सगल भगत जा की करदे सेवा ॥
अनाथा नाथु दीन दुख भंजनु सो गुर पूरे ते पाइणा ॥3॥
होरु दुआरा कोइ न सूझै ॥
त्रिभवण धावै ता किछू न बूझै ॥
सतिगुरु साहु भंडारु नाम जिसु इहु रतनु तिसै ते पाइणा ॥4॥
जा की धूरि करे पुनीता ॥
सुरि नर देव न पावहि मीता ॥
सति पुरखु सतिगुरु परमेसरु जिसु भेटत पारि पराइणा ॥5॥
पारजातु लोड़हि मन पिआरे ॥
कामधेनु सोही दरबारे ॥
त्रिपति संतोखु सेवा गुर पूरे नामु कमाइ रसाइणा ॥6॥
गुर कै सबदि मरहि पंच धातू ॥
भै पारब्रहम होवहि निरमला तू ॥
पारसु जब भेटै गुरु पूरा ता पारसु परसि दिखाइणा ॥7॥
कई बैकुंठ नाही लवै लागे ॥
मुकति बपुड़ी भी गिआनी तिआगे ॥
एकंकारु सतिगुर ते पाईऐ हउ बलि बलि गुर दरसाइणा ॥8॥
गुर की सेव न जाणै कोई ॥
गुरु पारब्रहमु अगोचरु सोई ॥
जिस नो लाइ लए सो सेवकु जिसु वडभाग मथाइणा ॥9॥
गुर की महिमा बेद न जाणहि ॥
तुछ मात सुणि सुणि वखाणहि ॥
पारब्रहम अपरंपर सतिगुर जिसु सिमरत मनु सीतलाइणा ॥10॥
जा की सोइ सुणी मनु जीवै ॥
रिदै वसै ता ठंढा थीवै ॥
गुरु मुखहु अलाए ता सोभा पाए तिसु जम कै पंथि न पाइणा ॥11॥
संतन की सरणाई पड़िआ ॥
जीउ प्राण धनु आगै धरिआ ॥
सेवा सुरति न जाणा काई तुम करहु दइआ किरमाइणा ॥12॥
निरगुण कउ संगि लेहु रलाए ॥
करि किरपा मोहि टहलै लाए ॥
पखा फेरउ पीसउ संत आगै चरण धोइ सुखु पाइणा ॥13॥
बहुतु दुआरे भ्रमि भ्रमि आइआ ॥
तुमरी क्रिपा ते तुम सरणाइआ ॥
सदा सदा संतह संगि राखहु एहु नाम दानु देवाइणा ॥14॥
भए क्रिपाल गुसाई मेरे ॥
दरसनु पाइआ सतिगुर पूरे ॥
सूख सहज सदा आनंदा नानक दास दसाइणा ॥15॥2॥7॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सिमरै धरती अरु आकासा ॥
सिमरहि चंद सूरज गुणतासा ॥
पउण पाणी बैसंतर सिमरहि सिमरै सगल उपारजना ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जिस परमात्मा के नाम को अनेकों देवते तरसते हैं।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।