सिमरि सिमरि पूरन परमेसुर चिंता गणत मिटाई हे ॥8॥
हरि का नामु कोटि लख बाहा ॥
हरि जसु कीरतनु संगि धनु ताहा ॥
गिआन खड़गु करि किरपा दीना दूत मारे करि धाई हे ॥9॥
हरि का जापु जपहु जपु जपने ॥
जीति आवहु वसहु घरि अपने ॥
लख चउरासीह नरक न देखहु रसकि रसकि गुण गाई हे ॥10॥
खंड ब्रहमंड उधारणहारा ॥
ऊच अथाह अगंम अपारा ॥
जिस नो क्रिपा करे प्रभु अपनी सो जनु तिसहि धिआई हे ॥11॥
बंधन तोड़ि लीए प्रभि मोले ॥
करि किरपा कीने घर गोले ॥
अनहद रुण झुणकारु सहज धुनि साची कार कमाई हे ॥12॥
मनि परतीति बनी प्रभ तेरी ॥
बिनसि गई हउमै मति मेरी ॥
अंगीकारु कीआ प्रभि अपनै जग महि सोभ सुहाई हे ॥13॥
जै जै कारु जपहु जगदीसै ॥
बलि बलि जाई प्रभ अपुने ईसै ॥
तिसु बिनु दूजा अवरु न दीसै एका जगति सबाई हे ॥14॥
सति सति सति प्रभु जाता ॥
गुर परसादि सदा मनु राता ॥
सिमरि सिमरि जीवहि जन तेरे एकंकारि समाई हे ॥15॥
भगत जना का प्रीतमु पिआरा ॥
सभै उधारणु खसमु हमारा ॥
सिमरि नामु पुंनी सभ इछा जन नानक पैज रखाई हे ॥16॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
संगी जोगी नारि लपटाणी ॥
उरझि रही रंग रस माणी ॥
किरत संजोगी भए इकत्रा करते भोग बिलासा हे ॥1॥
जो पिरु करै सु धन ततु मानै ॥
पिरु धनहि सीगारि रखै संगानै ॥
मिलि एकत्र वसहि दिनु राती प्रिउ दे धनहि दिलासा हे ॥2॥
धन मागै प्रिउ बहु बिधि धावै ॥
जो पावै सो आणि दिखावै ॥
एक वसतु कउ पहुचि न साकै धन रहती भूख पिआसा हे ॥3॥
धन करै बिनउ दोऊ कर जोरै ॥
प्रिअ परदेसि न जाहु वसहु घरि मोरै ॥
ऐसा बणजु करहु ग्रिह भीतरि जितु उतरै भूख पिआसा हे ॥4॥
सगले करम धरम जुग साधा ॥
बिनु हरि रस सुखु तिलु नही लाधा ॥
भई क्रिपा नानक सतसंगे तउ धन पिर अनंद उलासा हे ॥5॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उस पूरन दिल की जानने वाला वह प्रभू हरेक जगह में बस रहा है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।