खंड पताल दीप सभि लोआ ॥
सभि कालै वसि आपि प्रभि कीआ ॥
निहचलु एकु आपि अबिनासी सो निहचलु जो तिसहि धिआइदा ॥7॥
हरि का सेवकु सो हरि जेहा ॥
भेदु न जाणहु माणस देहा ॥
जिउ जल तरंग उठहि बहु भाती फिरि सललै सलल समाइदा ॥8॥
इकु जाचिकु मंगै दानु दुआरै ॥
जा प्रभ भावै ता किरपा धारै ॥
देहु दरसु जितु मनु त्रिपतासै हरि कीरतनि मनु ठहराइदा ॥9॥
रूड़ो ठाकुरु कितै वसि न आवै ॥
हरि सो किछु करे जि हरि किआ संता भावै ॥
कीता लोड़नि सोई कराइनि दरि फेरु न कोई पाइदा ॥10॥
जिथै अउघटु आइ बनतु है प्राणी ॥
तिथै हरि धिआईऐ सारिंगपाणी ॥
जिथै पुत्रु कलत्रु न बेली कोई तिथै हरि आपि छडाइदा ॥11॥
वडा साहिबु अगम अथाहा ॥
किउ मिलीऐ प्रभ वेपरवाहा ॥
काटि सिलक जिसु मारगि पाए सो विचि संगति वासा पाइदा ॥12॥
हुकमु बूझै सो सेवकु कहीऐ ॥
बुरा भला दुइ समसरि सहीऐ ॥
हउमै जाइ त एको बूझै सो गुरमुखि सहजि समाइदा ॥13॥
हरि के भगत सदा सुखवासी ॥
बाल सुभाइ अतीत उदासी ॥
अनिक रंग करहि बहु भाती जिउ पिता पूतु लाडाइदा ॥14॥
अगम अगोचरु कीमति नही पाई ॥
ता मिलीऐ जा लए मिलाई ॥
गुरमुखि प्रगटु भइआ तिन जन कउ जिन धुरि मसतकि लेखु लिखाइदा ॥15॥
तू आपे करता कारण करणा ॥
स्रिसटि उपाइ धरी सभ धरणा ॥
जन नानकु सरणि पइआ हरि दुआरै हरि भावै लाज रखाइदा ॥16॥1॥5॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जो दीसै सो एको तूहै ॥
बाणी तेरी स्रवणि सुणीऐ ॥
दूजी अवर न जापसि काई सगल तुमारी धारणा ॥1॥
आपि चितारे अपणा कीआ ॥
आपे आपि आपि प्रभु थीआ ॥
आपि उपाइ रचिओनु पसारा आपे घटि घटि सारणा ॥2॥
इकि उपाए वड दरवारी ॥
इकि उदासी इकि घर बारी ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(जो मनुष्य जपता है) वह खुद (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।