गुण ते गुण मिलि पाईऐ जे सतिगुर माहि समाइ ॥ मोुलि अमोुलु न पाईऐ वणजि न लीजै हाटि ॥ नानक पूरा तोलु है कबहु न होवै घाटि ॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: (पर अगर कोई कद्र जानने वाला मनुष्य) गुरू में ‘स्वै’ लीन कर दे। तो प्रभू के गुण गाने से। प्रभू की सिफतसालाह में जुड़ने से (प्रभू का ‘नाम’-रूपी कीमती पदार्थ) मिलता है। नाम’ बहुमूल्य पदार्थ है। किसी कीमत से नहीं मिल सकता। किसी दुकान से खरीदा नहीं जा सकता। हे नानक ! (‘नाम’ के मूल्य का) तोल तो बँधा हुआ है। वह कभी कम नहीं हो सकता (भाव। ‘अपने आप को गुरू में लीन करना’- ये बँधा हुआ मूल्य है। और इससे कम कोई उद्यम ‘नाम’ की प्राप्ति के लिए काफी नहीं है)। 1।
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ जो मनुष्य ‘नाम’ से टूटे हुए हैं वह भटकते हैं (भटकना के कारण) नित्य पैदा होते मरते हैं (भाव। ‘वासना’ पूरी करने के लिए जनम-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं); सो। कई जीव (इन ‘वासनाओं’ से) बंधे हुए हैं। कईयों ने बँधन कुछ ढीले कर लिए हैं और कई प्रभू के प्यार में रह के (बिल्कुल) सुखी हो गए हैं। हे नानक ! जो मनुष्य सदा स्थिर परमात्मा को अपने मन में पक्का कर लेता है। सदा-स्थिर नाम उसके लिए करने-योग्य काम है सदा-स्थिर नाम ही उसकी जीवन-जुगति हो जाता है। 2।
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (ज्ञान। मानो) बहुत ही तेजधार खड़ग है। यह ज्ञान गुरू से मिलता है। (जिसको मिला है उसका) माया की खातिर भटकना। मोह। लोभ। अहंकार-रूप किला (जिसमें वह घिरा हुआ था। इस ज्ञान-खड़ग से) काटा जाता है; गुरू के शबद में सुरति जोड़ने से उसके मन में परमात्मा का नाम बस जाता है। सिमरन के संजम से उसकी मति उक्तम हो जाती है। ईश्वर उसको प्यारा लगने लग जाता है; (आखिर उसकी ये हालत हो जाती है कि) सदा-स्थिर सृजनहार उसको हर जगह बसता दिखता है। 1।
सलोकु मः 3 ॥ केदारा रागा विचि जाणीऐ भाई सबदे करे पिआरु ॥ सतसंगति सिउ मिलदो रहै सचे धरे पिआरु ॥ विचहु मलु कटे आपणी कुला का करे उधारु ॥ गुणा की रासि संग्रहै अवगण कढै विडारि ॥ नानक मिलिआ सो जाणीऐ गुरू न छोडै आपणा दूजै न धरे पिआरु ॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे भाई ! केदारा राग को (और बाकी के) रागों में तभी जानो (भाव। केदारा राग की उपमा तभी करनी चाहिए। यदि इसे गाने वाला) गुरू के शबद में प्यार करने लग जाए। वह सत्संगति से मिला रहे और सच्चे प्रभु से प्रेम करे। अंदर से अपनी मैल भी काटे और अपनी कुलों का भी उद्धार कर ले। गुणों की पूँजी इकट्ठी करे और अवगुणों को मार के निकाल दे। हे नानक ! (केदारा राग से रॅब में) जुड़ा हुआ उसे समझो जो कभी भी अपने गुरू का आसरा ना छोड़े और माया में मोह ना डाले। 1।
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ (हे प्रभू !) जब मैं (इस संसार-) समुंद्र को देखता हूँ तो डर के मारे सहम जाता हूँ (कि कैसे इसमें से बच के पार होऊँगा। पर) आपके डर में रहने से (इस संसार-समुंद्र का कोई) डर नहीं रह जाता; क्योंकि। हे नानक ! गुरू के शबद से मैं संतोख वाला बन रहा हूँ और प्रभू के नाम से मैं खिलता हूँ। 2।
