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अंग १०६ · माझ

अंग
106
माझ
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  1. सरब जीआ कउ देवणहारा ॥
  2. मनु तनु तेरा धनु भी तेरा ॥
  3. पारब्रहमि प्रभि मेघु पठाइआ ॥
  4. सभे सुख भए प्रभ तुठे ॥

सरब जीआ कउ देवणहारा ॥

अंग १०५ से चला आ रहा अंश

सरब जीआ कउ देवणहारा ॥
गुर परसादी नदरि निहारा ॥
जल थल महीअल सभि त्रिपताणे साधू चरन पखाली जीउ ॥3॥
मन की इछ पुजावणहारा ॥
सदा सदा जाई बलिहारा ॥
नानक दानु कीआ दुख भंजनि रते रंगि रसाली जीउ ॥4॥32॥39॥

हिन्दी अर्थ: जो प्रभू सब जीवों को दातें देने की समर्था रखता है उस प्रभू ने गुरू की कृपा से (मुझे भी) मेहर की निगाह से देखा (जिसकी कृपा से) पानी धरती व धरती के ऊपर के अंतरिक्ष के सारे जीव जंतु उसकी दातों से तृप्त हो रहे हैं। (और मेरे हृदय में नाम बरखा करके मुझे माया की तृष्णा की ओर से तृप्त कर दिया, तभी तो) मैं गुरू के चरण धोता हूँ। परमात्मा सब जीवों के मन की कामना पूरी करने वाला है। मैं उससे सदा ही सदा ही सदके जाता हूँ। हे नानक ! (जीवों के) दुख नाश करने वाले प्रभू ने (जिन्हें नाम की) दाति बख्शी वह उस सारे रसों के मालिक प्रभू के प्रेम में रंगे गए।4।32।39।

मनु तनु तेरा धनु भी तेरा ॥

माझ महला 5 ॥
मनु तनु तेरा धनु भी तेरा ॥
तूं ठाकुरु सुआमी प्रभु मेरा ॥
जीउ पिंडु सभु रासि तुमारी तेरा जोरु गोपाला जीउ ॥1॥
सदा सदा तूंहै सुखदाई ॥
निवि निवि लागा तेरी पाई ॥
कार कमावा जे तुधु भावा जा तूं देहि दइआला जीउ ॥2॥
प्रभ तुम ते लहणा तूं मेरा गहणा ॥
जो तूं देहि सोई सुखु सहणा ॥
जिथै रखहि बैकुंठु तिथाई तूं सभना के प्रतिपाला जीउ ॥3॥
सिमरि सिमरि नानक सुखु पाइआ ॥
आठ पहर तेरे गुण गाइआ ॥
सगल मनोरथ पूरन होए कदे न होइ दुखाला जीउ ॥4॥33॥40॥

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ हेसृष्टि के पालक ! मुझे ये मन (जिंद) ये शरीर आपके से ही मिला है। (ये) धन भी आपका ही दिया हुआ है। आप मेरे पालणहार हैं। आप मेरे स्वामी हैं। आप मेरे मालिक हैं। ये जिंद ये शरीर सब आपका ही दिया हुआ है। हे गोपाल ! मुझे आपका ही मान तान है।1। हे दयाल प्रभू ! सदा से ही सदा से ही मुझे आप ही सुख देने वाले हैं। मैं सदा झुक झुक के आपके ही पैर लगता हूँ। जो आपकी रजा हो तो मैं वही काम करूँ जो आप (करने के लिए) मुझे दें।2। हे प्रभू ! (सारे पदार्थ) मैंने आपके पास से ही लेने है (सदा लेता रहता हूँ)। आप ही मेरे आत्मिक जीवन की सुंदरता का उपाय हैं वसीला हैं। (सुख चाहे दुख) जो कुछ आप मुझे देते हैं मैं उसे सुख जान के सहता हूँ (कबूलता हूँ)। हे प्रभू ! आप सब जीवों की पालना करने वाले हैं। मुझे आप जहाँ रखते हैं मेरे वास्ते वही बैकुंठ (स्वर्ग) है।3। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) उसने आपका नाम सिमर सिमर के आत्मिक आनंद लिया है, जिस मनुष्य ने आठों पहर (हर वक्त) आपकी सिफत सलाह के गीत गाए हैं, उसकी सारी जरूरतें पूरी हो जाती है, वह कभी दुखी नहीं होता।4।33।40।

पारब्रहमि प्रभि मेघु पठाइआ ॥

माझ महला 5 ॥
पारब्रहमि प्रभि मेघु पठाइआ ॥
जलि थलि महीअलि दह दिसि वरसाइआ ॥
सांति भई बुझी सभ त्रिसना अनदु भइआ सभ ठाई जीउ ॥1॥
सुखदाता दुख भंजनहारा ॥
आपे बखसि करे जीअ सारा ॥
अपने कीते नो आपि प्रतिपाले पइ पैरी तिसहि मनाई जीउ ॥2॥
जा की सरणि पइआ गति पाईऐ ॥
सासि सासि हरि नामु धिआईऐ ॥
तिसु बिनु होरु न दूजा ठाकुरु सभ तिसै कीआ जाई जीउ ॥3॥
तेरा माणु ताणु प्रभ तेरा ॥
तूं सचा साहिबु गुणी गहेरा ॥
नानकु दासु कहै बेनंती आठ पहर तुधु धिआई जीउ ॥4॥34॥41॥

