Lulla Family

अंग १०८६ · मारू

अंग
1086
मारू
अंग बदलें या अंश चुनें · २ अंश

१ से १४३० तक कोई अंक लिखिए।

  1. साधसंगि भजु अचुत सुआमी दरगह सोभा पावणा ॥3॥
  2. विणु गाहक गुणु वेचीऐ तउ गुणु सहघो जाइ ॥

साधसंगि भजु अचुत सुआमी दरगह सोभा पावणा ॥3॥

अंग १०८५ से चला आ रहा अंश

साधसंगि भजु अचुत सुआमी दरगह सोभा पावणा ॥3॥
चारि पदारथ असट दसा सिधि ॥
नामु निधानु सहज सुखु नउ निधि ॥
सरब कलिआण जे मन महि चाहहि मिलि साधू सुआमी रावणा ॥4॥
सासत सिंम्रिति बेद वखाणी ॥
जनमु पदारथु जीतु पराणी ॥
कामु क्रोधु निंदा परहरीऐ हरि रसना नानक गावणा ॥5॥
जिसु रूपु न रेखिआ कुलु नही जाती ॥
पूरन पूरि रहिआ दिनु राती ॥
जो जो जपै सोई वडभागी बहुड़ि न जोनी पावणा ॥6॥
जिस नो बिसरै पुरखु बिधाता ॥
जलता फिरै रहै नित ताता ॥
अकिरतघणै कउ रखै न कोई नरक घोर महि पावणा ॥7॥
जीउ प्राण तनु धनु जिनि साजिआ ॥
मात गरभ महि राखि निवाजिआ ॥
तिस सिउ प्रीति छाडि अन राता काहू सिरै न लावणा ॥8॥
धारि अनुग्रहु सुआमी मेरे ॥
घटि घटि वसहि सभन कै नेरे ॥
हाथि हमारै कछूऐ नाही जिसु जणाइहि तिसै जणावणा ॥9॥
जा कै मसतकि धुरि लिखि पाइआ ॥
तिस ही पुरख न विआपै माइआ ॥
नानक दास सदा सरणाई दूसर लवै न लावणा ॥10॥
आगिआ दूख सूख सभि कीने ॥
अंम्रित नामु बिरलै ही चीने ॥
ता की कीमति कहणु न जाई जत कत ओही समावणा ॥11॥
सोई भगतु सोई वड दाता ॥
सोई पूरन पुरखु बिधाता ॥
बाल सहाई सोई तेरा जो तेरै मनि भावणा ॥12॥
मिरतु दूख सूख लिखि पाए ॥
तिलु नही बधहि घटहि न घटाए ॥
सोई होइ जि करते भावै कहि कै आपु वञावणा ॥13॥
अंध कूप ते सेई काढे ॥
जनम जनम के टूटे गांढे ॥
किरपा धारि रखे करि अपुने मिलि साधू गोबिंदु धिआवणा ॥14॥
तेरी कीमति कहणु न जाई ॥
अचरज रूपु वडी वडिआई ॥
भगति दानु मंगै जनु तेरा नानक बलि बलि जावणा ॥15॥1॥14॥22॥24॥2॥14॥62॥

