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अंग 108

अंग
108
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जनम जनम का रोगु गवाइआ ॥
हरि कीरतनु गावहु दिनु राती सफल एहा है कारी जीउ ॥3॥
द्रिसटि धारि अपना दासु सवारिआ ॥
घट घट अंतरि पारब्रहमु नमसकारिआ ॥
इकसु विणु होरु दूजा नाही बाबा नानक इह मति सारी जीउ ॥4॥39॥46॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: उसने कई जन्मों (के विकारों) का रोग (उस दवा के साथ) दूर कर लिया। (हे भाई !) रात दिन परमात्मा की सिफत-सालाह के गीत गाते रहो, यही कार लाभदायक है।3। (प्रभू ने जो) अपना सेवक (अपनी) मेहर की निगाह करके सदकर्मों वाले जीवन वाला बना दिया, उसने हरेक शरीर में उस परमात्मा को (देख के हरेक के आगे) अपना सिर निवाया (भाव, हरेक के साथ प्रेम प्यार वाला बरताव किया)।यही सबसे श्रेष्ठ सूझ है।4।39।46।
माझ महला 5 ॥
मनु तनु रता राम पिआरे ॥
सरबसु दीजै अपना वारे ॥
आठ पहर गोविंद गुण गाईऐ बिसरु न कोई सासा जीउ ॥1॥
सोई साजन मीतु पिआरा ॥
राम नामु साधसंगि बीचारा ॥
साधू संगि तरीजै सागरु कटीऐ जम की फासा जीउ ॥2॥
चारि पदारथ हरि की सेवा ॥
पारजातु जपि अलख अभेवा ॥
कामु क्रोधु किलबिख गुरि काटे पूरन होई आसा जीउ ॥3॥
पूरन भाग भए जिसु प्राणी ॥ साधसंगि मिले सारंगपाणी ॥
नानक नामु वसिआ जिसु अंतरि परवाणु गिरसत उदासा जीउ ॥4॥40॥47॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (हे भाई ! अगर आप ये चाहता है कि आपका) मन (आपका) शरीर प्यारे प्रभू (के प्रेम रंग में) रंगा रहे (तो) अपना सब कुछ सदके करके (उस प्रेम के बदले) दे देना चाहिए। आठों पहर गोविंद के गुण गाने चाहिए। (हे भाई !) कोई एक श्वास (लेते हुए भी परमात्मा को) ना भुलाओ।1। वही सज्जन-प्रभू का प्यारा मित्र है, जो मनुष्य साध-संगति में (टिक के) परमात्मा के नाम को विचारता है, साध-संगति में (रहने से) संसार समुंद्र से पार लांघ सकते हैं, और जमों वाली फांसी कट जाती है।2। (हे भाई !) परमात्मा की सेवा भक्ति ही (दुनिया के प्रसिद्ध) चार पदार्थ हैं। (हे भाई !) अलॅख अभेव प्रभू का नाम जप, यही पारजात (वृक्ष मनोकामनाएं पूरी करने वाला) है। जिस मनुष्य (के अंदर से) गुरू ने काम वासना दूर कर दी है जिसके सारे पाप गुरू ने काट दिए हैं, उसकी (हरेक किस्म की) आशा पूरी हो गई।3। (हे भाई !) जिस मनुष्य के पूरे भाग्य जाग पड़ें, उसको साध-संगति में परमात्मा मिल जाता है। हे नानक ! जिस मनुष्य के हृदय में परमातमा का नाम बस जाता है, वह घर-बार वाला होता हुआ भी माया से निर्लिप रहता है और उस प्रभू के दर पे कबूल रहता है।4।40।47।
माझ महला 5 ॥
सिमरत नामु रिदै सुखु पाइआ ॥
करि किरपा भगतंी प्रगटाइआ ॥
संतसंगि मिलि हरि हरि जपिआ बिनसे आलस रोगा जीउ ॥1॥
जा कै ग्रिहि नव निधि हरि भाई ॥
तिसु मिलिआ जिसु पुरब कमाई ॥
गिआन धिआन पूरन परमेसुर प्रभु सभना गला जोगा जीउ ॥2॥
खिन महि थापि उथापनहारा ॥
आपि इकंती आपि पसारा ॥
लेपु नही जगजीवन दाते दरसन डिठे लहनि विजोगा जीउ ॥3॥
अंचलि लाइ सभ सिसटि तराई ॥
आपणा नाउ आपि जपाई ॥
