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अंग 106

अंग
106
राग माझ
राग: माझ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सरब जीआ कउ देवणहारा ॥
गुर परसादी नदरि निहारा ॥
जल थल महीअल सभि त्रिपताणे साधू चरन पखाली जीउ ॥3॥
मन की इछ पुजावणहारा ॥
सदा सदा जाई बलिहारा ॥
नानक दानु कीआ दुख भंजनि रते रंगि रसाली जीउ ॥4॥32॥39॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: जो प्रभू सब जीवों को दातें देने की समर्था रखता है उस प्रभू ने गुरू की कृपा से (मुझे भी) मेहर की निगाह से देखा (जिसकी कृपा से) पानी धरती व धरती के ऊपर के अंतरिक्ष के सारे जीव जंतु उसकी दातों से तृप्त हो रहे हैं। (और मेरे हृदय में नाम बरखा करके मुझे माया की तृष्णा की ओर से तृप्त कर दिया, तभी तो) मैं गुरू के चरण धोता हूँ। परमात्मा सब जीवों के मन की कामना पूरी करने वाला है। मैं उससे सदा ही सदा ही सदके जाता हूँ। हे नानक ! (जीवों के) दुख नाश करने वाले प्रभू ने (जिन्हें नाम की) दाति बख्शी वह उस सारे रसों के मालिक प्रभू के प्रेम में रंगे गए।4।32।39।
माझ महला 5 ॥
मनु तनु तेरा धनु भी तेरा ॥
तूं ठाकुरु सुआमी प्रभु मेरा ॥
जीउ पिंडु सभु रासि तुमारी तेरा जोरु गोपाला जीउ ॥1॥
सदा सदा तूंहै सुखदाई ॥
निवि निवि लागा तेरी पाई ॥
कार कमावा जे तुधु भावा जा तूं देहि दइआला जीउ ॥2॥
प्रभ तुम ते लहणा तूं मेरा गहणा ॥
जो तूं देहि सोई सुखु सहणा ॥
जिथै रखहि बैकुंठु तिथाई तूं सभना के प्रतिपाला जीउ ॥3॥
सिमरि सिमरि नानक सुखु पाइआ ॥
आठ पहर तेरे गुण गाइआ ॥
सगल मनोरथ पूरन होए कदे न होइ दुखाला जीउ ॥4॥33॥40॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ हेसृष्टि के पालक ! मुझे ये मन (जिंद) ये शरीर आपके से ही मिला है। (ये) धन भी आपका ही दिया हुआ है। आप मेरा पालणहार है। आप मेरा स्वामी है। आप मेरा मालिक है। ये जिंद ये शरीर सब आपका ही दिया हुआ है। हे गोपाल ! मुझे आपका ही मान तान है।1। हे दयाल प्रभू ! सदा से ही सदा से ही मुझे आप ही सुख देने वाला है। मैं सदा झुक झुक के आपके ही पैर लगता हूँ। जो आपकी रजा हैं तो मैं वही काम करूँ जो आप (करने के लिए) मुझे दे।2। हे प्रभू ! (सारे पदार्थ) मैंने आपके पास से ही लेने है (सदा लेता रहता हूँ)। आप ही मेरे आत्मिक जीवन की सुंदरता का उपाय है वसीला है। (सुख चाहे दुख) जो कुछ आप मुझे देता है मैं उसे सुख जान के सहता हूँ (कबूलता हूँ)। हे प्रभू ! आप सब जीवों की पालना करने वाला है। मुझे आप जहाँ रखता है मेरे वास्ते वही बैकुंठ (स्वर्ग) है।3। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) उसने आपका नाम सिमर सिमर के आत्मिक आनंद लिया है, जिस मनुष्य ने आठों पहर (हर वक्त) आपकी सिफत सलाह के गीत गाए हैं, उसकी सारी जरूरतें पूरी हो जाती है, वह कभी दुखी नहीं होता।4।33।40।
माझ महला 5 ॥
पारब्रहमि प्रभि मेघु पठाइआ ॥
जलि थलि महीअलि दह दिसि वरसाइआ ॥
सांति भई बुझी सभ त्रिसना अनदु भइआ सभ ठाई जीउ ॥1॥
सुखदाता दुख भंजनहारा ॥
आपे बखसि करे जीअ सारा ॥
अपने कीते नो आपि प्रतिपाले पइ पैरी तिसहि मनाई जीउ ॥2॥
जा की सरणि पइआ गति पाईऐ ॥
सासि सासि हरि नामु धिआईऐ ॥
तिसु बिनु होरु न दूजा ठाकुरु सभ तिसै कीआ जाई जीउ ॥3॥
तेरा माणु ताणु प्रभ तेरा ॥
तूं सचा साहिबु गुणी गहेरा ॥