मः 4 ॥ चड़ि बोहिथै चालसउ सागरु लहरी देइ ॥ ठाक न सचै बोहिथै जे गुरु धीरक देइ ॥ तितु दरि जाइ उतारीआ गुरु दिसै सावधानु ॥ नानक नदरी पाईऐ दरगह चलै मानु ॥3॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 4॥ (संसार-) समुंद्र (तो विकारों की लहरों से) ठाठा मार रहा है पर मैं (गुरू-शबद-रूप) जहाज में चढ़ के (इस समुंद्र में से) पार हो जाऊँगा। अगर सतिगुरू हौसला दे तो इस सच्चे जहाज में चढ़ने से (यात्रा में) कोई रोक (कोई मुश्किल) नहीं आएगी। मुझे अपना गुरू सावधान दिखाई दे रहा है (मेरा दृढ़ निश्चय है कि गुरू मुझे) उस (प्रभू के) दर पर जा उतारेगा। हे नानक ! (ये गुरू का शबद जहाज) प्रभू की मेहर से मिलता है (इसकी बरकति से) प्रभू की हजूरी में आदर मिलता है। 3।
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे भाई !) गुरू के सन्मुख हो के सिमरन की कमाई कर (और इस तरह) निहकंटक राज का भोग कर। (क्योंकि) जो प्रभू सदा-स्थिर तख्त पर बैठ कर न्याय कर रहा है वह आपको सत्संग में मिला देगा। वहाँ नाम-सिमरन की सच्ची शिक्षा कमाने से आपकी प्रभू से (समीपता) बन आएगी। इस जीवन में सुखदाता प्रभू मन में बसेगा और अंत के समय भी साथी बनेगा। जिस मनुष्य को सतिगुरू ने समझ बख्शी उसका प्रभू के साथ प्यार बन जाता है। 2।
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ बहुत समय से विछड़ी हुई मैं भटक रही हूँ। मुझे कोई सीधा सपाट रास्ता नहीं बताता। कोई जा के किसी सियाने लोगों से पूछो भला जो कोई मेरा कष्ट काट दे। हे नानक ! अगर सच्चा गुरू मन में आ बसे तो सज्जन प्रभू भी उसी जगह (भाव। हृदय में ही मिल जाता है)। प्रभू की सिफत सालाह करने से और प्रभू का नाम सिमरने से मन भटकने से हट जाता है। 1।
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ प्रभू अपनी रजा में स्वयं ही करने-योग्य काम करता है। आप ही जीव को बख्शता है आप ही (जिस पर मेहर करे उसमें साक्षात हैं के भक्ति की) कार कमाता है। हे नानक ! गुरू को मिल के जिसके हृदय में प्रकाश होता है वह ‘नाम’ सिमर के विष-रूपी माया से पैदा हुए दुखों को जला देता है। 2।
पउड़ी ॥ माइआ वेखि न भुलु तू मनमुख मूरखा ॥ चलदिआ नालि न चलई सभु झूठु दरबु लखा ॥ अगिआनी अंधु न बूझई सिर ऊपरि जम खड़गु कलखा ॥ गुर परसादी उबरे जिन हरि रसु चखा ॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे मूर्ख ! हे मन के गुलाम ! माया को देख के गलती ना कर। यह (यहाँ से) चलने के वक्त किसी के साथ नहीं जाती। सो। सारे धन को झूठा साथी जान। (पर इस माया को देख के) मूर्ख अंधा मनुष्य नहीं समझता कि सिर पर जम की मौत की तलवार भी है (और इस माया से साथ टूटना है)। जिन मनुष्यों ने हरी-नाम का रस चखा है वह गुरू की मेहर से (माया में मोह डालने की गलती से) बच जाते हैं;
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(पर अगर कोई कद्र जानने वाला मनुष्य) गुरू में ‘स्वै’ लीन कर दे।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।