Lulla Family

अंग 1073

अंग
1073
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
धन अंधी पिरु चपलु सिआना ॥
पंच ततु का रचनु रचाना ॥
जिसु वखर कउ तुम आए हहु सो पाइओ सतिगुर पासा हे ॥6॥
धन कहै तू वसु मै नाले ॥
प्रिअ सुखवासी बाल गुपाले ॥
तुझै बिना हउ कित ही न लेखै वचनु देहि छोडि न जासा हे ॥7॥
पिरि कहिआ हउ हुकमी बंदा ॥
ओहु भारो ठाकुरु जिसु काणि न छंदा ॥
जिचरु राखै तिचरु तुम संगि रहणा जा सदे त ऊठि सिधासा हे ॥8॥
जउ प्रिअ बचन कहे धन साचे ॥
धन कछू न समझै चंचलि काचे ॥
बहुरि बहुरि पिर ही संगु मागै ओहु बात जानै करि हासा हे ॥9॥
आई आगिआ पिरहु बुलाइआ ॥
ना धन पुछी न मता पकाइआ ॥
ऊठि सिधाइओ छूटरि माटी देखु नानक मिथन मोहासा हे ॥10॥
रे मन लोभी सुणि मन मेरे ॥
सतिगुरु सेवि दिनु राति सदेरे ॥
बिनु सतिगुर पचि मूए साकत निगुरे गलि जम फासा हे ॥11॥
मनमुखि आवै मनमुखि जावै ॥
मनमुखि फिरि फिरि चोटा खावै ॥
जितने नरक से मनमुखि भोगै गुरमुखि लेपु न मासा हे ॥12॥
गुरमुखि सोइ जि हरि जीउ भाइआ ॥
तिसु कउणु मिटावै जि प्रभि पहिराइआ ॥
सदा अनंदु करे आनंदी जिसु सिरपाउ पइआ गलि खासा हे ॥13॥
हउ बलिहारी सतिगुर पूरे ॥
सरणि के दाते बचन के सूरे ॥
ऐसा प्रभु मिलिआ सुखदाता विछुड़ि न कत ही जासा हे ॥14॥
गुण निधान किछु कीम न पाई ॥
घटि घटि पूरि रहिओ सभ ठाई ॥
नानक सरणि दीन दुख भंजन हउ रेण तेरे जो दासा हे ॥15॥1॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! माया-ग्रसित काया की संगति में जीवात्मा चंचल चतुर हो के दुनिया की खेल ही। खेल रहा है। हे भाई ! जिस (नाम-) पदार्थ की खातिर आप जगत में आए हैं। वह पदार्थ गुरू से ही मिलता है। 6। हे भाई ! काया (जीवात्मा को) कहती रहती है- हे प्यारे और सुखी रहने वाले लाडले पति ! आप सदा मेरे साथ बसता रह। आपके बिना मेरा कुछ भी मूल्य नहीं। (मेरे साथ) इकरार कर कि मैं आपको छोड़ के नहीं जाऊँगा। 7। हे भाई ! काया (जब भी काया-स्त्री ने यह तरला लिया। मिन्नतें की। तब ही) जीवात्मा-पति ने कहा- मैं तो (उस परमात्मा के) हुकम में चलने वाला गुलाम हूँ। वह बहुत बड़ा मालिक है। उसको किसी का डर नहीं उसको किसी की मुथाजी नहीं। जितने समय वह मुझे आपके साथ रखेगा। मैं उतने ही समय तक आपके साथ रह सकता हूँ। जब बुलाएगा। तब मैं उठ के चला जाऊँगा। 8। हे भाई ! जब भी जीवात्मा ये सच्चे वचन काया-स्त्री को कहता है। वह चंचल और अक्ल की कच्ची कुछ भी नहीं समझती। वह बार-बार जीवात्मा पति का साथ ही माँगती है। और। जीवात्मा उसकी बात को मजाक समझ लेता है। 9। हे भाई ! जब पति-परमात्मा की ओर से हुकम आता है। जब वह बुलावा भेजता है। जीवात्मा ना ही काया-स्त्री को पूछता है। ना ही उससे सलाह करता है। वह काया-मिट्टी को छोड़ के उठ के चल पड़ता है। हे नानक ! देख। ये है मोह का झूठा पसारा। 10। हे मेरे लोभी मन ! (मेरी बात) सुन; दिन-रात सदा ही गुरू की शरण पड़ा रह। गुरू की शरण के बिना साकत निगुरे मनुष्य (विकारों की आग में) जल के आत्मिक मौत सहेड़ी रखते हैं। उनके गले में जमराज का (ये) फंदा पड़ा रहता है। 11। