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अंग १०८४ · मारू

अंग
1084
मारू
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  1. सचु कमावै सोई काजी ॥
  2. पारब्रहम सभ ऊच बिराजे ॥

सचु कमावै सोई काजी ॥

अंग १०८३ से चला आ रहा अंश

सचु कमावै सोई काजी ॥
जो दिलु सोधै सोई हाजी ॥
सो मुला मलऊन निवारै सो दरवेसु जिसु सिफति धरा ॥6॥
सभे वखत सभे करि वेला ॥ खालकु यादि दिलै महि मउला ॥
तसबी यादि करहु दस मरदनु सुंनति सीलु बंधानि बरा ॥7॥
दिल महि जानहु सभ फिलहाला ॥
खिलखाना बिरादर हमू जंजाला ॥
मीर मलक उमरे फानाइआ एक मुकाम खुदाइ दरा ॥8॥
अवलि सिफति दूजी साबूरी ॥
तीजै हलेमी चउथै खैरी ॥
पंजवै पंजे इकतु मुकामै एहि पंजि वखत तेरे अपरपरा ॥9॥
सगली जानि करहु मउदीफा ॥
बद अमल छोडि करहु हथि कूजा ॥
खुदाइ एकु बुझि देवहु बांगां बुरगू बरखुरदार खरा ॥10॥
हकु हलालु बखोरहु खाणा ॥
दिल दरीआउ धोवहु मैलाणा ॥
पीरु पछाणै भिसती सोई अजराईलु न दोज ठरा ॥11॥
काइआ किरदार अउरत यकीना ॥
रंग तमासे माणि हकीना ॥
नापाक पाकु करि हदूरि हदीसा साबत सूरति दसतार सिरा ॥12॥
मुसलमाणु मोम दिलि होवै ॥
अंतर की मलु दिल ते धोवै ॥
दुनीआ रंग न आवै नेड़ै जिउ कुसम पाटु घिउ पाकु हरा ॥13॥
जा कउ मिहर मिहर मिहरवाना ॥
सोई मरदु मरदु मरदाना ॥
सोई सेखु मसाइकु हाजी सो बंदा जिसु नजरि नरा ॥14॥
कुदरति कादर करण करीमा ॥
सिफति मुहबति अथाह रहीमा ॥
हकु हुकमु सचु खुदाइआ बुझि नानक बंदि खलास तरा ॥15॥3॥12॥

हिन्दी अर्थ: हे ख़ुदा के बँदे ! जो मनुष्य सदा कायम रहने वाले अल्लाह की बंदगी करता है वह है (असल) काज़ी। जो मनुष्य अपने दिल को पवित्र रखने का यतन करता रहता है वही है (असल) हॅज करने वाला। जो मनुष्य (अपने अंदर से) विकारों को दूर करता है वह (असल) मुल्ला है। जिस मनुष्य को ख़ुदा की सिफत-सालाह का सहारा है वह (असल) फ़कीर। 6। हे ख़ुदा के बँदे ! हर वक्त हर समय ख़ालक को मौला को अपने दिल में याद करता रह। हर वक्त ख़ुदा को याद करते रहो- यही है तसब्बी। वह ख़ुदा दसों इन्द्रियों को वश में ला सकता है। हे ख़ुदा के बँदे ! अच्छा स्वभाव और (विकारों से) मज़बूती से परहेज़ ही सुन्नत (समझ)। 7। हे अल्लाह के बँदे ! सारी रचना का अपने दिल में नाशवंत जान। हे भाई ! ये टॅबर-टोर (परिवार आदि) का मोह सब बँधन (में फसाने वाले ही) हैं। शाह। पातशाह। अमीर लोक सब नाशवंत हैं। सिर्फ ख़ुदा का दर ही सदा कायम रहने वाला है। 8। हे ख़ुदा के बँदे ! (आपकी उम्र के) ये पाँच वक्त आपके वास्ते बड़े ही लाभदायक हो सकते हैं (अगर आप) पहले वक्त में रॅब की सिफत सलाह करता रहे। अगर संतोष आपकी दूसरी निमाज़ हैं। निमाज़ के तीसरे वक्त में आप विनम्रता धारण करे। और चौथे वक्त में आप सबका भला माँगे। अगर पाँचवें वक्त में आप कामादिक पाँचों को ही वश में रखे (भाव। रॅब की सिफतसालाह। संतोष। विनम्रता। सबका भला माँगना और कामादिक पाँचों को वश में रखना- ये पाँच हैं आत्मिक जीवन की पाँच निमाज़ें। और ये जीवन को बहुत ऊँचा करती हैं)। 9। हे अल्ला के बँदे ! सारी सृष्टि में एक ही ख़ुदा को बसता जान- इसको आप हर वक्त अपना रॅबी सलाम का पाठ बनाए रख। बुरे काम करने छोड़ दे- ये पानी का लोटा आप अपने हाथ में पकड़ (शरीर की स्वच्छता के लिए)। ये यकीन बना कि सारी ख़लकत का एक ही ख़ुदा है- ये बाँग सदा दिया कर। हे फकीर सांई ! ख़ुदा अच्छा पुत्र बनने का यतन किया कर-ये सिंज्ञीं बजाया कर। 10। हे ख़ुदा के बँदे ! हॅक की कमाई करा कर- ये है 'हलाल'। ये खाना खाया कर। (दिल में से भेद भाव निकाल के) दिल को दरिया बनाने का यतन कर। (इस तरह) दिल की (विकारों की) मैल धोया कर। हे अल्लाह के बँदे ! जो मनुष्य अपने गुरू-पीर (के हुकम) को पहचानता है। वह बहिश्त का हकदार बन जाता है। अज़राइल उसको दोज़क में नहीं फैंकता। 11। हे ख़ुदा के बँदे ! अपने इस शरीर को। जिसके द्वारा सदा अच्छे-बुरे काम किए जाते हैं अपनी वफ़ादार औरत (पतिव्रता स्त्री) बना। (और। विकारों के रंग-तमाशों में डूबने की जगह। इस पतिव्रता स्त्री के माध्यम से) रॅबी मिलाप के रंग-तमाशे भोगा कर। हे अल्ला के बँदे ! (विकारों में) मलीन हो रहे मन को पवित्र करने का यतन कर- यही है रॅबी मिलाप पैदा करने वाली शरह की किताब। (सुन्नत। लबें कटाने आदि की शरह छोड़ के) अपनी शकल को ज्यों का त्यों रख- यह (लोक-परलोक में) इज्जत-सम्मान प्राप्त करने का वसीला बन जाता है। 12। हे ख़ुदा के बँदे ! (असल) मुसलमान वह है जो मोम जैसे नर्म दिल वाला होता है और जो अपने दिल के अंदरूनी (विकारों की) मैल धो देता है। (वह मुसलमान) दुनियावी रंग-तमाशों के नजदीक नहीं फटकता (जो इस तरह पवित्र रहता है) जैसे फूल रेशम घी और मृगछाला पवित्र (रहते हैं)। 13। हे ख़ुदा के बँदे ! जिस मनुष्य पर मेहरवान (मौला) की हर वक्त मेहर रहती है। (विकारों के मुकाबले पर) वही मनुष्य सूरमा मर्द (साबित होता) है। वही है (असल) शेख मसाइक और हाज़ी। वही है (असल) ख़ुदा का बँदा जिस पर ख़ुदा की मेहर की निगाह रहती है। 14। हे नानक ! (कह-) हे ख़ुदा के बँदे ! कादर की कुदरति को। बख्शिंद मालिक के रचे हुए जगत को। बेअंत गहरे रहिम-दिल ख़ुदा की मुहब्बत और सिफत-सालाह को। सदा कायम रहने वाले प्रभू के हुकम को। सदा कायम रहने वाले ख़ुदा को समझ के माया के मोह के बँधनों से मुक्ति मिल जाती है। और। संसार-समुंद्र से पार लांघा जाता है। 15। 3। 12।

