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अंग 1079

अंग
1079
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सिमरहि खंड दीप सभि लोआ ॥
सिमरहि पाताल पुरीआ सचु सोआ ॥
सिमरहि खाणी सिमरहि बाणी सिमरहि सगले हरि जना ॥2॥
सिमरहि ब्रहमे बिसन महेसा ॥
सिमरहि देवते कोड़ि तेतीसा ॥
सिमरहि जख्यि दैत सभि सिमरहि अगनतु न जाई जसु गना ॥3॥
सिमरहि पसु पंखी सभि भूता ॥
सिमरहि बन परबत अउधूता ॥
लता बली साख सभ सिमरहि रवि रहिआ सुआमी सभ मना ॥4॥
सिमरहि थूल सूखम सभि जंता ॥
सिमरहि सिध साधिक हरि मंता ॥
गुपत प्रगट सिमरहि प्रभ मेरे सगल भवन का प्रभ धना ॥5॥
सिमरहि नर नारी आसरमा ॥
सिमरहि जाति जोति सभि वरना ॥
सिमरहि गुणी चतुर सभि बेते सिमरहि रैणी अरु दिना ॥6॥
सिमरहि घड़ी मूरत पल निमखा ॥
सिमरै कालु अकालु सुचि सोचा ॥
सिमरहि सउण सासत्र संजोगा अलखु न लखीऐ इकु खिना ॥7॥
करन करावनहार सुआमी ॥
सगल घटा के अंतरजामी ॥
करि किरपा जिसु भगती लावहु जनमु पदारथु सो जिना ॥8॥
जा कै मनि वूठा प्रभु अपना ॥
पूरै करमि गुर का जपु जपना ॥
सरब निरंतरि सो प्रभु जाता बहुड़ि न जोनी भरमि रुना ॥9॥
गुर का सबदु वसै मनि जा कै ॥ दूखु दरदु भ्रमु ता का भागै ॥
सूख सहज आनंद नाम रसु अनहद बाणी सहज धुना ॥10॥
सो धनवंता जिनि प्रभु धिआइआ ॥
सो पतिवंता जिनि साधसंगु पाइआ ॥
पारब्रहमु जा कै मनि वूठा सो पूर करंमा ना छिना ॥11॥
जलि थलि महीअलि सुआमी सोई ॥
अवरु न कहीऐ दूजा कोई ॥
गुर गिआन अंजनि काटिओ भ्रमु सगला अवरु न दीसै एक बिना ॥12॥
ऊचे ते ऊचा दरबारा ॥
कहणु न जाई अंतु न पारा ॥
गहिर गंभीर अथाह सुआमी अतुलु न जाई किआ मिना ॥13॥
तू करता तेरा सभु कीआ ॥
तुझु बिनु अवरु न कोई बीआ ॥
आदि मधि अंति प्रभु तूहै सगल पसारा तुम तना ॥14॥
जमदूतु तिसु निकटि न आवै ॥
साधसंगि हरि कीरतनु गावै ॥
सगल मनोरथ ता के पूरन जो स्रवणी प्रभ का जसु सुना ॥15॥
तू सभना का सभु को तेरा ॥ साचे साहिब गहिर गंभीरा ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! सारे खंड। द्वाीप। मण्डल। पाताल और सारियां पुरियां। सारी खाणियों और बाणियों (के जीव)। सारे प्रभू के सेवक सदा-स्थिर प्रभू की रजा में बरत रहे हैं। 2। हे भाई ! अनेकों ब्रहमा। विष्णु और शिव। तैतिस करोड़ देवतागण। सारे जख और दैत्य उस अगनत प्रभू को हर वक्त याद कर रहे हैं। उसकी सिफतसालाह का अंत नहीं पाया जा सकता। 3। हे भाई ! सारे पशु। पक्षी आदि जीव। जंगल और अडोल टिके हुए पहाड़। वेलें वृक्षों की शाखाएं। सब परमात्मा की रजा में काम कर रहे हैं। हे भाई ! मालिक-प्रभू सब जीवों के मनों में बस रहा है। 4। हे मेरे प्रभू ! बहुत बड़े आकार के शरीरों से ले के बहुत ही सूक्ष्म शरीरों वाले सारे जीव। सिद्ध और साधिक। दृश्य और अदृश्य सारे जीव आपको ही सिमरते हैं। हे प्रभू ! आप सारे भवनों का मालिक है। 5। हे भाई ! चारों आश्रमों के नर और नारियाँ। सब जातियों और वर्णों के सारे प्राणी। गुणवान। चतुर सियाने सारे जीव परमात्मा को ही सिमरते हैं। (सारे जीव) रात और दिन हर वक्त उसी प्रभू को सिमरते हैं। 