हिन्दी अर्थ: उस अविनाशी मालिक प्रभू का नाम गुरू की संगति में (रह के) जपा कर। प्रभू की हजूरी में (इस तरह) इज्जत मिलती है। 3। हे भाई ! अगर आप चार पदार्थ चाहते हैं। अगर आप अठारह सिद्धियों की अभिलाषा रखते हैं। यदि आपको दुनियां के नौ निधियाँ (नौ खजाने) चाहिए। यदि आपको सारे सुख चाहिए। तो गुरू को मिल के मालिक-प्रभू का सिमरन किया कर। ये हरी-नाम ही (असल) खजाना है। ये नाम ही आत्मिक अडोलता का सुख है। ये नाम ही चार-पदार्थ अठारह सिद्धियाँ और नौ निधियाँ हैं। 4। हे नानक ! (कह-) हे प्राणी ! शास्त्रों ने। स्मृतियों ने। वेदों ने कहा है कि अपने कीमती मानस जनम को सफल कर। (पर ये सफल तब ही हो सकता है यदि) जीभ से परमात्मा की सिफतसालाह गाई जाए। सिफतसालाह की बरकति से ही काम छोड़ा जा सकता है। क्रोध त्यागा जा सकता है निंदा तजी जा सकती है (और इन विकारों को त्यागने में ही जनम की सफलता है)। 5। हे भाई ! जिस परमात्मा का (क्या) रूप। रेख। कुल और जाति (है- ये बात) बताई नहीं जा सकती। जो परमात्मा दिन-रात हर वक्त सब जगह मौजूद है। उस परमात्मा का नाम जो जो मनुष्य जपता है वह बहुत भाग्यशाली बन जाता है। वह मनुष्य बार-बार जूनियों में नहीं पड़ता। 6। हे भाई ! जिस मनुष्य को सर्व-व्यापक बिसरा रहता है। वह सदा (विकारों में) जलता फिरता है। वह सदा (क्रोध से) जला भुजा रहता है। परमात्मा के किए उपकारों को भुलाने वाले उस मनुष्य को (इस बुरी आत्मिक दशा से) कोई बचा नहीं सकता। वह मनुष्य (सदा इस) भयानक नर्क में पड़ा रहता है। 7। हे नानक ! जिस परमात्मा ने जिंद दी। प्राण दिए। शरीर बनाया। धन दिया। माँ के पेट में रक्षा करके बड़ी दया की। जो मनुष्य उस परमात्मा का प्यार छोड़ के और ही पदार्थों के मोह में मस्त रहता है। वह मनुष्य किसी तरफ भी सिरे नहीं चढ़ता। 8। हे मेरे मालिक प्रभू ! (हम जीवों पर) दया किए रख। आप हरेक शरीर में बसते हैं। आप सब जीवों के नजदीक बसते हैं। हम जीवों के बस में कुछ भी नहीं। जिस मनुष्य को आप (आत्मिक जीवन की) समझ बख्शते हैं। वही मनुष्य यह समझ हासिल करता है। 9। हे नानक ! (कह- हे भाई !) धुर हजूरी में से जिस मनुष्य के माथे पर (प्रभू ने अच्छे भाग्यों के लेख) लिख दिए होते हैं। सिर्फ उस मनुष्य पर ही माया अपना जोर नहीं डाल सकती। हे भाई ! परमात्मा के भक्त सदा परमात्मा की शरण पड़े रहते हैं। वे किसी और को परमात्मा के बराबर का नहीं समझते। 10। हे भाई ! (जगत के) सारे दुख सारे सुख (परमात्मा ने अपने) हुकम में (आप ही) बनाए हैं। (इन दुखों से बचने के लिए) किसी विरले मनुष्य ने ही आत्मिक जीवन देने वाले हरी-नाम के साथ सांझ डाली है। हे भाई ! उस परमात्मा का मूल्य नहीं बताया जा सकता (वह परमात्मा किसी दुनियावी पदार्थ के बदले में नहीं मिलता। वैसे) हर जगह वह स्वयं ही समाया हुआ है। 11। हे भाई ! वह परमात्मा स्वयं ही (अपने सेवक में बैठा अपनी) भगती करने वाला है। वह स्वयं ही सबसे बड़ा दातार है। वह स्वयं ही सबमें व्यापक सृजनहार है। हे प्रभू ! जो (आपका भक्त) आपके मन में (आपको) प्यारा लगता है। वही आपका बाल सखा है (वही आपको इस तरह प्यारा है जैसे कोई छोटी उम्र से एक साथ रहने वाले बालक एक-दूसरे को सारी उम्र प्यार करने वाले होते हैं)। 12। हे भाई ! मौत दुख-सुख करतार ने स्वयं ही (जीवों के लेखों में) लिख के रख दिए हैं। ना ये बढ़ाने से तिल मात्र बढ़ते हैं। ना ही कम करने से कम होते हैं। हे भाई ! जो कुछ करतार को अच्छा लगता है वही होता है। (यह) कह के (कि हम अपने आप कुछ कर सकते हैं) अपने आप को दुखी ही करना होता है। 13। उनको ही परमात्मा माया के मोह के घोर अंधकार भरे कूएँ में से निकाल लेता है। और। कई जन्मों के (अपने से) टूटे हुओं को (दोबारा अपने साथ) जोड़ लेता है। हे भाई ! परमात्मा कृपा करके जिन मनुष्यों को अपना बना लेता है। जो मनुष्य गुरू को मिल के परमात्मा का नाम सिमरते हैं।14। हे नानक ! (कह-हे प्रभू !) आपका मूल्य नहीं पाया जा सकता। आपका स्वरूप हैरान कर देने वाला है और आपकी वडिआई बड़ी है। आपका सेवक (आपके दर से) आपकी भक्ति की ख़ैर माँगता है। और आपसे सदके जाता है कुर्बान जाता है। 15। 1। 14। 22। 24। 2। 14। 62।

विणु गाहक गुणु वेचीऐ तउ गुणु सहघो जाइ ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

मारू वार महला 3
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु मः 1 ॥
विणु गाहक गुणु वेचीऐ तउ गुणु सहघो जाइ ॥
गुण का गाहकु जे मिलै तउ गुणु लाख विकाइ ॥

हिन्दी अर्थ: मारू वार महला 3 सतिगुर प्रसादि॥ श्लोक महला 1॥ अगर कोई गाहक ना हो और (कोई) गुण (भाव। कोई कीमती पदार्थ) बेचें तो वह गुण सस्ते भाव में बिक जाता है। (भाव। उसकी कद्र नहीं पड़ती)। पर। यदि गुण का गाहक मिल जाए तो वह बहुत कीमती बिकता है।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1086 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी; महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०८६ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

English