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अंग 1094

अंग
1094
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आइआ ओहु परवाणु है जि कुल का करे उधारु ॥
अगै जाति न पुछीऐ करणी सबदु है सारु ॥
होरु कूड़ु पड़णा कूड़ु कमावणा बिखिआ नालि पिआरु ॥
अंदरि सुखु न होवई मनमुख जनमु खुआरु ॥
नानक नामि रते से उबरे गुर कै हेति अपारि ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: अपनी कुल का भी पार उतारा करता है उसका जगत में आना सफल है। प्रभू की हजूरी में (ऊँची) जाति की पूछ-पड़ताल नहीं होती। वहाँ तो (सिफत-सालाह की) बाणी (का अभ्यास) ही श्रेष्ठ करनी (मिथी जाती) है। (सिफत-सालाह के बिना) और पढ़ना और कमाना व्यर्थ है। माया के साथ ही प्यार (बढ़ाता) है (उस पढ़ाई और कमाई से) मन में सुख नहीं होता। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य की जिंदगी ही बेलगाम हो जाती है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू (के चरणों) में बहुत प्रेम करके प्रभू के नाम में रंगे जाते हैं वह (‘बिखिआ’ के असर से) बच जाते हैं। 2।
पउड़ी ॥
आपे करि करि वेखदा आपे सभु सचा ॥
जो हुकमु न बूझै खसम का सोई नरु कचा ॥
जितु भावै तितु लाइदा गुरमुखि हरि सचा ॥
सभना का साहिबु एकु है गुर सबदी रचा ॥
गुरमुखि सदा सलाहीऐ सभि तिस दे जचा ॥
जिउ नानक आपि नचाइदा तिव ही को नचा ॥22॥1॥ सुधु ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। प्रभू आप ही (जीवों को) पैदा करके आप ही संभाल करता है (क्योंकि) वह सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू हर जगह आप ही (मौजूद) है। पर जो मनुष्य (प्रभू की इस हर जगह मौजूद होने की) रज़ा को नहीं समझता। वह मनुष्य डोलता रहता है। जिस तरफ प्रभू की रजा हो उसी तरफ (हरेक जीव को) लगाता है। जिसको गुरू सन्मुख करता है वह प्रभू का ही रूप हो जाता है। (वैसे तो) सब जीवों का मालिक एक परमात्मा ही है। पर गुरू के शबद के द्वारा ही (उसमें) जुड़ा जा सकता है; (सो) गुरू के सन्मुख हो के उसकी सिफत-सलाह करनी चाहिए। (जगत के ये) सारे करिश्मे उस मालिक के ही हैं; हे नानक ! जैसे वह स्वयं जीवों को नचाता है वैस ही जीव नाचता है। 22। 1। सुधु।
मारू वार महला 5 डखणे मः 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तू चउ सजण मैडिआ डेई सिसु उतारि ॥
नैण महिंजे तरसदे कदि पसी दीदारु ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: मारू वार महला 5 डखणे मः 5 सतिगुर प्रसादि॥ हे मेरे सज्जन ! आप कहो (भाव। अगर आप कहे तो) मैं अपना सिर भी उतार के भेंट कर दूँ। मेरी आँखें तरस रही हैं। मैं कब आपके दर्शन करूँगी। 1।
मः 5 ॥
नीहु महिंजा तऊ नालि बिआ नेह कूड़ावे डेखु ॥
कपड़ भोग डरावणे जिचरु पिरी न डेखु ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे प्रभू ! मेरा प्यार (अब सिर्फ) आपके साथ है। दूसरे प्यार मैंने झूठे देख लिए हैं (मैंने देख लिया है कि दूसरे प्यार झूठे हैं)। जब तक मुझे पति के दर्शन नहीं होते। दुनियावी खाने-पहनने मुझे डराने लगते हैं। 2।
मः 5 ॥
उठी झालू कंतड़े हउ पसी तउ दीदारु ॥
काजलु हार तमोल रसु बिनु पसे हभि रस छारु ॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे सुंदर कंत ! सवेरे उठूँ तो (पहले) आपके दर्शन करूँ। आपके दर्शन किए बिना काजल। हार। पान का रस- ये सारे ही रस राख समान हैं। 3।
