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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1094 · मारू

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अंग
1094
मारू
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  1. आइआ ओहु परवाणु है जि कुल का करे उधारु ॥
  2. आपे करि करि वेखदा आपे सभु सचा ॥
  3. तू चउ सजण मैडिआ डेई सिसु उतारि ॥
  4. नीहु महिंजा तऊ नालि बिआ नेह कूड़ावे डेखु ॥
  5. उठी झालू कंतड़े हउ पसी तउ दीदारु ॥
  6. तू सचा साहिबु सचु सचु सभु धारिआ ॥
  7. डखणे मः 5 ॥
  8. दुरजन तू जलु भाहड़ी विछोड़े मरि जाहि ॥
  9. दुरजनु दूजा भाउ है वेछोड़ा हउमै रोगु ॥
  10. तू अगम दइआलु बेअंतु तेरी कीमति कहै कउणु ॥

आइआ ओहु परवाणु है जि कुल का करे उधारु ॥

अंग 1093 से चला आ रहा अंश

आइआ ओहु परवाणु है जि कुल का करे उधारु ॥
अगै जाति न पुछीऐ करणी सबदु है सारु ॥
होरु कूड़ु पड़णा कूड़ु कमावणा बिखिआ नालि पिआरु ॥
अंदरि सुखु न होवई मनमुख जनमु खुआरु ॥
नानक नामि रते से उबरे गुर कै हेति अपारि ॥2॥

हिन्दी अर्थ: अपनी कुल का भी पार उतारा करता है उसका जगत में आना सफल है। प्रभू की हजूरी में (ऊँची) जाति की पूछ-पड़ताल नहीं होती। वहाँ तो (सिफत-सालाह की) बाणी (का अभ्यास) ही श्रेष्ठ करनी (मानी जाती) है। (सिफत-सालाह के बिना) और पढ़ना और कमाना व्यर्थ है। माया के साथ ही प्यार (बढ़ाता) है (उस पढ़ाई और कमाई से) मन में सुख नहीं होता। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य की जिंदगी ही बेलगाम हो जाती है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू (के चरणों) में बहुत प्रेम करके प्रभू के नाम में रंगे जाते हैं वे ('बिखिआ' के असर से) बच जाते हैं। 2।

आपे करि करि वेखदा आपे सभु सचा ॥

पउड़ी ॥
आपे करि करि वेखदा आपे सभु सचा ॥
जो हुकमु न बूझै खसम का सोई नरु कचा ॥
जितु भावै तितु लाइदा गुरमुखि हरि सचा ॥
सभना का साहिबु एकु है गुर सबदी रचा ॥
गुरमुखि सदा सलाहीऐ सभि तिस दे जचा ॥
जिउ नानक आपि नचाइदा तिव ही को नचा ॥22॥1॥ सुधु ॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। प्रभू आप ही (जीवों को) पैदा करके आप ही संभाल करता है (क्योंकि) वह सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू हर जगह आप ही (मौजूद) है। पर जो मनुष्य (प्रभू की इस हर जगह मौजूद होने की) रज़ा को नहीं समझता। वह मनुष्य डोलता रहता है। जिस तरफ प्रभू की रजा हो उसी तरफ (हरेक जीव को) लगाता है। जिसको गुरू सन्मुख करता है वह प्रभू का ही रूप हो जाता है। (वैसे तो) सब जीवों का मालिक एक परमात्मा ही है। पर गुरू के शबद के द्वारा ही (उसमें) जुड़ा जा सकता है; (सो) गुरू के सन्मुख हो के उसकी सिफत-सलाह करनी चाहिए। (जगत के ये) सारे करिश्मे उस मालिक के ही हैं; हे नानक ! जैसे वह स्वयं जीवों को नचाता है वैसे ही जीव नाचता है। 22। 1। सुधु।

तू चउ सजण मैडिआ डेई सिसु उतारि ॥

मारू वार महला 5 डखणे मः 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तू चउ सजण मैडिआ डेई सिसु उतारि ॥
नैण महिंजे तरसदे कदि पसी दीदारु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: मारू वार महला 5 डखणे मः 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे मेरे सज्जन ! आप कहें (भाव। अगर आप कहें तो) मैं अपना सिर भी उतार के भेंट कर दूँ। मेरी आँखें तरस रही हैं। मैं कब आपके दर्शन करूँगी। 1।

नीहु महिंजा तऊ नालि बिआ नेह कूड़ावे डेखु ॥

मः 5 ॥
नीहु महिंजा तऊ नालि बिआ नेह कूड़ावे डेखु ॥
कपड़ भोग डरावणे जिचरु पिरी न डेखु ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे प्रभू ! मेरा प्यार (अब सिर्फ) आपके साथ है। दूसरे प्यार मैंने झूठे देख लिए हैं (मैंने देख लिया है कि दूसरे प्यार झूठे हैं)। जब तक मुझे पति के दर्शन नहीं होते। दुनियावी खाने-पहनने मुझे डराने लगते हैं। 2।

