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अंग 1074 · मारू

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अंग
1074
मारू
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  1. आपे सचु धारिओ सभु साचा सचे सचि वरतीजा हे ॥4॥
  2. गुरु गोपालु गुरु गोविंदा ॥

गुरु अर्जन देव जी · सोलहे · राग मारू

आपे सचु धारिओ सभु साचा सचे सचि वरतीजा हे ॥4॥

अंग 1073 से चला आ रहा अंश

आपे सचु धारिओ सभु साचा सचे सचि वरतीजा हे ॥4॥
सचु तपावसु सचे केरा ॥
साचा थानु सदा प्रभ तेरा ॥
सची कुदरति सची बाणी सचु साहिब सुखु कीजा हे ॥5॥
एको आपि तूहै वड राजा ॥
हुकमि सचे कै पूरे काजा ॥
अंतरि बाहरि सभु किछु जाणै आपे ही आपि पतीजा हे ॥6॥
तू वड रसीआ तू वड भोगी ॥
तू निरबाणु तूहै ही जोगी ॥
सरब सूख सहज घरि तेरै अमिउ तेरी द्रिसटीजा हे ॥7॥
तेरी दाति तुझै ते होवै ॥
देहि दानु सभसै जंत लोऐ ॥
तोटि न आवै पूर भंडारै त्रिपति रहे आघीजा हे ॥8॥
जाचहि सिध साधिक बनवासी ॥
जाचहि जती सती सुखवासी ॥
इकु दातारु सगल है जाचिक देहि दानु स्रिसटीजा हे ॥9॥
करहि भगति अरु रंग अपारा ॥
खिन महि थापि उथापनहारा ॥
भारो तोलु बेअंत सुआमी हुकमु मंनि भगतीजा हे ॥10॥
जिसु देहि दरसु सोई तुधु जाणै ॥
ओहु गुर कै सबदि सदा रंग माणै ॥
चतुरु सरूपु सिआणा सोई जो मनि तेरै भावीजा हे ॥11॥
जिसु चीति आवहि सो वेपरवाहा ॥
जिसु चीति आवहि सो साचा साहा ॥
जिसु चीति आवहि तिसु भउ केहा अवरु कहा किछु कीजा हे ॥12॥
त्रिसना बूझी अंतरु ठंढा ॥
गुरि पूरै लै तूटा गंढा ॥
सुरति सबदु रिद अंतरि जागी अमिउ झोलि झोलि पीजा हे ॥13॥
मरै नाही सद सद ही जीवै ॥
अमरु भइआ अबिनासी थीवै ॥
ना को आवै ना को जावै गुरि दूरि कीआ भरमीजा हे ॥14॥
पूरे गुर की पूरी बाणी ॥
पूरै लागा पूरे माहि समाणी ॥
चड़ै सवाइआ नित नित रंगा घटै नाही तोलीजा हे ॥15॥
बारहा कंचनु सुधु कराइआ ॥
नदरि सराफ वंनी सचड़ाइआ ॥
परखि खजानै पाइआ सराफी फिरि नाही ताईजा हे ॥16॥
अंम्रित नामु तुमारा सुआमी ॥
नानक दास सदा कुरबानी ॥
संतसंगि महा सुखु पाइआ देखि दरसनु इहु मनु भीजा हे ॥17॥1॥3॥

