अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: समर्थ प्रभू उसके शरीर को (नाम की दाति हासिल करने के लिए) योग्य बर्तन बना देता है। हे भाई ! जिस मनुष्य को साध-संगति में छूह लग जाती है। परमात्मा की सिफत-सालाह वाली बाणी के द्वारा उस मनुष्य की अच्छी शोभा बन जाती है। उसका मन मजीठ (के पक्के रंग जैसे) नाम-रंग में रंगा जाता है। 15। उसका जीवन पूरी तौर पर सफल हो जाता है। हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय-आकाश में बेअंत ताकतों वाला प्रभू-सूर्य चढ़ जाता है (प्रभू प्रकट हो जाता है)। हे नानक ! हरी-नाम की बरकति से उस मनुष्य के अंदर आनंद व खुशियों के सुख बने रहते हैं। वह मनुष्य सदा आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम-रस भोगता रहता है। 16। 2। 9।
मारू सोलहे महला 5 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ तू साहिबु हउ सेवकु कीता ॥ जीउ पिंडु सभु तेरा दीता ॥ करन करावन सभु तूहै तूहै है नाही किछु असाड़ा ॥1॥ तुमहि पठाए ता जग महि आए ॥ जो तुधु भाणा से करम कमाए ॥ तुझ ते बाहरि किछू न होआ ता भी नाही किछु काड़ा ॥2॥ ऊहा हुकमु तुमारा सुणीऐ ॥ ईहा हरि जसु तेरा भणीऐ ॥ आपे लेख अलेखै आपे तुम सिउ नाही किछु झाड़ा ॥3॥ तू पिता सभि बारिक थारे ॥ जिउ खेलावहि तिउ खेलणहारे ॥ उझड़ मारगु सभु तुम ही कीना चलै नाही को वेपाड़ा ॥4॥ इकि बैसाइ रखे ग्रिह अंतरि ॥ इकि पठाए देस दिसंतरि ॥ इक ही कउ घासु इक ही कउ राजा इन महि कहीऐ किआ कूड़ा ॥5॥ कवन सु मुकती कवन सु नरका ॥ कवनु सैसारी कवनु सु भगता ॥ कवन सु दाना कवनु सु होछा कवन सु सुरता कवनु जड़ा ॥6॥ हुकमे मुकती हुकमे नरका ॥ हुकमि सैसारी हुकमे भगता ॥ हुकमे होछा हुकमे दाना दूजा नाही अवरु धड़ा ॥7॥ सागरु कीना अति तुम भारा ॥ इकि खड़े रसातलि करि मनमुख गावारा ॥ इकना पारि लंघावहि आपे सतिगुरु जिन का सचु बेड़ा ॥8॥ कउतकु कालु इहु हुकमि पठाइआ ॥ जीअ जंत ओपाइ समाइआ ॥ वेखै विगसै सभि रंग माणे रचनु कीना इकु आखाड़ा ॥9॥ वडा साहिबु वडी नाई ॥ वड दातारु वडी जिसु जाई ॥ अगम अगोचरु बेअंत अतोला है नाही किछु आहाड़ा ॥10॥ कीमति कोइ न जाणै दूजा ॥ आपे आपि निरंजन पूजा ॥ आपि सु गिआनी आपि धिआनी आपि सतवंता अति गाड़ा ॥11॥ केतड़िआ दिन गुपतु कहाइआ ॥ केतड़िआ दिन सुंनि समाइआ ॥ केतड़िआ दिन धुंधूकारा आपे करता परगटड़ा ॥12॥ आपे सकती सबलु कहाइआ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: मारू सोलहे महला 5 सतिगुर प्रसादि॥ हे प्रभू ! आप (मेरा) मालिक है। मैं आपका (पैदा) किया हुआ सेवक हूँ। ये जिंद ये शरीर सब कुछ आपका ही दिया हुआ है। हे प्रभू ! (जगत में) सब कुछ करने वाला आप ही है (जीवों से) करवाने वाला भी आप ही है। हम जीवों का कोई जोर नहीं चल सकता। 1। हे प्रभू ! आप ही (जीवों को) भेजता है। तो (ये) जगत में आते हैं। जो आपको अच्छा लगता है। उसी तरह के कर्म जीव करते हैं। हे प्रभू ! आपके हुकम से बाहर कुछ भी नहीं हैं सकता। इतना बड़ा पसारा होते हुए भी आपको कोई फिक्र नहीं। 2। हे प्रभू ! परलोक में भी आपका (ही) हुकम (चल रहा) सुना जा रहा है। इस लोक में भी आपकी ही सिफत-सालाह उचारी जा रही है। हे प्रभू ! आप स्वयं ही (जीवों के किए कर्मों के) लेखे (लिखने वाला) है। आप आप ही लेखे से बाहर है। आपके साथ (जीव) कोई झगड़ा नहीं डाल सकते। 