अंग
1090
मारू
अंग बदलें या अंश चुनें · १२ अंश
- दोवै तरफा उपाईओनु विचि सकति सिव वासा ॥
- होवा पंडितु जोतकी वेद पड़ा मुखि चारि ॥
- आपि उपाए करे आपि आपे नदरि करेइ ॥
- कंटकु कालु एकु है होरु कंटकु न सूझै ॥
- हुकमि रजाई साखती दरगह सचु कबूलु ॥
- अलगउ जोइ मधूकड़उ सारंगपाणि सबाइ ॥
- मनमुख कालु विआपदा मोहि माइआ लागे ॥
- सरबे जोइ अगछमी दूखु घनेरो आथि ॥
- पूंजी साचउ नामु तू अखुटउ दरबु अपारु ॥
- पूरब प्रीति पिराणि लै मोटउ ठाकुरु माणि ॥
- आपे पिंडु सवारिओनु विचि नव निधि नामु ॥
- सलोकु मः 1 ॥
दोवै तरफा उपाईओनु विचि सकति सिव वासा ॥
पउड़ी ॥
दोवै तरफा उपाईओनु विचि सकति सिव वासा ॥
सकती किनै न पाइओ फिरि जनमि बिनासा ॥
गुरि सेविऐ साति पाईऐ जपि सास गिरासा ॥
सिम्रिति सासत सोधि देखु ऊतम हरि दासा ॥
नानक नाम बिना को थिरु नही नामे बलि जासा ॥10॥
दोवै तरफा उपाईओनु विचि सकति सिव वासा ॥
सकती किनै न पाइओ फिरि जनमि बिनासा ॥
गुरि सेविऐ साति पाईऐ जपि सास गिरासा ॥
सिम्रिति सासत सोधि देखु ऊतम हरि दासा ॥
नानक नाम बिना को थिरु नही नामे बलि जासा ॥10॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ इस सृष्टि में माया और आत्मा (दानों का) वास है (इनके असर तले कोई अहंकार में दूसरों से लड़ते हैं और कोई नाम के धनी हैं) ये दोनों पक्ष प्रभू ने खुद बनाए हैं। माया के असर में रह के किसी ने (रॅब) नहीं पाया। बार-बार पैदा होता मरता है। पर गुरू के हुकम में चलने से खाते-पीते नाम-जप के (हृदय में) ठंढ पड़ती है। (हे भाई !) स्मृतियाँ और शास्त्र (आदि सारे धार्मिक-पुस्तकों को बेशक) खोज के देख लो। अच्छे मनुष्य वे हैं जो प्रभू के सेवक हैं। हे नानक ! 'नाम' के बिना कोई वस्तु स्थिर रहने वाली नहीं; मैं सदके हूँ प्रभू के नाम से। 10।
होवा पंडितु जोतकी वेद पड़ा मुखि चारि ॥
सलोकु मः 3 ॥
होवा पंडितु जोतकी वेद पड़ा मुखि चारि ॥
नव खंड मधे पूजीआ अपणै चजि वीचारि ॥
मतु सचा अखरु भुलि जाइ चउकै भिटै न कोइ ॥
झूठे चउके नानका सचा एको सोइ ॥1॥
होवा पंडितु जोतकी वेद पड़ा मुखि चारि ॥
नव खंड मधे पूजीआ अपणै चजि वीचारि ॥
मतु सचा अखरु भुलि जाइ चउकै भिटै न कोइ ॥
झूठे चउके नानका सचा एको सोइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे भाई ! अगर मैं (धर्म-पुस्तकों का) विचारवान बन जाऊँ। ज्योतिषी बन जाऊँ। चारों वेद मुँह-ज़बानी पढ़ सकूँ; अगर अपने आचरण के कारण अपनी सद्-बुद्धि के कारण सारी ही धरती पर मेरी इज्जत हो; (अगर मैं बहुत स्वच्छता रखूँ कि) कहीं कोई (नीची जाति वाला मनुष्य मेरे) चौके को अपवित्र ना कर दे (तो यह सब कुछ व्यर्थ ही है)। हे नानक ! सारे चौके नाशवंत हैं। सदा कायम रहने वाला सिर्फ परमात्मा का नाम ही है (ध्यान इस बात का रखना चाहिए कि) कहीं सदा कायम रहने वाला हरी-नाम (मन से) भूल ना जाए। 1।
आपि उपाए करे आपि आपे नदरि करेइ ॥
मः 3 ॥
आपि उपाए करे आपि आपे नदरि करेइ ॥
आपे दे वडिआईआ कहु नानक सचा सोइ ॥2॥
आपि उपाए करे आपि आपे नदरि करेइ ॥
आपे दे वडिआईआ कहु नानक सचा सोइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ प्रभू स्वयं ही (जीवों को) पैदा करता है (सब कारज) स्वयं ही करता है। स्वयं ही (जीवों पर) मेहर की नजर करता है। स्वयं ही वडिआईयां देता है; कह। हे नानक ! वह सदा कायम रहने वाला प्रभू स्वयं ही (सब कुछ करने के समर्थ) है। 2।
