Lulla Family

अंग १०८१ · मारू

अंग
1081
मारू
अंग बदलें या अंश चुनें · २ अंश

१ से १४३० तक कोई अंक लिखिए।

  1. काइआ पात्रु प्रभु करणैहारा ॥
  2. तू साहिबु हउ सेवकु कीता ॥

काइआ पात्रु प्रभु करणैहारा ॥

अंग १०८० से चला आ रहा अंश

काइआ पात्रु प्रभु करणैहारा ॥
लगी लागि संत संगारा ॥
निरमल सोइ बणी हरि बाणी मनु नामि मजीठै रंगना ॥15॥
सोलह कला संपूरन फलिआ ॥
अनत कला होइ ठाकुरु चड़िआ ॥
अनद बिनोद हरि नामि सुख नानक अंम्रित रसु हरि भुंचना ॥16॥2॥9॥

हिन्दी अर्थ: समर्थ प्रभू उसके शरीर को (नाम की दाति हासिल करने के लिए) योग्य बर्तन बना देता है। हे भाई ! जिस मनुष्य को साध-संगति में छूह लग जाती है। परमात्मा की सिफत-सालाह वाली बाणी के द्वारा उस मनुष्य की अच्छी शोभा बन जाती है। उसका मन मजीठ (के पक्के रंग जैसे) नाम-रंग में रंगा जाता है। 15। उसका जीवन पूरी तौर पर सफल हो जाता है। हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय-आकाश में बेअंत ताकतों वाला प्रभू-सूर्य चढ़ जाता है (प्रभू प्रकट हो जाता है)। हे नानक ! हरी-नाम की बरकति से उस मनुष्य के अंदर आनंद व खुशियों के सुख बने रहते हैं। वह मनुष्य सदा आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम-रस भोगता रहता है। 16। 2। 9।

तू साहिबु हउ सेवकु कीता ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

मारू सोलहे महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तू साहिबु हउ सेवकु कीता ॥
जीउ पिंडु सभु तेरा दीता ॥
करन करावन सभु तूहै तूहै है नाही किछु असाड़ा ॥1॥
तुमहि पठाए ता जग महि आए ॥
जो तुधु भाणा से करम कमाए ॥
तुझ ते बाहरि किछू न होआ ता भी नाही किछु काड़ा ॥2॥
ऊहा हुकमु तुमारा सुणीऐ ॥
ईहा हरि जसु तेरा भणीऐ ॥
आपे लेख अलेखै आपे तुम सिउ नाही किछु झाड़ा ॥3॥
तू पिता सभि बारिक थारे ॥
जिउ खेलावहि तिउ खेलणहारे ॥
उझड़ मारगु सभु तुम ही कीना चलै नाही को वेपाड़ा ॥4॥
इकि बैसाइ रखे ग्रिह अंतरि ॥
इकि पठाए देस दिसंतरि ॥
इक ही कउ घासु इक ही कउ राजा इन महि कहीऐ किआ कूड़ा ॥5॥
कवन सु मुकती कवन सु नरका ॥
कवनु सैसारी कवनु सु भगता ॥
कवन सु दाना कवनु सु होछा कवन सु सुरता कवनु जड़ा ॥6॥
हुकमे मुकती हुकमे नरका ॥
हुकमि सैसारी हुकमे भगता ॥
हुकमे होछा हुकमे दाना दूजा नाही अवरु धड़ा ॥7॥
सागरु कीना अति तुम भारा ॥
इकि खड़े रसातलि करि मनमुख गावारा ॥
इकना पारि लंघावहि आपे सतिगुरु जिन का सचु बेड़ा ॥8॥
कउतकु कालु इहु हुकमि पठाइआ ॥
जीअ जंत ओपाइ समाइआ ॥
वेखै विगसै सभि रंग माणे रचनु कीना इकु आखाड़ा ॥9॥
वडा साहिबु वडी नाई ॥
वड दातारु वडी जिसु जाई ॥
अगम अगोचरु बेअंत अतोला है नाही किछु आहाड़ा ॥10॥
कीमति कोइ न जाणै दूजा ॥
आपे आपि निरंजन पूजा ॥
आपि सु गिआनी आपि धिआनी आपि सतवंता अति गाड़ा ॥11॥
केतड़िआ दिन गुपतु कहाइआ ॥
केतड़िआ दिन सुंनि समाइआ ॥
केतड़िआ दिन धुंधूकारा आपे करता परगटड़ा ॥12॥
आपे सकती सबलु कहाइआ ॥

