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अंग १०८२ · मारू

अंग
1082
मारू
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  1. आपे सूरा अमरु चलाइआ ॥
  2. अचुत पारब्रहम परमेसुर अंतरजामी ॥

आपे सूरा अमरु चलाइआ ॥

अंग १०८१ से चला आ रहा अंश

आपे सूरा अमरु चलाइआ ॥
आपे सिव वरताईअनु अंतरि आपे सीतलु ठारु गड़ा ॥13॥
जिसहि निवाजे गुरमुखि साजे ॥
नामु वसै तिसु अनहद वाजे ॥
तिस ही सुखु तिस ही ठकुराई तिसहि न आवै जमु नेड़ा ॥14॥
कीमति कागद कही न जाई ॥
कहु नानक बेअंत गुसाई ॥
आदि मधि अंति प्रभु सोई हाथि तिसै कै नेबेड़ा ॥15॥
तिसहि सरीकु नाही रे कोई ॥
किस ही बुतै जबाबु न होई ॥
नानक का प्रभु आपे आपे करि करि वेखै चोज खड़ा ॥16॥1॥10॥

हिन्दी अर्थ: वह शूरवीर प्रभू स्वयं ही (सारे जगत में) हुकम चला रहा है। (सब जीवों के) अंदर उसने स्वयं ही सुख-शांति बरताई हुई है। (क्योंकि) वह स्वयं ओले (बर्फ के गोले) की तरह शीतल ठंढा-ठार है। 13। हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा मेहर करता है। उसको गुरू की शरण में डाल के उसकी नई आत्मिक घाड़त घाड़ता है। उस (मनुष्य) के अंदर परमात्मा का नाम आ बसता है (मानो) उसके अंदर एक-रस बाजे (बज पड़ते हैं)। उसी मनुष्य को (सदा) आत्मिक आनंद प्राप्त रहता है। उसी को (परलोक में) आत्मिक अच्चता मिल जाती है। जमराज उसके नजदीक नहीं फटकता (मौत का डर। आत्मिक मौत उस पर असर नहीं डाल सकती)। 14। कागजों पर (लिख कर) उसका मूल्य नहीं डाला जा सकता। हे नानक ! कह- सृष्टि का मालिक-प्रभू बेअंत है। जगत के आरम्भ में। अब और अंत में भी वही कायम रहने वाला है। जीवों के कर्मों का फैसला उसी के हाथ में है। 15। हे भाई ! कोई भी जीव उस (परमात्मा) के बराबर का नहीं। उसके किसी भी काम में किसी तरफ से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। नानक का प्रभू (हर जगह) स्वयं ही स्वयं है। वह स्वयं ही तमाशे कर-कर के खड़ा स्वयं ही देख रहा है। 16। 1। 10।

