अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: (प्रभू के ‘नाम’ के बराबर के मूल्य की कोई चीज हो भी कैसे। क्योंकि) उसने स्वयं ही सारी सृष्टि बनाई है और स्वयं ही इसमें हर जगह मौजूद है। (हाँ।) गुरू के सन्मुख हो के सदा सिफत-सालाह करें (बस। यह) सिमरन ही (‘नाम’ की प्राप्ति के लिए) मूल्य किया जा सकता है। (क्योंकि) गुरू के शबद से हृदय-कमल खिलता है और इस तरह नाम-रस पीया जाता है। (जगत में) आने-जाने का चक्कर समाप्त हो जाता है और सुख में अडोल अवस्था में लीन हो जाया जाता है। 7।
सलोकु मः 1 ॥ ना मैला ना धुंधला ना भगवा ना कचु ॥ नानक लालो लालु है सचै रता सचु ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ हे नानक ! (कह- हे भाई !जो मनुष्य) सदा कायम रहने वाले परमात्मा (के नाम) में रंगा रहता है वह सदा स्थिर प्रभू (का ही रूप) हो जाता है। (उसका मन परमात्मा के प्रेम-रंग से) गाढ़ा रंगा जाता है। (हे भाई ! उसका मन) विकारों से नहीं लिबड़ता। उसकी निगाह धुंधली नहीं होती (भाव। उसको हर जगह परमात्मा साफ दिखाई देता है) उसको किसी भेष आदि की तमन्ना नहीं होती। नाशवंत जगत का मोह भी उसको नहीं व्यापता। 1।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ वह जीव-भौरा (दुनिया के) सारे डर नाश करके (सदा) आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। बनस्पति का हरेक फूल हरेक फल (जगत का हरेक मन-मोहना पदार्थ उसको माया की भटकना में डालने की जगह) आत्मिक अडोलता में टिकाता है। हे नानक ! (कह- हे भाई ! जैसे पंछियों के रैन-बसेरे के लिए वृक्ष आसरा है। वैसे ही जो जीव-) भौरा सिर्फ परमात्मा को ही आसरा-सहारा समझता है (जो भौरों की तरह हरेक फूल की सुगंधि नहीं लेता फिरता। बल्कि परमात्मा के ही सिफतसालाह-रूप) फूल (की सुगंधि ही) लेता है। 2।
पउड़ी ॥ जो जन लूझहि मनै सिउ से सूरे परधाना ॥ हरि सेती सदा मिलि रहे जिनी आपु पछाना ॥ गिआनीआ का इहु महतु है मन माहि समाना ॥ हरि जीउ का महलु पाइआ सचु लाइ धिआना ॥ जिन गुर परसादी मनु जीतिआ जगु तिनहि जिताना ॥8॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो मनुष्य (अपने) मन के साथ लड़ते हैं वे सूरमे इन्सान बनते हैं वे जाने-माने जाते हैं; जिन्होंने अपने आप को पहचाना है वे सदा ईश्वर के साथ मिले रहते हैं। ज्ञानवान लोगों की सिफत ही यही है (भाव। इसी बात में महानता है) कि वे मन में टिके रहते हैं (भाव। माया के पीछे भटकने की जगह अंदर की ओर केन्द्रित रहते हैं); (इस तरह) सुरति जोड़ के उन्हें ईश्वर का घर मिल जाता है। (सो) जिन्होंने गुरू की मेहर से अपने मन को जीता है उन्होंनें जगत जीत लिया है। 8।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ अगर मैं जोगी बन जाऊँ। जगत में भटकता फिरूँ और घर-घर से (सिर्फ) भिक्षा ही लेता फिरूँ (और अपनी करतूतों की तरफ देखूँ भी ना। तो) प्रभू की हजूरी में (तो अमलों का) लेखा माँगा जाता है मैं (अपनी) किस-किस करतूत का जवाब दूँगा। (जिस मनुष्य ने) प्रभू के नाम को भिक्षा बनाया है संतोख को कुटिया बनाया है ईश्वर सदा उसके साथ बसता है। भेष (बनाने) से कभी किसी को अस्लियत नहीं मिली। सारी सृष्टि जमकाल ने बाँध रखी है। हे नानक ! प्रभू का नाम ही याद कर। इसके अलावा और बातें झूठी हैं। 1।