गुर बोहिथु पाइआ किरपा ते नानक धुरि संजोगा जीउ ॥4॥41॥48॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ उसने नाम सिमर के हृदय में आत्मिक आनंद का सुख प्राप्त किया, (जिस मनुष्य के हृदय में) भगतजनों ने कृपा करके (परमात्मा का नाम) प्रगट कर दिया, साध-संगति में मिल के जिस ने सदा हरी नाम जपा, उसके सारे आलस उसके सारे रोग दूर हो गए।1। हे भाई जिस हरी के घर में नौ खजाने मौजूद हैं, वह हरी उस मनुष्य को मिलता है (गुरू के द्वारा) जिसकी पहले जन्मों में की नेक कमाई के संस्कार जाग पड़ते हैं। उसकी पूर्ण परमात्मा के साथ गहरी सांझ बन जाती है। उसे यकीन हो जाता है कि परमात्मा सब काम करने की स्मर्था रखता है।2। (हे भाई !) परमात्मा (सारा जगत) रच के एक छिन में (इसको) नाश करने की ताकत भी रखता है। वह स्वयं ही (निर्गुण स्वरूप हो के) अकेला (हो जाता) है, और स्वयं ही (अपने आप से सरगुण स्वरूप धार के) जगत रचना कर देता है। उस करतार को, जगत के जीवन उस प्रभू को माया का प्रभाव विचलित नहीं कर सकता। उसका दर्शन करने से सारे विछोड़े उतर जाते हैं (प्रभू से विछोड़ा डालने वाले सारे प्रभाव मन से उतर जाते हैं)।3। (हे भाई ! गुरू के) पल्ले लगा के (प्रभू स्वयं ही) सारी सृष्टि को (संसार समुंद्र से) पार लंघाता है, प्रभू (गुरू के द्वारा) अपना नाम स्वयं (जीवों से) जपाता है। हे नानक ! परमात्मा की धुर दरगाह से मिलाप के सबब बनने से परमात्मा की मेहर से गुरू जहाज मिलता है।4।41।48।
माझ महला 5 ॥
सोई करणा जि आपि कराए ॥
जिथै रखै सा भली जाए ॥
सोई सिआणा सो पतिवंता हुकमु लगै जिसु मीठा जीउ ॥1॥
सभ परोई इकतु धागै ॥
जिसु लाइ लए सो चरणी लागै ॥
ऊंध कवलु जिसु होइ प्रगासा तिनि सरब निरंजनु डीठा जीउ ॥2॥
तेरी महिमा तूंहै जाणहि ॥
अपणा आपु तूं आपि पछाणहि ॥
हउ बलिहारी संतन तेरे जिनि कामु क्रोधु लोभु पीठा जीउ ॥3॥
तूं निरवैरु संत तेरे निरमल ॥
जिन देखे सभ उतरहि कलमल ॥
नानक नामु धिआइ धिआइ जीवै बिनसिआ भ्रमु भउ धीठा जीउ ॥4॥42॥49॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (जीव) वही काम कर सकता है, जो परमात्मा स्वयं कराता है। (जीव को) जिस जगह पे परमात्मा रखता है, वही जगह (जीव वास्ते) ठीक होती है। वही मनुष्य अक्ल वाला है वही मनुष्य इज्जत वाला है, जिसे परमात्मा का हुकम प्यारा लगता है।1। परमात्मा ने सारी सृष्टि को अपने (हुकम रूपी) धागे में परो रखा है। जिस जीव को प्रभू (अपने चरणों से) लगाता है, वही चरणों से लगता है। उस मनुष्य ने (ही) निर्लिप प्रभू को हर जगह देखा है, जिसका पलटा हुआ हृदय रूपी कमल का फूल (प्रभू ने अपनी मेहर से खुद) खिला दिया है।2। हे प्रभू ! आप स्वयं ही जानता है कि आप कितना बड़ा है। अपने आप को आप स्वयं ही समझ सकता है। आपके जिस जिस संत ने (आपकी मेहर से अपने अंदर से) काम को, क्रोध को, लोभ को दूर किया है, मैं उन पे से कुर्बान जाता हूं।3। हे प्रभू ! आपके अंदर किसी के वास्ते वैर नहीं। आपके संत भी (वैर भावना आदि की) मैल से रहित हैं। आपके उन संत जनों का दर्शन करने से (औरों के भी) पाप दूर हैं जाते हैं। हे नानक ! (कह, हे प्रभू आपका) नाम सिमर सिमर के जो मनुष्य आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है उसके मन में से भटकना के डर दूर हो जाते हैं।4।42।49।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उसने कई जन्मों (के विकारों) का रोग (उस दवा के साथ) दूर कर लिया।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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