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अंग 1082

अंग
1082
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आपे सूरा अमरु चलाइआ ॥
आपे सिव वरताईअनु अंतरि आपे सीतलु ठारु गड़ा ॥13॥
जिसहि निवाजे गुरमुखि साजे ॥
नामु वसै तिसु अनहद वाजे ॥
तिस ही सुखु तिस ही ठकुराई तिसहि न आवै जमु नेड़ा ॥14॥
कीमति कागद कही न जाई ॥
कहु नानक बेअंत गुसाई ॥
आदि मधि अंति प्रभु सोई हाथि तिसै कै नेबेड़ा ॥15॥
तिसहि सरीकु नाही रे कोई ॥
किस ही बुतै जबाबु न होई ॥
नानक का प्रभु आपे आपे करि करि वेखै चोज खड़ा ॥16॥1॥10॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: वह शूरवीर प्रभू स्वयं ही (सारे जगत में) हुकम चला रहा है। (सब जीवों के) अंदर उसने स्वयं ही सुख-शांति बरताई हुई है। (क्योंकि) वह स्वयं ओले (बर्फ के गोले) की तरह शीतल ठंढा-ठार है। 13। हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा मेहर करता है। उसको गुरू की शरण में डाल के उसकी नई आत्मिक घाड़त घाड़ता है। उस (मनुष्य) के अंदर परमात्मा का नाम आ बसता है (मानो) उसके अंदर एक-रस बाजे (बज पड़ते हैं)। उसी मनुष्य को (सदा) आत्मिक आनंद प्राप्त रहता है। उसी को (परलोक में) आत्मिक अच्चता मिल जाती है। जमराज उसके नजदीक नहीं फटकता (मौत का डर। आत्मिक मौत उस पर असर नहीं डाल सकती)। 14। कागजों पर (लिख कर) उसका मूल्य नहीं डाला जा सकता। हे नानक ! कह- सृष्टि का मालिक-प्रभू बेअंत है। जगत के आरम्भ में। अब और अंत में भी वही कायम रहने वाला है। जीवों के कर्मों का फैसला उसी के हाथ में है। 15। हे भाई ! कोई भी जीव उस (परमात्मा) के बराबर का नहीं। उसके किसी भी काम में किसी तरफ से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। नानक का प्रभू (हर जगह) स्वयं ही स्वयं है। वह स्वयं ही तमाशे कर-कर के खड़ा स्वयं ही देख रहा है। 16। 1। 10।
मारू महला 5 ॥
अचुत पारब्रहम परमेसुर अंतरजामी ॥
मधुसूदन दामोदर सुआमी ॥
रिखीकेस गोवरधन धारी मुरली मनोहर हरि रंगा ॥1॥
मोहन माधव क्रिस्न मुरारे ॥
जगदीसुर हरि जीउ असुर संघारे ॥
जगजीवन अबिनासी ठाकुर घट घट वासी है संगा ॥2॥
धरणीधर ईस नरसिंघ नाराइण ॥
दाड़ा अग्रे प्रिथमि धराइण ॥
बावन रूपु कीआ तुधु करते सभ ही सेती है चंगा ॥3॥
स्री रामचंद जिसु रूपु न रेखिआ ॥
बनवाली चक्रपाणि दरसि अनूपिआ ॥
सहस नेत्र मूरति है सहसा इकु दाता सभ है मंगा ॥4॥
भगति वछलु अनाथह नाथे ॥
गोपी नाथु सगल है साथे ॥
बासुदेव निरंजन दाते बरनि न साकउ गुण अंगा ॥5॥
मुकंद मनोहर लखमी नाराइण ॥
द्रोपती लजा निवारि उधारण ॥
कमलाकंत करहि कंतूहल अनद बिनोदी निहसंगा ॥6॥
अमोघ दरसन आजूनी संभउ ॥
अकाल मूरति जिसु कदे नाही खउ ॥
अबिनासी अबिगत अगोचर सभु किछु तुझ ही है लगा ॥7॥
स्रीरंग बैकुंठ के वासी ॥
मछु कछु कूरमु आगिआ अउतरासी ॥
केसव चलत करहि निराले कीता लोड़हि सो होइगा ॥8॥
निराहारी निरवैरु समाइआ ॥
धारि खेलु चतुरभुजु कहाइआ ॥
सावल सुंदर रूप बणावहि बेणु सुनत सभ मोहैगा ॥9॥
बनमाला बिभूखन कमल नैन ॥
सुंदर कुंडल मुकट बैन ॥
संख चक्र गदा है धारी महा सारथी सतसंगा ॥10॥
पीत पीतंबर त्रिभवण धणी ॥
जगंनाथु गोपालु मुखि भणी ॥
सारिंगधर भगवान बीठुला मै गणत न आवै सरबंगा ॥11॥
निहकंटकु निहकेवलु कहीऐ ॥
