आदि अंति मधि प्रभु सोई ॥ आपे करता करे सु होई ॥ भ्रमु भउ मिटिआ साधसंग ते दालिद न कोई घालका ॥6॥ ऊतम बाणी गाउ गोुपाला ॥ साधसंगति की मंगहु रवाला ॥ बासन मेटि निबासन होईऐ कलमल सगले जालका ॥7॥ संता की इह रीति निराली ॥ पारब्रहमु करि देखहि नाली ॥ सासि सासि आराधनि हरि हरि किउ सिमरत कीजै आलका ॥8॥ जह देखा तह अंतरजामी ॥ निमख न विसरहु प्रभ मेरे सुआमी ॥ सिमरि सिमरि जीवहि तेरे दासा बनि जलि पूरन थालका ॥9॥ तती वाउ न ता कउ लागै ॥ सिमरत नामु अनदिनु जागै ॥ अनद बिनोद करे हरि सिमरनु तिसु माइआ संगि न तालका ॥10॥ रोग सोग दूख तिसु नाही ॥ साधसंगि हरि कीरतनु गाही ॥ आपणा नामु देहि प्रभ प्रीतम सुणि बेनंती खालका ॥11॥ नाम रतनु तेरा है पिआरे ॥ रंगि रते तेरै दास अपारे ॥ तेरै रंगि रते तुधु जेहे विरले केई भालका ॥12॥ तिन की धूड़ि मांगै मनु मेरा ॥ जिन विसरहि नाही काहू बेरा ॥ तिन कै संगि परम पदु पाई सदा संगी हरि नालका ॥13॥ साजनु मीतु पिआरा सोई ॥ एकु द्रिड़ाए दुरमति खोई ॥ कामु क्रोधु अहंकारु तजाए तिसु जन कउ उपदेसु निरमालका ॥14॥ तुधु विणु नाही कोई मेरा ॥ गुरि पकड़ाए प्रभ के पैरा ॥ हउ बलिहारी सतिगुर पूरे जिनि खंडिआ भरमु अनालका ॥15॥ सासि सासि प्रभु बिसरै नाही ॥ आठ पहर हरि हरि कउ धिआई ॥ नानक संत तेरै रंगि राते तू समरथु वडालका ॥16॥4॥13॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: उन्हें (जगत के) आदि में। अब। और आखिर में (कायम रहने वाला) वह परमात्मा ही दिखता है। (उनको निश्चय होता है कि) करतार स्वयं ही जो कुछ करता है वही होता है। हे भाई ! साध-संगत की बरकति से जिन मनुष्यों की हरेक भटकना। जिनका हरेक डर दूर हो जाता है। कोई भी दुख-कलेश उनकी आत्मिक मौत नहीं ला सकते। 6। हे भाई ! जीवन को ऊँचा करने वाली सिफत-सालाह की बाणी गाया करो। (हर वक्त) साध-संगति की चरण-धूड़ माँगा करो। (इस तरह अपने अंदर की) सारी वासनाएं मिटा के वासना-रहित हो जाया जाता है। और अपने सारे पाप जला लिए जाते हैं। 7। हे भाई ! संत जनों की (दुनियां के लोगों से) ये अलग ही जीवन चाह है। कि वह परमात्मा को (सदा अपने) साथ ही बसता देखते हैं। हे भाई ! संत जन हरेक सांस के साथ परमात्मा की आराधना करते रहते हैं (वे जानते हैं कि) परमात्मा का नाम सिमरने से कभी आलस नहीं करना चाहिए। 8। हे हरेक के दिल की जानने वाले ! मैं जिधर देखता हूँ। उधर (मुझे आप ही दिखता है)। हे मेरे मालिक प्रभू ! (मेहर कर। मुझे) आँख झपकनें जितने समय के लिए भी ना बिसर। हे प्रभू ! आपके दास आपको सिमर-सिमर के आत्मिक जीवन हासिल करते रहते हैं। हे प्रभू ! आप जंगल में जल में थल में (हर जगह बसता है)। 9। उसको रक्ती भर भी कोई दुख नहीं पोह सकता। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरते हुए हर वक्त (विकारों के हमलों से) सुचेत रहता है। वह मनुष्य (ज्यों-ज्यों) परमात्मा के नाम का सिमरन करता है (त्यों-त्यों) आत्मिक आनंद पाता है। उसका माया के साथ गहरा संबंध नहीं बनता। 