मिरत लोक पइआल समीपत असथिर थानु जिसु है अभगा ॥12॥ पतित पावन दुख भै भंजनु ॥ अहंकार निवारणु है भव खंडनु ॥ भगती तोखित दीन क्रिपाला गुणे न कित ही है भिगा ॥13॥ निरंकारु अछल अडोलो ॥ जोति सरूपी सभु जगु मउलो ॥ सो मिलै जिसु आपि मिलाए आपहु कोइ न पावैगा ॥14॥ आपे गोपी आपे काना ॥ आपे गऊ चरावै बाना ॥ आपि उपावहि आपि खपावहि तुधु लेपु नही इकु तिलु रंगा ॥15॥ एक जीह गुण कवन बखानै ॥ सहस फनी सेख अंतु न जानै ॥ नवतन नाम जपै दिनु राती इकु गुणु नाही प्रभ कहि संगा ॥16॥ ओट गही जगत पित सरणाइआ ॥ भै भइआनक जमदूत दुतर है माइआ ॥ होहु क्रिपाल इछा करि राखहु साध संतन कै संगि संगा ॥17॥ द्रिसटिमान है सगल मिथेना ॥ इकु मागउ दानु गोबिद संत रेना ॥ मसतकि लाइ परम पदु पावउ जिसु प्रापति सो पावैगा ॥18॥ जिन कउ क्रिपा करी सुखदाते ॥ तिन साधू चरण लै रिदै पराते ॥ सगल नाम निधानु तिन पाइआ अनहद सबद मनि वाजंगा ॥19॥ किरतम नाम कथे तेरे जिहबा ॥ सति नामु तेरा परा पूरबला ॥ कहु नानक भगत पए सरणाई देहु दरसु मनि रंगु लगा ॥20॥ तेरी गति मिति तूहै जाणहि ॥ तू आपे कथहि तै आपि वखाणहि ॥ नानक दासु दासन को करीअहु हरि भावै दासा राखु संगा ॥21॥2॥11॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: मातृ लोक में। पाताल में (सब जीवों के) नजदीक है। उसकी जगह हमेशा कायम रहने वाली है। कभी टूटने वाली नहीं। 12। हे भाई ! परमात्मा विकारियों को पवित्र करने वाला है। (जीवों के) सारे दुख सारे डर दूर करने वाला है। अहंकार दूर करने वाला है और जनम-मरण का चक्कर नाश करने वाला है। हे भाई ! दीनों पर कृपा करने वाला प्रभू भक्ति से खुश होता है। किसी भी अन्य गुण से नहीं पतीजता। 13। हे भाई ! आकार-रहित परमात्मा को माया छल नहीं सकती। (माया के हमलों के आगे) वह डोलने वाला नहीं। वह निरा नूर ही नूर है (उसके नूर से) सारा जगत खिल रहा है। (उस परमात्मा को) वही मनुष्य (ही) मिल सकता है। जिसको वह स्वयं मिलाता है। (उसकी मेहर के बिना निरे) अपने उद्यम से कोई भी मनुष्य उसको मिल नहीं सकता। 14। हे भाई ! परमात्मा स्वयं ही गोपियाँ है। स्वयं ही कृष्ण है। प्रभू खुद ही गऊओं को वृन्दावन में चराता है । हे प्रभू ! आप स्वयं ही (जीवों को) पैदा करता है। स्वयं ही नाश करता है। दुनिया के रंग-तमाशों का आपके ऊपर तिल भर भी असर नहीं होता। 15। हे प्रभू ! (मेरी) एक जीभ (आपके) कौन-कौन से गुण बयान कर सकती है। हजार फनों वाला शेषनाग भी (आपके गुणों का) अंत नहीं जानता। वह दिन-रात (आपके) नए-नए नाम जपता है। पर। हे प्रभू ! वह आपका एक भी गुण बयान नहीं कर सकता। 16। हे जगत के पिता ! मैंने आपकी ओट ली है। मैं आपकी शरण आया हूँ। जमदूत बड़े डरावने हैं। बड़े डर दे रहे हैं। माया (एक ऐसा समुंद्र है जिस) में से पार लांघना मुश्किल है। हे प्रभू ! दयावान हो। मुझे कृपा करके साध-संगति में रख। 17। हे गोबिंद ! ये दिखाई देता पसारा सब नाशवंत है। मैं (आपसे) एक (यह) दान माँगता हूँ (कि मुझे) संतजनों की चरण-धूड़ (मिले)। (ये धूड़) मैं (अपने) माथे पर लगा के सबसे उच्च दर्जा हासिल करूँ। जिस के भाग्यों में तूने जिस चरण-धूड़ की प्राप्ति लिखी है वही हासिल कर सकता है। 