धनंजै जलि थलि है महीऐ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे करतार ! आप अविनाशी है। आप पारब्रहम है। आप परमेश्वर है। आप अंतरजामी है। हे स्वामी ! मधुसूदन और दामोदर भी आप ही है। हे हरी ! आप ही ऋषिकेश गोवर्धन और मनोहर मुरलीवाला है। आप अनेकों रंग-तमाशे कर रहा है। 1। हे हरी जीउ ! मेहन। माधव। कृष्ण मुरारी आप ही है। आप ही है जगत का मालिक। आप ही दैत्यों का नाश करने वाला। हे जगजीवन ! हे अविनाशी ठाकुर ! आप सब शरीरों में मौजूद है। आप सबके साथ बसता है। 2। हे धरती के आसरे ! हे ईश्वर ! आप ही है नरसिंह अवतार। आप है विष्णू जिसका निवास समुंद्र में है। (वराह अवतार धार के) धरती को अपनी दाड़ों पर उठाने वाला भी आप ही है। हे करतार ! (राजा बलि को छलने के लिए) तूने ही वामन-रूप धारण किया था। आप सब जीवों के साथ बसता है। (फिर भी आप सबसे) उक्तम है। 3। हे प्रभू ! आप वह श्री रामचंद्र है जिसका ना कोई रूप है ना रेख। आप ही है बनवाली और सुदर्शन चक्रधारी। आप बेमिसाल अलोकिक स्वरूप वाला है। आपके हजारों नेत्र हैं। आपकी हजारों मूर्तियाँ हैं। आप ही अकेला दाता है। सारी दुनिया आपसे माँगने वाली है। 4। हे अनाथों के नाथ ! आप भक्ति को प्यार करने वाला है ! आप ही गोपियों का नाथ है। आप सब जीवों के साथ रहने वाला है। हे वासुदेव ! हे निर्लिप दातार ! मैं आपके अनेकों गुण बयान नहीं कर सकता। 5। हे मुक्ति के दाते ! हे सुंदर प्रभू ! हे लक्ष्मी के पति नारायण ! हे द्रोपदी को बेइज्जती से बचा के उसकी लाज रखने वाले ! हे लक्ष्मी के पति ! आप अनेकों करिश्मे करता है। आप सारे आनंद लेने वाला है। और निर्लिप भी है। 6। हे फल देने से कभी ना उकताने वाले दर्शनों वाले प्रभू ! हे जूनि-रहित प्रभू ! हे अपने आप से प्रकाश करने वाले प्रभू ! हे मौत-रहित स्वरूप वाले ! हे (ऐसे) प्रभू जिसका कभी नाश नहीं हो सकता ! हे अविनाशी ! हे अदृष्ट ! हे अगोचर ! (जगत की) हरेक चीज़ आपके ही आसरे है। 7। हे लक्ष्मी के पति ! हे बैकुंठ के रहने वाले ! मॅछ और कछुए (आदि) का आपकी ही आज्ञा में अवतार हुआ। हे सुंदर लंबे केशों वाले ! आप (सदा) अनोखे करिश्मे करता है। जो कुछ आप करना चाहता है वही अवश्य होता है। 8। हे प्रभू ! आप अन्न खाए बिना जीवित रहने वाला है। आपका किसी के साथ वैर नहीं। आप सबमें व्यापक है। ये जगत-खेल रच के (तूने ही अपने आप को) ब्रहमा कहलवाया है। हे प्रभू ! (कृष्ण जैसे) अनेकों साँवले-सुंदर रूप आप बनाता रहता है। आपकी बाँसुरी सुनते ही सारी सृष्टि मोहित हैं जाती है। 9। हे प्रभू ! सारी सृष्टि की वनस्पति आपके आभूषण हैं। हे कमल-पुष्प जैसी आँखों वाले ! हे सुंदर कुण्डलों वाले ! हे मुकट धारी ! हे बाँसुरी वाले ! हे शँखधारी ! हे चक्रधारी ! हे गदाधारी ! आप सत्संगियों का सबसे बड़ा सारथी (रथवाह। आगू) है। 10। हे पीले वस्त्रों वाले ! हे तीनों भवनों के मालिक ! आप ही सारे जगत का नाथ है। सृष्टि का पालनहार है। मैं (अपने) मुँह से (आपका नाम) उचारता हूँ। हे धर्नुधारी ! हे भगवान ! हे माया के प्रभाव से परे रहने वाले ! मुझसे आपके सारे गुण बयान नहीं हैं सकते। 11। हे भाई ! परमात्मा का कोई वैरी नहीं। उसको वासना-रहित कहा जाता है वही (सारे जगत के धन को जीतने वाला) धनंजय है। वह जल में है थल में है धरती पर (हर जगह) है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह शूरवीर प्रभू स्वयं ही (सारे जगत में) हुकम चला रहा है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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