10। हे भाई ! उस उस मनुष्य को कोई रोग-सोग दुख छू नहीं सकते। जो गुरू की संगति में टिक के परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाते रहते हैं। हे प्रीतम प्रभू ! हे ख़लकत के पैदा करने वाले ! (मेरी भी) विनती सुन। (मुझे भी) अपना नाम दे। 11। हे प्यारे ! आपका नाम बहुत ही कीमती पदार्थ है। हे बेअंत प्रभू ! आपके दास आपके प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। हे प्रभू जो मनुष्य आपके प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। वे आपके जैसे ही हैं जाते हैं। पर ऐसे बंदे बहुत विरले मिलते हैं। 12। मेरा मन उनके चरणों की धूल माँगता है। हे प्रभू ! जिन मनुष्यों को आप किसी भी वक्त भूलता नहीं। हे भाई ! (ऐसे) उन मनुष्यों की संगति में मैं भी (उस प्रभू की मेहर से) ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर सकूँगा। और परमात्मा (मेरा) सदा साथी बना रहेगा। 13। हे भाई ! वही मनुष्य मेरा प्यारा सज्जन है। मित्र है। जो मेरी खोटी मति दूर कर के (मेरे हृदय में) एक (परमात्मा की याद) को पक्का कर दे। जो मुझमें से काम क्रोध अहंकार (को) हटा दे। हे भाई ! उस मनुष्य को ऐसा उपदेश (उठता है जो सुनने वालों को) पवित्र कर देता है। 14। हे प्रभू ! आपके बिना मेरा कोई (सहारा) नहीं। हे भाई ! गुरू ने मुझे प्रभू के पैर पकड़ाए हैं। मैं पूरे गुरू के सदके जाता हूँ जिसने मेरी भटकना नाश की है। जिसने विकारों के तूफान को थाम लिया है। 15। हरेक सांस के साथ (उसको सिमरता रहूँ। मुझे किसी भी वक्त वह) भूले ना। हे भाई ! (अगर प्रभू की मेहर हो तो) मैं आठों पहर प्रभू का ध्यान धरता रहूँ। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) आप सब ताकतों का मालिक है। आप सबसे बड़ा है। आपके संत आपके प्रेम-रंग में सदा रंगे रहते हैं। 16। 4। 13।
मारू महला 5 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ चरन कमल हिरदै नित धारी ॥ गुरु पूरा खिनु खिनु नमसकारी ॥ तनु मनु अरपि धरी सभु आगै जग महि नामु सुहावणा ॥1॥ सो ठाकुरु किउ मनहु विसारे ॥ जीउ पिंडु दे साजि सवारे ॥ सासि गरासि समाले करता कीता अपणा पावणा ॥2॥ जा ते बिरथा कोऊ नाही ॥ आठ पहर हरि रखु मन माही ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! (अगर प्रभू मेहर करे तो) मैं (गुरू के) सुंदर चरण सदा (अपने) हृदय में टिकाए रखूँ। पूरे गुरू को हरेक छिन नमस्कार करता रहूँ। अपना तन अपना मन सब कुछ (गुरू के) आगे भेटा करके रख दूँ (क्योंकि गुरू से ही परमात्मा का नाम मिलता है। और) नाम ही जगत में (जीव को) सुंदर बनाता है। 1। हे भाई ! आप उस मालिक प्रभू को (अपने) मन से क्यों भुलाता है। जो जिंद दे के शरीर दे के पैदा करके सुंदर बनाता है। हरेक साँस के साथ ग्रास के साथ (खाते हुए साँस लेते हुए) करतार को अपने हृदय में संभाल के रख। अपनी ही की हुई कमाई का फल मिलता है। 2। हे भाई ! जिस (करतार के दर) से कभी कोई ख़ाली नहीं मुड़ता। उसको आठों पहर संभाल के रख।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा।
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।