अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: हे ख़ुदा के बँदे ! जो मनुष्य सदा कायम रहने वाले अल्लाह की बंदगी करता है वह है (असल) काज़ी। जो मनुष्य अपने दिल को पवित्र रखने का यतन करता रहता है वही है (असल) हॅज करने वाला। जो मनुष्य (अपने अंदर से) विकारों को दूर करता है वह (असल) मुल्ला है। जिस मनुष्य को ख़ुदा की सिफत-सालाह का सहारा है वह (असल) फ़कीर। 6। हे ख़ुदा के बँदे ! हर वक्त हर समय ख़ालक को मौला को अपने दिल में याद करता रह। हर वक्त ख़ुदा को याद करते रहो- यही है तसब्बी। वह ख़ुदा दसों इन्द्रियों को वश में ला सकता है। हे ख़ुदा के बँदे ! अच्छा स्वभाव और (विकारों से) मज़बूती से परहेज़ ही सुन्नत (समझ)। 7। हे अल्लाह के बँदे ! सारी रचना का अपने दिल में नाशवंत जान। हे भाई ! ये टॅबर-टोर (परिवार आदि) का मोह सब बँधन (में फसाने वाले ही) हैं। शाह। पातशाह। अमीर लोक सब नाशवंत हैं। सिर्फ ख़ुदा का दर ही सदा कायम रहने वाला है। 8। हे ख़ुदा के बँदे ! (आपकी उम्र के) ये पाँच वक्त आपके वास्ते बड़े ही लाभदायक हैं सकते हैं (अगर आप) पहले वक्त में रॅब की सिफत सलाह करता रहे। अगर संतोष आपकी दूसरी निमाज़ हैं। निमाज़ के तीसरे वक्त में आप विनम्रता धारण करे। और चौथे वक्त में आप सबका भला माँगे। अगर पाँचवें वक्त में आप कामादिक पाँचों को ही वश में रखे (भाव। रॅब की सिफतसालाह। संतोष। विनम्रता। सबका भला माँगना और कामादिक पाँचों को वश में रखना- ये पाँच हैं आत्मिक जीवन की पाँच निमाज़ें। और ये जीवन को बहुत ऊँचा करती हैं)। 9। हे अल्ला के बँदे ! सारी सृष्टि में एक ही ख़ुदा को बसता जान- इसको आप हर वक्त अपना रॅबी सलाम का पाठ बनाए रख। बुरे काम करने छोड़ दे- ये पानी का लोटा आप अपने हाथ में पकड़ (शरीर की स्वच्छता के लिए)। ये यकीन बना कि सारी ख़लकत का एक ही ख़ुदा है- ये बाँग सदा दिया कर। हे फकीर सांई ! ख़ुदा अच्छा पुत्र बनने का यतन किया कर-ये सिंज्ञीं बजाया कर। 10। हे ख़ुदा के बँदे ! हॅक की कमाई करा कर- ये है ‘हलाल’। ये खाना खाया कर। (दिल में से भेद भाव निकाल के) दिल को दरिया बनाने का यतन कर। (इस तरह) दिल की (विकारों की) मैल धोया कर। हे अल्लाह के बँदे ! जो मनुष्य अपने गुरू-पीर (के हुकम) को पहचानता है। वह बहिश्त का हकदार बन जाता है। अज़राइल उसको दोज़क में नहीं फैंकता। 11। हे ख़ुदा के बँदे ! अपने इस शरीर को। जिसके द्वारा सदा अच्छे-बुरे काम किए जाते हैं अपनी वफ़ादार औरत (पतिव्रता स्त्री) बना। (और। विकारों के रंग-तमाशों में डूबने की जगह। इस पतिव्रता स्त्री के माध्यम से) रॅबी मिलाप के रंग-तमाशे भोगा कर। हे अल्ला के बँदे ! (विकारों में) मलीन हो रहे मन को पवित्र करने का यतन कर- यही है रॅबी मिलाप पैदा करने वाली शरह की किताब। (सुन्नत। लबें कटाने आदि की शरह छोड़ के) अपनी शकल को ज्यों का त्यों रख- यह (लोक-परलोक में) इज्जत-सम्मान प्राप्त करने का वसीला बन जाता है। 12। हे ख़ुदा के बँदे ! (असल) मुसलमान वह है जो मोम जैसे नर्म दिल वाला होता है और जो अपने दिल के अंदरूनी (विकारों की) मैल धो देता है। (वह मुसलमान) दुनियावी रंग-तमाशों के नजदीक नहीं फटकता (जो इस तरह पवित्र रहता है) जैसे फूल रेशम घी और मृगछाला पवित्र (रहते हैं)। 