पंच ततु का रचनु रचाना ॥
जिसु वखर कउ तुम आए हहु सो पाइओ सतिगुर पासा हे ॥6॥
धन कहै तू वसु मै नाले ॥
प्रिअ सुखवासी बाल गुपाले ॥
तुझै बिना हउ कित ही न लेखै वचनु देहि छोडि न जासा हे ॥7॥
पिरि कहिआ हउ हुकमी बंदा ॥
ओहु भारो ठाकुरु जिसु काणि न छंदा ॥
जिचरु राखै तिचरु तुम संगि रहणा जा सदे त ऊठि सिधासा हे ॥8॥
जउ प्रिअ बचन कहे धन साचे ॥
धन कछू न समझै चंचलि काचे ॥
बहुरि बहुरि पिर ही संगु मागै ओहु बात जानै करि हासा हे ॥9॥
आई आगिआ पिरहु बुलाइआ ॥
ना धन पुछी न मता पकाइआ ॥
ऊठि सिधाइओ छूटरि माटी देखु नानक मिथन मोहासा हे ॥10॥
रे मन लोभी सुणि मन मेरे ॥
सतिगुरु सेवि दिनु राति सदेरे ॥
बिनु सतिगुर पचि मूए साकत निगुरे गलि जम फासा हे ॥11॥
मनमुखि आवै मनमुखि जावै ॥
मनमुखि फिरि फिरि चोटा खावै ॥
जितने नरक से मनमुखि भोगै गुरमुखि लेपु न मासा हे ॥12॥
गुरमुखि सोइ जि हरि जीउ भाइआ ॥
तिसु कउणु मिटावै जि प्रभि पहिराइआ ॥
सदा अनंदु करे आनंदी जिसु सिरपाउ पइआ गलि खासा हे ॥13॥
हउ बलिहारी सतिगुर पूरे ॥
सरणि के दाते बचन के सूरे ॥
ऐसा प्रभु मिलिआ सुखदाता विछुड़ि न कत ही जासा हे ॥14॥
गुण निधान किछु कीम न पाई ॥
घटि घटि पूरि रहिओ सभ ठाई ॥
नानक सरणि दीन दुख भंजन हउ रेण तेरे जो दासा हे ॥15॥1॥2॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करै अनंदु अनंदी मेरा ॥
घटि घटि पूरनु सिर सिरहि निबेरा ॥
सिरि साहा कै सचा साहिबु अवरु नाही को दूजा हे ॥1॥
हरखवंत आनंत दइआला ॥
प्रगटि रहिओ प्रभु सरब उजाला ॥
रूप करे करि वेखै विगसै आपे ही आपि पूजा हे ॥2॥
आपे कुदरति करे वीचारा ॥
आपे ही सचु करे पसारा ॥
आपे खेल खिलावै दिनु राती आपे सुणि सुणि भीजा हे ॥3॥
साचा तखतु सची पातिसाही ॥
सचु खजीना साचा साही ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! माया-ग्रसित काया की संगति में जीवात्मा चंचल चतुर हो के दुनिया की खेल ही।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।