भगता मुखि अंम्रित है बाणी ॥
गुरमुखि हरि नामु आखि वखाणी ॥
हरि हरि करत सदा मनु बिगसै हरि चरणी मनु लाई हे ॥13॥
हम मूरख अगिआन गिआनु किछु नाही ॥
सतिगुर ते समझ पड़ी मन माही ॥
होहु दइआलु क्रिपा करि हरि जीउ सतिगुर की सेवा लाई हे ॥14॥
जिनि सतिगुरु जाता तिनि एकु पछाता ॥
सरबे रवि रहिआ सुखदाता ॥
आतमु चीनि परम पदु पाइआ सेवा सुरति समाई हे ॥15॥
जिन कउ आदि मिली वडिआई ॥
सतिगुरु मनि वसिआ लिव लाई ॥
आपि मिलिआ जगजीवनु दाता नानक अंकि समाई हे ॥16॥1॥
हरि अगम अगोचरु सदा अबिनासी ॥
सरबे रवि रहिआ घट वासी ॥
तिसु बिनु अवरु न कोई दाता हरि तिसहि सरेवहु प्राणी हे ॥1॥
जा कउ राखै हरि राखणहारा ॥ ता कउ कोइ न साकसि मारा ॥
सो ऐसा हरि सेवहु संतहु जा की ऊतम बाणी हे ॥2॥
जा जापै किछु किथाऊ नाही ॥
ता करता भरपूरि समाही ॥
सूके ते फुनि हरिआ कीतोनु हरि धिआवहु चोज विडाणी हे ॥3॥
जो जीआ की वेदन जाणै ॥
तिसु साहिब कै हउ कुरबाणै ॥
तिसु आगै जन करि बेनंती जो सरब सुखा का दाणी हे ॥4॥
जो जीऐ की सार न जाणै ॥
तिसु सिउ किछु न कहीऐ अजाणै ॥
मूरख सिउ नह लूझु पराणी हरि जपीऐ पदु निरबाणी हे ॥5॥
ना करि चिंत चिंता है करते ॥
हरि देवै जलि थलि जंता सभतै ॥
अचिंत दानु देइ प्रभु मेरा विचि पाथर कीट पखाणी हे ॥6॥
ना करि आस मीत सुत भाई ॥
ना करि आस किसै साह बिउहार की पराई ॥
बिनु हरि नावै को बेली नाही हरि जपीऐ सारंगपाणी हे ॥7॥
अनदिनु नामु जपहु बनवारी ॥
सभ आसा मनसा पूरै थारी ॥
जन नानक नामु जपहु भव खंडनु सुखि सहजे रैणि विहाणी हे ॥8॥
जिनि हरि सेविआ तिनि सुखु पाइआ ॥
सहजे ही हरि नामि समाइआ ॥
जो सरणि परै तिस की पति राखै जाइ पूछहु वेद पुराणी हे ॥9॥
जिसु हरि सेवा लाए सोई जनु लागै ॥
गुर कै सबदि भरम भउ भागै ॥
विचे ग्रिह सदा रहै उदासी जिउ कमलु रहै विचि पाणी हे ॥10॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! गुरू के द्वारा नाम में ही लीन हो के वह मनुष्य (परमात्मा में) लीन रहता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।