Lulla Family

अंग 1095

अंग
1095
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तुधु थापे चारे जुग तू करता सगल धरण ॥
तुधु आवण जाणा कीआ तुधु लेपु न लगै त्रिण ॥
जिसु होवहि आपि दइआलु तिसु लावहि सतिगुर चरण ॥
तू होरतु उपाइ न लभही अबिनासी स्रिसटि करण ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! सारी धरतियाँ तूने ही बनाई हैं ये चारों युग आपके ही बनाए हुए हैं (समय बनाने वाला और समय की बाँट करने वाला आप ही है)। (जीवों के लिए) जनम-मरण का चक्कर तूने ही बनाया है। (जनम-मरण के चक्करों का) रक्ती भर भी प्रभाव आपके पर नहीं पड़ता। हे प्रभू ! जिस जीव पर आप दयालु होता है उसको गुरू के चरणों से लगाता है (क्योंकि) हे सृष्टिकर्ता अविनाशी प्रभू (गुरू की शरण के बिना) और किसी भी उपाय से आप नहीं मिल सकता। 2।
डखणे मः 5 ॥
जे तू वतहि अंङणे हभ धरति सुहावी होइ ॥
हिकसु कंतै बाहरी मैडी वात न पुछै कोइ ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ तो मेरा सारा शरीर ही सुंदर हो जाता है। पर एक पति-प्रभू के बिना कोई मेरी खबर-सुरति नहीं पूछता (भाव। अगर प्रभू हृदय में बस जाए। तो सारे शुभ गुणों से ज्ञान-इन्द्रियां चमक उठती हैं। अगर प्रभू से विछोड़ा है तो कोई शुभ-गुण आपके नजदीक नहीं फटकता)। 1।
मः 5 ॥
हभे टोल सुहावणे सहु बैठा अंङणु मलि ॥
पही न वंञै बिरथड़ा जो घरि आवै चलि ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ जिस जीव-पथिक (राही) का हृदय-आँगन पति-प्रभू घेर के (कब्जा करके) बैठ जाता है। उसको सारे पदार्थ (उपभोग करने) फबते हैं (क्योंकि) जो जीव-पथिक (बाहरी पदार्थों की ओर से) परत के अंतरात्मे आ टिकता है वह (जगत से) खाली हाथ नहीं जाता। 2।
मः 5 ॥
सेज विछाई कंत कू कीआ हभु सीगारु ॥
इती मंझि न समावई जे गलि पहिरा हारु ॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ मैंने पति को मिलने के लिए सेज बिछाई है व अन्य सारा हार-श्रृंगार किया (हृदय-सेज सजाने के लिए कई धार्मिक साधन किए)। पर अब (जब वह मिल गया है तो) अगर मैं (अपने गले में) एक हार भी पहन लूँ (तो यह हार पति-मिलाप के रास्ते में दूरी पैदा करता है। और) पति और मेरे बीच इतनी दूरी के लिए भी जगह नहीं है (इतनी दूरी भी नहीं होनी चाहिए) (भाव। लोकाचारी धार्मिक साधन पति-मिलाप के रास्ते में रुकावट हैं)। 3।
पउड़ी ॥
तू पारब्रहमु परमेसरु जोनि न आवही ॥
तू हुकमी साजहि स्रिसटि साजि समावही ॥
तेरा रूपु न जाई लखिआ किउ तुझहि धिआवही ॥
तू सभ महि वरतहि आपि कुदरति देखावही ॥
तेरी भगति भरे भंडार तोटि न आवही ॥
एहि रतन जवेहर लाल कीम न पावही ॥
जिसु होवहि आपि दइआलु तिसु सतिगुर सेवा लावही ॥
तिसु कदे न आवै तोटि जो हरि गुण गावही ॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! आप पारब्रहम है सबसे बड़ा मालिक है। आप जनम-मरण के चक्करों में नहीं आता। आप अपने हुकम से जगत पैदा करता है। (जगत) पैदा करके (इसमें) व्यापक है। आपका रूप बयान नहीं किया जा सकता। फिर जीव आपका ध्यान किस तरीके से धरें। हे प्रभू ! आप सब जीवों में खुद मौजूद है। (सबमें) अपनी ताकत दिखा रहा है। (आपके पास) आपकी भक्ति के खजाने भरे पड़े हैं जो कभी खत्म नहीं हैं सकते। आपके गुणों के खजाने ऐसे रतन-जवाहर और लाल हैं जिनका मूल्य नहीं डाला जा सकता (जगत में कोई भी चीज़ ऐसी नहीं है जिसके बदले में गुणों के खजाने मिल सकें)। जिस जीव पर आप दया करता है उसको सतिगुरू की सेवा में जोड़ता है। (गुरू की शरण आ के) जो मनुष्य प्रभू के गुण गाते हैं। उनको किसी किस्म की कमी नहीं रहती। 3।
डखणे मः 5 ॥
जा मू पसी हठ मै पिरी महिजै नालि ॥
हभे डुख उलाहिअमु नानक नदरि निहालि ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ जब मैं (ध्यान से) हृदय में देखती हूँ। तो मेरा पति-प्रभू मेरे साथ (मेरे दिल में) मौजूद है। हे नानक ! मेहर की निगाह कर के उसने मेरे सारे दुख दूर कर दिए हैं। 1।
