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अंग १०६९ · मारू

अंग
1069
मारू
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  1. सद ही नेड़ै दूरि न जाणहु ॥
  2. सचा आपि सवारणहारा ॥

सद ही नेड़ै दूरि न जाणहु ॥

अंग १०६८ से चला आ रहा अंश

सद ही नेड़ै दूरि न जाणहु ॥
गुर कै सबदि नजीकि पछाणहु ॥
बिगसै कमलु किरणि परगासै परगटु करि देखाइआ ॥15॥
आपे करता सचा सोई ॥
आपे मारि जीवाले अवरु न कोई ॥
नानक नामु मिलै वडिआई आपु गवाइ सुखु पाइआ ॥16॥2॥24॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! परमात्मा सदा ही (हमारे) नजदीक रहता है। उसको (कभी भी अपने से) दूर ना समझो। गुरू के शबद में जुड़ के उसको अपने अंग-संग बसता देखो। हे भाई ! (जो मनुष्य परमात्मा को अपने साथ बसता देखता है उसका हृदय-) कमल फूल खिला रहता है। (उसके अंदर ईश्वरीय ज्योति की) किरण (आत्मिक जीवन का) प्रकाश कर देती है। (गुरू उस मनुष्य को परमात्मा) प्रत्यक्ष करके दिखा देता है। 15। हे नानक ! वह करतार स्वयं ही सदा कायम रहने वाला है। वह स्वयं ही मार के जीवित करता है (भाव। मारता भी खुद ही है। पैदा भी करता खुद ही है)। उसके बिना कोई और ऐसी समर्थता वाला है ही नहीं। हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा का नाम मिल जाता है उसको (लोक-परलोक की) शोभा मिल जाती है। वह मनुष्य (अपने अंदर से) स्वै-भाव दूर कर के आत्मिक आनंद लेता रहता है। 16। 2। 24।

सचा आपि सवारणहारा ॥

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मारू सोलहे महला 4
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सचा आपि सवारणहारा ॥
अवर न सूझसि बीजी कारा ॥
गुरमुखि सचु वसै घट अंतरि सहजे सचि समाई हे ॥1॥
सभना सचु वसै मन माही ॥
गुर परसादी सहजि समाही ॥
गुरु गुरु करत सदा सुखु पाइआ गुर चरणी चितु लाई हे ॥2॥
सतिगुरु है गिआनु सतिगुरु है पूजा ॥
सतिगुरु सेवी अवरु न दूजा ॥
सतिगुर ते नामु रतन धनु पाइआ सतिगुर की सेवा भाई हे ॥3॥
बिनु सतिगुर जो दूजै लागे ॥
आवहि जाहि भ्रमि मरहि अभागे ॥
नानक तिन की फिरि गति होवै जि गुरमुखि रहहि सरणाई हे ॥4॥
गुरमुखि प्रीति सदा है साची ॥
सतिगुर ते मागउ नामु अजाची ॥
होहु दइआलु क्रिपा करि हरि जीउ रखि लेवहु गुर सरणाई हे ॥5॥
अंम्रित रसु सतिगुरू चुआइआ ॥
दसवै दुआरि प्रगटु होइ आइआ ॥
तह अनहद सबद वजहि धुनि बाणी सहजे सहजि समाई हे ॥6॥
जिन कउ करतै धुरि लिखि पाई ॥
अनदिनु गुरु गुरु करत विहाई ॥
बिनु सतिगुर को सीझै नाही गुर चरणी चितु लाई हे ॥7॥
जिसु भावै तिसु आपे देइ ॥
गुरमुखि नामु पदारथु लेइ ॥
आपे क्रिपा करे नामु देवै नानक नामि समाई हे ॥8॥
गिआन रतनु मनि परगटु भइआ ॥
नामु पदारथु सहजे लइआ ॥
एह वडिआई गुर ते पाई सतिगुर कउ सद बलि जाई हे ॥9॥
प्रगटिआ सूरु निसि मिटिआ अंधिआरा ॥
अगिआनु मिटिआ गुर रतनि अपारा ॥
सतिगुर गिआनु रतनु अति भारी करमि मिलै सुखु पाई हे ॥10॥
गुरमुखि नामु प्रगटी है सोइ ॥
चहु जुगि निरमलु हछा लोइ ॥
नामे नामि रते सुखु पाइआ नामि रहिआ लिव लाई हे ॥11॥
गुरमुखि नामु परापति होवै ॥
सहजे जागै सहजे सोवै ॥