3। हे प्रभू ! आप (सब जीवों का) पिता है। सारे (जीव) आपके बच्चे हैं। जैसे आप (इन बच्चों को) खेलाता है। वैसे ही ये खेल रहे हैं। हे प्रभू ! गलत रास्ता और ठीक रास्ता सब कुछ तूने स्वयं ही बनाया हुआ है। कोई भी जीव (अपने आप) गलत रास्ते पर चल नहीं सकता। 4। हे प्रभू ! कई जीव ऐसे हैं जिन्हें तूने घर में बैठाया हुआ है। कई ऐसे हैं जिनकों और-और देशों में भेजता है। कई जीवों को तूने घास काटने पर लगा दिया है। कईयों को तूने राजे बना दिया है। आपके इन कामों में किसी काम को गलत नहीं कहा जा सकता। 5। हे प्रभू ! आपके हुकम से बाहर ना कोई मुक्ति है ना कोई नर्क है। आपके हुकम के बिना ना कोई गृहस्ती है ना कोई भक्त बन सकता है। ना कोई बड़े जिगरे वाला है ना कोई होछे स्वभाव वाला है। आपके हुकम के बिना ना कोई ऊँची सूझ वाला है ना कोई मूर्ख है। 6। हे प्रभू ! आपके ही हुकम में (किसी को) मूक्ति (मिलती) है। आपके ही हुकम में (किसी को) नर्क (मिलता) है। आपके ही हुकम में कोई गृहस्ती है और कोई भगत है। हे प्रभू ! आपके ही हुकम में कोई जल्दबाज स्वभाव और कोई गंभीर स्वभाव वाला है। आपके मुकाबले पर और कोई धड़ा है ही नहीं। 7। हे प्रभू ! यह बेअंत बड़ा संसार-समुंद्र तूने स्वयं ही बनाया है। (यहाँ) कई जीवों को मन के मुरीद-मूर्ख बना के आप स्वयं ही नर्क में डालता है। कई जीवों को तूने खुद ही (इस संसार-समुंद्र से) पार लंधा लेता है। जिनके लिए आप गुरू को सदा कायम रहने वाला जहाज बना देता है। 8। हे भाई ! यह काल (मौत। जो प्रभू का बनाया एक) खिलौना (ही है। उसने अपने) हुकम अनुसार (जगत में) भेजा है। (प्रभू आप ही) सारे जीवों को पैदा करके खत्म कर देता है। (प्रभू आप ही इस तमाशे को) देख रहा है (और देख-देख के) खुश हैं रहा है। (सब जीवों में व्यापक हैं के स्वयं ही) सारे रंग भोग रहा है। इस जगत-रचना को उसने एक अखाड़ा बनाया हुआ है। 9। हे भाई ! वह मालिक प्रभू (बहुत) बड़ा है। उसकी वडिआई (भी बहुत) बड़ी है। वह बहुत बड़ा दाता है। उसकी जगह (जहाँ वह रहता है बहुत) बड़ी है। वह अपहुँच है। ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच से परे हैं। बेअंत है। तोला नहीं जा सकता। उसके तोलने के लिए कोई भी माप-तोल नहीं। 10। हे भाई ! और कोई भी जीव उसका मूल्य नहीं डाल सकता। वह निर्लिप प्रभू अपने बराबर का खुद ही है। वह आप ही अपने आप को जानने वाला है। आप ही अपने आप में समाधि लगाने वाला है। वह बहुत ही उच्च आचरण वाला है। 11। हे भाई ! (अब जगत बनने पर ज्ञानी लोग) कहते हैं कि बेअंत समय वह गुप्त ही रहा। बेअंत समय वह शून्य अवस्था में टिका रहा। बेअंत वक्त तक एक ऐसी अवस्था बनी रही जो जीवों की समझ से परे है। फिर उसने स्वयं ही अपने आप को (जगत के रूप में) प्रकट कर लिया। 12। हे भाई ! बलवान परमात्मा स्वयं ही (अपने आप को) माया कहलवा रहा है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “समर्थ प्रभू उसके शरीर को (नाम की दाति हासिल करने के लिए) योग्य बर्तन बना देता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।