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अंग १०८७ · मारू

अंग
1087
मारू
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  1. गुण ते गुण मिलि पाईऐ जे सतिगुर माहि समाइ ॥
  2. नाम विहूणे भरमसहि आवहि जावहि नीत ॥
  3. गुर ते गिआनु पाइआ अति खड़गु करारा ॥
  4. केदारा रागा विचि जाणीऐ भाई सबदे करे पिआरु ॥
  5. सागरु देखउ डरि मरउ भै तेरै डरु नाहि ॥
  6. चड़ि बोहिथै चालसउ सागरु लहरी देइ ॥
  7. निहकंटक राजु भुंचि तू गुरमुखि सचु कमाई ॥
  8. भूली भूली मै फिरी पाधरु कहै न कोइ ॥
  9. आपे करणी कार आपि आपे करे रजाइ ॥
  10. माइआ वेखि न भुलु तू मनमुख मूरखा ॥

गुण ते गुण मिलि पाईऐ जे सतिगुर माहि समाइ ॥

अंग १०८६ से चला आ रहा अंश

गुण ते गुण मिलि पाईऐ जे सतिगुर माहि समाइ ॥
मोुलि अमोुलु न पाईऐ वणजि न लीजै हाटि ॥
नानक पूरा तोलु है कबहु न होवै घाटि ॥1॥

हिन्दी अर्थ: (पर अगर कोई कद्र जानने वाला मनुष्य) गुरू में 'स्वै' लीन कर दे। तो प्रभू के गुण गाने से। प्रभू की सिफतसालाह में जुड़ने से (प्रभू का 'नाम'-रूपी कीमती पदार्थ) मिलता है। नाम' बहुमूल्य पदार्थ है। किसी कीमत से नहीं मिल सकता। किसी दुकान से खरीदा नहीं जा सकता। हे नानक ! ('नाम' के मूल्य का) तोल तो बँधा हुआ है। वह कभी कम नहीं हो सकता (भाव। 'अपने आप को गुरू में लीन करना'- ये बँधा हुआ मूल्य है। और इससे कम कोई उद्यम 'नाम' की प्राप्ति के लिए काफी नहीं है)। 1।

नाम विहूणे भरमसहि आवहि जावहि नीत ॥

मः 4 ॥
नाम विहूणे भरमसहि आवहि जावहि नीत ॥
इकि बांधे इकि ढीलिआ इकि सुखीए हरि प्रीति ॥
नानक सचा मंनि लै सचु करणी सचु रीति ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ जो मनुष्य 'नाम' से टूटे हुए हैं वह भटकते हैं (भटकना के कारण) नित्य पैदा होते मरते हैं (भाव। 'वासना' पूरी करने के लिए जनम-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं); सो। कई जीव (इन 'वासनाओं' से) बंधे हुए हैं। कईयों ने बँधन कुछ ढीले कर लिए हैं और कई प्रभू के प्यार में रह के (बिल्कुल) सुखी हो गए हैं। हे नानक ! जो मनुष्य सदा स्थिर परमात्मा को अपने मन में पक्का कर लेता है। सदा-स्थिर नाम उसके लिए करने-योग्य काम है सदा-स्थिर नाम ही उसकी जीवन-जुगति हो जाता है। 2।

