हरि कीरतनु गावहु दिनु राती सफल एहा है कारी जीउ ॥3॥
द्रिसटि धारि अपना दासु सवारिआ ॥
घट घट अंतरि पारब्रहमु नमसकारिआ ॥
इकसु विणु होरु दूजा नाही बाबा नानक इह मति सारी जीउ ॥4॥39॥46॥
मनु तनु रता राम पिआरे ॥
सरबसु दीजै अपना वारे ॥
आठ पहर गोविंद गुण गाईऐ बिसरु न कोई सासा जीउ ॥1॥
सोई साजन मीतु पिआरा ॥
राम नामु साधसंगि बीचारा ॥
साधू संगि तरीजै सागरु कटीऐ जम की फासा जीउ ॥2॥
चारि पदारथ हरि की सेवा ॥
पारजातु जपि अलख अभेवा ॥
कामु क्रोधु किलबिख गुरि काटे पूरन होई आसा जीउ ॥3॥
पूरन भाग भए जिसु प्राणी ॥ साधसंगि मिले सारंगपाणी ॥
नानक नामु वसिआ जिसु अंतरि परवाणु गिरसत उदासा जीउ ॥4॥40॥47॥
सिमरत नामु रिदै सुखु पाइआ ॥
करि किरपा भगतंी प्रगटाइआ ॥
संतसंगि मिलि हरि हरि जपिआ बिनसे आलस रोगा जीउ ॥1॥
जा कै ग्रिहि नव निधि हरि भाई ॥
तिसु मिलिआ जिसु पुरब कमाई ॥
गिआन धिआन पूरन परमेसुर प्रभु सभना गला जोगा जीउ ॥2॥
खिन महि थापि उथापनहारा ॥
आपि इकंती आपि पसारा ॥
लेपु नही जगजीवन दाते दरसन डिठे लहनि विजोगा जीउ ॥3॥
अंचलि लाइ सभ सिसटि तराई ॥
आपणा नाउ आपि जपाई ॥
गुर बोहिथु पाइआ किरपा ते नानक धुरि संजोगा जीउ ॥4॥41॥48॥
सोई करणा जि आपि कराए ॥
जिथै रखै सा भली जाए ॥
सोई सिआणा सो पतिवंता हुकमु लगै जिसु मीठा जीउ ॥1॥
सभ परोई इकतु धागै ॥
जिसु लाइ लए सो चरणी लागै ॥
ऊंध कवलु जिसु होइ प्रगासा तिनि सरब निरंजनु डीठा जीउ ॥2॥
तेरी महिमा तूंहै जाणहि ॥
अपणा आपु तूं आपि पछाणहि ॥
हउ बलिहारी संतन तेरे जिनि कामु क्रोधु लोभु पीठा जीउ ॥3॥
तूं निरवैरु संत तेरे निरमल ॥
जिन देखे सभ उतरहि कलमल ॥
नानक नामु धिआइ धिआइ जीवै बिनसिआ भ्रमु भउ धीठा जीउ ॥4॥42॥49॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उसने कई जन्मों (के विकारों) का रोग (उस दवा के साथ) दूर कर लिया।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।