उठी झालू कंतड़े हउ पसी तउ दीदारु ॥

मः 5 ॥
उठी झालू कंतड़े हउ पसी तउ दीदारु ॥
काजलु हार तमोल रसु बिनु पसे हभि रस छारु ॥3॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे सुंदर कंत ! सवेरे उठूँ तो (पहले) आपके दर्शन करूँ। आपके दर्शन किए बिना काजल। हार। पान का रस- ये सारे ही रस राख समान हैं। 3।

तू सचा साहिबु सचु सचु सभु धारिआ ॥

पउड़ी ॥
तू सचा साहिबु सचु सचु सभु धारिआ ॥
गुरमुखि कीतो थाटु सिरजि संसारिआ ॥
हरि आगिआ होए बेद पापु पुंनु वीचारिआ ॥
ब्रहमा बिसनु महेसु त्रै गुण बिसथारिआ ॥
नव खंड प्रिथमी साजि हरि रंग सवारिआ ॥
वेकी जंत उपाइ अंतरि कल धारिआ ॥
तेरा अंतु न जाणै कोइ सचु सिरजणहारिआ ॥
तू जाणहि सभ बिधि आपि गुरमुखि निसतारिआ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! आप सदा कायम रहने वाले मालिक हैं। और आपने अपना अटल नियम ही हर जगह कायम किया हुआ है। जगत पैदा करके आपने ये नियम भी बना दिया है कि (जीवों को) गुरू के बताए हुए मार्ग पर चलना चाहिए। हे हरी ! आपकी ही आज्ञा के अनुसार वेद (आदिक धार्मिक पुस्तकें प्रकट) हुए। जिन्होंने (जगत में) पाप और पुन्य को अलग किया है। आपने ही ब्रहमा। विष्णू और शिव को पैदा किया। आपने ही माया के तीन गुणों का पसारा-रूप जगत बनाया है। हे हरी ! यह नौ हिस्सों वाली धरती बना के आपने इसमें अनेकों रंग सजाए हैं। अलग-अलग भांति के जीव पैदा करके आपने (जीवों के अंदर) अपनी शक्ति कायम की है। हे सदा-स्थिर सृजनहार ! कोई जीव (आपके गुणों का) अंत नहीं जान सकता। सब तरह के भेद को आप खुद ही जानते हैं। जीवों को आप गुरू के रास्ते पर चला के (संसार-समुंद्र से) पार लंघाते हैं। 1।

डखणे मः 5 ॥

डखणे मः 5 ॥
जे तू मित्रु असाडड़ा हिक भोरी ना वेछोड़ि ॥
जीउ महिंजा तउ मोहिआ कदि पसी जानी तोहि ॥1॥

हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ अगर आप मेरे मित्र हैं। तो मुझे रक्ती भर भी (अपने से) ना विछोड़ें। मेरी जिंद आपने (अपने प्यार में) मोह ली है (अब हर वक्त मुझे तमन्ना रहती है कि) हे प्यारे ! मैं कब आपको देख सकूँ। 1।

दुरजन तू जलु भाहड़ी विछोड़े मरि जाहि ॥

मः 5 ॥
दुरजन तू जलु भाहड़ी विछोड़े मरि जाहि ॥
कंता तू सउ सेजड़ी मैडा हभो दुखु उलाहि ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे दुर्जन ! आप आग में जल जाएँ। हे विछोड़े ! आप मर जाएँ। हे (मेरे) कंत ! आप (मेरी हृदय-) सेज पर (आ के) सोएँ और मेरा सारा दुख दूर कर दें। 2।

दुरजनु दूजा भाउ है वेछोड़ा हउमै रोगु ॥

मः 5 ॥
दुरजनु दूजा भाउ है वेछोड़ा हउमै रोगु ॥
सजणु सचा पातिसाहु जिसु मिलि कीचै भोगु ॥3॥

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (प्रभू के बिना) किसी और से प्यार (जिंद का बड़ा) वैरी है। अहंम का रोग (प्रभू से) विछोड़ा (देने वाला) है। सदा कायम रहने वाला प्रभू पातशाह (जिंद का) मित्र है जिस को मिल के (आत्मिक) आनंद लिया जा सकता है। 3।

तू अगम दइआलु बेअंतु तेरी कीमति कहै कउणु ॥

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पउड़ी ॥
तू अगम दइआलु बेअंतु तेरी कीमति कहै कउणु ॥
तुधु सिरजिआ सभु संसारु तू नाइकु सगल भउण ॥
तेरी कुदरति कोइ न जाणै मेरे ठाकुर सगल रउण ॥
तुधु अपड़ि कोइ न सकै तू अबिनासी जग उधरण ॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। हे प्रभू ! आप अपहुँच हैं दयालु और बेअंत हैं। कोई जीव आपका मूल्य नहीं पा सकता। ये सारा जगत आपने ही पैदा किया है। और सारे भवनों के आप ही मालिक हैं। हे मेरे सर्व-व्यापक मालिक ! कोई जीव आपकी ताकत का अंदाजा नहीं लगा सकता। हे जगत का उद्धार करने वाले अविनाशी प्रभू ! कोई जीव आपकी बराबरी नहीं कर सकता।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1094 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी; महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1094 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।