आपे सिव वरताईअनु अंतरि आपे सीतलु ठारु गड़ा ॥13॥
जिसहि निवाजे गुरमुखि साजे ॥
नामु वसै तिसु अनहद वाजे ॥
तिस ही सुखु तिस ही ठकुराई तिसहि न आवै जमु नेड़ा ॥14॥
कीमति कागद कही न जाई ॥
कहु नानक बेअंत गुसाई ॥
आदि मधि अंति प्रभु सोई हाथि तिसै कै नेबेड़ा ॥15॥
तिसहि सरीकु नाही रे कोई ॥
किस ही बुतै जबाबु न होई ॥
नानक का प्रभु आपे आपे करि करि वेखै चोज खड़ा ॥16॥1॥10॥
अचुत पारब्रहम परमेसुर अंतरजामी ॥
मधुसूदन दामोदर सुआमी ॥
रिखीकेस गोवरधन धारी मुरली मनोहर हरि रंगा ॥1॥
मोहन माधव क्रिस्न मुरारे ॥
जगदीसुर हरि जीउ असुर संघारे ॥
जगजीवन अबिनासी ठाकुर घट घट वासी है संगा ॥2॥
धरणीधर ईस नरसिंघ नाराइण ॥
दाड़ा अग्रे प्रिथमि धराइण ॥
बावन रूपु कीआ तुधु करते सभ ही सेती है चंगा ॥3॥
स्री रामचंद जिसु रूपु न रेखिआ ॥
बनवाली चक्रपाणि दरसि अनूपिआ ॥
सहस नेत्र मूरति है सहसा इकु दाता सभ है मंगा ॥4॥
भगति वछलु अनाथह नाथे ॥
गोपी नाथु सगल है साथे ॥
बासुदेव निरंजन दाते बरनि न साकउ गुण अंगा ॥5॥
मुकंद मनोहर लखमी नाराइण ॥
द्रोपती लजा निवारि उधारण ॥
कमलाकंत करहि कंतूहल अनद बिनोदी निहसंगा ॥6॥
अमोघ दरसन आजूनी संभउ ॥
अकाल मूरति जिसु कदे नाही खउ ॥
अबिनासी अबिगत अगोचर सभु किछु तुझ ही है लगा ॥7॥
स्रीरंग बैकुंठ के वासी ॥
मछु कछु कूरमु आगिआ अउतरासी ॥
केसव चलत करहि निराले कीता लोड़हि सो होइगा ॥8॥
निराहारी निरवैरु समाइआ ॥
धारि खेलु चतुरभुजु कहाइआ ॥
सावल सुंदर रूप बणावहि बेणु सुनत सभ मोहैगा ॥9॥
बनमाला बिभूखन कमल नैन ॥
सुंदर कुंडल मुकट बैन ॥
संख चक्र गदा है धारी महा सारथी सतसंगा ॥10॥
पीत पीतंबर त्रिभवण धणी ॥
जगंनाथु गोपालु मुखि भणी ॥
सारिंगधर भगवान बीठुला मै गणत न आवै सरबंगा ॥11॥
निहकंटकु निहकेवलु कहीऐ ॥
धनंजै जलि थलि है महीऐ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह शूरवीर प्रभू स्वयं ही (सारे जगत में) हुकम चला रहा है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।