सिमरहि पाताल पुरीआ सचु सोआ ॥
सिमरहि खाणी सिमरहि बाणी सिमरहि सगले हरि जना ॥2॥
सिमरहि ब्रहमे बिसन महेसा ॥
सिमरहि देवते कोड़ि तेतीसा ॥
सिमरहि जख्यि दैत सभि सिमरहि अगनतु न जाई जसु गना ॥3॥
सिमरहि पसु पंखी सभि भूता ॥
सिमरहि बन परबत अउधूता ॥
लता बली साख सभ सिमरहि रवि रहिआ सुआमी सभ मना ॥4॥
सिमरहि थूल सूखम सभि जंता ॥
सिमरहि सिध साधिक हरि मंता ॥
गुपत प्रगट सिमरहि प्रभ मेरे सगल भवन का प्रभ धना ॥5॥
सिमरहि नर नारी आसरमा ॥
सिमरहि जाति जोति सभि वरना ॥
सिमरहि गुणी चतुर सभि बेते सिमरहि रैणी अरु दिना ॥6॥
सिमरहि घड़ी मूरत पल निमखा ॥
सिमरै कालु अकालु सुचि सोचा ॥
सिमरहि सउण सासत्र संजोगा अलखु न लखीऐ इकु खिना ॥7॥
करन करावनहार सुआमी ॥
सगल घटा के अंतरजामी ॥
करि किरपा जिसु भगती लावहु जनमु पदारथु सो जिना ॥8॥
जा कै मनि वूठा प्रभु अपना ॥
पूरै करमि गुर का जपु जपना ॥
सरब निरंतरि सो प्रभु जाता बहुड़ि न जोनी भरमि रुना ॥9॥
गुर का सबदु वसै मनि जा कै ॥ दूखु दरदु भ्रमु ता का भागै ॥
सूख सहज आनंद नाम रसु अनहद बाणी सहज धुना ॥10॥
सो धनवंता जिनि प्रभु धिआइआ ॥
सो पतिवंता जिनि साधसंगु पाइआ ॥
पारब्रहमु जा कै मनि वूठा सो पूर करंमा ना छिना ॥11॥
जलि थलि महीअलि सुआमी सोई ॥
अवरु न कहीऐ दूजा कोई ॥
गुर गिआन अंजनि काटिओ भ्रमु सगला अवरु न दीसै एक बिना ॥12॥
ऊचे ते ऊचा दरबारा ॥
कहणु न जाई अंतु न पारा ॥
गहिर गंभीर अथाह सुआमी अतुलु न जाई किआ मिना ॥13॥
तू करता तेरा सभु कीआ ॥
तुझु बिनु अवरु न कोई बीआ ॥
आदि मधि अंति प्रभु तूहै सगल पसारा तुम तना ॥14॥
जमदूतु तिसु निकटि न आवै ॥
साधसंगि हरि कीरतनु गावै ॥
सगल मनोरथ ता के पूरन जो स्रवणी प्रभ का जसु सुना ॥15॥
तू सभना का सभु को तेरा ॥ साचे साहिब गहिर गंभीरा ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर एक ही शबद है।
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।