6। हे भाई ! घड़ी महूरत पल निमख (आदि समय के बटवारे) प्रभू के हुकम-नियम में गुजरते जा रहे हैं। मौत प्रभू के हुकम में चल रही है। जनम प्रभू के हुकम में चल रहा है। सुच और शारीरिक क्रिया – ये भी कार हुकम में ही चल रही है। संजोग आदि बताने वाले ज्योतिष व अन्य शास्त्र उसके हुकम में ही चल रहे हैं। पर। प्रभू स्वयं ऐसा है कि उसका सही स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। तिल मात्र भी बयान नहीं किया जा सकता। 7। हे सब कुछ आप कर सकने वाले और जीवों से करवा सकने वाले स्वामी ! हे सब दिलों की जानने वाले प्रभू ! आप मेहर करके जिस मनुष्य को अपनी भक्ति में लगाता है। वह इस कीमती मानस जन्म की बाजी जीत जाता है। 8। हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में प्यारा प्रभू आ बसता है। वह (प्रभू की) पूरी मेहर से गुरू का (बताया) नाम-जाप जपता है। वह मनुष्य उस प्रभू को सबके अंदर बसता पहचान लेता है। वह मनुष्य दोबारा जूनियों की भटकना में दुखी नहीं होता। 9। हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में गुरू का शबद टिक जाता है। उसका दुख उसका दर्द दूर हो जाता है। उसकी भटकना समाप्त हो जाती है। उसके अंदर आत्मिक अडोलता के सुख-आनंद बने रहते हैं। उसको परमात्मा के नाम का स्वाद आने लग पड़ता है। गुरबाणी की बरकति से उसके अंदर एक-रस आत्मिक अडोलता की धुनि (रौंअ) चलती रहती है। 10। हे भाई ! जिस मनुष्य ने प्रभू का ध्यान धरा वह नाम-खजाने का मालिक बन गया। जिस मनुष्य ने गुरू का साथ हासिल कर लिया वह (लोक-परलोक में) इज्जत वाला हो गया। हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में परमात्मा आ बसा। वह बड़ी किस्मत वाला हो गया वह (जगत में) प्रसिद्ध हो गया। 11। हे भाई ! वही मालिक-प्रभू जल में धरती में आकाश में बसता है। उसके बिना कोई दूसरा बताया नहीं जा सकता। हे भाई ! गुरू के ज्ञान के सुरमे ने (जिस मनुष्य की आँखों का) सारा भ्रम (-जाल) काट दिया। उसको एक परमात्मा के बिना (कहीं कोई) और नहीं दिखता। 12। हे प्रभू ! आपका दरबार सब (दरबारों) से ऊँचा है। उसका आखिरी और उसका परला छोर बताया नहीं जा सकता। हे गहरे और अथाह (समुंद्र) ! हे बड़े जिगरे वाले ! हे मालिक ! आप अतुल्य है। आपको तोला नहीं जा सकता। आपको मापा नहीं जा सकता। 13। हे प्रभू ! आप पैदा करने वाला है। सारा जगत आपका पैदा किया हुआ है। आपके बिना (आपके जैसा) कोई और दूसरा नहीं। जगत के आरम्भ से आखिर तक आप सदा कायम रहने वाला है। ये सारा जगत पसारा आपके ही अपने आप का है। 14। जमदूत उसके नजदीक नहीं आ सकता (मौत उसको डरा नहीं सकती। आत्मिक मौत उसके नजदीक नहीं आ सकती)। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की संगति में रह के परमात्मा की सिफतसालाह के गीत गाता है। जो मनुष्य अपने कानों से प्रभू का यश सुनता रहता है। उसकी सारी जरूरतें पूरी हो जाती हैं। 15। हे प्रभू ! आप सारे जीवों का (पति) है। हरेक जीव आपका (पैदा किया हुआ) है। हे नानक ! कह- (हे सदा कायम रहने वाले मालिक ! हे गहरे और बड़े जिगरे वाले प्रभू)

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर एक ही शबद है।

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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