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अंग 1093

अंग
1093
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
बूझहु गिआनी बूझणा एह अकथ कथा मन माहि ॥
बिनु गुर ततु न पाईऐ अलखु वसै सभ माहि ॥
सतिगुरु मिलै त जाणीऐ जां सबदु वसै मन माहि ॥
आपु गइआ भ्रमु भउ गइआ जनम मरन दुख जाहि ॥
गुरमति अलखु लखाईऐ ऊतम मति तराहि ॥
नानक सोहं हंसा जपु जापहु त्रिभवण तिसै समाहि ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: हे ज्ञानवान ! अकथ प्रभू की यह गहरी राज वाली बात अपने मन में समझ। अलख प्रभू बसता तो सबके अंदर है। पर यह अस्लियत गुरू के बिना नहीं मिलती। जब गुरू मिल जाए जब गुरू का शबद मन में आ बसे तब ये (बात) समझ आ जाती है। जिस मनुष्य की ‘मैं’ दूर हो जाती है। (माया की खातिर) भटकना मिट जाती है (मौत आदि का) डर समाप्त हो जाता है। उसके सारी उम्र के दुख नाश हो जाते हैं (क्योंकि जीवन में दुख होते ही यही हैं); जिनको गुरू की मति ले कर ईश्वर दिखाई दे जाता है। जिनकी बुद्धि उज्जवल हो जाती है वे (इन दुखों के समुंद्र से) तैर जाते हैं। (सो।) हे नानक ! (आप भी) सिमरन कर जिससे आपकी आत्मा प्रभू के साथ एक-रूप हैं जाए। (देख !) त्रिलोकी के ही जीव उसी में टिके हुए हैं (उसी के आसरे हैं)। 1।
मः 3 ॥
मनु माणकु जिनि परखिआ गुर सबदी वीचारि ॥
से जन विरले जाणीअहि कलजुग विचि संसारि ॥
आपै नो आपु मिलि रहिआ हउमै दुबिधा मारि ॥
नानक नामि रते दुतरु तरे भउजलु बिखमु संसारु ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ ये मन सुच्चा मोती है। जिस मनुष्य ने गुरू के शबद के माध्यम से विचार करके (इस सुच्चे मोती को) परख लिया है। पर इस संसार में जहाँ विकारों का पहरा है ऐसे लोग बहुत कम देखे जाते हैं। उसका स्वै अहंकार और मेर तेर को मर कर ‘आपे’ के साथ मिला रहता है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के नाम में रंगे जाते हैं वे इस डरावने संसार-समुंद्र में से पार लांघ जाते हैं (वैसे) जिसको तैरना बहुत मुश्किल है। 2।
पउड़ी ॥
मनमुख अंदरु न भालनी मुठे अहंमते ॥
चारे कुंडां भवि थके अंदरि तिख तते ॥
सिंम्रिति सासत न सोधनी मनमुख विगुते ॥
बिनु गुर किनै न पाइओ हरि नामु हरि सते ॥
ततु गिआनु वीचारिआ हरि जपि हरि गते ॥19॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य अहंकार के ठगे हुए अपना मन नहीं खोजते। अंदर से तृष्णा से जले हुए (होने के कारण) (माया की खातिर) चारों तरफ भटक-भटक के थक जाते हैं; स्मृतियों-शास्त्रों (भाव। धार्मिक पुस्तकों) को ध्यान से नहीं खोजते और (धर्म-पुस्तकों की जगह अपने) मन के पीछे चल के ख्वार होते हैं। सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा का नाम गुरू की शरण आए बिना किसी को भी नहीं मिला। हमने असल विचार की बात ढूँढ ली है कि परमात्मा का नाम जपने से ही मनुष्य की आत्मिक हालत सुधरती है। 19।
सलोक मः 2 ॥
आपे जाणै करे आपि आपे आणै रासि ॥
तिसै अगै नानका खलिइ कीचै अरदासि ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 2॥ प्रभू स्वयं ही (जीवों के दिलों की) जानता है (क्योंकि) वह स्वयं ही (इनको) पैदा करता है। स्वयं ही (जीवों के कारज) सफल करता है; (इसलिए) हे नानक ! उस प्रभू के आगे ही अदब-श्रद्धा के साथ आरजू करनी चाहिए। 1।
मः 1 ॥
जिनि कीआ तिनि देखिआ आपे जाणै सोइ ॥
किस नो कहीऐ नानका जा घरि वरतै सभु कोइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ जिस परमात्मा ने जगत पैदा किया है। उसने ही इसकी संभाल की हुई है। वह स्वयं ही (हरेक के दिल की) जानता है। हे नानक ! जब हरेक जीव (उस परमात्मा के घर से हरेक आवश्यक्ता पूरी करता है जो) हरेक के हृदय-गृह में मौजूद है। तो उसके बिना किसी और के आगे आरजू करनी व्यर्थ है। 2।
पउड़ी ॥
सभे थोक विसारि इको मितु करि ॥