अचुत पारब्रहम परमेसुर अंतरजामी ॥

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मारू महला 5 ॥
अचुत पारब्रहम परमेसुर अंतरजामी ॥
मधुसूदन दामोदर सुआमी ॥
रिखीकेस गोवरधन धारी मुरली मनोहर हरि रंगा ॥1॥
मोहन माधव क्रिस्न मुरारे ॥
जगदीसुर हरि जीउ असुर संघारे ॥
जगजीवन अबिनासी ठाकुर घट घट वासी है संगा ॥2॥
धरणीधर ईस नरसिंघ नाराइण ॥
दाड़ा अग्रे प्रिथमि धराइण ॥
बावन रूपु कीआ तुधु करते सभ ही सेती है चंगा ॥3॥
स्री रामचंद जिसु रूपु न रेखिआ ॥
बनवाली चक्रपाणि दरसि अनूपिआ ॥
सहस नेत्र मूरति है सहसा इकु दाता सभ है मंगा ॥4॥
भगति वछलु अनाथह नाथे ॥
गोपी नाथु सगल है साथे ॥
बासुदेव निरंजन दाते बरनि न साकउ गुण अंगा ॥5॥
मुकंद मनोहर लखमी नाराइण ॥
द्रोपती लजा निवारि उधारण ॥
कमलाकंत करहि कंतूहल अनद बिनोदी निहसंगा ॥6॥
अमोघ दरसन आजूनी संभउ ॥
अकाल मूरति जिसु कदे नाही खउ ॥
अबिनासी अबिगत अगोचर सभु किछु तुझ ही है लगा ॥7॥
स्रीरंग बैकुंठ के वासी ॥
मछु कछु कूरमु आगिआ अउतरासी ॥
केसव चलत करहि निराले कीता लोड़हि सो होइगा ॥8॥
निराहारी निरवैरु समाइआ ॥
धारि खेलु चतुरभुजु कहाइआ ॥
सावल सुंदर रूप बणावहि बेणु सुनत सभ मोहैगा ॥9॥
बनमाला बिभूखन कमल नैन ॥
सुंदर कुंडल मुकट बैन ॥
संख चक्र गदा है धारी महा सारथी सतसंगा ॥10॥
पीत पीतंबर त्रिभवण धणी ॥
जगंनाथु गोपालु मुखि भणी ॥
सारिंगधर भगवान बीठुला मै गणत न आवै सरबंगा ॥11॥
निहकंटकु निहकेवलु कहीऐ ॥
धनंजै जलि थलि है महीऐ ॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे करतार ! आप अविनाशी हैं। आप पारब्रहम हैं। आप परमेश्वर हैं। आप अंतरजामी हैं। हे स्वामी ! मधुसूदन और दामोदर भी आप ही हैं। हे हरी ! आप ही ऋषिकेश गोवर्धन और मनोहर मुरलीवाले हैं। आप अनेकों रंग-तमाशे कर रहे हैं। 1। हे हरी जीउ ! मोहन। माधव। कृष्ण मुरारी आप ही हैं। आप ही हैं जगत के मालिक। आप ही दैत्यों का नाश करने वाले हैं। हे जगजीवन ! हे अविनाशी ठाकुर ! आप सब शरीरों में मौजूद हैं। आप सबके साथ बसते हैं। 2। हे धरती के आसरे ! हे ईश्वर ! आप ही हैं नरसिंह अवतार। आप हैं विष्णू जिसका निवास समुंद्र में है। (वराह अवतार धार के) धरती को अपनी दाड़ों पर उठाने वाले भी आप ही हैं। हे करतार ! (राजा बलि को छलने के लिए) आपने ही वामन-रूप धारण किया था। आप सब जीवों के साथ बसते हैं। (फिर भी आप सबसे) उक्तम हैं। 3। हे प्रभू ! आप वह श्री रामचंद्र हैं जिनका ना कोई रूप है ना रेख। आप ही हैं बनवाली और सुदर्शन चक्रधारी। आप बेमिसाल अलोकिक स्वरूप वाले हैं। आपके हजारों नेत्र हैं। आपकी हजारों मूर्तियाँ हैं। आप ही अकेले दाता हैं। सारी दुनिया आपसे माँगने वाली है। 4। हे अनाथों के नाथ ! आप भक्ति को प्यार करने वाले हैं ! आप ही गोपियों के नाथ हैं। आप सब जीवों के साथ रहने वाले हैं। हे वासुदेव ! हे निर्लिप दातार ! मैं आपके अनेकों गुण बयान नहीं कर सकता। 5। हे मुक्ति के दाते ! हे सुंदर प्रभू ! हे लक्ष्मी के पति नारायण ! हे द्रोपदी को बेइज्जती से बचा के उसकी लाज रखने वाले ! हे लक्ष्मी के पति ! आप अनेकों करिश्मे करते हैं। आप सारे आनंद लेने वाले हैं। और निर्लिप भी हैं। 6। हे फल देने से कभी ना उकताने वाले दर्शनों वाले प्रभू ! हे जूनि-रहित प्रभू ! हे अपने आप से प्रकाश करने वाले प्रभू ! हे मौत-रहित स्वरूप वाले ! हे (ऐसे) प्रभू जिसका कभी नाश नहीं हो सकता ! हे अविनाशी ! हे अदृष्ट ! हे अगोचर ! (जगत की) हरेक चीज़ आपके ही आसरे है। 7। हे लक्ष्मी के पति ! हे बैकुंठ के रहने वाले ! मॅछ और कछुए (आदि) का आपकी ही आज्ञा में अवतार हुआ। हे सुंदर लंबे केशों वाले ! आप (सदा) अनोखे करिश्मे करते हैं। जो कुछ आप करना चाहते हैं वही अवश्य होता है। 8। हे प्रभू ! आप अन्न खाए बिना जीवित रहने वाले हैं। आपका किसी के साथ वैर नहीं। आप सबमें व्यापक हैं। ये जगत-खेल रच के (आपने ही अपने आप को) ब्रहमा कहलवाया है। हे प्रभू ! (कृष्ण जैसे) अनेकों साँवले-सुंदर रूप आप बनाते रहते हैं। आपकी बाँसुरी सुनते ही सारी सृष्टि मोहित हो जाती है। 9। हे प्रभू ! सारी सृष्टि की वनस्पति आपके आभूषण हैं। हे कमल-पुष्प जैसी आँखों वाले ! हे सुंदर कुण्डलों वाले ! हे मुकट धारी ! हे बाँसुरी वाले ! हे शँखधारी ! हे चक्रधारी ! हे गदाधारी ! आप सत्संगियों के सबसे बड़े सारथी (रथवाह। आगू) हैं। 10। हे पीले वस्त्रों वाले ! हे तीनों भवनों के मालिक ! आप ही सारे जगत के नाथ हैं। सृष्टि के पालनहार हैं। मैं (अपने) मुँह से (आपका नाम) उचारता हूँ। हे धर्नुधारी ! हे भगवान ! हे माया के प्रभाव से परे रहने वाले ! मुझसे आपके सारे गुण बयान नहीं हो सकते। 11। हे भाई ! परमात्मा का कोई वैरी नहीं। उसको वासना-रहित कहा जाता है वही (सारे जगत के धन को जीतने वाला) धनंजय है। वह जल में है थल में है धरती पर (हर जगह) है।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1082 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०८२ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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