अंग
1072
मारू
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थान थनंतरि अंतरजामी ॥
थान थनंतरि अंतरजामी ॥
सिमरि सिमरि पूरन परमेसुर चिंता गणत मिटाई हे ॥8॥
हरि का नामु कोटि लख बाहा ॥
हरि जसु कीरतनु संगि धनु ताहा ॥
गिआन खड़गु करि किरपा दीना दूत मारे करि धाई हे ॥9॥
हरि का जापु जपहु जपु जपने ॥
जीति आवहु वसहु घरि अपने ॥
लख चउरासीह नरक न देखहु रसकि रसकि गुण गाई हे ॥10॥
खंड ब्रहमंड उधारणहारा ॥
ऊच अथाह अगंम अपारा ॥
जिस नो क्रिपा करे प्रभु अपनी सो जनु तिसहि धिआई हे ॥11॥
बंधन तोड़ि लीए प्रभि मोले ॥
करि किरपा कीने घर गोले ॥
अनहद रुण झुणकारु सहज धुनि साची कार कमाई हे ॥12॥
मनि परतीति बनी प्रभ तेरी ॥
बिनसि गई हउमै मति मेरी ॥
अंगीकारु कीआ प्रभि अपनै जग महि सोभ सुहाई हे ॥13॥
जै जै कारु जपहु जगदीसै ॥
बलि बलि जाई प्रभ अपुने ईसै ॥
तिसु बिनु दूजा अवरु न दीसै एका जगति सबाई हे ॥14॥
सति सति सति प्रभु जाता ॥
गुर परसादि सदा मनु राता ॥
सिमरि सिमरि जीवहि जन तेरे एकंकारि समाई हे ॥15॥
भगत जना का प्रीतमु पिआरा ॥
सभै उधारणु खसमु हमारा ॥
सिमरि नामु पुंनी सभ इछा जन नानक पैज रखाई हे ॥16॥1॥
सिमरि सिमरि पूरन परमेसुर चिंता गणत मिटाई हे ॥8॥
हरि का नामु कोटि लख बाहा ॥
हरि जसु कीरतनु संगि धनु ताहा ॥
गिआन खड़गु करि किरपा दीना दूत मारे करि धाई हे ॥9॥
हरि का जापु जपहु जपु जपने ॥
जीति आवहु वसहु घरि अपने ॥
लख चउरासीह नरक न देखहु रसकि रसकि गुण गाई हे ॥10॥
खंड ब्रहमंड उधारणहारा ॥
ऊच अथाह अगंम अपारा ॥
जिस नो क्रिपा करे प्रभु अपनी सो जनु तिसहि धिआई हे ॥11॥
बंधन तोड़ि लीए प्रभि मोले ॥
करि किरपा कीने घर गोले ॥
अनहद रुण झुणकारु सहज धुनि साची कार कमाई हे ॥12॥
मनि परतीति बनी प्रभ तेरी ॥
बिनसि गई हउमै मति मेरी ॥
अंगीकारु कीआ प्रभि अपनै जग महि सोभ सुहाई हे ॥13॥
जै जै कारु जपहु जगदीसै ॥
बलि बलि जाई प्रभ अपुने ईसै ॥
तिसु बिनु दूजा अवरु न दीसै एका जगति सबाई हे ॥14॥
सति सति सति प्रभु जाता ॥
गुर परसादि सदा मनु राता ॥
सिमरि सिमरि जीवहि जन तेरे एकंकारि समाई हे ॥15॥
भगत जना का प्रीतमु पिआरा ॥
सभै उधारणु खसमु हमारा ॥
सिमरि नामु पुंनी सभ इछा जन नानक पैज रखाई हे ॥16॥1॥
हिन्दी अर्थ: उस पूरन दिल की जानने वाला वह प्रभू हरेक जगह में बस रहा है। सबके परमेश्वर का नाम सदा सिमर के मनुष्य अपनी सारी चिंता-फिक्र मिटा लेता है। 8। हे भाई ! (जैसे वैरियों का मुकाबला करने के लिए बहुत सारी बाँहें और बहुत सारे साथी मनुष्य के लिए सहारा होते हैं। वैसे ही कामादिक वैरियों से मुकाबले में मनुष्य के लिए) परमात्मा का नाम (मानो) लाखों-करोड़ों बाहें हैं। परमात्मा का यश-कीर्तन उसके पास धन है। जिस मनुष्य को परमात्मा आत्मिक जीवन की सूझ की तलवार कृपा करके देता है। वह मनुष्य हमला करके कामादिक वैरियों को मार लेता है। 