Lulla Family

अंग 1066

अंग
1066
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मारू महला 3 ॥
निरंकारि आकारु उपाइआ ॥
माइआ मोहु हुकमि बणाइआ ॥
आपे खेल करे सभि करता सुणि साचा मंनि वसाइदा ॥1॥
माइआ माई त्रै गुण परसूति जमाइआ ॥
चारे बेद ब्रहमे नो फुरमाइआ ॥
वर्हे माह वार थिती करि इसु जग महि सोझी पाइदा ॥2॥
गुर सेवा ते करणी सार ॥
राम नामु राखहु उरि धार ॥
गुरबाणी वरती जग अंतरि इसु बाणी ते हरि नामु पाइदा ॥3॥
वेदु पड़ै अनदिनु वाद समाले ॥
नामु न चेतै बधा जमकाले ॥
दूजै भाइ सदा दुखु पाए त्रै गुण भरमि भुलाइदा ॥4॥
गुरमुखि एकसु सिउ लिव लाए ॥
त्रिबिधि मनसा मनहि समाए ॥
साचै सबदि सदा है मुकता माइआ मोहु चुकाइदा ॥5॥
जो धुरि राते से हुणि राते ॥
गुर परसादी सहजे माते ॥
सतिगुरु सेवि सदा प्रभु पाइआ आपै आपु मिलाइदा ॥6॥
माइआ मोहि भरमि न पाए ॥
दूजै भाइ लगा दुखु पाए ॥
सूहा रंगु दिन थोड़े होवै इसु जादे बिलम न लाइदा ॥7॥
एहु मनु भै भाइ रंगाए ॥
इतु रंगि साचे माहि समाए ॥
पूरै भागि को इहु रंगु पाए गुरमती रंगु चड़ाइदा ॥8॥
मनमुखु बहुतु करे अभिमानु ॥
दरगह कब ही न पावै मानु ॥
दूजै लागे जनमु गवाइआ बिनु बूझे दुखु पाइदा ॥9॥
मेरै प्रभि अंदरि आपु लुकाइआ ॥
गुर परसादी हरि मिलै मिलाइआ ॥
सचा प्रभु सचा वापारा नामु अमोलकु पाइदा ॥10॥
इसु काइआ की कीमति किनै न पाई ॥
मेरै ठाकुरि इह बणत बणाई ॥
गुरमुखि होवै सु काइआ सोधै आपहि आपु मिलाइदा ॥11॥
काइआ विचि तोटा काइआ विचि लाहा ॥
गुरमुखि खोजे वेपरवाहा ॥
गुरमुखि वणजि सदा सुखु पाए सहजे सहजि मिलाइदा ॥12॥
सचा महलु सचे भंडारा ॥
आपे देवै देवणहारा ॥
गुरमुखि सालाहे सुखदाते मनि मेले कीमति पाइदा ॥13॥
काइआ विचि वसतु कीमति नही पाई ॥
गुरमुखि आपे दे वडिआई ॥
जिस दा हटु सोई वथु जाणै गुरमुखि देइ न पछोताइदा ॥14॥
हरि जीउ सभ महि रहिआ समाई ॥
गुर परसादी पाइआ जाई ॥
आपे मेलि मिलाए आपे सबदे सहजि समाइदा ॥15॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 3॥ (उस मनुष्य को ये निश्चय हो जाता है कि) आकार-रहित परमात्मा ने (अपने आप से पहले) ये दिखाई देता जगत पैदा किया। और माया का मोह भी उसने अपने हुकम में ही बना दिया। जो मनुष्य सदा कायम रहने वाले परमात्मा का नाम (गुरू से) सुन के अपने मन में बसाता है (वह समझता है की) करतार स्वयं ही यह सारे खेल कर रहा है। 1। (हे भाई ! हरी-नाम को अपने मन में बसाने वाला मनुष्य यह निश्चय रखता है कि) (जगत की) माँ माया से (जगत के पिता परमात्मा ने सारे) त्रैगुणी जीव पैदा किए (ब्रहमा। शिव आदि भी उसी ने पैदा किए)। ब्रहमा को उसने चार वेद (रचने के लिए) हुकम किया। वर्ष। महीने। वार। तिथिएं (आदि) बना के इस जगत में (समय आदि की) सूझ भी वह परमात्मा ही पैदा करने वाला है। 2। हे भाई ! (परमात्मा की मेहर से जिसको गुरू मिल गया) गुरू की शरण पड़ने से उसको ये श्रेष्ठ करने-योग्य कर्म मिल गया कि परमात्मा का नाम अपने दिल में बसाए रखो। सो। हे भाई ! इस जगत में (जिस मनुष्य के हृदय में) गुरू की बाणी आ बसती है। वह इस बाणी की बरकति से परमात्मा का नाम प्राप्त कर लेता है। 3। (पर। हे भाई !) जो मनुष्य गुरू की शरण से वंचित रह के वेद (आदि ही) पढ़ता है। और। हर वक्त चर्चा आदि ही करता है। परमात्मा का नाम नहीं सिमरता वह आत्मिक मौत के बँधनों में बंधा रहता है। अन्य ही प्यार में फस के वह सदा दुख पाता है। माया के तीन गुणों की भटकना में पड़ के वह जीवन के गलत रास्ते पर पड़ा रहता है। 4। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य सिर्फ परमात्मा के साथ प्यार डालता है। (इस तरह वह) माया के तीन गुणों के कारण पैदा होने वाले फुरनों को अपने मन में ही खत्म कर देता है। सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह के शबद की बरकति से वह मनुष्य (विकारों से) सदा बचा रहता है। (वह अपने अंदर से) माया का मोह दूर कर लेता है। 