गुर परसादी नदरि निहारा ॥
जल थल महीअल सभि त्रिपताणे साधू चरन पखाली जीउ ॥3॥
मन की इछ पुजावणहारा ॥
सदा सदा जाई बलिहारा ॥
नानक दानु कीआ दुख भंजनि रते रंगि रसाली जीउ ॥4॥32॥39॥
मनु तनु तेरा धनु भी तेरा ॥
तूं ठाकुरु सुआमी प्रभु मेरा ॥
जीउ पिंडु सभु रासि तुमारी तेरा जोरु गोपाला जीउ ॥1॥
सदा सदा तूंहै सुखदाई ॥
निवि निवि लागा तेरी पाई ॥
कार कमावा जे तुधु भावा जा तूं देहि दइआला जीउ ॥2॥
प्रभ तुम ते लहणा तूं मेरा गहणा ॥
जो तूं देहि सोई सुखु सहणा ॥
जिथै रखहि बैकुंठु तिथाई तूं सभना के प्रतिपाला जीउ ॥3॥
सिमरि सिमरि नानक सुखु पाइआ ॥
आठ पहर तेरे गुण गाइआ ॥
सगल मनोरथ पूरन होए कदे न होइ दुखाला जीउ ॥4॥33॥40॥
पारब्रहमि प्रभि मेघु पठाइआ ॥
जलि थलि महीअलि दह दिसि वरसाइआ ॥
सांति भई बुझी सभ त्रिसना अनदु भइआ सभ ठाई जीउ ॥1॥
सुखदाता दुख भंजनहारा ॥
आपे बखसि करे जीअ सारा ॥
अपने कीते नो आपि प्रतिपाले पइ पैरी तिसहि मनाई जीउ ॥2॥
जा की सरणि पइआ गति पाईऐ ॥
सासि सासि हरि नामु धिआईऐ ॥
तिसु बिनु होरु न दूजा ठाकुरु सभ तिसै कीआ जाई जीउ ॥3॥
तेरा माणु ताणु प्रभ तेरा ॥
तूं सचा साहिबु गुणी गहेरा ॥
नानकु दासु कहै बेनंती आठ पहर तुधु धिआई जीउ ॥4॥34॥41॥
सभे सुख भए प्रभ तुठे ॥
गुर पूरे के चरण मनि वुठे ॥
सहज समाधि लगी लिव अंतरि सो रसु सोई जाणै जीउ ॥1॥
अगम अगोचरु साहिबु मेरा ॥
घट घट अंतरि वरतै नेरा ॥
सदा अलिपतु जीआ का दाता को विरला आपु पछाणै जीउ ॥2॥
प्रभ मिलणै की एह नीसाणी ॥
मनि इको सचा हुकमु पछाणी ॥
सहजि संतोखि सदा त्रिपतासे अनदु खसम कै भाणै जीउ ॥3॥
हथी दिती प्रभि देवणहारै ॥
जनम मरण रोग सभि निवारे ॥
नानक दास कीए प्रभि अपुने हरि कीरतनि रंग माणे जीउ ॥4॥35॥42॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो प्रभू सब जीवों को दातें देने की समर्था रखता है उस प्रभू ने गुरू की कृपा से (मुझे भी) मेहर की निगाह से देखा (जिसकी कृपा से) पानी धरती व धरती के ऊपर के अंतरिक्ष के सारे जीव जंतु उ।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।