9। हे भाई ! परमात्मा के नाम का जाप जपा करो। यही जपने-योग्य जप है। (इस जप की बरकति से कामादिक वैरियों को) जीत के अपने असल घर में टिके रहोगे। चौरासी लाख जूनियों के नर्क देखने नहीं पड़ेंगे। (जो मनुष्य) प्रेम से प्रभू के गुण गाता है (उसको यह फल प्राप्त होता है)। 10। हे भाई ! परमात्मा खंडो-ब्रहमंडों के जीवों को विकारों से बचाने के योग्य है। वह प्रभू ऊँचा है अथाह है अपहुँच है बेअंत है। जिस मनुष्य पर वह अपनी कृपा करता है वह मनुष्य उसी प्रभू को ही सिमरता रहता है। 11। हे भाई ! जिस मनुष्य के (माया के मोह के) बँधन तोड़ के प्रभू ने उसको अपना बना लिया। मेहर करके जिसको उसने अपने घर का दास बना लिया। वह मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन की कार करता है। उसके अंदर आत्मिक अडोलता की तार बँधी रहती है। और उसके अंदर सिफतसालाह का (मानो) लगातार मीठा सुरीला राग होता रहता है। 12। हे प्रभू ! जिस मनुष्य के मन में आपके प्रति श्रद्धा बन जाती है। उसके अंदर से अहंकार दूर हो जाता है। उसकी ममता वाली बुद्धि नाश हो जाती है। हे भाई ! अपने प्रभू ने जिस मनुष्य की सहायता की उसके सारे जगत में शोभा चमक पड़ी। 13। हे भाई ! जगत के मालिक प्रभू की सिफत सालाह करते रहो। मैं तो अपने ईश्वर प्रभू से सदा सदके जाता हूँ। उस प्रभू के बिना (उस जैसा) और कोई नहीं दिखता। सारे जगत में वह एक स्वयं ही स्वयं है। 14। हे भाई ! जिस मनुष्य ने परमात्मा को सदा-स्थिर जान लिया है उसका मन गुरू की कृपा से उसमें रंगा रहता है। हे प्रभू ! आपके सेवक आपका नाम सिमर-सिमर के आत्मिक जीवन हासिल करते हैं। वे सदा आपके सर्व-व्यापक स्वरूप में लीन रहते हैं। 15। हे भाई ! हमारा मालिक-प्रभू अपने भक्तों का प्यारा है। सब जीवों का पार-उतारा करने वाला है। उसका नाम सिमर-सिमर के उसके भक्तों की हरेक आस पूरी हो जाती है। हे नानक ! परमात्मा अपने सेवकों की सदा लाज रखता है। 16। 1।
संगी जोगी नारि लपटाणी ॥
मारू सोलहे महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
संगी जोगी नारि लपटाणी ॥
उरझि रही रंग रस माणी ॥
किरत संजोगी भए इकत्रा करते भोग बिलासा हे ॥1॥
जो पिरु करै सु धन ततु मानै ॥
पिरु धनहि सीगारि रखै संगानै ॥
मिलि एकत्र वसहि दिनु राती प्रिउ दे धनहि दिलासा हे ॥2॥
धन मागै प्रिउ बहु बिधि धावै ॥
जो पावै सो आणि दिखावै ॥
एक वसतु कउ पहुचि न साकै धन रहती भूख पिआसा हे ॥3॥
धन करै बिनउ दोऊ कर जोरै ॥
प्रिअ परदेसि न जाहु वसहु घरि मोरै ॥
ऐसा बणजु करहु ग्रिह भीतरि जितु उतरै भूख पिआसा हे ॥4॥
सगले करम धरम जुग साधा ॥
