कहु नानक सेई जन ऊतम जो भावहि सुआमी तुम मना ॥16॥1॥8॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: वही मनुष्य श्रेष्ठ हैं जो आपको अच्छे लगते हैं। 16। 1। 8।
मारू महला 5 ॥ प्रभ समरथ सरब सुख दाना ॥ सिमरउ नामु होहु मिहरवाना ॥ हरि दाता जीअ जंत भेखारी जनु बांछै जाचंगना ॥1॥ मागउ जन धूरि परम गति पावउ ॥ जनम जनम की मैलु मिटावउ ॥ दीरघ रोग मिटहि हरि अउखधि हरि निरमलि रापै मंगना ॥2॥ स्रवणी सुणउ बिमल जसु सुआमी ॥ एका ओट तजउ बिखु कामी ॥ निवि निवि पाइ लगउ दास तेरे करि सुक्रितु नाही संगना ॥3॥ रसना गुण गावै हरि तेरे ॥ मिटहि कमाते अवगुण मेरे ॥ सिमरि सिमरि सुआमी मनु जीवै पंच दूत तजि तंगना ॥4॥ चरन कमल जपि बोहिथि चरीऐ ॥ संतसंगि मिलि सागरु तरीऐ ॥ अरचा बंदन हरि समत निवासी बाहुड़ि जोनि न नंगना ॥5॥ दास दासन को करि लेहु गोुपाला ॥ क्रिपा निधान दीन दइआला ॥ सखा सहाई पूरन परमेसुर मिलु कदे न होवी भंगना ॥6॥ मनु तनु अरपि धरी हरि आगै ॥ जनम जनम का सोइआ जागै ॥ जिस का सा सोई प्रतिपालकु हति तिआगी हउमै हंतना ॥7॥ जलि थलि पूरन अंतरजामी ॥ घटि घटि रविआ अछल सुआमी ॥ भरम भीति खोई गुरि पूरै एकु रविआ सरबंगना ॥8॥ जत कत पेखउ प्रभ सुख सागर ॥ हरि तोटि भंडार नाही रतनागर ॥ अगह अगाह किछु मिति नही पाईऐ सो बूझै जिसु किरपंगना ॥9॥ छाती सीतल मनु तनु ठंढा ॥ जनम मरण की मिटवी डंझा ॥ करु गहि काढि लीए प्रभि अपुनै अमिओ धारि द्रिसटंगना ॥10॥ एको एकु रविआ सभ ठाई ॥ तिसु बिनु दूजा कोई नाही ॥ आदि मधि अंति प्रभु रविआ त्रिसन बुझी भरमंगना ॥11॥ गुरु परमेसरु गुरु गोबिंदु ॥ गुरु करता गुरु सद बखसंदु ॥ गुर जपु जापि जपत फलु पाइआ गिआन दीपकु संत संगना ॥12॥ जो पेखा सो सभु किछु सुआमी ॥ जो सुनणा सो प्रभ की बानी ॥ जो कीनो सो तुमहि कराइओ सरणि सहाई संतह तना ॥13॥ जाचकु जाचै तुमहि अराधै ॥ पतित पावन पूरन प्रभ साधै ॥ एको दानु सरब सुख गुण निधि आन मंगन निहकिंचना ॥14॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे सारी ताकतों के मालिक प्रभू ! हे सारे सुख देने वाले ! (मेरे पर) मेहरवान हो। मैं आपका नाम सिमरता रहूँ। हे भाई ! परमात्मा दातें देने वाला है। सारे जीव (उसके दर के) मंगते हैं। (नानक उसका) दास मंगता बन के (उससे नाम की दाति) माँगता है। 1। हे भाई ! (प्रभू के दर से) मैं (उसके) सेवकों की चरण-धूल माँगता हूँ ताकि मैं सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर सकूँ। और अनेकों जन्मों की (विकारों की) मैल दूर कर सकूँ। हे भाई ! हरी-नाम की दवाई से बड़े-बड़े रोग दूर हो जाते हैं। मैं भी (उसके दर से) माँगता हूँ कि उसके पवित्र नाम में (मेरा मन) रंगा रहे। 2। हे स्वामी ! (मेहर कर) मैं (अपने) कानों से आपका पवित्र नाम सुनता रहूँ। मुझे सिर्फ आपका ही आसरा है। (मेहर कर) मैं आत्मिक मौत लाने वाली काम वासना त्याग दूँ। मैं झुक-झुक के आपके सेवकों के चरणों में लगता रहूँ। ये नेक कमाई करते हुए मुझे कभी शर्म महिसूस ना हैं। 3। हे स्वामी ! हे हरी ! (मेहर कर) मेरी जीभ आपके गुण गाती रहे। और। मेरे (पिछले) किए हुए अवगुण मिट जाएं। (मेहर कर) आपका नाम सिमर-सिमर के (और। सिमरन की बरकति से) दुखी करने वाले कामादिक पाँच वैरियों का साथ छोड़ के मेरा मन आत्मिक जीवन प्राप्त कर ले। 