पारब्रहम सभ ऊच बिराजे ॥

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मारू महला 5 ॥
पारब्रहम सभ ऊच बिराजे ॥
आपे थापि उथापे साजे ॥
प्रभ की सरणि गहत सुखु पाईऐ किछु भउ न विआपै बाल का ॥1॥
गरभ अगनि महि जिनहि उबारिआ ॥
रकत किरम महि नही संघारिआ ॥
अपना सिमरनु दे प्रतिपालिआ ओहु सगल घटा का मालका ॥2॥
चरण कमल सरणाई आइआ ॥
साधसंगि है हरि जसु गाइआ ॥
जनम मरण सभि दूख निवारे जपि हरि हरि भउ नही काल का ॥3॥
समरथ अकथ अगोचर देवा ॥
जीअ जंत सभि ता की सेवा ॥
अंडज जेरज सेतज उतभुज बहु परकारी पालका ॥4॥
तिसहि परापति होइ निधाना ॥
राम नाम रसु अंतरि माना ॥
करु गहि लीने अंध कूप ते विरले केई सालका ॥5॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे भाई ! परमात्मा सबसे ऊँचे (आत्मिक) ठिकाने पर टिका रहता है। वह खुद ही (सबको) पैदा करके आप ही नाश करता है। वह स्वयं ही रचना रचता है। हे भाई ! उस परमात्मा का आसरा लेने से आत्मिक आनंद प्राप्त हुआ रहता है। माया के मोह का डर तिल मात्र भी अपना जोर नहीं डाल सकता। 1। हे भाई ! जिस परमात्मा ने (जीवों को) माँ की पेट की आग में बचाए रखा। जिसने माँ का लहू के कृमियों के बीच (जीव को) मरने ना दिया उसने (तब) अपने (नाम का) सिमरन दे के रक्षा की। हे भाई ! वह प्रभू सारे जीवों का मालिक है। 2। हे भाई ! जो मनुष्य प्रभू के सोहणें चरणों की शरण में आ जाता है। जो मनुष्य साध-संगति में (रह के) परमात्मा की सिफतसालाह करता है। परमात्मा उसके सारी उम्र के दुख दूर कर देता है। परमात्मा का नाम जप-जप के उसको (आत्मिक) मौत का डर नहीं रह जाता। 3। हे भाई ! परमात्मा सब ताकतों का मालिक है। उसका स्वरूप सही तरह से बयान नहीं किया जा सकता। वह ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच से परे है। वह नूर ही नूर है। सारे जीव-जंतुओं को उसी का ही आसरा है। हे भाई ! अंडज-जेरज-सेतज-उत्भुज -इन चारों ही खाणियों के जीवों को वह कई तरीकों से पालने वाला है। 4। हे भाई ! उस-उस मनुष्य को ही (नाम का) खजाना मिलता है। वही मनुष्य परमात्मा के नाम का आनंद अपने अंदर उठाते हैं। जिनको (उनका) हाथ पकड़ कर (परमातमा माया के मोह के) अंधे कूएँ में से निकाल लेता है। पर। हे भाई ! ऐसे कोई विरले ही संत होते हैं। 5।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1084 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०८४ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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