मः 5 ॥
नानक बैठा भखे वाउ लंमे सेवहि दरु खड़ा ॥
पिरीए तू जाणु महिजा साउ जोई साई मुहु खड़ा ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे प्रभू ! बेअंत जीव खड़े आपका दर सेवते हैं। मैं नानक भी (आपके दर पर खड़ा) आपकी सोय सुन रहा हूँ। हे पति ! आप मेरे दिल की जानता है। हे साई ! मैं खड़ा आपका मुँह ताक रहा हूँ। 2।
मः 5 ॥
किआ गालाइओ भूछ पर वेलि न जोहे कंत तू ॥
नानक फुला संदी वाड़ि खिड़िआ हभु संसारु जिउ ॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (हे जीव !) आप हर जगह कंत प्रभू को देख। पराई स्त्री को (दुर्भावना से) ना देख। और (कामातुर हैं के) मति-हीन नापाक बोल ना बोल। हे नानक ! जैसे फुलवाड़ी खिली होती है वैसे ही यह सारा संसार खिला हुआ है (यहाँ कोई फूल तोड़ना नहीं। किसी पराई सुंदरी के प्रति बुरी भावना नहीं रखनी)। 3।
पउड़ी ॥
सुघड़ु सुजाणु सरूपु तू सभ महि वरतंता ॥
तू आपे ठाकुरु सेवको आपे पूजंता ॥
दाना बीना आपि तू आपे सतवंता ॥
जती सती प्रभु निरमला मेरे हरि भगवंता ॥
सभु ब्रहम पसारु पसारिओ आपे खेलंता ॥
इहु आवा गवणु रचाइओ करि चोज देखंता ॥
तिसु बाहुड़ि गरभि न पावही जिसु देवहि गुर मंता ॥
जिउ आपि चलावहि तिउ चलदे किछु वसि न जंता ॥4॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! आप सुघड़। समझदार और सुंदर है। सब जीवों में आप ही मौजूद है। (सो) आप स्वयं ही मालिक है स्वयं ही सेवक है स्वयं ही अपनी पूजा कर रहा है (हरेक जीव के अंदर व्यापक होने के कारण) आप खुद ही (जीवों के कामों को) जानता है देखता है। आप खुद ही अच्छे आचरण वाला है। हे मेरे हरी भगवान ! आप खुद ही जती है। खुद ही पवित्र आचरण वाला है। यह सारा जगत-पसारा तूने खूद ही पसारा हुआ है। आप खुद ही यह जगत-खेल खेल रहा है। (जीवों के) पैदा होने-मरने का तमाशा तूने खुद ही रचाया हुआ है। ये तमाशे कर के आप खुद ही देख रहा है। हे प्रभू ! जिस मनुष्य को आप गुरू उपदेश की दाति देता है। उसको दोबारा जूनियों के चक्करों में नहीं डालता। (आपके पैदा किए हुए इन) जीवों के वश में कुछ नहीं। जैसे आप खुद जीवों को चला रहा है। वैसे ही चल रहे हैं। 4।
डखणे मः 5 ॥
कुरीए कुरीए वैदिआ तलि गाड़ा महरेरु ॥
वेखे छिटड़ि थीवदो जामि खिसंदो पेरु ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ हे (संसार-) नदी के किनारे-किनारे जाने वाले ! आपके पैरों तले (आपके रास्ते में) बड़ी मेढ़ (बड़ी बंध। मिट्टी की बनी हुई रुकावट) लगी हुई है। ध्यान रखना। जब भी आपका पैर फिसल गया। तो (मोह के कीचड़ से) लिबड़ जाएगा। 1।
मः 5 ॥
सचु जाणै कचु वैदिओ तू आघू आघे सलवे ॥
नानक आतसड़ी मंझि नैणू बिआ ढलि पबणि जिउ जुंमिओ ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (हे जीव !) नाशवंत काँच (-रूपी माया) को आप सदा-स्थिर जानता है। व और-और इकट्ठी करता है। पर। हे नानक ! (कह- यह माया यूँ है) जैसे आग में मक्खन नाश हो जाता है (पिघल जाता है)। या। जैसे (पानी के ढल जाने से) चुपक्ती गिर के नाश हो जाती है। 2।
मः 5 ॥
भोरे भोरे रूहड़े सेवेदे आलकु ॥
मुदति पई चिराणीआ फिरि कडू आवै रुति ॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे भोली रूह ! परमात्मा को सिमरते हुए आप आलस करती है। लंबी मुद्दतों के बाद (ये मनुष्य जनम मिला है। अगर सिमरन से वंचित बीत गया) तो दोबारा (क्या पता है।) कब (मनुष्य जन्म की) ऋतु आए। 3।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 12 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! सारी धरतियाँ तूने ही बनाई हैं ये चारों युग आपके ही बनाए हुए हैं (समय बनाने वाला और समय की बाँट करने वाला आप ही है)।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।