मांझ महला 5 ॥ झूठा मंगणु जे कोई मागै ॥ तिस कउ मरते घड़ी न लागै ॥ पारब्रहमु जो सद ही सेवै सो गुर मिलि निहचलु कहणा ॥1॥ प्रेम भगति जिस कै मनि लागी ॥ गुण गावै अनदिनु निति जागी ॥ बाह पकड़ि तिसु सुआमी मेलै जिस कै मसतकि लहणा ॥2॥ चरन कमल भगतां मनि वुठे ॥ विणु परमेसर सगले मुठे ॥ संत जनां की धूड़ि नित बांछहि नामु सचे का गहणा ॥3॥ ऊठत बैठत हरि हरि गाईऐ ॥ जिसु सिमरत वरु निहचलु पाईऐ ॥ नानक कउ प्रभ होइ दइआला तेरा कीता सहणा ॥4॥43॥50॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: मांझ महला 5 ॥ यदि कोई मनुष्य (सदैव) नाशवंत पदार्थों की ही मांग करता रहे (और नाम सिमरन की दाति कभी ना मांगे), उसे आत्मिक मौत मरते देर नहीं लगती। जो मनुष्य सदा ही परमेश्वर की सेवा-भक्ति करता है, वह गुरू को मिल के (माया की तृष्णा की तरफ से) अडोल हो गया कहा जा सकता है।1। जिस मनुष्य के मन में परमात्मा की प्यार-भरी भगती की लिव लग जाती है, जो मनुष्य हर रोज सदा (माया के हमलों से) सुचेत रह के परमात्मा के गुण गाता है, (उस की) बाँह पकड़ के उसको मालिक प्रभू (अपने साथ) मिला लेता है। (पर ये दाति उसी को प्राप्त होती है) जिसके माथे पर ये दात हासिल करने का लेख मौजूद हो (भाव, जिसके अंदर पूर्बले समय में किए कर्मों के अनुसार सेवा भगती के संस्कार मौजूद हों, गुरू को मिल के उसके वह संस्कार जाग पड़ते हैं)।2। भगतों के मन में परमात्मा के सुहाने चरण (सदा) बसते रहते हैं। (परमात्मा की भक्ति करने वाले लोग जानते हैं कि) परमेश्वर के चरणों में जुड़े बिना सारे ही जीव (माया के कामादिक दूतों के हाथों) लूटे जाते हैं। जो मनुष्य ऐसे संत जनों की चरण धूड़ की सदा चाहत रखते हैं। उन्हें सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम मिल जाता है, जो उनके जीवन को संवार देता है।3। (हे भाई !) उठते बैठते (हर वक्त) परमात्मा की सिफति सलाह करनी चाहिए, क्योंकि उसका सिमरन करने से पति प्रभू मिल जाता है जो सदा अटॅल रहने वाला है। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) जिस पर आप दयावान होता है (वह उठते बैठते आपका नाम सिमरता है और इस तरह) उसे आपकी रजा प्यारी लगती है।4।43।50।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: रागु माझ असटपदीआ महला 1 घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। जिन्होंने अपने मन नाम-रंग में रंगा लिए, जो आपके हुकम में चलते हैं, वे सारे आपकी सदा स्थिर दरगाह में आपके महल में बुला लिए जाते हैं हे सदा चिर रहने वाले ! हे दीनों पे दया करने वाले मेरे मालिक ! ….जिन्होंने अपने मन को आपके सदा स्थिर नाम में राजी कर लिया है, …… ।1। जिन्होंने गुरू के शबद के द्वारा अपने जीवन को सुहाना बना लिया है, जिन्होंने आत्मिक जीवन देने वाला नाम, सदा सुख देने वाला प्रभू नाम गुरू की मति ले के अपने मन में बसा लिया है, मैं उनके कुर्बान हूँ, सदके हूँ।1।