18। हे सुखों के देने वाले ! जिन पर आप मेहर करता है वह गुरू के चरणों को अपने हृदय में परो लेते हैं। उनको सारे खजानों से श्रेष्ठ नाम-खजाना मिल जाता है। उनके मन में (जैसे) एक-रस बाजे बजने लगते हैं। 19। हे प्रभू ! (हमारी जीवों की) जीभ आपके वह नाम उचारती है जो नाम (आपके गुण देख-देख के जीवों ने) बनाए हुए हैं। पर ‘सतिनामु’ आपका आदि कदीमी का नाम है (भाव। आप ‘अस्तित्व वाला’ है। आपका यह ‘अस्तित्व’ जगत-रचना से पहले भी मौजूद था)। हे नानक ! कह- (हे प्रभू !) आपके भगत आपकी शरण पड़े रहते हैं। आप उनको दर्शन देता है। उनके मन में आनंद बना रहता है। 20। हे प्रभू ! आप कैसा है और कितना बड़ा है- ये बात आप स्वयं ही जानता है। अपनी ‘गति मिति’ आप बता सकता है और खुद ही बयान करता है। हे प्रभू ! नानक को दासों का दास बनाए रख। और। हे हरी ! अगर आपकी मेहर हैं तो (नानक को) अपने दासों की संगति में रख। 21। 2। 11।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे अल्लाह के बँदे ! हे अपहुँच रॅब के बंदे ! हे ख़ुदा के बंदे ! (निरे) दुनिया वाले ख्याल छोड़ दे। (निरे) दुनियावी झमेले छोड़ दे। रॅब के फकीरों के पैरों की खाक हो के (दुनिया में) मुसाफिर बना रह। इस तरह का फकीर रॅब के दर पर कबूल हो जाता है। 1। हे ख़ुदा के बंदे ! सदा कायम रहने वाले रॅब के नाम (की याद) को (अपनी) निमाज़ बना। रॅब के ऊपर भरोसा – ये आपका मुसल्ला हैं। हे ख़ुदा के फकीर ! (अपने अंदर से) मन का फुरना मार के खत्म कर दे- इसको डंडा बना। (आपका यह) शरीर (आपकी) मस्जिद हैं। (आपका) मन (उस मस्जिद में) मुल्ला (बना रहे)। (इस मन को सदा) पवित्र और साफ रख- ये आपके लिए ख़ुदाई कलमा है। 2। हे ख़ुदा के बंदे ! (ख़ुदा का नाम) ले के बँदगी की कमाई करा कर- यह है असल शरह शरीअति (बाहरी धार्मिक रहन-सहन)। हे रॅब के बंदे ! (स्वैभाव) त्याग के (अपने अंदर बसते रॅब को) खोज के ढूँढ- ये है मन को साफ़ रखने का तरीका। हे अब्दाल फकीर ! अपने मन को वश में रख – यह है मारफति (आत्मिक जीवन की सूझ)। रॅब से मिला रह- ये है हकीकति (चौथा पद)। (ये हकीकति ऐसी है कि) इससे दोबारा आत्मिक मौत नहीं होती। 3। हे ख़ुदा के बंदे ! अपने दिल में खुदा के नाम की कमाई करता रह- ये है कुरान। ये है कतेबों की तालीम। हे ख़ुदा के बंदे ! अपनी दस इन्द्रियों को बुरे रास्तों से रोक के रख ! सिदक की मदद से पाँच कामादिक शूरवीरों को पकड़ के बाँध के रख। संतोख की ख़ैर की बरकति से आप खुदा के दर पर कबूल हैं जाएगा। 4। हे ख़ुदा के बँदे ! (दिल में सबक लिए) तरस को (हॅज-स्थान) मक्का (समझ)। (सबके) पैरों की ख़ाक हुए रहना (असल) रोज़ा है। गुरू के बचनों पर पूरी तरह से चलना -ये है बहिश्त। ख़ुदा के नूर का जहूर ही हूरें हैं। ख़ुदा की बूँदगी ही कसतूरी है। ख़ुदा की बँदगी ही सबसे बढ़िया हुजरा है (जहाँ मन विकारों से हट के एक ठिकाने पर रह सकता है)। 5।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा।
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।