बिनु हरि रस सुखु तिलु नही लाधा ॥
भई क्रिपा नानक सतसंगे तउ धन पिर अनंद उलासा हे ॥5॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
संगी जोगी नारि लपटाणी ॥
उरझि रही रंग रस माणी ॥
किरत संजोगी भए इकत्रा करते भोग बिलासा हे ॥1॥
जो पिरु करै सु धन ततु मानै ॥
पिरु धनहि सीगारि रखै संगानै ॥
मिलि एकत्र वसहि दिनु राती प्रिउ दे धनहि दिलासा हे ॥2॥
धन मागै प्रिउ बहु बिधि धावै ॥
जो पावै सो आणि दिखावै ॥
एक वसतु कउ पहुचि न साकै धन रहती भूख पिआसा हे ॥3॥
धन करै बिनउ दोऊ कर जोरै ॥
प्रिअ परदेसि न जाहु वसहु घरि मोरै ॥
ऐसा बणजु करहु ग्रिह भीतरि जितु उतरै भूख पिआसा हे ॥4॥
सगले करम धरम जुग साधा ॥
बिनु हरि रस सुखु तिलु नही लाधा ॥
भई क्रिपा नानक सतसंगे तउ धन पिर अनंद उलासा हे ॥5॥
हिन्दी अर्थ: मारू सोलहे महला 5 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! (यह जीवात्मा असल में विरक्त) जोगी (है। यह काया-) स्त्री का साथी (जब बन जाता है। तो काया-) स्त्री (इसके साथ) लिपटी रहती है। इसको अपने मोह में फसाती रहती है। (और इसके साथ माया के) रंग रस भोगती है। किए कर्मों के संजोगों से (यह जीवात्मा और काया) इकट्ठे होते हैं। और। (दुनिया के) भोग विलास करते रहते हैं। 1। हे भाई ! जो कुछ जीवात्मा-पति काया-स्त्री को कहता है वह तुरन्त मानती है जीवात्मा पति काया-स्त्री को सजा-सँवार के अपने साथ रखता है। मिल के दिन-रात ये इकट्ठे बसते हैं। जीवात्मा-पति काया-स्त्री को (कई तरह के) हौसले देता रहता है। 2। हे भाई ! काया-स्त्री (भी जो कुछ) माँगती है। (वह हासिल करने के लिए) जीवात्मा-पति कई तरह की दौड़-भाग करता फिरता है। जो कुछ उसको मिलता है। वह ला के (अपनी काया-स्त्री को) दिखा देता है। (पर इस दौड़-भाग में इसको) नाम-पदार्थ नहीं मिल सकता। (नाम-पदार्थ के बिना) काया-स्त्री की (माया वाली) भूख-प्यास टिकी रहती है। 3। हे भाई ! काया-स्त्री दोनों हाथ जोड़ती है और (जीवात्मा-पति के आगे) विनती करती है - हे प्यारे ! (मुझे छोड़ के) किसी और देश में ना चले जाना। मेरे ही इस घर में टिके रहना। इसी घर में कोई ऐसा वव्यापार करता रह। जिससे मेरी भूख-प्यास मिटती रहे (मेरी जरूरतें पूरी होती रहें)। 4। पर। हे भाई ! सदा से ही लोग मिथे हुए धार्मिक कर्म करते आए हैं। हरी-नाम के स्वाद के बिना किसी को भी रक्ती भर सुख नहीं मिला। हे नानक ! जब साध-संगति में परमात्मा की कृपा होती है तब यह जीवात्मा और काया मिल के (नाम की बरकति से) आत्मिक आनंद लेते हैं। 5।
रचयिता और स्रोत
यह मारू राग के क्रम का अंग 1072 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०७२ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।