सचु तपावसु सचे केरा ॥
साचा थानु सदा प्रभ तेरा ॥
सची कुदरति सची बाणी सचु साहिब सुखु कीजा हे ॥5॥
एको आपि तूहै वड राजा ॥
हुकमि सचे कै पूरे काजा ॥
अंतरि बाहरि सभु किछु जाणै आपे ही आपि पतीजा हे ॥6॥
तू वड रसीआ तू वड भोगी ॥
तू निरबाणु तूहै ही जोगी ॥
सरब सूख सहज घरि तेरै अमिउ तेरी द्रिसटीजा हे ॥7॥
तेरी दाति तुझै ते होवै ॥
देहि दानु सभसै जंत लोऐ ॥
तोटि न आवै पूर भंडारै त्रिपति रहे आघीजा हे ॥8॥
जाचहि सिध साधिक बनवासी ॥
जाचहि जती सती सुखवासी ॥
इकु दातारु सगल है जाचिक देहि दानु स्रिसटीजा हे ॥9॥
करहि भगति अरु रंग अपारा ॥
खिन महि थापि उथापनहारा ॥
भारो तोलु बेअंत सुआमी हुकमु मंनि भगतीजा हे ॥10॥
जिसु देहि दरसु सोई तुधु जाणै ॥
ओहु गुर कै सबदि सदा रंग माणै ॥
चतुरु सरूपु सिआणा सोई जो मनि तेरै भावीजा हे ॥11॥
जिसु चीति आवहि सो वेपरवाहा ॥
जिसु चीति आवहि सो साचा साहा ॥
जिसु चीति आवहि तिसु भउ केहा अवरु कहा किछु कीजा हे ॥12॥
त्रिसना बूझी अंतरु ठंढा ॥
गुरि पूरै लै तूटा गंढा ॥
सुरति सबदु रिद अंतरि जागी अमिउ झोलि झोलि पीजा हे ॥13॥
मरै नाही सद सद ही जीवै ॥
अमरु भइआ अबिनासी थीवै ॥
ना को आवै ना को जावै गुरि दूरि कीआ भरमीजा हे ॥14॥
पूरे गुर की पूरी बाणी ॥
पूरै लागा पूरे माहि समाणी ॥
चड़ै सवाइआ नित नित रंगा घटै नाही तोलीजा हे ॥15॥
बारहा कंचनु सुधु कराइआ ॥
नदरि सराफ वंनी सचड़ाइआ ॥
परखि खजानै पाइआ सराफी फिरि नाही ताईजा हे ॥16॥
अंम्रित नामु तुमारा सुआमी ॥
नानक दास सदा कुरबानी ॥
संतसंगि महा सुखु पाइआ देखि दरसनु इहु मनु भीजा हे ॥17॥1॥3॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरु गोपालु गुरु गोविंदा ॥
गुरु दइआलु सदा बखसिंदा ॥
गुरु सासत सिम्रिति खटु करमा गुरु पवित्रु असथाना हे ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह खुद ही सदा कायम रहने वाला है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।