गुर ते गिआनु पाइआ अति खड़गु करारा ॥

पउड़ी ॥
गुर ते गिआनु पाइआ अति खड़गु करारा ॥
दूजा भ्रमु गड़ु कटिआ मोहु लोभु अहंकारा ॥
हरि का नामु मनि वसिआ गुर सबदि वीचारा ॥
सच संजमि मति ऊतमा हरि लगा पिआरा ॥
सभु सचो सचु वरतदा सचु सिरजणहारा ॥1॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (ज्ञान। मानो) बहुत ही तेजधार खड़ग है। यह ज्ञान गुरू से मिलता है। (जिसको मिला है उसका) माया की खातिर भटकना। मोह। लोभ। अहंकार-रूप किला (जिसमें वह घिरा हुआ था। इस ज्ञान-खड़ग से) काटा जाता है; गुरू के शबद में सुरति जोड़ने से उसके मन में परमात्मा का नाम बस जाता है। सिमरन के संजम से उसकी मति उक्तम हो जाती है। ईश्वर उसको प्यारा लगने लग जाता है; (आखिर उसकी ये हालत हो जाती है कि) सदा-स्थिर सृजनहार उसको हर जगह बसता दिखता है। 1।

केदारा रागा विचि जाणीऐ भाई सबदे करे पिआरु ॥

सलोकु मः 3 ॥
केदारा रागा विचि जाणीऐ भाई सबदे करे पिआरु ॥
सतसंगति सिउ मिलदो रहै सचे धरे पिआरु ॥
विचहु मलु कटे आपणी कुला का करे उधारु ॥
गुणा की रासि संग्रहै अवगण कढै विडारि ॥
नानक मिलिआ सो जाणीऐ गुरू न छोडै आपणा दूजै न धरे पिआरु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे भाई ! केदारा राग को (और बाकी के) रागों में तभी जानो (भाव। केदारा राग की उपमा तभी करनी चाहिए। यदि इसे गाने वाला) गुरू के शबद में प्यार करने लग जाए। वह सत्संगति से मिला रहे और सच्चे प्रभु से प्रेम करे। अंदर से अपनी मैल भी काटे और अपनी कुलों का भी उद्धार कर ले। गुणों की पूँजी इकट्ठी करे और अवगुणों को मार के निकाल दे। हे नानक ! (केदारा राग से रॅब में) जुड़ा हुआ उसे समझो जो कभी भी अपने गुरू का आसरा ना छोड़े और माया में मोह ना डाले। 1।

सागरु देखउ डरि मरउ भै तेरै डरु नाहि ॥

मः 4 ॥
सागरु देखउ डरि मरउ भै तेरै डरु नाहि ॥
गुर कै सबदि संतोखीआ नानक बिगसा नाइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ (हे प्रभू !) जब मैं (इस संसार-) समुंद्र को देखता हूँ तो डर के मारे सहम जाता हूँ (कि कैसे इसमें से बच के पार होऊँगा। पर) आपके डर में रहने से (इस संसार-समुंद्र का कोई) डर नहीं रह जाता; क्योंकि। हे नानक ! गुरू के शबद से मैं संतोख वाला बन रहा हूँ और प्रभू के नाम से मैं खिलता हूँ। 2।

चड़ि बोहिथै चालसउ सागरु लहरी देइ ॥

मः 4 ॥
चड़ि बोहिथै चालसउ सागरु लहरी देइ ॥
ठाक न सचै बोहिथै जे गुरु धीरक देइ ॥
तितु दरि जाइ उतारीआ गुरु दिसै सावधानु ॥
नानक नदरी पाईऐ दरगह चलै मानु ॥3॥

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ (संसार-) समुंद्र (तो विकारों की लहरों से) ठाठा मार रहा है पर मैं (गुरू-शबद-रूप) जहाज में चढ़ के (इस समुंद्र में से) पार हो जाऊँगा। अगर सतिगुरू हौसला दे तो इस सच्चे जहाज में चढ़ने से (यात्रा में) कोई रोक (कोई मुश्किल) नहीं आएगी। मुझे अपना गुरू सावधान दिखाई दे रहा है (मेरा दृढ़ निश्चय है कि गुरू मुझे) उस (प्रभू के) दर पर जा उतारेगा। हे नानक ! (ये गुरू का शबद जहाज) प्रभू की मेहर से मिलता है (इसकी बरकति से) प्रभू की हजूरी में आदर मिलता है। 3।

