अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! सदा-स्थिर प्रभू स्वयं ही (मनुष्य को गुरू के) शबद में जोड़ता है। शबद से ही (उसके) अंदर से भटकना दूर करता है। हे नानक ! हरी-नाम में जुड़े हुओं को लोक-परलोक में इज्जत मिलती है। नाम से ही (मनुष्य) आत्मिक आनंद पाता है। 16। 8। 22।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 3॥ हे अपहुँच प्रभू ! हे ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच से परे रहने वाले प्रभू ! हे बेमुथाज प्रभू ! हे (अपने जैसे) खुद ही खुद ! हे मेहरवान ! हे अपहुँच ! हे गहरे जिगरे वाले ! जिस मनुष्य को आप गुरू के शबद के माध्यम से अपने साथ मिला लेता है। उसकी कोई बराबरी नहीं कर सकता। 1। हे प्रभू ! आपकी सेवा-भगती वह मनुष्य करते हैं जो आपको प्यारे लगते हैं। वह मनुष्य गुरू के शबद से (आपके) सदा-स्थिर नाम में लीन रहते हैं। हर वक्त दिन रात वे आपके गुण गाते हैं। हे हरी ! उनकी जीभ को आपके नाम-अमृत का स्वाद अच्छा लगता है। 2। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद से (विकारों से। स्वै भाव से) मर जाते हैं। वह अपनी ये मौत और के लिए सुंदर बना लेते हैं (भाव। लोगों को उनका ये आत्मिक जीवन अच्छा लगता है)। वह मनुष्य अपने हृदय में परमात्मा के गुण टिकाए रखते हैं। परमात्मा के चरणों में लग के वे अपना मानस जन्म कामयाब बना लेते हैं। वे (अपने अंदर से) माया का प्यार समाप्त कर लेते हैं। 3। परमात्मा उनको स्वयं अपने चरणों में मिला लेता है। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद से (अपने अंदर से) स्वै भाव दूर कर लेते हैं। वे हर वक्त परमात्मा की भक्ति में मस्त रहते हैं। इस जगत में वे (भक्ति का) लाभ कमाते हैं। 4। हे प्रभू ! (मेरा जी करता है कि) मैं आपके गुण कथन करूँ। पर मुझसे बयान नहीं किए जा सकते। आपके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। उस पार का किनारा नहीं तलाशा जा सकता। मूल्य नहीं पड़ सकता। हे भाई ! सारे सुख देने वाला (प्रभू जब) स्वयं ही दया करता है। तो गुण गाने वाले को अपने गुणों में लीन कर लेता है। 5। हे भाई ! इस जगत में (हर तरफ) मोह पसरा हुआ है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (इस मोह के कारण) आत्मिक जीवन से बेसमझ रहता है। (मोह में) बिल्कुल अंधा हुआ रहता है। (मोह के) घंधे में भटकता-भटकता (मानस-) जनम बेकार कर लेता है। परमात्मा के नाम के बिना दुख पाता है। 6। हे भाई ! (जब किसी मनुष्य पर) परमात्मा की मेहर होती है। तब उसको गुरू मिलता है। गुरू के शबद से (वह अपने अंदर से) अहंकार की मैल जलाता है। उसका मन पवित्र हो जाता है। (उसको अपने अंदर से) ज्ञान रतन (मिल जाता है। जो उसके अंदर आत्मिक जीवन का) प्रकाश कर देता है। इस तरह वह (अपने अंदर से) अज्ञान-अंधेरा दूर कर लेता है। 7। हे प्रभू ! (आपके गुणों के आधार पर) आपके अनेकों ही नाम हैं। मूल्य नहीं पाया जा सकता (किसी दुनियावी पदार्थ के बदले में आपका नाम प्राप्त नहीं हैं सकता)। (अगर आप मेहर करे तो) मैं आपका सदा कायम रहने वाला नाम अपने दिल में बसाए रखूँ। हे प्रभू ! कौन आपका मूल्य डाल सकता है। (जिस पर आप दयावान होता है। उसको) आप खुद ही आत्मिक अडोलता में लीन रखता है। 8। हे भाई ! अपहुँच और बेअंत परमात्मा के नाम का मूल्य नहीं डाला जा सकता (किसी दुनियावी पदार्थ के बदले नहीं मिल सकता)। कोई भी जीव (हरी-नाम का) मूल्य डालने के योग्य नहीं हो सका। वह प्रभू स्वयं ही अपने नाम की कद्र (कीमत) जानता है। खुद कद्र जान के जीवों को कद्र करनी सिखाता है। गुरू के शबद से (अपने साथ) मिला के कद्र सिखाता है। 9। हे प्रभू ! आपके भक्त आपकी सेवा-भगती करते हैं। (आपके दर पर) अरादास करते हैं। आप स्वयं ही उनको (अपने नाम में) जोड़ के अपने पास बैठाता है। हे प्रभू ! आप सारे जीवों को सुख देने वाला है। आपकी पूरी मेहर से (ही आपके सेवक) आपका नाम सिमरते हैं। 10। हे भाई ! जो मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन की कमाई करता है। जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाता रहता है। उसका यह मन पवित्र हो जाता है। आत्मिक मौत लाने वाली इस माया-जहर के बीच में रहते हुए ही उसको आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल मिल जाता है। मेरे प्रभू को यही मर्यादा भाती है। 11। हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा खुद आत्मिक जीवन की समझ देता है। वही मनुष्य समझता है। (ज्यों ज्यों) वह परमात्मा के गुण गाता है। उसका हृदय सूझ वाला होता जाता है। वह मनुष्य अहंकार और ममता को (प्रभाव डालने से) रोके रखता हैआत्मिक अडोलता में टिक केवह सदा-स्थिर हरी मिलाप प्राप्त कर लेता है। 12। हे भाई ! परमात्मा की मेहर के बिना (नाम से टूटी हुई) और बहुत सारी दुनिया भटकती फिरती है। वह जनम-मरण के चक्करों में पड़ी रहती है। उसका जनम-मरन का चक्कर खत्म नहीं होता। जो मनुष्य आत्मिक मौत लाने वाली माया-जहर का लट्टू हुआ रहता है। वह यह जहर ही विहाजता फिरता है। वह कभी भी आत्मिक आनंद नहीं पा सकता। 13। हे भाई ! (त्योगियों वाला पहरावा डाले फिरते हुओं को देख के भी ना भूल जाना कि ये इस जहर से बचे हुए हैं। जोग-अभ्यास वाला) धार्मिक पहरावा पहनने वाला मनुष्य बहुत सारे (ऐसे) भेष करता है। पर गुरू के शबद के बिना कोई भी मनुष्य (अपने अंदर से) अहंकार दूर नहीं कर सका। जब मनुष्य दुनिया के कार्य-व्यवहार करता हुआ ही स्वै भाव छोड़ता है। तब वह (अहंकार से) मुक्ति पा लेता है। वह सदा कायम रहने वाले परमात्मा के नाम में जुड़ा रहता है। 14। हे भाई ! आत्मिक जीवन की ओर से बेसमझी (इसको) माया की तृष्णा (कह लो। ये माया की तृष्णा मनुष्य के) इस शरीर को (अंदर-अंदर से) जलाती रहती है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! सदा-स्थिर प्रभू स्वयं ही (मनुष्य को गुरू के) शबद में जोड़ता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।