चारि पदारथ असट दसा सिधि ॥
नामु निधानु सहज सुखु नउ निधि ॥
सरब कलिआण जे मन महि चाहहि मिलि साधू सुआमी रावणा ॥4॥
सासत सिंम्रिति बेद वखाणी ॥
जनमु पदारथु जीतु पराणी ॥
कामु क्रोधु निंदा परहरीऐ हरि रसना नानक गावणा ॥5॥
जिसु रूपु न रेखिआ कुलु नही जाती ॥
पूरन पूरि रहिआ दिनु राती ॥
जो जो जपै सोई वडभागी बहुड़ि न जोनी पावणा ॥6॥
जिस नो बिसरै पुरखु बिधाता ॥
जलता फिरै रहै नित ताता ॥
अकिरतघणै कउ रखै न कोई नरक घोर महि पावणा ॥7॥
जीउ प्राण तनु धनु जिनि साजिआ ॥
मात गरभ महि राखि निवाजिआ ॥
तिस सिउ प्रीति छाडि अन राता काहू सिरै न लावणा ॥8॥
धारि अनुग्रहु सुआमी मेरे ॥
घटि घटि वसहि सभन कै नेरे ॥
हाथि हमारै कछूऐ नाही जिसु जणाइहि तिसै जणावणा ॥9॥
जा कै मसतकि धुरि लिखि पाइआ ॥
तिस ही पुरख न विआपै माइआ ॥
नानक दास सदा सरणाई दूसर लवै न लावणा ॥10॥
आगिआ दूख सूख सभि कीने ॥
अंम्रित नामु बिरलै ही चीने ॥
ता की कीमति कहणु न जाई जत कत ओही समावणा ॥11॥
सोई भगतु सोई वड दाता ॥
सोई पूरन पुरखु बिधाता ॥
बाल सहाई सोई तेरा जो तेरै मनि भावणा ॥12॥
मिरतु दूख सूख लिखि पाए ॥
तिलु नही बधहि घटहि न घटाए ॥
सोई होइ जि करते भावै कहि कै आपु वञावणा ॥13॥
अंध कूप ते सेई काढे ॥
जनम जनम के टूटे गांढे ॥
किरपा धारि रखे करि अपुने मिलि साधू गोबिंदु धिआवणा ॥14॥
तेरी कीमति कहणु न जाई ॥
अचरज रूपु वडी वडिआई ॥
भगति दानु मंगै जनु तेरा नानक बलि बलि जावणा ॥15॥1॥14॥22॥24॥2॥14॥62॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु मः 1 ॥
विणु गाहक गुणु वेचीऐ तउ गुणु सहघो जाइ ॥
गुण का गाहकु जे मिलै तउ गुणु लाख विकाइ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उस अविनाशी मालिक प्रभू का नाम गुरू की संगति में (रह के) जपा कर।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।