Lulla Family

अंग १०६५ · मारू

अंग
1065
मारू
अंग बदलें या अंश चुनें · १ अंश

१ से १४३० तक कोई अंक लिखिए।

  1. हरि चेतहि तिन बलिहारै जाउ ॥

हरि चेतहि तिन बलिहारै जाउ ॥

अंग १०६४ से चला आ रहा अंश

हरि चेतहि तिन बलिहारै जाउ ॥
गुर कै सबदि तिन मेलि मिलाउ ॥
तिन की धूरि लाई मुखि मसतकि सतसंगति बहि गुण गाइदा ॥2॥
हरि के गुण गावा जे हरि प्रभ भावा ॥
अंतरि हरि नामु सबदि सुहावा ॥
गुरबाणी चहु कुंडी सुणीऐ साचै नामि समाइदा ॥3॥
सो जनु साचा जि अंतरु भाले ॥ गुर कै सबदि हरि नदरि निहाले ॥
गिआन अंजनु पाए गुर सबदी नदरी नदरि मिलाइदा ॥4॥
वडै भागि इहु सरीरु पाइआ ॥
माणस जनमि सबदि चितु लाइआ ॥
बिनु सबदै सभु अंध अंधेरा गुरमुखि किसहि बुझाइदा ॥5॥
इकि कितु आए जनमु गवाए ॥
मनमुख लागे दूजै भाए ॥
एह वेला फिरि हाथि न आवै पगि खिसिऐ पछुताइदा ॥6॥
गुर कै सबदि पवित्रु सरीरा ॥
तिसु विचि वसै सचु गुणी गहीरा ॥
सचो सचु वेखै सभ थाई सचु सुणि मंनि वसाइदा ॥7॥
हउमै गणत गुर सबदि निवारे ॥
हरि जीउ हिरदै रखहु उर धारे ॥
गुर कै सबदि सदा सालाहे मिलि साचे सुखु पाइदा ॥8॥
सो चेते जिसु आपि चेताए ॥
गुर कै सबदि वसै मनि आए ॥
आपे वेखै आपे बूझै आपै आपु समाइदा ॥9॥
जिनि मन विचि वथु पाई सोई जाणै ॥
गुर कै सबदे आपु पछाणै ॥
आपु पछाणै सोई जनु निरमलु बाणी सबदु सुणाइदा ॥10॥
एह काइआ पवितु है सरीरु ॥
गुर सबदी चेतै गुणी गहीरु ॥
अनदिनु गुण गावै रंगि राता गुण कहि गुणी समाइदा ॥11॥
एहु सरीरु सभ मूलु है माइआ ॥
दूजै भाइ भरमि भुलाइआ ॥
हरि न चेतै सदा दुखु पाए बिनु हरि चेते दुखु पाइदा ॥12॥
जि सतिगुरु सेवे सो परवाणु ॥
काइआ हंसु निरमलु दरि सचै जाणु ॥
हरि सेवे हरि मंनि वसाए सोहै हरि गुण गाइदा ॥13॥
बिनु भागा गुरु सेविआ न जाइ ॥
मनमुख भूले मुए बिललाइ ॥
जिन कउ नदरि होवै गुर केरी हरि जीउ आपि मिलाइदा ॥14॥
काइआ कोटु पके हटनाले ॥
गुरमुखि लेवै वसतु समाले ॥
हरि का नामु धिआइ दिनु राती ऊतम पदवी पाइदा ॥15॥
आपे सचा है सुखदाता ॥
पूरे गुर कै सबदि पछाता ॥
नानक नामु सलाहे साचा पूरै भागि को पाइदा ॥16॥7॥21॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा का सिमरन करते हैं। मैं उनसे कुर्बान जाता हूँ। गुरू के शबद की बरकति से मैं उनकी संगति में मिलता हूँ। हे भाई ! जो मनुष्य साध-संगति में बैठ के परमात्मा के गुण गाते हैं। मैं उन (के चरणों) की धूल अपने मुँह पर अपने माथे पर लगाता हूँ। 2। हे भाई ! मैं परमात्मा के गुण तब ही गा सकता हूँ यदि मैं उसे अच्छा लगूँ (अगर मेरे पर उसकी मेहर हो)। हे भाई ! यदि मेरे दिल में परमात्मा का नाम बस जाए। तो गुरू के शबद की बरकति से मेरा जीवन सुंदर बन जाता है। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की बाणी में जुड़ता है। वह सारे संसार में प्रकट हो जाता है। नाम में लीन रहने से मनुष्य सदा कायम रहने वाले परमात्मा में समाया रहता है। 3। हे भाई ! जो मनुष्य अपने हृदय को खोजता रहता है। वह मनुष्य (विकारों से) अडोल जीवन वाला बन जाता है। गुरू के शबद में जुड़ने से परमात्मा मेहर की निगाह से देखता है। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद से आत्मिक जीवन की सूझ का सुरमा प्रयोग करता है। मेहर का मालिक परमात्मा उसको अपनी मेहर से (अपने चरणों में) मिला लेता है। 4। हे भाई ! ये मनुष्य-शरीर बड़ी किस्मत से मिलता है। (पर उसी को ही मिला जानो। जिस ने) मनुष्य जनम में (आ के) गुरू के शबद में अपना मन जोड़ा। किसी विरले को ही गुरू के द्वारा परमात्मा ये समझ बख्शता है कि गुरू के शबद के बिना (जीवन-यात्रा में मनुष्य के लिए) हर जगह घोर अंधकार है। 5। हे भाई ! कई मनुष्य मानस-जन्म गवा के जगत में व्यर्थ ही आए (समझो) क्योंकि अपने मन के पीछे चलने वाले वह लोग माया के प्यार में ही लगे रहे। हे भाई ! मानस-जनम वाला यह समय फिर नहीं मिलता (इसको विकारों में गवा के) मौत आने पर मनुष्य पछताता है। 