निहकंटक राजु भुंचि तू गुरमुखि सचु कमाई ॥

पउड़ी ॥
निहकंटक राजु भुंचि तू गुरमुखि सचु कमाई ॥
सचै तखति बैठा निआउ करि सतसंगति मेलि मिलाई ॥
सचा उपदेसु हरि जापणा हरि सिउ बणि आई ॥
ऐथै सुखदाता मनि वसै अंति होइ सखाई ॥
हरि सिउ प्रीति ऊपजी गुरि सोझी पाई ॥2॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे भाई !) गुरू के सन्मुख हो के सिमरन की कमाई कर (और इस तरह) निहकंटक राज का भोग कर। (क्योंकि) जो प्रभू सदा-स्थिर तख्त पर बैठ कर न्याय कर रहा है वह आपको सत्संग में मिला देगा। वहाँ नाम-सिमरन की सच्ची शिक्षा कमाने से आपकी प्रभू से (समीपता) बन आएगी। इस जीवन में सुखदाता प्रभू मन में बसेगा और अंत के समय भी साथी बनेगा। जिस मनुष्य को सतिगुरू ने समझ बख्शी उसका प्रभू के साथ प्यार बन जाता है। 2।

भूली भूली मै फिरी पाधरु कहै न कोइ ॥

सलोकु मः 1 ॥
भूली भूली मै फिरी पाधरु कहै न कोइ ॥
पूछहु जाइ सिआणिआ दुखु काटै मेरा कोइ ॥
सतिगुरु साचा मनि वसै साजनु उत ही ठाइ ॥
नानक मनु त्रिपतासीऐ सिफती साचै नाइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ बहुत समय से विछड़ी हुई मैं भटक रही हूँ। मुझे कोई सीधा सपाट रास्ता नहीं बताता। कोई जा के किसी सियाने लोगों से पूछो भला जो कोई मेरा कष्ट काट दे। हे नानक ! अगर सच्चा गुरू मन में आ बसे तो सज्जन प्रभू भी उसी जगह (भाव। हृदय में ही मिल जाता है)। प्रभू की सिफत सालाह करने से और प्रभू का नाम सिमरने से मन भटकने से हट जाता है। 1।

आपे करणी कार आपि आपे करे रजाइ ॥

मः 3 ॥
आपे करणी कार आपि आपे करे रजाइ ॥
आपे किस ही बखसि लए आपे कार कमाइ ॥
नानक चानणु गुर मिले दुख बिखु जाली नाइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ प्रभू अपनी रजा में स्वयं ही करने-योग्य काम करता है। आप ही जीव को बख्शता है आप ही (जिस पर मेहर करे उसमें साक्षात हो के भक्ति की) कार कमाता है। हे नानक ! गुरू को मिल के जिसके हृदय में प्रकाश होता है वह 'नाम' सिमर के विष-रूपी माया से पैदा हुए दुखों को जला देता है। 2।

माइआ वेखि न भुलु तू मनमुख मूरखा ॥

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पउड़ी ॥
माइआ वेखि न भुलु तू मनमुख मूरखा ॥
चलदिआ नालि न चलई सभु झूठु दरबु लखा ॥
अगिआनी अंधु न बूझई सिर ऊपरि जम खड़गु कलखा ॥
गुर परसादी उबरे जिन हरि रसु चखा ॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे मूर्ख ! हे मन के गुलाम ! माया को देख के गलती ना कर। यह (यहाँ से) चलने के वक्त किसी के साथ नहीं जाती। सो। सारे धन को झूठा साथी जान। (पर इस माया को देख के) मूर्ख अंधा मनुष्य नहीं समझता कि सिर पर जम की मौत की तलवार भी है (और इस माया से साथ टूटना है)। जिन मनुष्यों ने हरी-नाम का रस चखा है वह गुरू की मेहर से (माया में मोह डालने की गलती से) बच जाते हैं;

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1087 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी; महला ३: गुरु अमर दास जी; महला ४: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०८७ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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