Lulla Family

अंग 107

अंग
107
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
माझ महला 5 ॥
कीनी दइआ गोपाल गुसाई ॥
गुर के चरण वसे मन माही ॥
अंगीकारु कीआ तिनि करतै दुख का डेरा ढाहिआ जीउ ॥1॥
मनि तनि वसिआ सचा सोई ॥
बिखड़ा थानु न दिसै कोई ॥
दूत दुसमण सभि सजण होए एको सुआमी आहिआ जीउ ॥2॥
जो किछु करे सु आपे आपै ॥
बुधि सिआणप किछू न जापै ॥
आपणिआ संता नो आपि सहाई प्रभि भरम भुलावा लाहिआ जीउ ॥3॥
चरण कमल जन का आधारो ॥
आठ पहर राम नामु वापारो ॥
सहज अनंद गावहि गुण गोविंद प्रभ नानक सरब समाहिआ जीउ ॥4॥36॥43॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ सृष्टि के पालणहार ! सृष्टि के पति प्रभू ने (जिस मनुष्य पर) मेहर की, उसके मन में गुरू के चरण बस गए। (उस को) उस करतार ने परवान कर लिया (अपना बना लिया, और उसके अंदर से करतार ने) दुख का अड्डा ही उठवा दिया।1। जिस मनुष्य के मन में, शरीर में वह सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा बस जाए, उसको (जीवन सफर में) कोई जगह मुश्किल नहीं दिखती। जिसका प्यार प्रभू मालिक के साथ बन जाए, सारे दोखी दुश्मन उसके सज्जन मित्र बन जाते हैं (कामादिक वैरी उसके अधीन हो जाते हैं)।2। जो कुछ प्रभू करता है स्वयं ही अपने आप से करता है (उसके कामों में किसी और की) अक्ल या चतुराई (काम करती) नहीं दिखती। अपने संतों वास्ते प्रभू खुद सहायक बनता है, मनुष्य के मन में से प्रभू ने भटकना व भुलेखा दूर कर दिया।3। हे नानक ! प्रभू के सुंदर चरण प्रभू के सेवकों की जिंदगी का आसरा बन जाते हैं। सेवक आठों पहर परमात्मा के नाम का व्यापार करते हैं। सेवक आत्मिक अडोलता का आनंद (लेते हुए सदैव) उस गोबिंद प्रभू के गुण गाते हैं जो सब जीवों में व्यापक है।4।36।43।
माझ महला 5 ॥
सो सचु मंदरु जितु सचु धिआईऐ ॥
सो रिदा सुहेला जितु हरि गुण गाईऐ ॥
सा धरति सुहावी जितु वसहि हरि जन सचे नाम विटहु कुरबाणो जीउ ॥1॥
सचु वडाई कीम न पाई ॥
कुदरति करमु न कहणा जाई ॥
धिआइ धिआइ जीवहि जन तेरे सचु सबदु मनि माणो जीउ ॥2॥
सचु सालाहणु वडभागी पाईऐ ॥
गुर परसादी हरि गुण गाईऐ ॥
रंगि रते तेरै तुधु भावहि सचु नामु नीसाणो जीउ ॥3॥
सचे अंतु न जाणै कोई ॥
थानि थनंतरि सचा सोई ॥
नानक सचु धिआईऐ सद ही अंतरजामी जाणो जीउ ॥4॥37॥44॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (हे भाई !) जिस जगह में सदा स्थिर परमात्मा का सिमरन किया जाता है, वह सदा कायम रहने वाला मंदिर है। वह हृदय (सदा) सुखी है जिसके द्वारा परमात्मा के गुण गाए जाएं। वह धरती सुंदर बन जाती हैजिसमें परमात्मा के भगत बसते हैं, और परमात्मा के नाम से सदके जाते हैं।1। (हे प्रभू !) आप सदा स्थिर रहने वाला है। आपकी बुजुर्गी का कोई जीव मुल्य नहीं डाल सकता। (अर्थात, आपके जितना बड़ा और कोई नहीं है)। आपकी कुदरति बयान नहीं की जा सकती। आपके भगत आपका नाम सिमर सिमर के आत्मिक जीवन प्राप्त करते हैं। उनके मन में आपका सदा स्थिर (सिफत-सालाह का) शबद ही आसरा है।2। (हे प्रभू !) आप सदा कायम रहने वाला है। आपकी सिफत सलाह बड़े भाग्यों के साथ मिलती है। हे हरी ! आपके गुण गुरू की कृपा से गाए जा सकते हैं। हे प्रभू ! तूझे वह सेवक प्यारे लगते हैं जो आपके प्रेम रंग में रंगे रहते हैं। उनके पास आपका सदा स्थिर रहने वाला नाम (जीवन सफर में) राहदारी है।3। (हे भाई !) सदा कायम रहने वाले परमात्मा के गुणों का कोई मनुष्य अंत नहीं जान सकता। वह सदा स्थिर रहने वाला प्रभू हरेक जगह में बस रहा है। हे नानक ! उस सदा स्थिर प्रभू को सदा ही सिमरना चाहिए। वह सुजान है और हरेक के दिल की जानने वाला है।4।37।44।
