कीनी दइआ गोपाल गुसाई ॥
गुर के चरण वसे मन माही ॥
अंगीकारु कीआ तिनि करतै दुख का डेरा ढाहिआ जीउ ॥1॥
मनि तनि वसिआ सचा सोई ॥
बिखड़ा थानु न दिसै कोई ॥
दूत दुसमण सभि सजण होए एको सुआमी आहिआ जीउ ॥2॥
जो किछु करे सु आपे आपै ॥
बुधि सिआणप किछू न जापै ॥
आपणिआ संता नो आपि सहाई प्रभि भरम भुलावा लाहिआ जीउ ॥3॥
चरण कमल जन का आधारो ॥
आठ पहर राम नामु वापारो ॥
सहज अनंद गावहि गुण गोविंद प्रभ नानक सरब समाहिआ जीउ ॥4॥36॥43॥
सो सचु मंदरु जितु सचु धिआईऐ ॥
सो रिदा सुहेला जितु हरि गुण गाईऐ ॥
सा धरति सुहावी जितु वसहि हरि जन सचे नाम विटहु कुरबाणो जीउ ॥1॥
सचु वडाई कीम न पाई ॥
कुदरति करमु न कहणा जाई ॥
धिआइ धिआइ जीवहि जन तेरे सचु सबदु मनि माणो जीउ ॥2॥
सचु सालाहणु वडभागी पाईऐ ॥
गुर परसादी हरि गुण गाईऐ ॥
रंगि रते तेरै तुधु भावहि सचु नामु नीसाणो जीउ ॥3॥
सचे अंतु न जाणै कोई ॥
थानि थनंतरि सचा सोई ॥
नानक सचु धिआईऐ सद ही अंतरजामी जाणो जीउ ॥4॥37॥44॥
रैणि सुहावड़ी दिनसु सुहेला ॥
जपि अंम्रित नामु संतसंगि मेला ॥
घड़ी मूरत सिमरत पल वंञहि जीवणु सफलु तिथाई जीउ ॥1॥
सिमरत नामु दोख सभि लाथे ॥
अंतरि बाहरि हरि प्रभु साथे ॥
भै भउ भरमु खोइआ गुरि पूरै देखा सभनी जाई जीउ ॥2॥
प्रभु समरथु वड ऊच अपारा ॥
नउ निधि नामु भरे भंडारा ॥
आदि अंति मधि प्रभु सोई दूजा लवै न लाई जीउ ॥3॥
करि किरपा मेरे दीन दइआला ॥
जाचिकु जाचै साध रवाला ॥
देहि दानु नानकु जनु मागै सदा सदा हरि धिआई जीउ ॥4॥38॥45॥
ऐथै तूंहै आगै आपे ॥
जीअ जंत्र सभि तेरे थापे ॥
तुधु बिनु अवरु न कोई करते मै धर ओट तुमारी जीउ ॥1॥
रसना जपि जपि जीवै सुआमी ॥
पारब्रहम प्रभ अंतरजामी ॥
जिनि सेविआ तिन ही सुखु पाइआ सो जनमु न जूऐ हारी जीउ ॥2॥
नामु अवखधु जिनि जन तेरै पाइआ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “माझ महला 5 ॥ सृष्टि के पालणहार ! सृष्टि के पति प्रभू ने (जिस मनुष्य पर) मेहर की, उसके मन में गुरू के चरण बस गए।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।