Lulla Family

अंग 1071

अंग
1071
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
विचि हउमै सेवा थाइ न पाए ॥
जनमि मरै फिरि आवै जाए ॥
सो तपु पूरा साई सेवा जो हरि मेरे मनि भाणी हे ॥11॥
हउ किआ गुण तेरे आखा सुआमी ॥
तू सरब जीआ का अंतरजामी ॥
हउ मागउ दानु तुझै पहि करते हरि अनदिनु नामु वखाणी हे ॥12॥
किस ही जोरु अहंकार बोलण का ॥
किस ही जोरु दीबान माइआ का ॥
मै हरि बिनु टेक धर अवर न काई तू करते राखु मै निमाणी हे ॥13॥
निमाणे माणु करहि तुधु भावै ॥
होर केती झखि झखि आवै जावै ॥
जिन का पखु करहि तू सुआमी तिन की ऊपरि गल तुधु आणी हे ॥14॥
हरि हरि नामु जिनी सदा धिआइआ ॥
तिनी गुर परसादि परम पदु पाइआ ॥
जिनि हरि सेविआ तिनि सुखु पाइआ बिनु सेवा पछोताणी हे ॥15॥
तू सभ महि वरतहि हरि जगंनाथु ॥
सो हरि जपै जिसु गुर मसतकि हाथु ॥
हरि की सरणि पइआ हरि जापी जनु नानकु दासु दसाणी हे ॥16॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! अहंकार में की हुई सेवा-भगती परवान नहीं होती। वह मनुष्य (तो बल्कि) जनम-मरण के चक्करों में पड़ा रहता है। हे भाई ! वही है पूरा तप। वही है सेवा भक्ति। जो मेरे प्रभू के मन को भाती है (प्रभू की रजा में चलना ही सही रास्ता है)। 11। हे मेरे मालिक ! मैं आपके कौन-कौन से गुण बयान करूँ। आप सब जीवों के दिल की जानने वाला है। हे करतार ! मैं आपसे ही यह दान माँगता हूँ कि मैं हर वक्त आपका नाम उचारता रहूँ। 12। हे भाई ! किसी के अंदर अच्छा बोल सकने के अहंकार की ताकत है। किसी को माया के आसरे का भरोसा है। मुझे परमात्मा के बिना और कोई आसरा नहीं सहारा नहीं। हे करतार ! मेरी निमाणी की रक्षा आप ही कर। 13। हे स्वामी ! आप निमाणे का माण है। जो आपको अच्छा लगता है। वही आप करता है। (आपकी रज़ा से दूर जाने का यतन करके) बेअंत दुनिया दुखी हो-हो के जनम-मरण के चक्करों में पड़ती है। हे स्वामी ! आप जिनका पक्ष करता है। उनकी बात हर जगह मानी जाती है। 14। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने सदा परमात्मा का नाम सिमरा। उन्हों ने गुरू की कृपा से सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लिया। हे भाई ! जिस मनुष्य ने परमात्मा की सेवा-भक्ति की। उसने सुख पाया। प्रभू की सेवा-भक्ति के बिना दुनिया पछताती (ही) है। 15। हे हरी ! आप जगत का नाथ है। आप सबमें व्यापक है। हे भाई ! वही मनुष्य परमात्मा का नाम जपता है जिसके माथे पर गुरू का हाथ होता है। हे भाई ! (मैं भी) हरी की शरण पड़ा हूँ। मैं भी हरी का नाम जपता हूँ। दास नानक हरी के दासों का दास है। 16। 2।
मारू सोलहे महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कला उपाइ धरी जिनि धरणा ॥
गगनु रहाइआ हुकमे चरणा ॥
अगनि उपाइ ईधन महि बाधी सो प्रभु राखै भाई हे ॥1॥
जीअ जंत कउ रिजकु संबाहे ॥
करण कारण समरथ आपाहे ॥
खिन महि थापि उथापनहारा सोई तेरा सहाई हे ॥2॥
मात गरभ महि जिनि प्रतिपालिआ ॥
सासि ग्रासि होइ संगि समालिआ ॥