नानकु दासु कहै बेनंती आठ पहर तुधु धिआई जीउ ॥4॥34॥41॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (जैसे, जब भी) पारब्रहम प्रभू ने बादल भेजे और पानी में धरती में आकाश में दसों दिशाओं में बरखा कर दी (जिसकी बरकति से जीवों के अंदर) ठंड पड़ गई, सभी की प्यास मिट गई और सब जगह खुशी ही खुशी छा गई (इस तरह अकाल-पुरख ने गुरू को भेजा जिसने प्रभू के नाम की बरखा की तो सब जीवों के हृदय में शांति पैदा हुई, सभी की माया की तृष्णा मिट गई, और सबके हृदयों में आत्मिक आनंद पैदा हुआ)।1। (सब जीवों को) सुख देने वाला (सबके) दुख दूर करने वाला परमात्मा खुद ही मिहर करके सब जीवों की संभाल करता है। प्रभू अपने पैदा किए जगत की स्वयं ही प्रतिपालना करता है। मैं उसके चरणों में गिर के उसे ही प्रसन्न करने का यत्न करता हूँ।2। (हे भाई !) जिस परमात्मा का आसरा लेने से उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त हो जाती है, उस हरी का नाम हरेक श्वास के साथ याद करते रहना चाहिए। उसके बिनां (उस जैसा) और कोई पालणहार नहीं। सारी जगहें उसी की हैं। (सब जीवों में वह स्वयं ही बस रहा है)।3। हे प्रभू ! मुझे आपका ही माण है। मुझे आपका ही आसरा है। आप सदा कायम रहने वाला मेरा मालिक है। आप सारे गुणों वाला है आपके गुणों की थाह नहीं पाई जा सकती। हे प्रभू ! (आपका) दास नानक ! (आपके आगे) विनती करता है (कि मेहर कर) मैं आठों पहर तूझे ही याद करता रहूँ।4।34।41।
माझ महला 5 ॥
सभे सुख भए प्रभ तुठे ॥
गुर पूरे के चरण मनि वुठे ॥
सहज समाधि लगी लिव अंतरि सो रसु सोई जाणै जीउ ॥1॥
अगम अगोचरु साहिबु मेरा ॥
घट घट अंतरि वरतै नेरा ॥
सदा अलिपतु जीआ का दाता को विरला आपु पछाणै जीउ ॥2॥
प्रभ मिलणै की एह नीसाणी ॥
मनि इको सचा हुकमु पछाणी ॥
सहजि संतोखि सदा त्रिपतासे अनदु खसम कै भाणै जीउ ॥3॥
हथी दिती प्रभि देवणहारै ॥
जनम मरण रोग सभि निवारे ॥
नानक दास कीए प्रभि अपुने हरि कीरतनि रंग माणे जीउ ॥4॥35॥42॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ जब प्रभू प्रसन्न हो तो (उसको) सारे सुख प्राप्त हो जातें हैं, (और उसकी मेहर से) पूरे गुरू के चरण (किसी बड़े भाग्यशाली के) मन में आ बसें, पर उस आनंद को वही मनुष्य समझता है जिसके अंदर (प्रभू मिलाप की) लगन हो जिसकी आत्मिक अडोलता वाली समाधि लगी हुई हो (अर्थात, जो सदैव आत्मिक अडोलता में टिका रहे)।1। (हे भाई !) मेरा मालिक प्रभू अपहुँच है। ज्ञानेंद्रियों की उस तक पहुँच नहीं हो सकती। (वैसे) वह हरेक के दिल में बस रहा है वह सब जीवों के नजदीक बसता है। (फिर भी) वह माया के प्रभाव से परे है, और सब जीवों को दातें देने वाला है (वह सब की जिंद जान है, सब की आत्मा है, सब का स्वै है) उस (सबके) स्वै (प्रभू) को कोई विरला मनुष्य ही पहचानता है।2। (हे भाई !) परमात्मा के मिलाप की निशानी ये है (कि जो उसके चरणों में जुड़ा रहता है वह) अपने मन में उस प्रभू का सदा कायम रहने वाला हुकम समझ लेता है (उसकी रजा में राजी रहता है)। जो मनुष्य पति प्रभू की रजा में रहते हैं, वह आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं। वे संतोषमयी जीवन व्यतीत करते हैं और (तृष्णा) की ओर से सदा तृप्त रहते हैं।3। (प्रभू की सिफत-सालाह मानो एक फक्की है) देवनहार प्रभू ने इस जीव-बाल को (इस फक्की की) तली दी, उसके जनम मरन के चक्कर में डालने वाले सारे रोग दूर कर दिए। हे नानक ! जिन्हें प्रभू ने अपना सेवक बना लिया, वे परमात्मा की सिफत-सालाह में (आत्मिक) आनंद लेते हैं।4।35।42।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो प्रभू सब जीवों को दातें देने की समर्था रखता है उस प्रभू ने गुरू की कृपा से (मुझे भी) मेहर की निगाह से देखा (जिसकी कृपा से) पानी धरती व धरती के ऊपर के अंतरिक्ष के सारे जीव जंतु उ।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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