मः 3 ॥ जितु दरि लेखा मंगीऐ सो दरु सेविहु न कोइ ॥ ऐसा सतिगुरु लोड़ि लहु जिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥ तिसु सरणाई छूटीऐ लेखा मंगै न कोइ ॥ सचु द्रिड़ाए सचु द्रिड़ु सचा ओहु सबदु देइ ॥ हिरदै जिस दै सचु है तनु मनु भी सचा होइ ॥ नानक सचै हुकमि मंनिऐ सची वडिआई देइ ॥ सचे माहि समावसी जिस नो नदरि करेइ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (हे भाई !) जिस दरवाजे पर (बैठने से। किए हुए कर्मों का) लेखा (फिर भी) माँगा जाना है उस दर पे कोई ना बैठना। ऐसा गुरू ढूँढो जिस जैसा और कोई ना मिल सके। उस गुरू की शरण पड़ने से (कर्मों के चक्करों से) मुक्त हुआ जाता है (फिर किसी कर्मों का) लेखा कोई नहीं माँगता (क्योंकि) वह गुरू स्वयं प्रभू का नाम पल्ले बाँधता है (शरण आए हुओं के) पल्ले बँधाता है और प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी देता है। जिस मनुष्य के हृदय में ईश्वर आ बसता है उसका शरीर भी उसका मन भी रॅब के प्यार में रंगा जाता है। हे नानक ! अगर प्रभू की रजा मान लें तो वह सच्ची वडिआई बख्शता है; पर। वही मनुष्य अपना आप प्रभू में लीन करता है जिस परवह खुद मिहर की निगाह करता है। 2।
पउड़ी ॥ सूरे एहि न आखीअहि अहंकारि मरहि दुखु पावहि ॥ अंधे आपु न पछाणनी दूजै पचि जावहि ॥ अति करोध सिउ लूझदे अगै पिछै दुखु पावहि ॥ हरि जीउ अहंकारु न भावई वेद कूकि सुणावहि ॥ अहंकारि मुए से विगती गए मरि जनमहि फिरि आवहि ॥9॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो मनुष्य अहंकार में मरते हैं (खपते हैं) और दुख पाते हैं उन्हें शूरवीर नहीं कहा जाता। वह (अहंकारी) अंधे अपना असल नहीं पहचानते और माया के मोह में दुखी होते हैं। बड़े क्रोध में आ के (दुनिया से) लड़ते हैं और इस लोक में व परलोक में दुख ही पाते हैं। वेद आदि धर्म-पुस्तकें पुकार-पुकार कर कह रही हैं कि ईश्वर को अहंकार अच्छा नहीं लगता। जो मनुष्य अहंकार में मरते रहे वे बे-गति ही चले गए (उनका जीवन ना सुधरा)। वे बार-बार पैदा होते मरते रहते हैं। 9।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ कौआ (हंस) के समान सफेद नहीं बन सकता। लोहे की नाव से (नदी) पार नहीं की जा सकती; पर शाबाश है उस सँवारने वाले (गुरू) का (जिसकी मति ले के कौए जैसे काले मन वाला भी) परमात्मा का नाम अंगीकार करता है। हुकम पहचानता है और इस तरह (कौए से) हंस बन जाता है (जैसे) लकड़ी के आसरे लोहा (नदी के) उस पार जा लगता है; (गुरू के आसरे) हे नानक ! वह तृष्णा त्यागता है और रॅब के भय में जीता है। (बस !) यही करणी सबसे अच्छी है। 1।
मः 3 ॥ मारू मारण जो गए मारि न सकहि गवार ॥ नानक जे इहु मारीऐ गुर सबदी वीचारि ॥ एहु मनु मारिआ ना मरै जे लोचै सभु कोइ ॥ नानक मन ही कउ मनु मारसी जे सतिगुरु भेटै सोइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जो मनुष्य बाहर जंगलों में मन को मारने के लिए गए वे मार न सके; हे नानक ! अगर यह मन वश में किया जा सकता है तो गुरू के शबद में विचार जोड़ने से ही वश में किया जा सकता है। (नहीं तो ऐसे) चाहे कोई कितनी भी तांघ करे (कोशिश करे) ये मन प्रयत्न करने पर वश में नहीं आता। हे नानक ! अगर समर्थ गुरू मिल जाए तो मन ही मन को मार लेता है (भाव। गुरू की सहायता से अंदर की ओर झाँकने से मन वश में आ जाता है)। 2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(प्रभू के ‘नाम’ के बराबर के मूल्य की कोई चीज हो भी कैसे।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।