6। हे भाई ! गुरू के शबद में जुड़ के (जिस मनुष्य का) शरीर (विकारों से) पवित्र रहता है। उस मनुष्य के इस शरीर में वह परमात्मा आ बसता है जो सदा कायम रहने वाला है जो सारे गुणों का मालिक है और जो बड़े जिगरे वाला है वह मनुष्य (फिर) हर जगह सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा को ही देखता है। सदा स्थिर हरी-नाम को सुन के अपने मन में बसाए रखता है। 7। हे भाई ! अहंकार की गिनतियाँ (मनुष्य) गुरू के शबद द्वारा ही दूर कर सकता है। (इसलिए। हे भाई ! गुरू के शबद से) परमात्मा को अपने हृदय में बसाए रखो। जो मनुष्य गुरू के शबद से सदा परमात्मा की सिफतसालाह करता रहता है। वह सदा स्थिर प्रभू में जुड़ के आत्मिक आनंद पाता है। 8। हे भाई ! परमात्मा का नाम वह मनुष्य (ही) सिमरता है जिसको परमात्मा स्वयं सिमरन के लिए प्रेरित करता है। गुरू के शबद के द्वारा परमात्मा उसके मन में बसता है। (हरेक में व्यापक परमात्मा) स्वयं ही (उस मनुष्य के हरेक काम को) देखता है। स्वयं ही (उसके दिल की) समझता है। और (खुद ही उस मनुष्य में बसता हुआ) अपने आप को अपने आप में लीन करता है। 9। हे भाई ! (परमात्मा की कृपा से) जिस (मनुष्य) ने परमात्मा का नाम-पदार्थ (अपने) मन में पा लिया। वह ही (उसकी कद्र) समझता है। गुरू के शबद से (वह मनुष्य) अपने जीवन को पड़तालता रहता है। (जो मनुष्य) अपने जीवन को पड़तालता है वही मनुष्य जीवन वाला हो जाता है। (वह फिर औरों को भी) सिफत-सालाह की बाणी गुरू का शबद सुनाता है। 10। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के गुणों के मालिक गहरे जिगरे वाले परमात्मा को सिमरता है। उसका यह शरीर (विकारों से बच के) पवित्र हो जाता है। वह मनुष्य परमात्मा के प्रेम-रंग में रंग के हर वक्त परमात्मा के गुण गाता है। परमात्मा के गुण उचार के वह गुणों के मालिक प्रभू में लीन हो जाता है। 11। पर। हे भाई ! जो मनुष्य (परमात्मा को छोड़ के) और ही प्यार में फसता है। भटकना में पड़ कर कुमार्ग पर पड़ा रहता है। उसका ये शरीर सिर्फ माया के मोह का कारण बन जाता है। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम नहीं सिमरता। वह सदा दुख पाता है। (ये बात पक्की है कि) प्रभू का नाम सिमरे बिना मनुष्य दुख पाता है। 12। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह (लोक-परलोक में) आदर-योग्य हो जाता है। उसका शरीर (विकारों से) पवित्र रहता है। उसकी आत्मा पवित्र रहती है। सदा स्थिर परमात्मा के दर पर वह जाना-पहचाना हो जाता है (आदर प्राप्त करता है)। वह मनुष्य परमात्मा की सेवा-भक्ति करता है। परमात्मा को मन में बसाए रखता है। परमात्मा के गुण गाता सुंदर जीवन वाला बन जाता है। 13। पर। हे भाई ! किस्मत के बिना गुरू की शरण नहीं पड़ा जा सकता। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य कुमार्ग पर पड़े रहते हैं। बड़े दुखी हो-हो के आत्मिक मौत सहेड़ी रखते हैं। हे भाई ! जिन मनुष्यों पर गुरू की मेहर की निगाह होती है। उनको परमात्मा अपने (चरणों) में जोड़ लेता है। 14। (विकारों के मुकाबले पर उसका) शरीर (एक ऐसा) किला (बन जाता) है (जिसके) बाजार (ज्ञान-इन्द्रियाँ विकारों के मुकाबले में) अडोल (हो जाती) हैं। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के (अपने अंदर) नाम-पदार्थ संभाल लेता है वह मनुष्य दिन-रात परमात्मा का नाम सिमर के उच्च आत्मिक दर्जा हासिल कर लेता है। 15। हे नानक ! (कह-हे भाई !) सदा कायम रहने वाला परमात्मा स्वयं ही (सारे) सुख देने वाला है। पूरे गुरू के शबद में जुड़ के उसके साथ सांझ डाली जा सकती है। पूरी किस्मत से मनुष्य ये दाति प्राप्त करता है कि सदा-स्थिर हरी-नाम की सिफत सालाह करता रहता है। 16। 7। 21।

रचयिता और स्रोत

यह मारू राग के क्रम का अंग 1065 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०६५ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

English