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अंग 1091

अंग
1091
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
भोलतणि भै मनि वसै हेकै पाधर हीडु ॥
अति डाहपणि दुखु घणो तीने थाव भरीडु ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: वही एक हृदय सरल है जिसके हृदय में भोलापन और (ईश्वरीय) भय के कारण (ईश्वर स्वयं) बसता है। पर जलन और ईष्या के कारण बहुत ही दुख व्यापता है। मन। वाणी और शरीर तीनों ही भ्रष्ट हुए रहते हैं। 1।
मः 1 ॥
मांदलु बेदि सि बाजणो घणो धड़ीऐ जोइ ॥
नानक नामु समालि तू बीजउ अवरु न कोइ ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ घणा धड़ा (भाव। बहुत सारी दुनिया) देखती है उस ढोल को (जो ढोल) वेदों ने बजाया (भाव। कर्म-काण्ड का रास्ता)। हे नानक ! आप ‘नाम’ सिमर। (इससे अलग) और दूसरा कोई (सही रास्ता) नहीं। 2।
मः 1 ॥
सागरु गुणी अथाहु किनि हाथाला देखीऐ ॥
वडा वेपरवाहु सतिगुरु मिलै त पारि पवा ॥
मझ भरि दुख बदुख ॥
नानक सचे नाम बिनु किसै न लथी भुख ॥3॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (यह) त्रैगुणी (संसार) (मानो) अति-गहरा समुंद्र है। इसकी थाह किसने पाई है। अगर सतिगुरू (जो इस त्रिगुणी संसार से) बहुत बेपरवाह है मिल जाए तो मैं भी इससे पार लांघ जाऊँ। इस संसार-समुंद्र का बीच का हिस्सा दुखों से भरा हुआ है। हे नानक ! प्रभू के नाम सिमरन के बिना किसी की भी (त्रैगुणी माया की) भूख नहीं उतरती। 3।
पउड़ी ॥
जिनी अंदरु भालिआ गुर सबदि सुहावै ॥
जो इछनि सो पाइदे हरि नामु धिआवै ॥
जिस नो क्रिपा करे तिसु गुरु मिलै सो हरि गुण गावै ॥
धरम राइ तिन का मितु है जम मगि न पावै ॥
हरि नामु धिआवहि दिनसु राति हरि नामि समावै ॥14॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ सतिगुरू के सोहाने शबद से जिन्होंने अपना मन खोजा है वह हरी-नाम सिमरते हैं और मन-इच्छित फल पाते हैं। जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर करे उसको गुरू मिलता है और वह प्रभू के गुण गाता है। धर्मराज उनका मित्र बन जाता है उनको वह जम के राह पर नहीं डालता; वह दिन रात हरी-नाम सिमरते हैं और हरी-नाम में जुड़े रहते हैं। 14।
सलोकु मः 1 ॥
सुणीऐ एकु वखाणीऐ सुरगि मिरति पइआलि ॥
हुकमु न जाई मेटिआ जो लिखिआ सो नालि ॥
कउणु मूआ कउणु मारसी कउणु आवै कउणु जाइ ॥
कउणु रहसी नानका किस की सुरति समाइ ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ यही बात सुनी जाती है और बयान की जा रही है कि स्वर्ग में धरती पर और पाताल में (तीनों ही लोकों में) प्रभू एक स्वयं ही स्वयं है। उसके हुकम की उलंघना नहीं की जा सकती। (जीवों का) जो जो लेख उसने लिखा है वही (हरेक जीव को) चला रहा है। (सो।) ना कोई मरता है ना कोई मारता है। ना कोई पैदा होता है ना कोई मरता है। हे नानक ! वह खुद ही आनंद लेने वाला है। उसकी अपनी ही सुरति (अपने आप में) टिकी हुई है। 1।
मः 1 ॥
हउ मुआ मै मारिआ पउणु वहै दरीआउ ॥
त्रिसना थकी नानका जा मनु रता नाइ ॥
लोइण रते लोइणी कंनी सुरति समाइ ॥
जीभ रसाइणि चूनड़ी रती लाल लवाइ ॥