सदा सदा जपीऐ सो प्रीतमु वडी जिसु वडिआई हे ॥3॥
सुलतान खान करे खिन कीरे ॥
गरीब निवाजि करे प्रभु मीरे ॥
गरब निवारण सरब सधारण किछु कीमति कही न जाई हे ॥4॥
सो पतिवंता सो धनवंता ॥
जिसु मनि वसिआ हरि भगवंता ॥
मात पिता सुत बंधप भाई जिनि इह स्रिसटि उपाई हे ॥5॥
प्रभ आए सरणा भउ नही करणा ॥
साधसंगति निहचउ है तरणा ॥
मन बच करम अराधे करता तिसु नाही कदे सजाई हे ॥6॥
गुण निधान मन तन महि रविआ ॥
जनम मरण की जोनि न भविआ ॥
दूख बिनास कीआ सुखि डेरा जा त्रिपति रहे आघाई हे ॥7॥
मीतु हमारा सोई सुआमी ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: मारू सोलहे महला 5 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! जिस परमात्मा ने (अपने ही अंदर से) शक्ति पैदा करके धरती की सृजना की है। जिसने अपने हुकम का ही आसरा दे के आकाश को स्तंभ दिया हुआ है। जिसने आग पैदा करके इसको ईधन (लकड़ियों) में बाँध रखा है। वही परमात्मा (सब जीवों की) रक्षा करता है। 1। हे भाई ! जो परमात्मा सारे ही जीवों को रिज़क पहुँचाता है। जो सृष्टि का मूल है। जो सब ताकतों का मालिक व निर्लिप है। जो एक छिन में पैदा करके नाश करने की समर्थता रखता है। वही परमात्मा (हर वक्त) आपका भी मददगार है। 2। हे भाई ! जिस परमात्मा ने माँ के पेट में (आपकी) पालना की। आपके हरेक सांस के साथ आपकी हरेक ग्रास के साथ आपका संगी बन के आपकी संभाल की। जिस परमात्मा की इतनी बड़ी वडिआई है। उस प्रीतम प्रभू को सदा ही सदा ही जपना चाहिए। 3। हे भाई ! वह परमात्मा बादशाहों और खानों को एक छिन में कीड़े (कंगाल) बना देता है। गरीबों को ऊँचे करके अमीर बना देता है। वह परमात्मा (अहंकारियों का) अहंकार दूर करने वाला है। वह परमात्मा सबका आसरा है। हे भाई ! उसका मूल्य नहीं डाला सकता। 4। वह (असल) इज्जतदार है। वही (असल) धनाढ है। हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में हरी भगवान आ बसता है। जिस परमात्मा ने यह सृष्टि पैदा की है। वही है माता-पिता। वही है पुत्र-रिश्तेदार और भाई (वही है हमेशा साथ निभने वाला संबंधी)। 5। हे भाई ! प्रभू की शरण पड़ने से किसी किस्म के डर की आवश्यक्ता नहीं रहती। हे भाई ! गुरू की संगत में रहने से अवश्य (सारे डरों से) पार-उतारा हो जाता है। जो मनुष्य अपने मन से वचनों से कर्मों से करतार हरी की आराधना करता रहता है। उसको कभी कोई कष्ट छू नहीं सकता। 6। हे भाई ! जो मनुष्य अपने मन में अपने तन में परमात्मा को याद रखता है। वह जनम-मरण के चक्र में नहीं भटकता। उसके सारे दुखों का नाश हो जाता है। वह सदा के लिए आत्मिक आनंद में ठिकाना बना लेता है। क्योंकि वह (तृष्णा की ओर से) पूरी तौर पर तृप्त होता है। 7। हे भाई ! वही मालिक प्रभू हम जीवों का (असल) मित्र है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! अहंकार में की हुई सेवा-भगती परवान नहीं होती।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
English