अगै जाति न पुछीऐ करणी सबदु है सारु ॥
होरु कूड़ु पड़णा कूड़ु कमावणा बिखिआ नालि पिआरु ॥
अंदरि सुखु न होवई मनमुख जनमु खुआरु ॥
नानक नामि रते से उबरे गुर कै हेति अपारि ॥2॥
आपे करि करि वेखदा आपे सभु सचा ॥
जो हुकमु न बूझै खसम का सोई नरु कचा ॥
जितु भावै तितु लाइदा गुरमुखि हरि सचा ॥
सभना का साहिबु एकु है गुर सबदी रचा ॥
गुरमुखि सदा सलाहीऐ सभि तिस दे जचा ॥
जिउ नानक आपि नचाइदा तिव ही को नचा ॥22॥1॥ सुधु ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तू चउ सजण मैडिआ डेई सिसु उतारि ॥
नैण महिंजे तरसदे कदि पसी दीदारु ॥1॥
नीहु महिंजा तऊ नालि बिआ नेह कूड़ावे डेखु ॥
कपड़ भोग डरावणे जिचरु पिरी न डेखु ॥2॥
उठी झालू कंतड़े हउ पसी तउ दीदारु ॥
काजलु हार तमोल रसु बिनु पसे हभि रस छारु ॥3॥
तू सचा साहिबु सचु सचु सभु धारिआ ॥
गुरमुखि कीतो थाटु सिरजि संसारिआ ॥
हरि आगिआ होए बेद पापु पुंनु वीचारिआ ॥
ब्रहमा बिसनु महेसु त्रै गुण बिसथारिआ ॥
नव खंड प्रिथमी साजि हरि रंग सवारिआ ॥
वेकी जंत उपाइ अंतरि कल धारिआ ॥
तेरा अंतु न जाणै कोइ सचु सिरजणहारिआ ॥
तू जाणहि सभ बिधि आपि गुरमुखि निसतारिआ ॥1॥
जे तू मित्रु असाडड़ा हिक भोरी ना वेछोड़ि ॥
जीउ महिंजा तउ मोहिआ कदि पसी जानी तोहि ॥1॥
दुरजन तू जलु भाहड़ी विछोड़े मरि जाहि ॥
कंता तू सउ सेजड़ी मैडा हभो दुखु उलाहि ॥2॥
दुरजनु दूजा भाउ है वेछोड़ा हउमै रोगु ॥
सजणु सचा पातिसाहु जिसु मिलि कीचै भोगु ॥3॥
तू अगम दइआलु बेअंतु तेरी कीमति कहै कउणु ॥
तुधु सिरजिआ सभु संसारु तू नाइकु सगल भउण ॥
तेरी कुदरति कोइ न जाणै मेरे ठाकुर सगल रउण ॥
तुधु अपड़ि कोइ न सकै तू अबिनासी जग उधरण ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अपनी कुल का भी पार उतारा करता है उसका जगत में आना सफल है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।