कंटकु कालु एकु है होरु कंटकु न सूझै ॥
पउड़ी ॥
कंटकु कालु एकु है होरु कंटकु न सूझै ॥
अफरिओ जग महि वरतदा पापी सिउ लूझै ॥
गुर सबदी हरि भेदीऐ हरि जपि हरि बूझै ॥
सो हरि सरणाई छुटीऐ जो मन सिउ जूझै ॥
मनि वीचारि हरि जपु करे हरि दरगह सीझै ॥11॥
कंटकु कालु एकु है होरु कंटकु न सूझै ॥
अफरिओ जग महि वरतदा पापी सिउ लूझै ॥
गुर सबदी हरि भेदीऐ हरि जपि हरि बूझै ॥
सो हरि सरणाई छुटीऐ जो मन सिउ जूझै ॥
मनि वीचारि हरि जपु करे हरि दरगह सीझै ॥11॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (मनुष्य के लिए) मौत (का डर ही) एक (ऐसा) काँटा है (जो हर वक्त दिल में चुभता है) कोई और काँटा (भाव। सहम) इस जैसा नहीं। (यह मौत) सारे जगत में बरत रही है कोई इसको रोक नहीं सकता। (मौत का सहम) विकारी बंदों को (विशेष तौर पर) अड़ाता है (भाव। दबा के रखता है)। जो मनुष्य सतिगुरू के शबद से प्रभू के नाम में परोया जाता है जो अपने मन के साथ टकराव बनाता है वह सिमरन करके (अस्लियत को) समझ लेता है और वह प्रभू की शरण पड़ कर (मौत के सहम से) बच जाता है। जो मनुष्य अपने मन में (प्रभू के गुणों की) विचार करके बँदगी करता है वह प्रभू की हजूरी में परवान होता है। 11।
हुकमि रजाई साखती दरगह सचु कबूलु ॥
सलोकु मः 1 ॥
हुकमि रजाई साखती दरगह सचु कबूलु ॥
साहिबु लेखा मंगसी दुनीआ देखि न भूलु ॥
दिल दरवानी जो करे दरवेसी दिलु रासि ॥
इसक मुहबति नानका लेखा करते पासि ॥1॥
हुकमि रजाई साखती दरगह सचु कबूलु ॥
साहिबु लेखा मंगसी दुनीआ देखि न भूलु ॥
दिल दरवानी जो करे दरवेसी दिलु रासि ॥
इसक मुहबति नानका लेखा करते पासि ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ परमात्मा के हुकम में चलने से परमात्मा से बन जाती है। प्रभू की हजूरी में सच (भाव। सिमरन) परवान है। हे भाई ! दुनिया को देख के (सिमरन को भूलने की) गलती ना खा। मालिक (आपके कर्मों का) लेखा माँगेगा। जो मनुष्य दिल की रक्षा करता है। दिल को सीधे राह पर रखने की फकीरी कमाता है। हे नानक ! उसके प्यार मुहब्बत का हिसाब करतार के पास है (भाव। प्रभू उसके प्यार को जानता है)। 1।
अलगउ जोइ मधूकड़उ सारंगपाणि सबाइ ॥
मः 1 ॥
अलगउ जोइ मधूकड़उ सारंगपाणि सबाइ ॥
हीरै हीरा बेधिआ नानक कंठि सुभाइ ॥2॥
अलगउ जोइ मधूकड़उ सारंगपाणि सबाइ ॥
हीरै हीरा बेधिआ नानक कंठि सुभाइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (जो जीव-) भौरा निर्लिप रह कर हर जगह परमात्मा को देखता है। जिसकी आत्मा परमात्मा में परोई हुई है। हे नानक ! वह प्रभू-प्रेम के द्वारा प्रभू के गले से (लगा हुआ) है। 2।
मनमुख कालु विआपदा मोहि माइआ लागे ॥
पउड़ी ॥
मनमुख कालु विआपदा मोहि माइआ लागे ॥
खिन महि मारि पछाड़सी भाइ दूजै ठागे ॥
फिरि वेला हथि न आवई जम का डंडु लागे ॥
तिन जम डंडु न लगई जो हरि लिव जागे ॥
सभ तेरी तुधु छडावणी सभ तुधै लागे ॥12॥
मनमुख कालु विआपदा मोहि माइआ लागे ॥
खिन महि मारि पछाड़सी भाइ दूजै ठागे ॥
फिरि वेला हथि न आवई जम का डंडु लागे ॥
तिन जम डंडु न लगई जो हरि लिव जागे ॥
