बिनु करमा किछू न पाईऐ जे बहुतु लोचाही ॥ आवै जाइ जंमै मरै गुर सबदि छुटाही ॥ आपि करै किसु आखीऐ दूजा को नाही ॥16॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: पर चाहे कितनी ही लालसा करें प्रभू की मेहर के बिना नाम नहीं मिलता। (सो। इस मोह में ही) जगत पैदा होता है मरता है पैदा होता है मरता है। (इस चक्र में से) जीव गुरू के शबद से ही बच सकते हैं। पर ये सारी खेल प्रभू स्वयं कर रहा है। किसी और के पास पुकार नहीं की जा सकती। क्योंकि प्रभू के बिना और है ही कोई नहीं। 16।
सलोकु मः 3 ॥ इसु जग महि संती धनु खटिआ जिना सतिगुरु मिलिआ प्रभु आइ ॥ सतिगुरि सचु द्रिड़ाइआ इसु धन की कीमति कही न जाइ ॥ इतु धनि पाइऐ भुख लथी सुखु वसिआ मनि आइ ॥ जिंन॑ा कउ धुरि लिखिआ तिनी पाइआ आइ ॥ मनमुखु जगतु निरधनु है माइआ नो बिललाइ ॥ अनदिनु फिरदा सदा रहै भुख न कदे जाइ ॥ सांति न कदे आवई नह सुखु वसै मनि आइ ॥ सदा चिंत चितवदा रहै सहसा कदे न जाइ ॥ नानक विणु सतिगुर मति भवी सतिगुर नो मिलै ता सबदु कमाइ ॥ सदा सदा सुख महि रहै सचे माहि समाइ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ इस जगत में संतों ने ही नाम-धन कमाया है जिनको गुरू मिला है (और गुरू के माध्यम से) प्रभू मिला है। (क्योंकि) गुरू ने उनके मन में सिमरन पक्का कर दिया है (भाव। सिमरन की गाँठ पक्की तरह बाँध दी है)। यह नाम-धन इतना अमूल्य है कि इसका मोल नहीं डाला जा सकता। अगर यह नाम-धन मिल जाए तो (माया की) भूख उतर जाती है। मन में सुख आ बसता है। पर मिलता उनको है जिनके भाग्यों में धुर-दरगाह से लिखा हो (भाव। जिन पर मेहर हो)। मन के पीछे चलने वाला जगत सदा कंगाल है माया के लिए बिलकता है। हर रोज सदा भटकता फिरता है। इसकी (मायावी) भूख मिटती नहीं। कभी इसके अंदर शीतलता नहीं आती। कभी इसके मन को सुख नहीं मिलता। हमेशा सोचें सोचता रहता है; हे नानक ! गुरू से वंचित रहने के कारण इसकी बुद्धि चक्करों में पड़ी रहती है। अगर मनमुख भी गुरू को मिल जाए तो शबद की कमाई करता है। (शबद की बरकति से) फिर सदा ही सुख में टिका रहता है। प्रभू में जुड़ा रहता है। 1।
मः 3 ॥ जिनि उपाई मेदनी सोई सार करेइ ॥ एको सिमरहु भाइरहु तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥ खाणा सबदु चंगिआईआ जितु खाधै सदा त्रिपति होइ ॥ पैनणु सिफति सनाइ है सदा सदा ओहु ऊजला मैला कदे न होइ ॥ सहजे सचु धनु खटिआ थोड़ा कदे न होइ ॥ देही नो सबदु सीगारु है जितु सदा सदा सुखु होइ ॥ नानक गुरमुखि बुझीऐ जिस नो आपि विखाले सोइ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जिस परमात्मा ने सृष्टि पैदा की है वही इसकी संभाल करता है। हे भाईयो ! उस एक को सिमरो। उसके बिना और कोई (संभाल करने वाला) नहीं। (हे भाईयो !) प्रभू के गुणों को गुरू के शबद को भोजन बनाओ (भाव। जीवन का आसरा बनाओ)। ये भोजन खाते हुए सदा तृप्त रहना है (मन में सदा संतोख रहता है); प्रभू की सिफतसालाह को वडिआईयों को (अपना) पोशाका बनाओ। वह पोशाक सदा साफ़ रहती है और कभी मैली नहीं होती। आत्मिक अडोलता में (रह के) कमाया हुआ नाम-धन कभी कम नहीं होता। मनुष्य के शरीर के लिए गुरू का शबद (मानो) गहना है। इस (गहने की बरकति) से सदा ही सुख मिलता है। हे नानक ! जिस मनुष्य को प्रभू स्वयं समझ बख्शे वह गुरू के माध्यम से यह (जीवन का भेद) समझ लेता है। 2।
