विचि हउमै पाईआ ॥
एकु मंदरु पंच चोर हहि नित करहि बुरिआईआ ॥
दस नारी इकु पुरखु करि दसे सादि लोुभाईआ ॥
एनि माइआ मोहणी मोहीआ नित फिरहि भरमाईआ ॥
हाठा दोवै कीतीओ सिव सकति वरताईआ ॥
सिव अगै सकती हारिआ एवै हरि भाईआ ॥
इकि विचहु ही तुधु रखिआ जो सतसंगि मिलाईआ ॥
जल विचहु बिंबु उठालिओ जल माहि समाईआ ॥6॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू! आपने जीवों के अंदर अहंम डाल दिया है। (और इस तरह) जगत में एक तमाशा रच दिया है। यह मनुष्य शरीर एक है (इसमें) कामादिक पाँच चोर हैं जो सदा ही बुराई करते रहते हैं। (एक तरफ) मन अकेला है। (इसके साथ) दस इन्द्रियाँ हैं। ये दसों ही (माया के) स्वाद में फसी हुई हैं। इस मोहनी माया ने इनको मोहा हुआ है (इस वास्ते ये) सदा भटकती फिरती हैं। (पर) ये दोनों तरफें आपने खुद ही बनाई हैं। जीवात्मा और माया का खेल आपने ही रचा है। हे हरी! आपको ऐसा ही अच्छा लगा है कि जीवात्मा माया के मुकाबले में हार रही है। पर जिनको आपने सत्संग में जोड़ा है उनको आपने माया में से बचा लिया है (और अपने चरणों में लीन कर रखा है) जैसे पानी में से बुलबुला पैदा होता है और पानी में ही लीन हो जाता है (वे आपके अंदर लीन हुए रहते हैं)। 6।
· मारू की वार, डखणे सलोक · राग मारू
आगाहा कू त्राघि पिछा फेरि न मुहडड़ा ॥
डखणे मः 5 ॥
आगाहा कू त्राघि पिछा फेरि न मुहडड़ा ॥
नानक सिझि इवेहा वार बहुड़ि न होवी जनमड़ा ॥1॥
आगाहा कू त्राघि पिछा फेरि न मुहडड़ा ॥
नानक सिझि इवेहा वार बहुड़ि न होवी जनमड़ा ॥1॥
हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ (हे भाई!) आगे बढ़ने की तमन्ना करें। पीछे को कंधा ना मोड़ें (जीवन को और-और ऊँचा उठाने के लिए उद्यम करें। नीच ना होने दें)। हे नानक! इसी जन्म में कामयाब हों (जीवन-खेल जीतें) ताकि दोबारा जन्म ना लेना पड़े। 1।
· मारू की वार, डखणे सलोक · राग मारू
सजणु मैडा चाईआ हभ कही दा मितु ॥
मः 5 ॥
सजणु मैडा चाईआ हभ कही दा मितु ॥
हभे जाणनि आपणा कही न ठाहे चितु ॥2॥
सजणु मैडा चाईआ हभ कही दा मितु ॥
हभे जाणनि आपणा कही न ठाहे चितु ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ मेरा मित्र-प्रभू प्यार भरे दिल वाला है। हर किसी का मित्र है (हरेक के साथ प्यार करता है)। सारे ही जीव उस प्रभू को अपना (मित्र) मानते हैं। वह किसी का दिल नहीं तोड़ता। 2।
· मारू की वार, डखणे सलोक · राग मारू
गुझड़ा लधमु लालु मथै ही परगटु थिआ ॥
मः 5 ॥
गुझड़ा लधमु लालु मथै ही परगटु थिआ ॥
सोई सुहावा थानु जिथै पिरीए नानक जी तू वुठिआ ॥3॥
गुझड़ा लधमु लालु मथै ही परगटु थिआ ॥
