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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1091 · मारू

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अंग
1091
मारू
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  1. भोलतणि भै मनि वसै हेकै पाधर हीडु ॥
  2. मांदलु बेदि सि बाजणो घणो धड़ीऐ जोइ ॥
  3. सागरु गुणी अथाहु किनि हाथाला देखीऐ ॥
  4. जिनी अंदरु भालिआ गुर सबदि सुहावै ॥
  5. सुणीऐ एकु वखाणीऐ सुरगि मिरति पइआलि ॥
  6. हउ मुआ मै मारिआ पउणु वहै दरीआउ ॥
  7. इसु जुग महि नामु निधानु है नामो नालि चलै ॥
  8. मनमुख वापारै सार न जाणनी बिखु विहाझहि बिखु संग्रहहि बिख सिउ धरहि पिआरु ॥
  9. दुखु लगा बिनु सेविऐ हुकमु मंने दुखु जाइ ॥
  10. हरि नाम बिना जगतु है निरधनु बिनु नावै त्रिपति नाही ॥

भोलतणि भै मनि वसै हेकै पाधर हीडु ॥

अंग 1090 से चला आ रहा अंश

भोलतणि भै मनि वसै हेकै पाधर हीडु ॥
अति डाहपणि दुखु घणो तीने थाव भरीडु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: वही एक हृदय सरल है जिसके हृदय में भोलापन और (ईश्वरीय) भय के कारण (ईश्वर स्वयं) बसता है। पर जलन और ईष्या के कारण बहुत ही दुख व्यापता है। मन, वाणी और शरीर तीनों ही भ्रष्ट हुए रहते हैं। 1।

मांदलु बेदि सि बाजणो घणो धड़ीऐ जोइ ॥

मः 1 ॥
मांदलु बेदि सि बाजणो घणो धड़ीऐ जोइ ॥
नानक नामु समालि तू बीजउ अवरु न कोइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ घणा धड़ा (भाव। बहुत सारी दुनिया) देखती है उस ढोल को (जो ढोल) वेदों ने बजाया (भाव। कर्म-काण्ड का रास्ता)। हे नानक ! आप 'नाम' सिमर। (इससे अलग) और दूसरा कोई (सही रास्ता) नहीं। 2।

सागरु गुणी अथाहु किनि हाथाला देखीऐ ॥

मः 1 ॥
सागरु गुणी अथाहु किनि हाथाला देखीऐ ॥
वडा वेपरवाहु सतिगुरु मिलै त पारि पवा ॥
मझ भरि दुख बदुख ॥
नानक सचे नाम बिनु किसै न लथी भुख ॥3॥

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (यह) त्रैगुणी (संसार) (मानो) अति-गहरा समुंद्र है। इसकी थाह किसने पाई है। अगर सतिगुरू (जो इस त्रिगुणी संसार से) बहुत बेपरवाह है मिल जाए तो मैं भी इससे पार लांघ जाऊँ। इस संसार-समुंद्र का बीच का हिस्सा दुखों से भरा हुआ है। हे नानक ! प्रभू के नाम सिमरन के बिना किसी की भी (त्रैगुणी माया की) भूख नहीं उतरती। 3।

जिनी अंदरु भालिआ गुर सबदि सुहावै ॥

पउड़ी ॥
जिनी अंदरु भालिआ गुर सबदि सुहावै ॥
जो इछनि सो पाइदे हरि नामु धिआवै ॥
जिस नो क्रिपा करे तिसु गुरु मिलै सो हरि गुण गावै ॥
धरम राइ तिन का मितु है जम मगि न पावै ॥
हरि नामु धिआवहि दिनसु राति हरि नामि समावै ॥14॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ सतिगुरू के सोहाने शबद से जिन्होंने अपना मन खोजा है वह हरी-नाम सिमरते हैं और मन-इच्छित फल पाते हैं। जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर करे उसको गुरू मिलता है और वह प्रभू के गुण गाता है। धर्मराज उनका मित्र बन जाता है उनको वह जम के राह पर नहीं डालता; वह दिन रात हरी-नाम सिमरते हैं और हरी-नाम में जुड़े रहते हैं। 14।

सुणीऐ एकु वखाणीऐ सुरगि मिरति पइआलि ॥

सलोकु मः 1 ॥
सुणीऐ एकु वखाणीऐ सुरगि मिरति पइआलि ॥
हुकमु न जाई मेटिआ जो लिखिआ सो नालि ॥
कउणु मूआ कउणु मारसी कउणु आवै कउणु जाइ ॥
कउणु रहसी नानका किस की सुरति समाइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ यही बात सुनी जाती है और बयान की जा रही है कि स्वर्ग में धरती पर और पाताल में (तीनों ही लोकों में) प्रभू एक स्वयं ही स्वयं है। उसके हुकम की उलंघना नहीं की जा सकती। (जीवों का) जो जो लेख उसने लिखा है वही (हरेक जीव को) चला रहा है। (सो।) ना कोई मरता है ना कोई मारता है। ना कोई पैदा होता है ना कोई मरता है। हे नानक ! वह खुद ही आनंद लेने वाला है। उसकी अपनी ही सुरति (अपने आप में) टिकी हुई है। 1।