5। पर। हे भाई ! इस मानस जन्म में वह मनुष्य ही नाम-रंग में रंगे रहते हैं जो (पूर्व जनम की की कमाई के अनुसार) धुर दरगाह से रंगे हुए होते हैं। वे गुरू की कृपा से आत्मिक अडोलता में मस्त रहते हैं। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर मनुष्य सदा प्रभू का मिलाप प्राप्त करे रखता है। वह अपने आप को (प्रभू के) आपे में मिला लेता है। 6। हे भाई ! माया के मोह में। भटकना में फसा हुआ मनुष्य परमात्मा को नहीं मिल सकता। और और प्यार में लगा हुआ मनुष्य दुख (ही) सहता है। (कुसंभ के रंग की तरह माया का) शोख़-रंग थोड़े दिन ही रहता है। इसके फीका पड़ने में वक्त नहीं लगता। 7। हे भाई ! जो मनुष्य (अपने) इस मन को परमात्मा के डर-अदब में प्यार में रहता है। वह इस रंग में रंग के सदा-स्थिर परमात्मा में लीन रहता है। पर कोई विरला मनुष्य बड़ी किस्मत से ये प्रेम-रंग हासिल करता है। वह गुरू की मति पर चल कर यह रंग (अपने मन को) चढ़ाता है। 8। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य बड़ा अहंकार करता है। पर वह परमात्मा की हजूरी में कभी भी आदर नहीं पाता। और-और (मोह) में लग के वह अपना मानस जन्म गवा लेता है। सही जीवन की समझ के बिना वह सदा दुख पाता है। 9। हे भाई ! मेरे प्रभू ने अपने आप को (हरेक जीव के) अंदर गुप्त रखा हुआ है। (फिर भी) गुरू की कृपा से ही मिलाए मिलता है। (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है वह यह समझ लेता है कि) परमात्मा सदा कायम रहने वाला है। उसका नाम जपना ही सही वाणज्य व्यापार है। (गुरू की कृपा से वह) कीमती हरी-नाम प्राप्त करि लेता है। 10। हे भाई ! (अपनी बुद्धि के आसरे) किसी व्यक्ति ने इस (मनुष्य-) शरीर की कद्र नहीं समझी। मेरे मालिक प्रभू ने यही मर्यादा बना रखी है कि जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है वह (अपने) शरीर को विकारों से बचाए रखता है। और स्वै भाव को अपने में ही लीन कर देता है। 11। हे भाई ! (हरी-नाम से टूटने से) शरीर के अंदर (आत्मिक जीवन का) घाटा पड़ता जाता है (नाम में जुड़ने से) शरीर के अंदर (आत्मिक जीवन का) लाभ प्राप्त होता है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य बेपरवाह प्रभू को (अपने शरीर में) तलाशता है। नाम-व्यापार करके वह सदा सुख पाता है और हर वक्त अपने आप को आत्मिक अडोलता में टिकाए रखता है। 12। हे भाई ! परमात्मा का ठिकाना सदा कायम रहने वाला है। उसके खजाने (भी) सदा कायम रहने वाले हैं। सब कुछ देने की समर्थता वाला परमात्मा स्वयं ही (जीवों को यह खजाने) देता है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य सारे सुख देने वाला परमात्मा की सिफतसालाह करता है। उसको अपने मन में संभाल के रखता है। उस (के नाम) की कद्र समझता है। 13। हे भाई ! मनुष्य के शरीर में ही नाम-पदार्थ है। पर मनुष्य इस की कद्र नहीं समझता। गुरू के सन्मुख करके (परमात्मा) स्वयं ही (अपने नाम की कद्र करने की) वडिआई महानता बख्शता है। हे भाई ! इस परमात्मा का (बनाया हुआ यह मनुष्य-शरीर-) हाट है। वह (इसमें रखे हुए नाम-) पदार्थ (की कद्र) को जानता है। (वह प्रभू ये दाति) गुरू के माध्यम से देता है। (दे के) पछताता नहीं। 14। हे भाई ! परमात्मा सब जीवों में व्यापक है। (पर फिर भी वह) गुरू की कृपा से उसे मिलता है। वह स्वयं ही (गुरू के साथ) मिला के (अपने साथ) मिलाता है। गुरू के शबद से (प्रभू जीव को) आत्मिक अडोलता में टिकाए रखता है। 15।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “मारू महला 3॥ (उस मनुष्य को ये निश्चय हो जाता है कि) आकार-रहित परमात्मा ने (अपने आप से पहले) ये दिखाई देता जगत पैदा किया।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
English