13। हे ख़ुदा के बँदे ! जिस मनुष्य पर मेहरवान (मौला) की हर वक्त मेहर रहती है। (विकारों के मुकाबले पर) वही मनुष्य सूरमा मर्द (साबित होता) है। वही है (असल) शेख मसाइक और हाज़ी। वही है (असल) ख़ुदा का बँदा जिस पर ख़ुदा की मेहर की निगाह रहती है। 14। हे नानक ! (कह-) हे ख़ुदा के बँदे ! कादर की कुदरति को। बख्शिंद मालिक के रचे हुए जगत को। बेअंत गहरे रहिम-दिल ख़ुदा की मुहब्बत और सिफत-सालाह को। सदा कायम रहने वाले प्रभू के हुकम को। सदा कायम रहने वाले ख़ुदा को समझ के माया के मोह के बँधनों से मुक्ति मिल जाती है। और। संसार-समुंद्र से पार लांघा जाता है। 15। 3। 12।
मारू महला 5 ॥ पारब्रहम सभ ऊच बिराजे ॥ आपे थापि उथापे साजे ॥ प्रभ की सरणि गहत सुखु पाईऐ किछु भउ न विआपै बाल का ॥1॥ गरभ अगनि महि जिनहि उबारिआ ॥ रकत किरम महि नही संघारिआ ॥ अपना सिमरनु दे प्रतिपालिआ ओहु सगल घटा का मालका ॥2॥ चरण कमल सरणाई आइआ ॥ साधसंगि है हरि जसु गाइआ ॥ जनम मरण सभि दूख निवारे जपि हरि हरि भउ नही काल का ॥3॥ समरथ अकथ अगोचर देवा ॥ जीअ जंत सभि ता की सेवा ॥ अंडज जेरज सेतज उतभुज बहु परकारी पालका ॥4॥ तिसहि परापति होइ निधाना ॥ राम नाम रसु अंतरि माना ॥ करु गहि लीने अंध कूप ते विरले केई सालका ॥5॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे भाई ! परमात्मा सबसे ऊँचे (आत्मिक) ठिकाने पर टिका रहता है। वह खुद ही (सबको) पैदा करके आप ही नाश करता है। वह स्वयं ही रचना रचता है। हे भाई ! उस परमात्मा का आसरा लेने से आत्मिक आनंद प्राप्त हुआ रहता है। माया के मोह का डर तिल मात्र भी अपना जोर नहीं डाल सकता। 1। हे भाई ! जिस परमात्मा ने (जीवों को) माँ की पेट की आग में बचाए रखा। जिसने माँ का लहू के कृमियों के बीच (जीव को) मरने ना दिया उसने (तब) अपने (नाम का) सिमरन दे के रक्षा की। हे भाई ! वह प्रभू सारे जीवों का मालिक है। 2। हे भाई ! जो मनुष्य प्रभू के सोहणें चरणों की शरण में आ जाता है। जो मनुष्य साध-संगति में (रह के) परमात्मा की सिफतसालाह करता है। परमात्मा उसके सारी उम्र के दुख दूर कर देता है। परमात्मा का नाम जप-जप के उसको (आत्मिक) मौत का डर नहीं रह जाता। 3। हे भाई ! परमात्मा सब ताकतों का मालिक है। उसका स्वरूप सही तरह से बयान नहीं किया जा सकता। वह ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच से परे है। वह नूर ही नूर है। सारे जीव-जंतुओं को उसी का ही आसरा है। हे भाई ! अंडज-जेरज-सेतज-उत्भुज -इन चारों ही खाणियों के जीवों को वह कई तरीकों से पालने वाला है। 4। हे भाई ! उस-उस मनुष्य को ही (नाम का) खजाना मिलता है। वही मनुष्य परमात्मा के नाम का आनंद अपने अंदर उठाते हैं। जिनको (उनका) हाथ पकड़ कर (परमातमा माया के मोह के) अंधे कूएँ में से निकाल लेता है। पर। हे भाई ! ऐसे कोई विरले ही संत होते हैं। 5।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे ख़ुदा के बँदे ! जो मनुष्य सदा कायम रहने वाले अल्लाह की बंदगी करता है वह है (असल) काज़ी।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।