हउ मुआ मै मारिआ पउणु वहै दरीआउ ॥

मः 1 ॥
हउ मुआ मै मारिआ पउणु वहै दरीआउ ॥
त्रिसना थकी नानका जा मनु रता नाइ ॥
लोइण रते लोइणी कंनी सुरति समाइ ॥
जीभ रसाइणि चूनड़ी रती लाल लवाइ ॥
अंदरु मुसकि झकोलिआ कीमति कही न जाइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ जितना समय जीव 'अहंकार' का मारा हुआ है उसके अंदर तृष्णा का दरिया बहता रहता है। पर। हे नानक ! जब मन 'नाम' में रंगा जाता है तब तृष्णा समाप्त हो जाती है। आँखें अपने आप में रंगी जाती हैं। (निंदा आदि) सुनने की चाहत कानों में ही लीन हो जाती है। जीभ 'नाम' सिमर के नाम रसायन में रंग के सुंदर लाल बन जाती है। मन ('नाम' में) महक के लपटें देता है। (ऐसे जीवन वाले का) मूल्य नहीं पड़ सकता। 2।

इसु जुग महि नामु निधानु है नामो नालि चलै ॥

पउड़ी ॥
इसु जुग महि नामु निधानु है नामो नालि चलै ॥
एहु अखुटु कदे न निखुटई खाइ खरचिउ पलै ॥
हरि जन नेड़ि न आवई जमकंकर जमकलै ॥
से साह सचे वणजारिआ जिन हरि धनु पलै ॥
हरि किरपा ते हरि पाईऐ जा आपि हरि घलै ॥15॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ मनुष्य जनम में (जीव के लिए परमात्मा का) नाम ही (असल) खजाना है। 'नाम' ही (यहाँ से मनुष्य के) साथ जाता है। ये नाम-खजाना अमुक (ना खत्म होने वाला) है कभी समाप्त नहीं होता। बेशक खाओ। खरचो और साथ बाँध लो; (फिर। इस खजाने वाले) भगत जन के पास जमकाल जमदूत भी नहीं आते। जिन्होंने नाम-धन इकट्टा किया है वही सच्चे शाह हैं सच्चे व्यापारी हैं। यह नाम-धन परमात्मा की मेहर से मिलता है जब वह स्वयं (गुरू को जगत में) भेजता है। 15।

मनमुख वापारै सार न जाणनी बिखु विहाझहि बिखु संग्रहहि बिख सिउ धरहि पिआरु ॥

सलोकु मः 3 ॥
मनमुख वापारै सार न जाणनी बिखु विहाझहि बिखु संग्रहहि बिख सिउ धरहि पिआरु ॥
बाहरहु पंडित सदाइदे मनहु मूरख गावार ॥
हरि सिउ चितु न लाइनी वादी धरनि पिआरु ॥
वादा कीआ करनि कहाणीआ कूड़ु बोलि करहि आहारु ॥
जग महि राम नामु हरि निरमला होरु मैला सभु आकारु ॥
नानक नामु न चेतनी होइ मैले मरहि गवार ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (असल) व्यापार की कद्र नहीं जानते। वे माया का सौदा करते हैं। माया जोड़ते हैं और माया से ही प्यार करते हैं; वे बाहर से तो विद्वान कहलवाते हैं पर असल में मूर्ख हैं गावार हैं। (क्योंकि) वे प्रभू के साथ तो मन नहीं लगाते (विद्या के आसरे) चर्चा में प्यार करते हैं। चर्चा की ही नित्य बातें करते हैं; और रोज़ी कमाते हैं झूठ बोल के। (असल बात यह है कि) नाम सिमरना ही जगत में (पवित्र काम) है। और जो कुछ दिखाई दे रहा है (इसका आहर) मैल पैदा करता है। हे नानक ! जो 'नाम' नहीं सिमरते वे मूर्ख नीच जीवन वाले हो के आत्मिक मौत सहते हैं। 1।

दुखु लगा बिनु सेविऐ हुकमु मंने दुखु जाइ ॥

मः 3 ॥
दुखु लगा बिनु सेविऐ हुकमु मंने दुखु जाइ ॥
आपे दाता सुखै दा आपे देइ सजाइ ॥
नानक एवै जाणीऐ सभु किछु तिसै रजाइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (प्रभू का) सिमरन किए बिना मनुष्य को दुख व्यापता है। जब (प्रभू का) हुकम मानता है (भाव। रज़ा में चलता है) तो दुख दूर हो जाता है (क्योंकि प्रभू) खुद ही सुख देने वाला है और स्वयं ही सज़ा देने वाला है। हे नानक ! हुकम में चलने से ही ये समझ पड़ती है कि सब कुछ प्रभू की रज़ा में हो रहा है। 2।

हरि नाम बिना जगतु है निरधनु बिनु नावै त्रिपति नाही ॥

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पउड़ी ॥
हरि नाम बिना जगतु है निरधनु बिनु नावै त्रिपति नाही ॥
दूजै भरमि भुलाइआ हउमै दुखु पाही ॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ प्रभू के 'नाम' के बिना जगत कंगाल है (क्योंकि चाहे कितनी ही माया इकट्ठी कर ले) 'नाम' के बिना संतोख नहीं आता; माया के मोह के कारण भटकना में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़ा रहता है। अहंकार के कारण ही जीव दुख पाते हैं।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1091 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 3: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1091 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।