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अंग 1086

अंग
1086
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
साधसंगि भजु अचुत सुआमी दरगह सोभा पावणा ॥3॥
चारि पदारथ असट दसा सिधि ॥
नामु निधानु सहज सुखु नउ निधि ॥
सरब कलिआण जे मन महि चाहहि मिलि साधू सुआमी रावणा ॥4॥
सासत सिंम्रिति बेद वखाणी ॥
जनमु पदारथु जीतु पराणी ॥
कामु क्रोधु निंदा परहरीऐ हरि रसना नानक गावणा ॥5॥
जिसु रूपु न रेखिआ कुलु नही जाती ॥
पूरन पूरि रहिआ दिनु राती ॥
जो जो जपै सोई वडभागी बहुड़ि न जोनी पावणा ॥6॥
जिस नो बिसरै पुरखु बिधाता ॥
जलता फिरै रहै नित ताता ॥
अकिरतघणै कउ रखै न कोई नरक घोर महि पावणा ॥7॥
जीउ प्राण तनु धनु जिनि साजिआ ॥
मात गरभ महि राखि निवाजिआ ॥
तिस सिउ प्रीति छाडि अन राता काहू सिरै न लावणा ॥8॥
धारि अनुग्रहु सुआमी मेरे ॥
घटि घटि वसहि सभन कै नेरे ॥
हाथि हमारै कछूऐ नाही जिसु जणाइहि तिसै जणावणा ॥9॥
जा कै मसतकि धुरि लिखि पाइआ ॥
तिस ही पुरख न विआपै माइआ ॥
नानक दास सदा सरणाई दूसर लवै न लावणा ॥10॥
आगिआ दूख सूख सभि कीने ॥
अंम्रित नामु बिरलै ही चीने ॥
ता की कीमति कहणु न जाई जत कत ओही समावणा ॥11॥
सोई भगतु सोई वड दाता ॥
सोई पूरन पुरखु बिधाता ॥
बाल सहाई सोई तेरा जो तेरै मनि भावणा ॥12॥
मिरतु दूख सूख लिखि पाए ॥
तिलु नही बधहि घटहि न घटाए ॥
सोई होइ जि करते भावै कहि कै आपु वञावणा ॥13॥
अंध कूप ते सेई काढे ॥
जनम जनम के टूटे गांढे ॥
किरपा धारि रखे करि अपुने मिलि साधू गोबिंदु धिआवणा ॥14॥
तेरी कीमति कहणु न जाई ॥
अचरज रूपु वडी वडिआई ॥
भगति दानु मंगै जनु तेरा नानक बलि बलि जावणा ॥15॥1॥14॥22॥24॥2॥14॥62॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: उस अविनाशी मालिक प्रभू का नाम गुरू की संगति में (रह के) जपा कर। प्रभू की हजूरी में (इस तरह) इज्जत मिलती है। 3। हे भाई ! अगर आप चार पदार्थ चाहता है। अगर आप अठारह सिद्धियों की अभिलाषा रखता है। यदि आपको दुनियां के नौ निधियाँ (नौ खजाने) चाहिए। यदि आपको सारे सुख चाहिए। तो गुरू को मिल के मालिक-प्रभू का सिमरन किया कर। ये हरी-नाम ही (असल) खजाना है। ये नाम ही आत्मिक अडोलता का सुख है। ये नाम ही चार-पदार्थ अठारह सिद्धियाँ और नौ निधियाँ हैं। 4। हे नानक ! (कह-) हे प्राणी ! शास्त्रों ने। स्मृतियों ने। वेदों ने कहा है कि अपने कीमती मानस जनम को सफल कर। (पर ये सफल तब ही हो सकता है यदि) जीभ से परमात्मा की सिफतसालाह गाई जाए। सिफतसालाह की बरकति से ही काम छोड़ा जा सकता है। क्रोध त्यागा जा सकता है निंदा तजी जा सकती है (और इन विकारों को त्यागने में ही जनम की सफलता है)। 5। हे भाई ! जिस परमात्मा का (क्या) रूप। रेख। कुल और जाति (है- ये बात) बताई नहीं जा सकती। जो परमात्मा दिन-रात हर वक्त सब जगह मौजूद है। उस परमात्मा का नाम जो जो मनुष्य जपता है वह बहुत भाग्यशाली बन जाता है। वह मनुष्य बार-बार जूनियों में नहीं पड़ता। 6। हे भाई ! जिस मनुष्य को सर्व-व्यापक बिसरा रहता है। वह सदा (विकारों में) जलता फिरता है। वह सदा (क्रोध से) जला भुजा रहता है। परमात्मा के किए उपकारों को भुलाने वाले उस मनुष्य को (इस बुरी आत्मिक दशा से) कोई बचा नहीं सकता। वह मनुष्य (सदा इस) भयानक नर्क में पड़ा रहता है। 