अंदरु मुसकि झकोलिआ कीमति कही न जाइ ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ जितना समय जीव ‘अहंकार’ का मारा हुआ है उसके अंदर तृष्णा का दरिया बहता रहता है। पर। हे नानक ! जब मन ‘नाम’ में रंगा जाता है तब तृष्णा समाप्त हो जाती है। आँखें अपने आप में रंगी जाती हैं। (निंदा आदि) सुनने की चाहत कानों में ही लीन हैं जाती है। जीभ ‘नाम’ सिमर के नाम रसायन में रंग के सुंदर लाल बन जाती है। मन (‘नाम’ में) महक के लपटें देता है। (ऐसे जीवन वाले का) मूल्य नहीं पड़ सकता। 2।
पउड़ी ॥
इसु जुग महि नामु निधानु है नामो नालि चलै ॥
एहु अखुटु कदे न निखुटई खाइ खरचिउ पलै ॥
हरि जन नेड़ि न आवई जमकंकर जमकलै ॥
से साह सचे वणजारिआ जिन हरि धनु पलै ॥
हरि किरपा ते हरि पाईऐ जा आपि हरि घलै ॥15॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ मनुष्य जनम में (जीव के लिए परमात्मा का) नाम ही (असल) खजाना है। ‘नाम’ ही (यहाँ से मनुष्य के) साथ जाता है। ये नाम-खजाना अमुक (ना खत्म होने वाला) है कभी समाप्त नहीं होता। बेशक खाओ। खरचो और साथ बाँध लो; (फिर। इस खजाने वाले) भगत जन के पास जमकाल जमदूत भी नहीं आते। जिन्होंने नाम-धन इकट्टा किया है वही सच्चे शाह हैं सच्चे व्यापारी हैं। यह नाम-धन परमात्मा की मेहर से मिलता है जब वह स्वयं (गुरू को जगत में) भेजता है। 15।
सलोकु मः 3 ॥
मनमुख वापारै सार न जाणनी बिखु विहाझहि बिखु संग्रहहि बिख सिउ धरहि पिआरु ॥
बाहरहु पंडित सदाइदे मनहु मूरख गावार ॥
हरि सिउ चितु न लाइनी वादी धरनि पिआरु ॥
वादा कीआ करनि कहाणीआ कूड़ु बोलि करहि आहारु ॥
जग महि राम नामु हरि निरमला होरु मैला सभु आकारु ॥
नानक नामु न चेतनी होइ मैले मरहि गवार ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (असल) व्यापार की कद्र नहीं जानते। वे माया का सौदा करते हैं। माया जोड़ते हैं और माया से ही प्यार करते हैं; वे बाहर से तो विद्वान कहलवाते हैं पर असल में मूर्ख हैं गावार हैं। (क्योंकि) वे प्रभू के साथ तो मन नहीं लगाते (विद्या के आसरे) चर्चा में प्यार करते हैं। चर्चा की ही नित्य बातें करते हैं; और रोज़ी कमाते हैं झूठ बोल के। (असल बात यह है कि) नाम सिमरना ही जगत में (पवित्र काम) है। और जो कुछ दिखाई दे रहा है (इसका आहर) मैल पैदा करता है। हे नानक ! जो ‘नाम’ नहीं सिमरते वे मूर्ख नीच जीवन वाले हो के आत्मिक मौत सहते हैं। 1।
मः 3 ॥
दुखु लगा बिनु सेविऐ हुकमु मंने दुखु जाइ ॥
आपे दाता सुखै दा आपे देइ सजाइ ॥
नानक एवै जाणीऐ सभु किछु तिसै रजाइ ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (प्रभू का) सिमरन किए बिना मनुष्य को दुख व्यापता है। जब (प्रभू का) हुकम मानता है (भाव। रज़ा में चलता है) तो दुख दूर हो जाता है (क्योंकि प्रभू) खुद ही सुख देने वाला है और स्वयं ही सज़ा देने वाला है। हे नानक ! हुकम में चलने से ही ये समझ पड़ती है कि सब कुछ प्रभू की रज़ा में हो रहा है। 2।
पउड़ी ॥
हरि नाम बिना जगतु है निरधनु बिनु नावै त्रिपति नाही ॥
दूजै भरमि भुलाइआ हउमै दुखु पाही ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ प्रभू के ‘नाम’ के बिना जगत कंगाल है (क्योंकि चाहे कितनी ही माया इकट्ठी कर ले) ‘नाम’ के बिना संतोख नहीं आता; माया के मोह के कारण भटकना में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़ा रहता है। अहंकार के कारण ही जीव दुख पाते हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वही एक हृदय सरल है जिसके हृदय में भोलापन और (ईश्वरीय) भय के कारण (ईश्वर स्वयं) बसता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।