सोई सुहावा थानु जिथै पिरीए नानक जी तू वुठिआ ॥3॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (प्रभू-पति की मेहर हुई। तब वह प्रभू-) लाल मेरे अंदर छुपा हुआ ही मुझे मिल गया। (इसकी बरकति से) मेरे माथे पर प्रकाश हो गया (भाव, मेरा मन तन खिल उठा)। हे नानक! (कहें:) हे प्रभू पति! जिस हृदय में आप आ बसते हैं। वह हृदय सुंदर हो जाता है। 3।
· मारू की वार, पउड़ी · राग मारू
जा तू मेरै वलि है ता किआ मुहछंदा ॥
पउड़ी ॥
जा तू मेरै वलि है ता किआ मुहछंदा ॥
तुधु सभु किछु मैनो सउपिआ जा तेरा बंदा ॥
लखमी तोटि न आवई खाइ खरचि रहंदा ॥
लख चउरासीह मेदनी सभ सेव करंदा ॥
एह वैरी मित्र सभि कीतिआ नह मंगहि मंदा ॥
लेखा कोइ न पुछई जा हरि बखसंदा ॥
अनंदु भइआ सुखु पाइआ मिलि गुर गोविंदा ॥
सभे काज सवारिऐ जा तुधु भावंदा ॥7॥
जा तू मेरै वलि है ता किआ मुहछंदा ॥
तुधु सभु किछु मैनो सउपिआ जा तेरा बंदा ॥
लखमी तोटि न आवई खाइ खरचि रहंदा ॥
लख चउरासीह मेदनी सभ सेव करंदा ॥
एह वैरी मित्र सभि कीतिआ नह मंगहि मंदा ॥
लेखा कोइ न पुछई जा हरि बखसंदा ॥
अनंदु भइआ सुखु पाइआ मिलि गुर गोविंदा ॥
सभे काज सवारिऐ जा तुधु भावंदा ॥7॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू! जब आप मेरी सहायता में हैं तो मुझे किसी और की मुहताजी नहीं रह जाती। जब मैं आपका सेवक बनता हूँ, तब आप मुझे सब कुछ दे देते हैं। मुझे धन-पदार्थ की कोई कमी नहीं रहती। मैं (आपका यह नाम-धन) उपयोग में लाता हूँ, बाँटता हूँ और एकत्र भी करता हूँ। धरती के चौरासी लाख जीव ही मेरी सेवा करने लग जाते हैं। आप वैरियों को भी मेरे मित्र बना देते हैं। कोई भी मेरा बुरा नहीं चितवता। हे हरी! जब आप मुझे बख्शने वाले हैं, तो कोई भी मुझसे मेरे कर्मों का हिसाब नहीं पूछता। क्योंकि गोविंद-रूप गुरू को मिल के मेरे अंदर ठंड पड़ जाती है मुझे सुख प्राप्त हो जाता है। जब आपकी रज़ा है, तो मेरे सारे काम सँवर जाते हैं। 7।
· मारू की वार, डखणे सलोक · राग मारू
डेखण कू मुसताकु मुखु किजेहा तउ धणी ॥
डखणे मः 5 ॥
डेखण कू मुसताकु मुखु किजेहा तउ धणी ॥
फिरदा कितै हालि जा डिठमु ता मनु ध्रापिआ ॥1॥
डेखण कू मुसताकु मुखु किजेहा तउ धणी ॥
फिरदा कितै हालि जा डिठमु ता मनु ध्रापिआ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ हे (मेरे) मालिक! आपका मुँह कैसा है। मैं आपका मुख देखने के लिए बहुत चाहवान था। (माया-वश हो के) मैं किस बुरे हाल में भटकता फिरता हूँ। पर जब से आपका मुंह मैंने देख लिया, तो मेरा मन (माया की ओर से) तृप्त हो गया। 1।
रचयिता और स्रोत
यह मारू राग के क्रम का अंग 1096 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1096 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।