7। हे नानक ! जिस परमात्मा ने जिंद दी। प्राण दिए। शरीर बनाया। धन दिया। माँ के पेट में रक्षा करके बड़ी दया की। जो मनुष्य उस परमात्मा का प्यार छोड़ के और ही पदार्थों के मोह में मस्त रहता है। वह मनुष्य किसी तरफ भी सिरे नहीं चढ़ता। 8। हे मेरे मालिक प्रभू ! (हम जीवों पर) दया किए रख। आप हरेक शरीर में बसता है। आप सब जीवों के नजदीक बसता है। हम जीवों के बस में कुछ भी नहीं। जिस मनुष्य को आप (आत्मिक जीवन की) समझ बख्शता है। वही मनुष्य यह समझ हासिल करता है। 9। हे नानक ! (कह- हे भाई !) धुर हजूरी में से जिस मनुष्य के माथे पर (प्रभू ने अच्छे भाग्यों के लेख) लिख दिए होते हैं। सिर्फ उस मनुष्य पर ही माया अपना जोर नहीं डाल सकती। हे भाई ! परमात्मा के भक्त सदा परमात्मा की शरण पड़े रहते हैं। वे किसी और को परमात्मा के बराबर का नहीं समझते। 10। हे भाई ! (जगत के) सारे दुख सारे सुख (परमात्मा ने अपने) हुकम में (आप ही) बनाए हैं। (इन दुखों से बचने के लिए) किसी विरले मनुष्य ने ही आत्मिक जीवन देने वाले हरी-नाम के साथ सांझ डाली है। हे भाई ! उस परमात्मा का मूल्य नहीं बताया जा सकता (वह परमात्मा किसी दुनियावी पदार्थ के बदले में नहीं मिलता। वैसे) हर जगह वह स्वयं ही समाया हुआ है। 11। हे भाई ! वह परमात्मा आप ही (अपने सेवक में बैठा अपनी) भगती करने वाला है। वह स्वयं ही सबसे बड़ा दातार है। वह स्वयं ही सबमें व्यापक सृजनहार है। हे प्रभू ! जो (आपका भक्त) आपके मन में (आपको) प्यारा लगता है। वही आपका बाल सखा है (वही आपको इस तरह प्यारा है जैसे कोई छोटी उम्र से एक साथ रहने वाले बालक एक-दूसरे को सारी उम्र प्यार करने वाले होते हैं)। 12। हे भाई ! मौत दुख-सुख करतार ने स्वयं ही (जीवों के लेखों में) लिख के रख दिए हैं। ना ये बढ़ाने से तिल मात्र बढ़ते हैं। ना ही कम करने से कम होते हैं। हे भाई ! जो कुछ करतार को अच्छा लगता है वही होता है। (यह) कह के (कि हम अपने आप कुछ कर सकते हैं) अपने आप को दुखी ही करना होता है। 13। उनको ही परमात्मा माया के मोह के घोर अंधकार भरे कूएँ में से निकाल लेता है। और। कई जन्मों के (अपने से) टूटे हुओं को (दोबारा अपने साथ) जोड़ लेता है। हे भाई ! परमात्मा कृपा करके जिन मनुष्यों को अपना बना लेता है। जो मनुष्य गुरू को मिल के परमात्मा का नाम सिमरते हैं।14। हे नानक ! (कह-हे प्रभू !) आपका मूल्य नहीं पाया जा सकता। आपका स्वरूप हैरान कर देने वाला है और आपकी वडिआई बड़ी है। आपका सेवक (आपके दर से) आपकी भक्ति की ख़ैर माँगता है। और आपसे सदके जाता है कुर्बान जाता है। 15। 1। 14। 22। 24। 2। 14। 62।
मारू वार महला 3
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु मः 1 ॥
विणु गाहक गुणु वेचीऐ तउ गुणु सहघो जाइ ॥
गुण का गाहकु जे मिलै तउ गुणु लाख विकाइ ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: मारू वार महला 3 सतिगुर प्रसादि॥ श्लोक महला 1॥ अगर कोई गाहक ना हो और (कोई) गुण (भाव। कोई कीमती पदार्थ) बेचें तो वह गुण सस्ते भाव में बिक जाता है। (भाव। उसकी कद्र नहीं पड़ती)। पर। यदि गुण का गाहक मिल जाए तो वह बहुत कीमती बिकता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उस अविनाशी मालिक प्रभू का नाम गुरू की संगति में (रह के) जपा कर।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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