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य पैदा होता है मरता है। बार-बार जनम-मरण के इस चक्कर में चोटें खाता रहता है। मन का मुरीद सारे ही नर्कों के दुख भोगता है। पर गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य पर इनका रक्ती भर भी असर नहीं पड़ता। ै12। हे भाई ! उसी मनुष्य को गुरू के सन्मुख जानो जो परमात्मा को अच्छा लग गया। जिस (ऐसे) मनुष्य को परमात्मा ने स्वयं आदर-सत्कार दिया। उसकी इस शोभा को कोई मिटा नहीं सकता। जिस मनुष्य के गले में करतार की ओर से सुंदर (आदर-सम्मान) सिरोपाव पड़ गया। वह आनंद-स्वरूप परमात्मा के चरणों में जुड़ के सदा आत्मिक आनंद पाता है। 13। हे भाई ! मैं पूरे गुरू से सदके जाता हूँ। गुरू शरण पड़े की सहायता करने योग्य है। गुरू शूरवीरों की तरह वचन पालने वाला है। (पूरे गुरू की मेहर से मुझे) ऐसा सुखों का दाता परमात्मा मिल गया है। कि उसके चरणों से विछुड़ के मैं और कहीं नहीं जाऊँगा। 14। हे गुणों के खजाने प्रभू ! आपकी कीमत नहीं डाली जा सकती। आप सब जगह हरेक शरीर में व्यापक है। हे नानक ! (कह-) हे दीनों के दुख नाश करने वाले ! मेहर कर। मैं उन (के चरणों) की धूड़ बना रहूँ जो आपके दास हैं। 15। 1। 2।
मारू सोलहे महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करै अनंदु अनंदी मेरा ॥
घटि घटि पूरनु सिर सिरहि निबेरा ॥
सिरि साहा कै सचा साहिबु अवरु नाही को दूजा हे ॥1॥
हरखवंत आनंत दइआला ॥
प्रगटि रहिओ प्रभु सरब उजाला ॥
रूप करे करि वेखै विगसै आपे ही आपि पूजा हे ॥2॥
आपे कुदरति करे वीचारा ॥
आपे ही सचु करे पसारा ॥
आपे खेल खिलावै दिनु राती आपे सुणि सुणि भीजा हे ॥3॥
साचा तखतु सची पातिसाही ॥
सचु खजीना साचा साही ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: मारू सोलहे महला 5 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! खुशियों का मालिक मेरा प्रभू (स्वयं ही हर जगह) खुशी मना रहा है। हरेक शरीर में वह व्यापक है। हरेक जीव के किए कर्मों के अनुसार फैसला करता है। (दुनिया के) बादशाहों के भी सिर पर वह सदा-स्थिर परमात्मा है। कोई और (उसके बराबर का) नहीं। 1। हे भाई ! बेअंत परमात्मा खुशियों का मालिक है। दया का घर है। हर जगह प्रकट हो रहा है। सबमें वह ही (अपनी ज्योति का) प्रकाश कर रहा है। अनेकों ही रूप बना-बना के (सबकी) संभाल कर रहा है। और प्रसन्न हो रहा है। (सबमें व्यापक है) स्वयं ही (अपनी) पूजा कर रहा है। 2। हे भाई ! परमात्मा स्व्यं ही यह कुदरति रचता है स्वयं ही इसकी संभाल करता है। वह सदा-स्थिर प्रभू स्वयं ही जगत-खिलारा बना रहा है। दिन-रात हर वक्त वह स्वयं ही (जीवों को) खेलें खिला रहा है। स्वयं ही (जीवों की प्रार्थनाएं। अरजोईयां) सुन-सुन के खुश होता है। 3। हे भाई ! वह परमात्मा सदा कायम रहने वाला शहनशाह है। उसका खजाना सदा कायम रहने वाला है। उसकी बादशाहियत सदा कायम रहने वाली है। उसका तख्त हमेशा कायम रहने वाला है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! माया-ग्रसित काया की संगति में जीवात्मा चंचल चतुर हो के दुनिया की खेल ही।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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