इकि भूखे इकि त्रिपति अघाए सभसै तेरा पारणा ॥3॥ आपे सति सति सति साचा ॥ ओति पोति भगतन संगि राचा ॥ आपे गुपतु आपे है परगटु अपणा आपु पसारणा ॥4॥ सदा सदा सद होवणहारा ॥ ऊचा अगमु अथाहु अपारा ॥ ऊणे भरे भरे भरि ऊणे एहि चलत सुआमी के कारणा ॥5॥ मुखि सालाही सचे साहा ॥ नैणी पेखा अगम अथाहा ॥ करनी सुणि सुणि मनु तनु हरिआ मेरे साहिब सगल उधारणा ॥6॥ करि करि वेखहि कीता अपणा ॥ जीअ जंत सोई है जपणा ॥ अपणी कुदरति आपे जाणै नदरी नदरि निहालणा ॥7॥ संत सभा जह बैसहि प्रभ पासे ॥ अनंद मंगल हरि चलत तमासे ॥ गुण गावहि अनहद धुनि बाणी तह नानक दासु चितारणा ॥8॥ आवणु जाणा सभु चलतु तुमारा ॥ करि करि देखै खेलु अपारा ॥ आपि उपाए उपावणहारा अपणा कीआ पालणा ॥9॥ सुणि सुणि जीवा सोइ तुमारी ॥ सदा सदा जाई बलिहारी ॥ दुइ कर जोड़ि सिमरउ दिनु राती मेरे सुआमी अगम अपारणा ॥10॥ तुधु बिनु दूजे किसु सालाही ॥ एको एकु जपी मन माही ॥ हुकमु बूझि जन भए निहाला इह भगता की घालणा ॥11॥ गुर उपदेसि जपीऐ मनि साचा ॥ गुर उपदेसि राम रंगि राचा ॥ गुर उपदेसि तुटहि सभि बंधन इहु भरमु मोहु परजालणा ॥12॥ जह राखै सोई सुख थाना ॥ सहजे होइ सोई भल माना ॥ बिनसे बैर नाही को बैरी सभु एको है भालणा ॥13॥ डर चूके बिनसे अंधिआरे ॥ प्रगट भए प्रभ पुरख निरारे ॥ आपु छोडि पए सरणाई जिस का सा तिसु घालणा ॥14॥ ऐसा को वडभागी आइआ ॥ आठ पहर जिनि खसमु धिआइआ ॥ तिसु जन कै संगि तरै सभु कोई सो परवार सधारणा ॥15॥ इह बखसीस खसम ते पावा ॥ आठ पहर कर जोड़ि धिआवा ॥ नामु जपी नामि सहजि समावा नामु नानक मिलै उचारणा ॥16॥1॥6॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: तूने कई तो ऐसे पैदा किए हैं जो सदा तृष्णा के अधीन रहते हैं। और कई पूरी तरह से तृप्त हैं। हरेक जीव को आपका ही सहारा है। 3। हे भाई ! परमात्मा सिर्फ स्वयं ही सदा कायम रहने वाला है। ताने-पेटे की तरह अपले भक्तों के साथ रचा-मिला रहता है। (जीवात्मा के रूप में हरेक जीव के अंदर) खुद ही छुपा हुआ है। यह दिखाई देता पसारा भी वह खुद ही है। (जगत-रूप में) उसने अपने आप को खुद ही खिलारा हुआ है। 4। हे भाई ! परमात्मा सदा ही सदा ही जीवित रहने वाला है। (आत्मिक अवस्था में) वह बहुत ऊँचा है। अपहुँच है। अथाह है। बेअंत है। उस मालिक प्रभू के ये करिश्मे-तमाशे हैं कि खाली (बर्तन) भर देता है और भरों को खाली कर देता है। 5। हे सदा कायम रहने वाले पातशाह ! (मेहर कर) मैं मुँह से आपकी सिफतसालाह करता रहूँ। हे अपहुँच और अथाह प्रभू ! (कृपा कर। हर जगह) मैं (आपको) आँखों से देखूँ। कानों से आपकी सिफतसालाह सुन-सुन के मेरा मन मेरा तन (आत्मिक जीवन से) हरा-भरा हुआ रहे। हे मेरे मालिक ! आप सब जीवों का बेड़ा पार करने वाला है। 6। हे प्रभू ! आप सब जीवों को पैदा कर-कर के अपने पैदा किए हुओं की संभाल करने वाला है। हे भाई ! सारे जीव-जंतु उसी सृजनहार को जपते हैं। अपनी कुदरति (पैदा करने की ताकत) को खुद ही जानता है। मेहर का मालिक प्रभू मेहर की निगाह से सबकी ओर देखता है। 7। हे भाई ! जिस साध-संगति में (संत जन) प्रभू के चरणों में बैठते हैं। प्रभू के करिश्मों-तमाशों का जिकर करके आत्मिक आनंद खुशियाँ लेते हैं। और एक-रस सुर में बाणी के द्वारा प्रभू के गुण गाते हैं। (यदि प्रभू की मेहर हो तो) उस साध-संगति में दास नानक भी उसके गुण अपने दिल में बसाए। 