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ (जैसे, जब भी) पारब्रहम प्रभू ने बादल भेजे और पानी में धरती में आकाश में दसों दिशाओं में बरखा कर दी (जिसकी बरकति से जीवों के अंदर) ठंड पड़ गई, सभी की प्यास मिट गई और सब जगह खुशी ही खुशी छा गई (इस तरह अकाल-पुरख ने गुरू को भेजा जिसने प्रभू के नाम की बरखा की तो सब जीवों के हृदय में शांति पैदा हुई, सभी की माया की तृष्णा मिट गई, और सबके हृदयों में आत्मिक आनंद पैदा हुआ)।1। (सब जीवों को) सुख देने वाला (सबके) दुख दूर करने वाला परमात्मा खुद ही मिहर करके सब जीवों की संभाल करता है। प्रभू अपने पैदा किए जगत की स्वयं ही प्रतिपालना करता है। मैं उसके चरणों में गिर के उसे ही प्रसन्न करने का यत्न करता हूँ।2। (हे भाई !) जिस परमात्मा का आसरा लेने से उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त हो जाती है, उस हरी का नाम हरेक श्वास के साथ याद करते रहना चाहिए। उसके बिनां (उस जैसा) और कोई पालणहार नहीं। सारी जगहें उसी की हैं। (सब जीवों में वह स्वयं ही बस रहा है)।3। हे प्रभू ! मुझे आपका ही माण है। मुझे आपका ही आसरा है। आप सदा कायम रहने वाले मेरे मालिक हैं। आप सारे गुणों वाले हैं आपके गुणों की थाह नहीं पाई जा सकती। हे प्रभू ! (आपका) दास नानक ! (आपके आगे) विनती करता है (कि मेहर कर) मैं आठों पहर आपको ही याद करता रहूँ।4।34।41।

सभे सुख भए प्रभ तुठे ॥

माझ महला 5 ॥
सभे सुख भए प्रभ तुठे ॥
गुर पूरे के चरण मनि वुठे ॥
सहज समाधि लगी लिव अंतरि सो रसु सोई जाणै जीउ ॥1॥
अगम अगोचरु साहिबु मेरा ॥
घट घट अंतरि वरतै नेरा ॥
सदा अलिपतु जीआ का दाता को विरला आपु पछाणै जीउ ॥2॥
प्रभ मिलणै की एह नीसाणी ॥
मनि इको सचा हुकमु पछाणी ॥
सहजि संतोखि सदा त्रिपतासे अनदु खसम कै भाणै जीउ ॥3॥
हथी दिती प्रभि देवणहारै ॥
जनम मरण रोग सभि निवारे ॥
नानक दास कीए प्रभि अपुने हरि कीरतनि रंग माणे जीउ ॥4॥35॥42॥

हिन्दी अर्थ: माझ महला 5 ॥ जब प्रभू प्रसन्न हो तो (उसको) सारे सुख प्राप्त हो जातें हैं, (और उसकी मेहर से) पूरे गुरू के चरण (किसी बड़े भाग्यशाली के) मन में आ बसें, पर उस आनंद को वही मनुष्य समझता है जिसके अंदर (प्रभू मिलाप की) लगन हो जिसकी आत्मिक अडोलता वाली समाधि लगी हुई हो (अर्थात, जो सदैव आत्मिक अडोलता में टिका रहे)।1। (हे भाई !) मेरा मालिक प्रभू अपहुँच है। ज्ञानेंद्रियों की उस तक पहुँच नहीं हो सकती। (वैसे) वह हरेक के दिल में बस रहा है वह सब जीवों के नजदीक बसता है। (फिर भी) वह माया के प्रभाव से परे है, और सब जीवों को दातें देने वाला है (वह सब की जिंद जान है, सब की आत्मा है, सब का स्वै है) उस (सबके) स्वै (प्रभू) को कोई विरला मनुष्य ही पहचानता है।2। (हे भाई !) परमात्मा के मिलाप की निशानी ये है (कि जो उसके चरणों में जुड़ा रहता है वह) अपने मन में उस प्रभू का सदा कायम रहने वाला हुकम समझ लेता है (उसकी रजा में राजी रहता है)। जो मनुष्य पति प्रभू की रजा में रहते हैं, वह आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं। वे संतोषमयी जीवन व्यतीत करते हैं और (तृष्णा) की ओर से सदा तृप्त रहते हैं।3। (प्रभू की सिफत-सालाह मानो एक फक्की है) देवनहार प्रभू ने इस जीव-बाल को (इस फक्की की) तली दी, उसके जनम मरन के चक्कर में डालने वाले सारे रोग दूर कर दिए। हे नानक ! जिन्हें प्रभू ने अपना सेवक बना लिया, वे परमात्मा की सिफत-सालाह में (आत्मिक) आनंद लेते हैं।4।35।42।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०६ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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