4। हे भाई ! (संसार-समुंद्र से पार लांघने के लिए परमात्मा के) सुंदर चरणों का ध्यान धर के (नाम-) जहाज में चढ़ना चाहिए। गुरू की संगति में मिल के (संसार-) समुंद्र से पार लांघा जा सकता है। परमात्मा को सब जीवों में एक-समान बस रहा जान लेना- यही है उसकी अर्चना-पूजा। यही है उसके आगे वंदना। (इस तरह) बार-बार जूनियों में पड़ कर दुखी नहीं होते। 5। मुझे अपने दासों का दास बना ले। हे गोपाल ! हे कृपा के खजाने ! हे दीनों पर दया करने वाले ! हे सर्व-व्यापक परमेश्वर ! आप ही मेरा मित्र है। आप ही मेरा मददगार है। मुझे मिल। आपसे मेरा कभी विछोड़ा ना हैं। 6। हे भाई ! जिस मनुष्य ने अपना मन अपना तन परमात्मा के आगे भेटा कर दिया। वह मनुष्य अनेकों जन्मों का सोया हुआ (भी) जाग उठता है (आत्मिक जीवन की सूझ वाला हो जाता है)। जिस परमात्मा ने उसको पैदा किया था। वही उसका रखवाला बन जाता है। वह मनुष्य आत्मिक मौत लाने वाले अहंकार को सदा के लिए त्याग देता है। 7। उसको परमात्मा सबमें व्यापक दिख जाता है; (उसको ये दिखाई दे जाता है कि) सबके दिलों की जानने वाला प्रभू जल में धरती में सब जगह व्यापक है। हे भाई ! पूरे गुरू ने (जिस मनुष्य की परमात्मा से विछोड़ा डालने वाली) भटकना की दीवार दूर कर दी। माया से ना छला जा सकने वाला हरी हरेक शरीर में मौजूद है। 8। हे भाई ! मैं जिस तरफ भी देखता हूँ। सुखों का समुंद्र परमात्मा ही (बस रहा है)। रत्नों की खान उस परमात्मा के खजानों में कभी कमी नहीं आती। हे भाई ! उस परमात्मा की हस्ती की कोई हद-बंदी नहीं पा सकता जो हरेक समय की पकड़ से परे है जिसको नापा नहीं जा सकता। पर। यह बात वह मनुष्य समझता है जिस पर उसकी कृपा हो। 9। उनका हृदय शांत हो गया है। उनका मन उनका तन शांत हो गया है। उनकी वह जलन मिट गई है जो जनम-मरण के चक्करों में डालती है। हे भाई ! आत्मिक जीवन देने वाली निगाह करके प्यारे प्रभू ने जिन (भाग्यशालियों) को (उनका) हाथ पकड़ कर (संसार-समुंद्र में से) निकाल लिया है। 10। (उसको यह दिखाई दे जाता है कि) परमात्मा ही परमात्मा सब जगह बस रहा है। उसके बिना (उस जैसा) और कोई नहीं। वह परमात्मा ही जगत-रचना के आरम्भ में था। वह परमात्मा ही अब मौजूद है। वह परमात्मा ही जगत के अंत में होंगे। हे भाई ! (गुरू की कृपा से जिस मनुष्य की माया की) तृष्णा समाप्त हो जाती है भटकना खत्म हो जाती है 11। (उसको ये दिखाई दे जाता है कि) गुरू परमेश्वर (का रूप) है गुरू गोबिंद (का रूप) है। गुरू करतार (का रूप है) गुरू सदा बख्शिशें करने वाला है। हे भाई ! साध-संगति में टिक के गुरू का बताया हुआ हरी-नाम का जाप जपते हुए जिस मनुष्य के अंदर आत्मिक जीवन की सूझ का दीया जल उठता है जिसको ये फल प्राप्त हो जाता है 12। हे भाई ! (संसार में) मैं जो कुछ देखता हूँ सब कुछ मालिक-प्रभू (का ही रूप) है। जो कुछ मैं सुनता हूँ। प्रभू ही हर जगह स्वयं बोल रहा है। हे प्रभू ! जो कुछ जीव करते हैं। वह आप ही कर रहा है। आप शरण पड़ने वालों की सहायता करने वाला है। आप (अपने) संतों का सहारा है। 13। (आपके दर का) मंगता (दास) आपसे ही माँगता है आपको ही आराधता है। हे पतित-पावन प्रभू ! हे पूरन साधु प्रभू ! हे सारे सुख देने वाले प्रभू ! गुणों के खजाने प्रभू ! (आपका दास आपसे) सिर्फ (आपके नाम का) दान (ही माँगता है)। और माँगें माँगना बेअर्थ हैं (निकम्मी हैं)। 14।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वही मनुष्य श्रेष्ठ हैं जो आपको अच्छे लगते हैं।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।