पउड़ी ॥ अंतरि जपु तपु संजमो गुर सबदी जापै ॥ हरि हरि नामु धिआईऐ हउमै अगिआनु गवापै ॥ अंदरु अंम्रिति भरपूरु है चाखिआ सादु जापै ॥ जिन चाखिआ से निरभउ भए से हरि रसि ध्रापै ॥ हरि किरपा धारि पीआइआ फिरि कालु न विआपै ॥17॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (‘दूजे भरम’ से हट के) मन के अंदर ही टिकना – यही है जप यही है तप यही है इन्द्रियों को विकारों से रोकने का साधन; पर यह समझ सतिगुरू के शबद द्वारा ही आती है; अगर (‘दूसरे भ्रम’ को छोड़ के) प्रभू का नाम सिमरें तो अहंकार और आत्मिक जीवन की तरफ से बनी हुई बेसमझी दूर हो जाती है। (वैसे तो सदा ही) हृदय नाम-अमृत से नाको-नाक भरा हुआ है (भाव। परमात्मा अंदर ही रोम-रोम में बसता है)। (गुरू के शबद द्वारा नाम-रस) चखने से स्वाद आता है। जिन्होंनें ये नाम-रस चखा है वह निर्भय (प्रभू का रूप) हो जाते हैं। वे नाम के रस से तृप्त हो जाते हैं। जिनको प्रभू ने मेहर करके यह रस पिलाया है उनको दोबारा मौत का डर सता नहीं सकता (आत्मिक मौत उनके नजदीक नहीं आती)। 17।
सलोकु मः 3 ॥ लोकु अवगणा की बंन॑ै गंठड़ी गुण न विहाझै कोइ ॥ गुण का गाहकु नानका विरला कोई होइ ॥ गुर परसादी गुण पाईअनि॑ जिस नो नदरि करेइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जगत अवगुणों की पोटली बाँधता जा रहा है। कोई व्यक्ति गुणों का सौदा नहीं करता। हे नानक ! गुण खरीदने वाला कोई विरला ही होता है। गुरू की कृपा से ही गुण मिलते हैं। (पर मिलते उसको हैं) जिस पर प्रभू मेहर की नज़र करता है। 1।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (जिसने हुकम माना है उसको लोगों की ओर से किए गए) गुण और अवगुण (भाव। नेकी और बदी के सलूक) एक समान ही प्रतीत होते हैं (क्योंकि। ‘हुकम’ में चलने के कारण समझ लेता है कि) ये (गुण और अवगुण) करतार ने खुद ही पैदा किए हैं। हे नानक ! गुरू के शबद द्वारा विचारवान हो के प्रभू का हुकम मानने से सुख मिलता है। 2।
पउड़ी ॥ अंदरि राजा तखतु है आपे करे निआउ ॥ गुर सबदी दरु जाणीऐ अंदरि महलु असराउ ॥ खरे परखि खजानै पाईअनि खोटिआ नाही थाउ ॥ सभु सचो सचु वरतदा सदा सचु निआउ ॥ अंम्रित का रसु आइआ मनि वसिआ नाउ ॥18॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (जीव के) अंदर ही (जीवों का) मालिक (बैठा) है। (जीव के) अंदर ही (उसका) तख़्त है। वह स्वयं ही (अंदर बैठा हुआ। जीव के किए कर्मों का) न्याय किए जाता है; (जीव के) अंदर ही (उसका) महल है। (जीव के) अंदर ही (बैठा जीव को) आसरा (दिए जा रहा) है। पर उसके महल का दरवाजा गुरू के शबद द्वारा ही मिलता है। (जीव के अंदर ही बैठे हुए की हजूरी में) खरे जीव परख के खजाने में रखे जाते हैं (भाव। अंदर बैठा हुआ ही खरे जीवों की आप संभाल किए जाता है)। खोटों को जगह नहीं मिलती। वह सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू हर जगह मौजूद है। उसका न्याय सदा अटल है; उनको उसके नाम-अमृत का स्वाद आता है जिनके मन में नाम बसता है। 18।
सलोक मः 1 ॥ हउ मै करी तां तू नाही तू होवहि हउ नाहि ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ हे प्रभू ! जब मैं ‘मैं मैं’ करता हूँ तब आप (मेरे अंदर प्रकट) नहीं होता। पर जब आप आ बसता है मेरी ‘मैं’ समाप्त हो जाती है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पर चाहे कितनी ही लालसा करें प्रभू की मेहर के बिना नाम नहीं मिलता।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।