रहाउ। (दुनिया में) कोई भी मेरा सदा का साथी नहीं। मैं भी किसी का सदा के लिए साथी नहीं हूँ। मेरा सदा वास्ते पालने वाला सिर्फ वही (प्रभू) है, जो तीनों भवनों में व्यापक है। ‘मैं बड़ा हूँ, मैं बड़ा हूँ’-ये मान कर करके बेअंत दुनिया (जगत से) चलती जा रही है। (अभिमान में मतवाली हुई दुनिया) पाप कमा कमा के पछताती भी है।2। जे मनुष्य परमात्मा की रजा को समझता है, (वह अभिमान नहीं करता) वह परमात्मा की सिफत-सालाह करता है। गुरू के शबद के द्वारा वह प्रभू के नाम में (टिक के, नाम की) राहदारी समेत (यहाँ से जाता है)। सदा स्थिर प्रभू के दर पे सब जीवों के कर्मों का लेखा होता है। इस लेखे से वही सुर्ख-रू होता है जो नाम से अपने जीवन को सुहाना बना लेता है।3। प्रभू नाम से टूटे हुए मन का मुरीद मनुष्य (कर्मों से बचने के लिए) कोई जगह नहीं ढूँढ सकता। (अपने किए अवगुणों का) बंधा हुआ यमराज के दर पे मार खाता है। (आत्मिक दु:ख कलेश की चोटों से बचाने कि लिए) प्रभू के नाम के बिना और कोई संगी साथी नहीं हो सकता। जम की इन चोटों से वही बचते हैं, जो प्रभू का नाम सिमरते हैं।4। झूठे मोह में फंसे साकत को सदा स्थिर प्रभू (का नाम) अच्छा नही लगता। (उसे मोह वाली मेर-तेर पसंद है) उस मेर-तेर में फंसा हुआ जनम मरन के चक्कर में पड़ता है। (दुबिधा वाले किए कर्मों के अनुसार, माथे पर दुबिधा के संस्कारों का) लिखा लेख कोई मिटा नहीं सकता। (इस लेख से) वही खलासी पाता है, जो गुरू की शरण पड़ता है।5। जिस जीव स्त्री ने पेके घर (इस लोक) में प्रभू पति के साथ सांझ नहीं डाली, झूठे मोह के कारण प्रभू चरणों से विछुड़ी हुई वह (आखिर) धाड़ें मार मार के रोती है। जिस (के आत्मिक जीवन) को पाप (-स्वभाव) ने लूट लिया, उसे परमात्मा का महल नहीं मिलता। इन अवगुणों को गुणों का मालिक प्रभू (स्वयं ही) बख्शता है।6। जिस जीव स्त्री ने पेके घर (इस लोक) में प्यारे प्रभू के साथ सांझ पा ली, वह गुरू की शरण पड़ कर (जगत के) मूल प्रभू (के गुणों) को समझती व विचारती है। जो सदा स्थिर प्रभू के नाम में टिके रहते हैं, गुरू उनका जनम मरन का चक्कर समाप्त कर देता है।7। गुरू की शरण पड़ने से मनुष्य बेअंत गुणों वाले प्रभू (के गुणों) को समझता है। (औरों) को सिफत-सालाह के वास्ते प्रेरता है। सदा स्थिर ठाकुर को (सिफत-सालाह का) सदा स्थिर कर्म ही अच्छा लगता है। हे नानक ! (गुरू की शरण पड़ने वाला मनुष्य) सदा स्थिर प्रभू का नाम सिमरता रहता है, (सदा स्थिर प्रभू के दर पे) आरजूऐं (करता रहता है)। प्रभू की सिफत-सालाह करने वालों को सदा स्थिर प्रभू मिल जाता है।8।1।
माझ महला 3 घरु 1 ॥ करमु होवै सतिगुरू मिलाए ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 घरु 1 ॥ जिस मनुष्य पर प्रभू की बख्शिश हो, उसे प्रभू गुरू से मिलाता है
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मांझ महला 5 ॥ यदि कोई मनुष्य (सदैव) नाशवंत पदार्थों की ही मांग करता रहे (और नाम सिमरन की दाति कभी ना मांगे), उसे आत्मिक मौत मरते देर नहीं लगती।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।