माझ महला 5 ॥
रैणि सुहावड़ी दिनसु सुहेला ॥
जपि अंम्रित नामु संतसंगि मेला ॥
घड़ी मूरत सिमरत पल वंञहि जीवणु सफलु तिथाई जीउ ॥1॥
सिमरत नामु दोख सभि लाथे ॥
अंतरि बाहरि हरि प्रभु साथे ॥
भै भउ भरमु खोइआ गुरि पूरै देखा सभनी जाई जीउ ॥2॥
प्रभु समरथु वड ऊच अपारा ॥
नउ निधि नामु भरे भंडारा ॥
आदि अंति मधि प्रभु सोई दूजा लवै न लाई जीउ ॥3॥
करि किरपा मेरे दीन दइआला ॥
जाचिकु जाचै साध रवाला ॥
देहि दानु नानकु जनु मागै सदा सदा हरि धिआई जीउ ॥4॥38॥45॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ रात सुहानी बीतती है। दिन भी आसान हो गुजरता है। आत्मिक मौत से बचाने वाले हरी नाम को जप के (अगर) संतों की संगति में मेल (हो जाए तो वहाँ) जहाँ उम्र की घड़ीआं दो घड़ीआं पल परमात्मा का नाम सिमरते हुए व्यतीत हो वहीं जीवन (का समय) सफल होता है।1। परमातमा का नाम सिमरने से सारे पाप उतर जाते हैं। जीव के हृदय में और बाहर जगत में परमात्मा (हर समय) साथ (बसता प्रतीत) होता है। परमात्मा काडर अदब दिल में रखने के कारण पूरे गुरू ने मेरा दुनिया वाला डर समाप्त कर दिया है। अब मैं परमात्मा को सब जगहों पे देखता हूँ।2। प्रभू सब ताकतों वाला है। सबसे बड़ा ऊँचा है, और बेअंत है। उसका नाम (मानो, जगत के) नौं ही खजाने है, (नाम धन से उस प्रभू के) खजाने भरे पड़े हैं। (संसार रचना के) शुरू में प्रभू स्वयं ही स्वयं था (दुनिया के) अंत में भी प्रभू स्वयं ही स्वयं होंगे (अब संसार रचना के) मध्य में प्रभू स्वयं ही स्वयं है। मैं किसी और को बराबर का नहीं समझ सकता।3। हे दीनों पर दया करने वाले मेरे प्रभू ! (मेरे पर) कृपा कर। (आपका ये) मंगता (आपसे) गुरू के चरणों की धूड़ मांगता हूँ। (आपका) दास नानक (आपसे) मांगता है (कि ये) दान दे कि मैं, हे हरी ! सदा सदा ही (आपको) सिमरता रहूँ।4।38।45।
माझ महला 5 ॥
ऐथै तूंहै आगै आपे ॥
जीअ जंत्र सभि तेरे थापे ॥
तुधु बिनु अवरु न कोई करते मै धर ओट तुमारी जीउ ॥1॥
रसना जपि जपि जीवै सुआमी ॥
पारब्रहम प्रभ अंतरजामी ॥
जिनि सेविआ तिन ही सुखु पाइआ सो जनमु न जूऐ हारी जीउ ॥2॥
नामु अवखधु जिनि जन तेरै पाइआ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ हे करतार ! इस लोक में मेरा आप ही सहारा है, और परलोक में भी मेरा आप स्वयं ही आसरा है। सारे ही जीव जन्तु आपके ही सहारे हैं। हे करतार आपके बिना मुझे कोई और (सहायक) नहीं (दिखता)। मुझे आपकी ही ओट है आपका ही आसरा है।1। (आपका सेवक आपका नाम अपनी) जीभ से जप जप के आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है। हे स्वामी ! हे पारब्रहम ! हे अंतरयामी प्रभू ! जिस मनुष्य ने आपकी सेवा भक्ति की उसने ही आत्मिक आनंद हासिल किया। वह मनुष्य अपना मानस जनम व्यर्थ नहीं गवाता (जैसेकि जुआरिया जूए में अपना सब कुछ हार जाता है)।2। (हे प्रभू !) आपके जिस सेवक ने आपका नाम (-रूप) दवा ढूँढ ली,

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “माझ महला 5 ॥ सृष्टि के पालणहार ! सृष्टि के पति प्रभू ने (जिस मनुष्य पर) मेहर की, उसके मन में गुरू के चरण बस गए।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
English