अति डाहपणि दुखु घणो तीने थाव भरीडु ॥1॥
मांदलु बेदि सि बाजणो घणो धड़ीऐ जोइ ॥
नानक नामु समालि तू बीजउ अवरु न कोइ ॥2॥
सागरु गुणी अथाहु किनि हाथाला देखीऐ ॥
वडा वेपरवाहु सतिगुरु मिलै त पारि पवा ॥
मझ भरि दुख बदुख ॥
नानक सचे नाम बिनु किसै न लथी भुख ॥3॥
जिनी अंदरु भालिआ गुर सबदि सुहावै ॥
जो इछनि सो पाइदे हरि नामु धिआवै ॥
जिस नो क्रिपा करे तिसु गुरु मिलै सो हरि गुण गावै ॥
धरम राइ तिन का मितु है जम मगि न पावै ॥
हरि नामु धिआवहि दिनसु राति हरि नामि समावै ॥14॥
सुणीऐ एकु वखाणीऐ सुरगि मिरति पइआलि ॥
हुकमु न जाई मेटिआ जो लिखिआ सो नालि ॥
कउणु मूआ कउणु मारसी कउणु आवै कउणु जाइ ॥
कउणु रहसी नानका किस की सुरति समाइ ॥1॥
हउ मुआ मै मारिआ पउणु वहै दरीआउ ॥
त्रिसना थकी नानका जा मनु रता नाइ ॥
लोइण रते लोइणी कंनी सुरति समाइ ॥
जीभ रसाइणि चूनड़ी रती लाल लवाइ ॥
अंदरु मुसकि झकोलिआ कीमति कही न जाइ ॥2॥
इसु जुग महि नामु निधानु है नामो नालि चलै ॥
एहु अखुटु कदे न निखुटई खाइ खरचिउ पलै ॥
हरि जन नेड़ि न आवई जमकंकर जमकलै ॥
से साह सचे वणजारिआ जिन हरि धनु पलै ॥
हरि किरपा ते हरि पाईऐ जा आपि हरि घलै ॥15॥
मनमुख वापारै सार न जाणनी बिखु विहाझहि बिखु संग्रहहि बिख सिउ धरहि पिआरु ॥
बाहरहु पंडित सदाइदे मनहु मूरख गावार ॥
हरि सिउ चितु न लाइनी वादी धरनि पिआरु ॥
वादा कीआ करनि कहाणीआ कूड़ु बोलि करहि आहारु ॥
जग महि राम नामु हरि निरमला होरु मैला सभु आकारु ॥
नानक नामु न चेतनी होइ मैले मरहि गवार ॥1॥
दुखु लगा बिनु सेविऐ हुकमु मंने दुखु जाइ ॥
आपे दाता सुखै दा आपे देइ सजाइ ॥
नानक एवै जाणीऐ सभु किछु तिसै रजाइ ॥2॥
हरि नाम बिना जगतु है निरधनु बिनु नावै त्रिपति नाही ॥
दूजै भरमि भुलाइआ हउमै दुखु पाही ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वही एक हृदय सरल है जिसके हृदय में भोलापन और (ईश्वरीय) भय के कारण (ईश्वर स्वयं) बसता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।