8। हे प्रभू ! (जीवों का) पैदा होने और मरना- ये सारा आपका (रचा हुआ) खेल है। हे भाई ! बेअंत प्रभू ये खेल कर कर के देख रहा है। पैदा करने की समर्थता वाला प्रभू स्वयं (जीवों को) पैदा करता है। अपने पैदा किए हुए (जीवों) को (स्वयं ही) पालता है। 9। हे प्रभू ! आपकी शोभा सुन-सुन के मैं आत्मिक जीवन हासिल करता हूँ। मैं आपसे सदा ही सदके जाता हूँ। हे मेरे अपहुँच और बेअंत मालिक ! (जब आपकी मेहर होती है) मैं दोनों हाथ जोड़ के दिन-रात आपको सिमरता हूँ। 10। हे प्रभू ! आपको छोड़ के मैं किसी और की सिफतसालाह नहीं कर सकता। मैं अपने मन में सिर्फ एक आपको ही जपता हूँ। आपके सेवक आपकी रज़ा को समझ के सदा प्रसन्न रहते हैं – ये है आपके भक्तों की घाल-कमाई। 11। हे भाई ! गुरू के उपदेश से मन में सदा-स्थिर प्रभू का नाम जपना चाहिए। गुरू के उपदेश पर चल के मन प्रभू के प्रेम-रंग में रंगा रहता है। हे भाई ! गुरू के उपदेश की बरकति से (मनुष्य के अंदर से माया-मोह के) सारे बँधन टूट जाते हैं। मनुष्य की यह भटकना। मनुष्य का यह मोह अच्छी तरह जल जाता है। 12। हे भाई ! (‘अैसा को वडभागी आइआ’ जो ये निश्चय रखता है कि) जहाँ (परमात्मा हमें) रखता है वही (हमारे लिए) सुख देने वाली जगह है। (जो मनुष्य) जो कुछ रजा में हो रहा है उसको भलाई के लिए मानता है। (जिस मनुष्य के अंदर से) सारे वैर-विरोध मिट जाते हैं। (जिसको जगत में) कोई वैरी नहीं दिखता। (जो) हर जगह सिर्फ परमात्मा को ही देखता है। 13। हे भाई ! (‘अैसा को वडभागी आइआ’। जिसके अंदर से) सारे भय समाप्त हो जाते हैं। आत्मिक जीवन के रास्ते के सारे अंधेरे दूर हो जाते हैं। (जिसके अंदर) निर्लिप प्रभू प्रकट हो जाता है। (जो मनुष्य) स्वैभाव दूर करके परमात्मा की शरण पड़ता है। जिस प्रभू का पैदा किया हुआ है उसी (के सिमरन) की घाल-कमाई करता है। 14। हे भाई ! कोई विरला ही ऐसा भाग्यशाली मनुष्य पैदा होता है। जो आठों पहर मालिक-प्रभू का नाम याद करता है। उस मनुष्य की संगति में (रह के) हरेक मनुष्य संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है। वह मनुष्य अपने परिवार के लिए सहारा बन जाता है। 15। हे नानक ! (कह-हे भाई ! अगर मेरे मालिक की मेरे ऊपर मेहर हो तो) मैं उस मालिक से ये दाति हासिल करूँ कि आठों पहर दोनों हाथ जोड़ के उसका नाम सिमरता रहूँ। उसका नाम जपता रहूँ। उसके नाम में आत्मिक अडोलता में लीन रहूँ। मुझे उसका नाम जपने की दाति मिली रहे। 16। 1। 6।
मारू महला 5 ॥ सूरति देखि न भूलु गवारा ॥ मिथन मोहारा झूठु पसारा ॥ जग महि कोई रहणु न पाए निहचलु एकु नाराइणा ॥1॥ गुर पूरे की पउ सरणाई ॥ मोहु सोगु सभु भरमु मिटाई ॥ एको मंत्रु द्रिड़ाए अउखधु सचु नामु रिद गाइणा ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 5॥ हे मूर्ख ! (जगत के पदार्थों की) सूरत देख के गलती ना खा। ये सारा झूठे मोह का झूठा पसारा है। जगत में कोई भी सदा के लिए टिका नहीं रह सकता। सिर्फ एक परमात्मा सदा कायम रहने वाला है। 1। हे भाई ! पूरे गुरू की शरण पड़ा रह। गुरू (शरण पड़े मनुष्य का) मोह-सोग और सारा भरम मिटा देता है। गुरू एक ही उपदेश हृदय में बसाता है। एक ही दवाई देता है कि हृदय में सदा कायम रहने वाला हरी-नाम सिमरना चाहिए। ै2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “तूने कई तो ऐसे पैदा किए हैं जो सदा तृष्णा के अधीन रहते हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।