मनु तनु होइ निहालु पापा दहै हरि ॥
आवण जाणा चुकै जनमि न जाहि मरि ॥
सचु नामु आधारु सोगि न मोहि जरि ॥
नानक नामु निधानु मन महि संजि धरि ॥20॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ और सब चीजों (का मोह) विसार के एक परमात्मा को ही अपना मित्र बना। आपका मन खिल जाएगा आपका शरीर हल्का फूल जैसा हैं जाएगा (क्योंकि) परमात्मा सारे पाप जला देता है। (जगत में आपका) जनम-मरण समाप्त हैं जाएगा। आप बार-बार नहीं पैदा होंगे और मरेगा। प्रभू के नाम को आसरा बना। आप चिंता में और मोह में नहीं जलेगा। हे नानक ! परमात्मा का नाम-खजाना अपने मन में इकट्ठा कर के रख। 20।
सलोक मः 5 ॥
माइआ मनहु न वीसरै मांगै दंमा दंम ॥
सो प्रभु चिति न आवई नानक नही करंम ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे नानक ! जिस मनुष्य को मन से माया नहीं भूलती। जो (नाम की दाति माँगने की जगह) साँस-साँस (हरेक श्वास में) (माया ही) माँगता है। जिसको वह परमात्मा कभी याद नहीं आता (ये जानो कि) उसके भाग्य अच्छे नहीं हैं। 1।
मः 5 ॥
माइआ साथि न चलई किआ लपटावहि अंध ॥
गुर के चरण धिआइ तू तूटहि माइआ बंध ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे अंधे (जीव) ! आप (बार-बार) माया को क्यों चिपकता है। ये तो कभी किसी के साथ नहीं जाती; आप सतिगुरू के चरणों का ध्यान धर (भाव। अहंकार को छोड़ के गुरू का आसरा ले) (ताकि) आपकी ये मुश्कें जो माया ने कसी हुई हैं टूट जाएं। 2।
पउड़ी ॥
भाणै हुकमु मनाइओनु भाणै सुखु पाइआ ॥
भाणै सतिगुरु मेलिओनु भाणै सचु धिआइआ ॥
भाणे जेवड होर दाति नाही सचु आखि सुणाइआ ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन सचु कमाइआ ॥
नानक तिसु सरणागती जिनि जगतु उपाइआ ॥21॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ उस परमात्मा ने (जिस मनुष्य से) अपनी रजा में अपना हुकम मनाया है उस मनुष्य ने रजा में रह के सुख पाया है। उस प्रभू ने अपनी रज़ा में जिस मनुष्य को गुरू मिलाया है वह मनुष्य रज़ा में रह के ‘नाम’ सिमरता है; जिस मनुष्य को प्रभू की रजा में रहना सबसे बड़ी बख्शिश प्रतीत होती है वह खुद ‘नाम’ सिमरता है और औरों को सुनाता है; पर ‘नाम’ सिमरते वही हैं जिनके माथे पर धुर से आदि से लिखा हुआ है (भाव। जिनके अंदर पूर्बले कर्मों के अनुसार सिमरन के संस्कार मौजूद हैं)। (सो।) हे नानक ! उस प्रभू की शरण में रह जिस ने यह संसार पैदा किया है। 21।
सलोक मः 3 ॥
जिन कउ अंदरि गिआनु नही भै की नाही बिंद ॥
नानक मुइआ का किआ मारणा जि आपि मारे गोविंद ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जिन मनुष्यों के अंदर परमात्मा का रक्ती भर भी डर नहीं। और जिनको प्रभू के साथ जान-पहचान प्राप्त नहीं हुई। हे नानक ! वे (आत्मिक मौत) मरे हुए हैं। उनको (मानो) ईश्वर ने खुद मार दिया है। इन मरे हुओं को (इससे ज्यादा) किसी और ने क्या मारना है। 1।
मः 3 ॥
मन की पत्री वाचणी सुखी हू सुखु सारु ॥
सो ब्राहमणु भला आखीऐ जि बूझै ब्रहमु बीचारु ॥
हरि सालाहे हरि पड़ै गुर कै सबदि वीचारि ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (लोगों को तिथियाँ आदि बताने के लिए पत्री पढ़ने की जगह) अपने मन की पत्री पढ़नी चाहिए (कि इसकी कौन से वक्त क्या हालत है; ये पत्री वाचने से) सबसे श्रेष्ठ सुख मिलता है। (जो तिथियों की भलाई बुराई विचारने की जगह) ईश्वरीय विचार को समझता है उस ब्राहमण को ठीक समझो। जो (ब्राहमण) गुरू के शबद द्वारा विचार करके प्रभू की सिफत-सालाह करता है प्रभू का नाम पढ़ता है (और इस तरह)

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 11 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे ज्ञानवान ! अकथ प्रभू की यह गहरी राज वाली बात अपने मन में समझ।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।