पउड़ी ॥
तू सचा साहिबु सचु सचु सभु धारिआ ॥
गुरमुखि कीतो थाटु सिरजि संसारिआ ॥
हरि आगिआ होए बेद पापु पुंनु वीचारिआ ॥
ब्रहमा बिसनु महेसु त्रै गुण बिसथारिआ ॥
नव खंड प्रिथमी साजि हरि रंग सवारिआ ॥
वेकी जंत उपाइ अंतरि कल धारिआ ॥
तेरा अंतु न जाणै कोइ सचु सिरजणहारिआ ॥
तू जाणहि सभ बिधि आपि गुरमुखि निसतारिआ ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! आप सदा कायम रहने वाला मालिक है। और तूने अपना अटल नियम ही हर जगह कायम किया हुआ है। जगत पैदा करके तूने ये नियम भी बना दिया है कि (जीवों को) गुरू के बताए हुए मार्ग पर चलना चाहिए। हे हरी ! आपकी ही आज्ञा के अनुसार वेद (आदिक धार्मिक पुस्तकें प्रकट) हुए। जिन्होंने (जगत में) पाप और पुन्य को अलग किया है। तूने ही ब्रहमा। विष्णू और शिव को पैदा किया। तूने ही माया के तीन गुणों का पसारा-रूप जगत बनाया है। हे हरी ! यह नौ हिस्सों वाली धरती बना के तूने इसमें अनेकों रंग सजाए हैं। अलग-अलग भांति के जीव पैदा करके तूने (जीवों के अंदर) अपनी सक्ता कायम की है। हे सदा-स्थिर सृजनहार ! कोई जीव (आपके गुणों का) अंत नहीं जान सकता। सब तरह के भेद को आप खुद ही जानता है। जीवों को आप गुरू के रास्ते पर चला के (संसार-समुंद्र से) पार लंघाता है। 1।
डखणे मः 5 ॥
जे तू मित्रु असाडड़ा हिक भोरी ना वेछोड़ि ॥
जीउ महिंजा तउ मोहिआ कदि पसी जानी तोहि ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: डखणे महला 5॥ अगर आप मेरा मित्र है। तो मुझे रक्ती भर भी (अपने से) ना विछोड़। मेरी जिंद तूने (अपने प्यार में) मोह ली है (अब हर वक्त मुझे तमन्ना रहती है कि) हे प्यारे ! मैं कब आपको देख सकूँ। 1।
मः 5 ॥
दुरजन तू जलु भाहड़ी विछोड़े मरि जाहि ॥
कंता तू सउ सेजड़ी मैडा हभो दुखु उलाहि ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे दुर्जन ! आप आग में जल जा। हे विछोड़े ! आप मर जा। हे (मेरे) कंत ! आप (मेरी हृदय-) सेज पर (आ के) सो और मेरा सारा दुख दूर कर दे। 2।
मः 5 ॥
दुरजनु दूजा भाउ है वेछोड़ा हउमै रोगु ॥
सजणु सचा पातिसाहु जिसु मिलि कीचै भोगु ॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (प्रभू के बिना) किसी और से प्यार (जिंद का बड़ा) वैरी है। अहंम का रोग (प्रभू से) विछोड़ा (देने वाला) है। सदा कायम रहने वाला प्रभू पातशाह (जिंद का) मित्र है जिस को मिल के (आत्मिक) आनंद लिया जा सकता है। 3।
पउड़ी ॥
तू अगम दइआलु बेअंतु तेरी कीमति कहै कउणु ॥
तुधु सिरजिआ सभु संसारु तू नाइकु सगल भउण ॥
तेरी कुदरति कोइ न जाणै मेरे ठाकुर सगल रउण ॥
तुधु अपड़ि कोइ न सकै तू अबिनासी जग उधरण ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। हे प्रभू ! आप अपहुँच है दयालु और बेअंत है। कोई जीव आपका मूल्य नहीं पा सकता। ये सारा जगत तूने ही पैदा किया है। और सारे भवनों का आप ही मालिक है। हे मेरे सर्व-व्यापक मालिक ! कोई जीव आपकी ताकत का अंदाजा नहीं लगा सकता। हे जगत का उद्धार करने वाले अविनाशी प्रभू ! कोई जीव आपकी बराबरी नहीं कर सकता।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अपनी कुल का भी पार उतारा करता है उसका जगत में आना सफल है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।