जनमि मरै फिरि आवै जाए ॥
सो तपु पूरा साई सेवा जो हरि मेरे मनि भाणी हे ॥11॥
हउ किआ गुण तेरे आखा सुआमी ॥
तू सरब जीआ का अंतरजामी ॥
हउ मागउ दानु तुझै पहि करते हरि अनदिनु नामु वखाणी हे ॥12॥
किस ही जोरु अहंकार बोलण का ॥
किस ही जोरु दीबान माइआ का ॥
मै हरि बिनु टेक धर अवर न काई तू करते राखु मै निमाणी हे ॥13॥
निमाणे माणु करहि तुधु भावै ॥
होर केती झखि झखि आवै जावै ॥
जिन का पखु करहि तू सुआमी तिन की ऊपरि गल तुधु आणी हे ॥14॥
हरि हरि नामु जिनी सदा धिआइआ ॥
तिनी गुर परसादि परम पदु पाइआ ॥
जिनि हरि सेविआ तिनि सुखु पाइआ बिनु सेवा पछोताणी हे ॥15॥
तू सभ महि वरतहि हरि जगंनाथु ॥
सो हरि जपै जिसु गुर मसतकि हाथु ॥
हरि की सरणि पइआ हरि जापी जनु नानकु दासु दसाणी हे ॥16॥2॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कला उपाइ धरी जिनि धरणा ॥
गगनु रहाइआ हुकमे चरणा ॥
अगनि उपाइ ईधन महि बाधी सो प्रभु राखै भाई हे ॥1॥
जीअ जंत कउ रिजकु संबाहे ॥
करण कारण समरथ आपाहे ॥
खिन महि थापि उथापनहारा सोई तेरा सहाई हे ॥2॥
मात गरभ महि जिनि प्रतिपालिआ ॥
सासि ग्रासि होइ संगि समालिआ ॥
सदा सदा जपीऐ सो प्रीतमु वडी जिसु वडिआई हे ॥3॥
सुलतान खान करे खिन कीरे ॥
गरीब निवाजि करे प्रभु मीरे ॥
गरब निवारण सरब सधारण किछु कीमति कही न जाई हे ॥4॥
सो पतिवंता सो धनवंता ॥
जिसु मनि वसिआ हरि भगवंता ॥
मात पिता सुत बंधप भाई जिनि इह स्रिसटि उपाई हे ॥5॥
प्रभ आए सरणा भउ नही करणा ॥
साधसंगति निहचउ है तरणा ॥
मन बच करम अराधे करता तिसु नाही कदे सजाई हे ॥6॥
गुण निधान मन तन महि रविआ ॥
जनम मरण की जोनि न भविआ ॥
दूख बिनास कीआ सुखि डेरा जा त्रिपति रहे आघाई हे ॥7॥
मीतु हमारा सोई सुआमी ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! अहंकार में की हुई सेवा-भगती परवान नहीं होती।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।