सभ तेरी तुधु छडावणी सभ तुधै लागे ॥12॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ मन के गुलाम मनुष्य माया के मोह में मस्त रहते हैं। उनको मौत (का सहम) दबाए रखता है। जो मनुष्य माया के मोह में लूटे जा रहे हैं उनको (ये सहम) पल में मार के नाश करता है। जिस वक्त मौत का डंडा आही बजता है (मौत सिर पर आ जाती है) तब (इस मोह में से निकलने के लिए) समय नहीं मिलता। जो मनुष्य परमात्मा की याद में सचेत रहते हैं उनको जम का डंडा नहीं लगता (सहम नहीं मारता)। हे प्रभू ! सारी सृष्टि आपकी ही है। आपने इसे माया के मोह से छुड़वाना है। सभी का आप ही आसरा हैं। 12।
सरबे जोइ अगछमी दूखु घनेरो आथि ॥
सलोकु मः 1 ॥
सरबे जोइ अगछमी दूखु घनेरो आथि ॥
कालरु लादसि सरु लाघणउ लाभु न पूंजी साथि ॥1॥
सरबे जोइ अगछमी दूखु घनेरो आथि ॥
कालरु लादसि सरु लाघणउ लाभु न पूंजी साथि ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ (जो मनुष्य) सारी सृष्टि को ना नाश होने वाली देखता है उसे बड़ा दुख (व्यापता है)। वह (मानो) कलॅर लाद रहा है (पर उसने) समुंद्र पार लांघना है। उसके पल्ले ना मूल है ना कमाई। 1।
पूंजी साचउ नामु तू अखुटउ दरबु अपारु ॥
मः 1 ॥
पूंजी साचउ नामु तू अखुटउ दरबु अपारु ॥
नानक वखरु निरमलउ धंनु साहु वापारु ॥2॥
पूंजी साचउ नामु तू अखुटउ दरबु अपारु ॥
नानक वखरु निरमलउ धंनु साहु वापारु ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (जिस मनुष्य के पास) प्रभू का नाम पूँजी है। जिस के पास (हे प्रभू !) आप ना समाप्त होने वाला और बेअंत धन हैं। जिसके पास ये पवित्र सौदा है। हे नानक ! वह शाह धन्य है और उसका किया हुआ व्यापार धन्य है। 2।
पूरब प्रीति पिराणि लै मोटउ ठाकुरु माणि ॥
मः 1 ॥
पूरब प्रीति पिराणि लै मोटउ ठाकुरु माणि ॥
माथै ऊभै जमु मारसी नानक मेलणु नामि ॥3॥
पूरब प्रीति पिराणि लै मोटउ ठाकुरु माणि ॥
माथै ऊभै जमु मारसी नानक मेलणु नामि ॥3॥
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (हे जीव !) प्रभू के साथ प्राथमिक मूल प्रीति को पहचान। उस बड़े मालिक को याद कर। हे नानक ! प्रभू के नाम में जुड़ना जम को (भाव। मौत के सहम को) मुँह-भार मारता है। 3।
आपे पिंडु सवारिओनु विचि नव निधि नामु ॥
पउड़ी ॥
आपे पिंडु सवारिओनु विचि नव निधि नामु ॥
इकि आपे भरमि भुलाइअनु तिन निहफल कामु ॥
इकनी गुरमुखि बुझिआ हरि आतम रामु ॥
इकनी सुणि कै मंनिआ हरि ऊतम कामु ॥
अंतरि हरि रंगु उपजिआ गाइआ हरि गुण नामु ॥13॥
आपे पिंडु सवारिओनु विचि नव निधि नामु ॥
इकि आपे भरमि भुलाइअनु तिन निहफल कामु ॥
इकनी गुरमुखि बुझिआ हरि आतम रामु ॥
इकनी सुणि कै मंनिआ हरि ऊतम कामु ॥
अंतरि हरि रंगु उपजिआ गाइआ हरि गुण नामु ॥13॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ परमात्मा ने स्वयं ही इस मनुष्य शरीर को सँवारा है और स्वयं ही इसमें अपना नाम (मानो) नौ-खजानों के रूप में डाल दिए हैं (नौ-निधि-नाम डाल रखा है)। पर। कई जीव उसने स्वयं ही भटकना में डाल के गलत रास्ते पर डाले हुए हैं। उनका (सारा) उद्यम असफल जाता है। कई जीवों ने गुरू के सन्मुख हो के (सब जगह) परमात्मा की ज्योति (व्यापक) समझी है। कई जीवों ने 'नाम' सुन के मान लिया है (भाव। 'नाम' में मन लगा लिया है) उनका ये उद्यम बढ़िया है। जो मनुष्य प्रभू के गुण गाते हैं। 'नाम' सिमरते हैं उनके मन में प्रभू का प्यार पैदा होता है। 13।
रचयिता और स्रोत
यह मारू राग के क्रम का अंग 1090 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी; महला ३: गुरु अमर दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०९० खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।