हिन्दी अर्थ: वह खुद ही सदा कायम रहने वाला है। सारे जगत को वह खुद ही सहारा देने वाला है। अपने सदा-स्थिर (नियमों के) द्वारा वह स्वयं ही जगत में वरतारा बरता रहा है। 4। हे भाई! सदा स्थिर परमात्मा का न्याय भी अटल (अभूल) है। हे प्रभू! आपका ठिकाना सदा कायम रहने वाला है। हे साहिब! आपकी रची हुई कुदरति और (उसकी) संरचना (बणतर) अटल नियमों वाली है। आपने स्वयं ही (इस कुदरति में) अटल सुख पैदा किया हुआ है। 5। हे प्रभू! सिर्फ आप स्वयं ही सबसे बड़े राजा हैं। हे भाई! सदा स्थिर प्रभू के हुकम अनुसार सब जीवों के काम सफल होते हैं। जो कुछ जीवों के अंदर घटित होता है जो कुछ बाहर सारे जगत में हो रहा है ये सब कुछ वह स्वयं ही जानता है। और संतुष्ट होता है। 6। हे प्रभू! (सबमें व्यापक हो के) आप सबसे बड़े रस लेने वाले व भोग भोगने वाले हैं। (निराकार होते हुए) आप स्वयं ही वासना रहित जोगी हैं। हे प्रभू! आत्मिक अडोलता के सारे आनंद आपके घर में मौजूद हैं। आपकी मेहर की निगाह में अमृत बस रहा है। 7। हे प्रभू! जितनी दाति आप दे रहे हैं यह आप ही दे सकते हैं। आप तो सारे लोकों में सब जीवों को दान दे रहे हैं। आपके भरे हुए खजाने में कभी घाटा नहीं पड़ सकता। सारे ही जीव (आपकी दातों की बरकति से) पूरे तौर पर तृप्त रहते हैं। 8। हे प्रभू! जंगलों के वासी सिद्ध और साधिक (आपके दर से ही) माँगते हैं। सुखी-रहने वाले जती और सती (भी आपके दर से) माँगते हैं। आप एक दाता हैं। और सारी दुनिया (आपके दर से) माँगने वाली है। आप सारी सृष्टि को दान देते हैं। 9। हे भाई! (अनेकों भक्त) बेअंत प्रभू की भक्ति करते हैं और आत्मिक आनंद पाते हैं। परमात्मा पैदा करके एक छिन में नाश करने की समर्था रखता है। वह मालिक बेअंत ताकत वाला है बेअंत है। (जीव) उसका हुकम मान के उसके भगत बनते हैं। 10। हे प्रभू! जिस मनुष्य को आप दर्शन देते हैं। वही आपके साथ सांझ डालता है। गुरू के शबद की बरकति से वह सदा आत्मिक आनंद पाता है। वही मनुष्य (दरअसल) समझदार है सुंदर है बुद्धिवान है। जो आपके मन को अच्छा लगता है। 11। हे प्रभू! जिस मनुष्य के चित्त में आप आ बसते हैं उसको किसी की मुथाजी नहीं रहती। वह सदा कायम रहने वाले (नाम-) धन का मालिक बन जाता है। उसको किसी तरह का कोई डर नहीं रह जाता। कोई भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता। 12। उसकी तृष्णा (की आग) बुझ गई उसका हृदय शांत हो गया। हे भाई! (प्रभू से) टूटे हुए जिस मनुष्य को पकड़ के पूरे गुरू ने (दोबारा प्रभू के संग) जोड़ दिया। गुरू के शबद को सुरति में (टिकाने की सूझ उस मनुष्य के) हृदय में जाग उठी। वह मनुष्य बड़े स्वाद से आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पीता है। 13। वह आत्मिक मौत नहीं सहेड़ता। वह सदा ही आत्मिक जीवन जीता है। वह अटल आत्मिक जीवन वाला हो जाता है। उसको मौत का सहम नहीं व्यापता। हे भाई! गुरू ने जिस मनुष्य की भटकन दूर कर दी। ऐसा मनुष्य जनम-मरण के चक्र से बच जाता है। 14। हे भाई! जो मनुष्य पूरे गुरू की पूरी बाणी से पूर्ण परमात्मा की याद में जुड़ता है। वह उसमें समाया रहता है। परमात्मा के प्रेम का रंग (उसके दिल में) सदा ही बढ़ता रहता है। पड़ताल करने से वह कभी भी कम नहीं होता। 15। हे भाई! वह मनुष्य बारह वंनी के (शुद्ध) सोने जैसा खरा हो जाता है। वह सुंदर रंग वाला (सुंदर आत्मिक जीवन वाला) गुरू-सर्राफ की नज़रों में परवान हो जाता है। (जैसे शुद्ध सोने को) सर्राफ परख के खजाने में डाल लेते हैं। और उसको फिर परखने के लिए भट्ठी में डाला नहीं जाता (इस तरह वह मनुष्य परमात्मा की हजूरी में कबूल हो जाता है)। 16। हे नानक! (कहें:) हे मेरे मालिक प्रभू! आपका नाम आत्मिक जीवन देने वाला है। आपके दास आपसे सदा सदके जाते हैं। गुरू की संगति में रह के वे बहुत आत्मिक आनंद पाते हैं। (आपका) दर्शन करके उनका ये मन (आपके नाम-रस में) भीगा रहता है। 17। 1। 3।

गुरु अर्जन देव जी · सोलहे · राग मारू

गुरु गोपालु गुरु गोविंदा ॥

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मारू महला 5 सोलहे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरु गोपालु गुरु गोविंदा ॥
गुरु दइआलु सदा बखसिंदा ॥
गुरु सासत सिम्रिति खटु करमा गुरु पवित्रु असथाना हे ॥1॥

हिन्दी अर्थ: मारू महला 5 सोलहे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई! (गुरू के सेवक के लिए) गुरू गोपाल (का रूप) है। गुरू गोविंद (का रूप) है। गुरू दया का श्रोत है। गुरू सदा बख्शिश करने वाला है। (सेवक के लिए) गुरू (ही) शास्त्र है, स्मृति है। छह धार्मिक कर्म है; गुरू ही पवित्र तीर्थ है। 1।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1074 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1074 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।