हिन्दी अर्थ: मारू सोलहे महला 5 सतिगुर प्रसादि॥ हे प्रभू ! आप (मेरे) मालिक हैं। मैं आपका (पैदा) किया हुआ सेवक हूँ। ये जिंद ये शरीर सब कुछ आपका ही दिया हुआ है। हे प्रभू ! (जगत में) सब कुछ करने वाले आप ही हैं (जीवों से) करवाने वाले भी आप ही हैं। हम जीवों का कोई जोर नहीं चल सकता। 1। हे प्रभू ! आप ही (जीवों को) भेजते हैं। तो (ये) जगत में आते हैं। जो आपको अच्छा लगता है। उसी तरह के कर्म जीव करते हैं। हे प्रभू ! आपके हुकम से बाहर कुछ भी नहीं हो सकता। इतना बड़ा पसारा होते हुए भी आपको कोई फिक्र नहीं। 2। हे प्रभू ! परलोक में भी आपका (ही) हुकम (चल रहा) सुना जा रहा है। इस लोक में भी आपकी ही सिफत-सालाह उचारी जा रही है। हे प्रभू ! आप स्वयं ही (जीवों के किए कर्मों के) लेखे (लिखने वाले) हैं। आप स्वयं ही लेखे से बाहर हैं। आपके साथ (जीव) कोई झगड़ा नहीं डाल सकते। 3। हे प्रभू ! आप (सब जीवों के) पिता हैं। सारे (जीव) आपके बच्चे हैं। जैसे आप (इन बच्चों को) खेलाते हैं। वैसे ही ये खेल रहे हैं। हे प्रभू ! गलत रास्ता और ठीक रास्ता सब कुछ आपने स्वयं ही बनाया हुआ है। कोई भी जीव (अपने आप) गलत रास्ते पर चल नहीं सकता। 4। हे प्रभू ! कई जीव ऐसे हैं जिन्हें आपने घर में बैठाया हुआ है। कई ऐसे हैं जिनकों और-और देशों में भेजता है। कई जीवों को आपने घास काटने पर लगा दिया है। कईयों को आपने राजे बना दिया है। आपके इन कामों में किसी काम को गलत नहीं कहा जा सकता। 5। हे प्रभू ! आपके हुकम से बाहर ना कोई मुक्ति है ना कोई नर्क है। आपके हुकम के बिना ना कोई गृहस्ती है ना कोई भक्त बन सकता है। ना कोई बड़े जिगरे वाला है ना कोई होछे स्वभाव वाला है। आपके हुकम के बिना ना कोई ऊँची सूझ वाला है ना कोई मूर्ख है। 6। हे प्रभू ! आपके ही हुकम में (किसी को) मूक्ति (मिलती) है। आपके ही हुकम में (किसी को) नर्क (मिलता) है। आपके ही हुकम में कोई गृहस्ती है और कोई भगत है। हे प्रभू ! आपके ही हुकम में कोई जल्दबाज स्वभाव और कोई गंभीर स्वभाव वाला है। आपके मुकाबले पर और कोई धड़ा है ही नहीं। 7। हे प्रभू ! यह बेअंत बड़ा संसार-समुंद्र आपने स्वयं ही बनाया है। (यहाँ) कई जीवों को मन के मुरीद-मूर्ख बना के आप स्वयं ही नर्क में डालते हैं। कई जीवों को आप खुद ही (इस संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेते हैं। जिनके लिए आप गुरू को सदा कायम रहने वाला जहाज बना देते हैं। 8। हे भाई ! यह काल (मौत। जो प्रभू का बनाया एक) खिलौना (ही है। उसने अपने) हुकम अनुसार (जगत में) भेजा है। (प्रभू आप ही) सारे जीवों को पैदा करके खत्म कर देता है। (प्रभू आप ही इस तमाशे को) देख रहा है (और देख-देख के) खुश हो रहा है। (सब जीवों में व्यापक हो के स्वयं ही) सारे रंग भोग रहा है। इस जगत-रचना को उसने एक अखाड़ा बनाया हुआ है। 9। हे भाई ! वह मालिक प्रभू (बहुत) बड़ा है। उसकी वडिआई (भी बहुत) बड़ी है। वह बहुत बड़ा दाता है। उसकी जगह (जहाँ वह रहता है बहुत) बड़ी है। वह अपहुँच है। ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच से परे हैं। बेअंत है। तोला नहीं जा सकता। उसके तोलने के लिए कोई भी माप-तोल नहीं। 10। हे भाई ! और कोई भी जीव उसका मूल्य नहीं डाल सकता। वह निर्लिप प्रभू अपने बराबर का खुद ही है। वह आप ही अपने आप को जानने वाला है। आप ही अपने आप में समाधि लगाने वाला है। वह बहुत ही उच्च आचरण वाला है। 11। हे भाई ! (अब जगत बनने पर ज्ञानी लोग) कहते हैं कि बेअंत समय वह गुप्त ही रहा। बेअंत समय वह शून्य अवस्था में टिका रहा। बेअंत वक्त तक एक ऐसी अवस्था बनी रही जो जीवों की समझ से परे है। फिर उसने स्वयं ही अपने आप को (जगत के रूप में) प्रकट कर लिया। 12। हे भाई ! बलवान परमात्मा स्वयं ही (अपने आप को) माया कहलवा रहा है।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1081 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०८१ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

English