हिन्दी अर्थ: मारू सोलहे महला 4 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! सदा कायम रहने वाला परमात्मा स्वयं ही उसका जीवन सुंदर बनाने की समर्थता रखता है। उसको (प्रभू की याद के बिना) कोई और दूसरी कार नहीं सूझती। पर। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। उसके हृदय में सदा कायम रहने वाला परमात्मा आ बसता है। वह आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। वह सदा-स्थिर प्रभू में लीन रहता है। 1। हे भाई ! (वैसे तो) सदा-स्थिर प्रभू सब जीवों के मन में बसता है। पर गुरू की कृपा से ही (जीव) आत्मिक अडोलता में (टिक के प्रभू में) लीन होते हैं। गुरू को हर वक्त याद करते हुए मनुष्य आत्मिक आनंद पाता है। गुरू के चरणों में चित्त जोड़े रखता है। 2। हे भाई ! गुरू आत्मिक जीवन की सूझ (देने वाला) है। गुरू परमात्मा की (भगती (सिखाने वाला) है। मैं तो गुरू की ही शरण पड़ता हूँ। कोई और दूसरा (मैं अपने मन में) नहीं (लाता)। मैंने गुरू से श्रेष्ठ नाम-धन पाया है। मुझे गुरू की (बताई हुई) सेवा अच्छी लगती है। 3। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू को छोड़ के और तरफ लगते हैं। वह अभागे व्यक्ति भटकना में पड़ कर आत्मिक मौत सहेड़ते हैं। वे जनम-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं। हे नानक ! (कह-) उन मनुष्यों की ही फिर ऊँची आत्मिक अवस्था बनती है जो गुरू की शरण पड़ते हैं। 4। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। उसकी प्रभू से प्रीति पक्की होती है। (वह हर समय इस प्रकार अरदास करता रहता है-) मैं गुरू से (आपका) अमूल्य नाम माँगता हूँ। हे हरी ! दयावान हो। कृपा कर। मुझे गुरू की शरण में रख। 5। हे भाई ! गुरू (जिस मनुष्य के हृदय में) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पैदा करता है। (परमात्मा) उसके सोच-मंडल में प्रकट हो जाता है। उस अवस्था में उस मनुष्य के अंदर सिफत सालाह की बाणी से (इस प्रकार) आत्मिक आनंद पैदा होता है (जैसे। मानो वहाँ) पाँच किस्मों के साज़ बज रहे हैं। वह मनुष्य हर वक्त आत्मिक आनंद में लीन रहता है। 6। पर। हे भाई ! (आत्मिक आनंद की यह दाति उन्हें ही मिलती है) जिनके भाग्यों में करतार ने धुर दरगाह से लिख के रख दी है। उनकी उम्र सदा गुरू को याद करते हुए बीतती है। हे भाई ! गुरू की शरण पड़े बिना कोई मनुष्य (जिंदगी में) सफल नहीं होता। आप सदा गुरू के चरणों में अपना चित्त जोड़े रख। 7। हे भाई ! जो जीव उस परमात्मा को प्यारा लगता है उसको वह स्वयं ही (नाम की दाति) देता है। वह मनुष्य गुरू से यह कीमती नाम हासिल करता है। हे नानक ! (कह-) जिसके ऊपर वह प्रभू कृपा करता है उसको अपना नाम देता है। वह मनुष्य नाम में लीन रहता है। 8। हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में आत्मिक जीवन की श्रेष्ठ सूझ उभर आई। उसने आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा का कीमती नाम पा लिया। पर यह वडिआई गुरू से (ही) मिलती है। मैं सदा ही गुरू से सदके जाता हूँ। 9। हे भाई ! (जैसे जब) सूरज चढ़ता है (तब) रात का अंधेरा मिट जाता है। (इसी तरह) गुरू के बेअंत कीमती ज्ञान-रत्न से अज्ञान-अंधेरा दूर हो जाता है। हे भाई ! गुरू का (दिया हुआ) 'ज्ञान रत्न' बहुत ही कीमती है। परमात्मा की मेहर से जिसको यह मिलता है। वह आत्मिक आनंद पाता है। 10। हे भाई ! गुरू के द्वारा जिसको हरी-नाम प्राप्त होता है। उसकी शोभा पसर जाती है। वह सदा के लिए पवित्र जीवन वाला हो जाता है। वह सारे जगत में अच्छा माना जाता है। हे भाई ! हर वक्त हरी-नाम में रंगे रहने के कारण वह सुख पाता है। वह हरी-नाम में हर वक्त सुरति जोड़े रखता है। 11। हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू के द्वारा हरी-नाम हासिल होता है। वह जागता और सोया हुआ हर समय आत्मिक अडोलता में टिका रहता है (आत्मिक अडोलता में जागता है आत्मिक अडोलता में सोता है)।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1069 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी; महला ४: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०६९ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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