अंग
1064
मारू
अंग बदलें या अंश चुनें · २ अंश
जिसु भाणा भावै सो तुझहि समाए ॥
जिसु भाणा भावै सो तुझहि समाए ॥
भाणे विचि वडी वडिआई भाणा किसहि कराइदा ॥3॥
जा तिसु भावै ता गुरू मिलाए ॥
गुरमुखि नामु पदारथु पाए ॥
तुधु आपणै भाणै सभ स्रिसटि उपाई जिस नो भाणा देहि तिसु भाइदा ॥4॥
मनमुखु अंधु करे चतुराई ॥
भाणा न मंने बहुतु दुखु पाई ॥
भरमे भूला आवै जाए घरु महलु न कबहू पाइदा ॥5॥
सतिगुरु मेले दे वडिआई ॥
सतिगुर की सेवा धुरि फुरमाई ॥
सतिगुर सेवे ता नामु पाए नामे ही सुखु पाइदा ॥6॥
सभ नावहु उपजै नावहु छीजै ॥
गुर किरपा ते मनु तनु भीजै ॥
रसना नामु धिआए रसि भीजै रस ही ते रसु पाइदा ॥7॥
महलै अंदरि महलु को पाए ॥
गुर कै सबदि सचि चितु लाए ॥
जिस नो सचु देइ सोई सचु पाए सचे सचि मिलाइदा ॥8॥
नामु विसारि मनि तनि दुखु पाइआ ॥
माइआ मोहु सभु रोगु कमाइआ ॥
बिनु नावै मनु तनु है कुसटी नरके वासा पाइदा ॥9॥
नामि रते तिन निरमल देहा ॥
निरमल हंसा सदा सुखु नेहा ॥
नामु सलाहि सदा सुखु पाइआ निज घरि वासा पाइदा ॥10॥
सभु को वणजु करे वापारा ॥
विणु नावै सभु तोटा संसारा ॥
नागो आइआ नागो जासी विणु नावै दुखु पाइदा ॥11॥
जिस नो नामु देइ सो पाए ॥
गुर कै सबदि हरि मंनि वसाए ॥
गुर किरपा ते नामु वसिआ घट अंतरि नामो नामु धिआइदा ॥12॥
नावै नो लोचै जेती सभ आई ॥
नाउ तिना मिलै धुरि पुरबि कमाई ॥
जिनी नाउ पाइआ से वडभागी गुर कै सबदि मिलाइदा ॥13॥
काइआ कोटु अति अपारा ॥
तिसु विचि बहि प्रभु करे वीचारा ॥
सचा निआउ सचो वापारा निहचलु वासा पाइदा ॥14॥
अंतर घर बंके थानु सुहाइआ ॥
गुरमुखि विरलै किनै थानु पाइआ ॥
इतु साथि निबहै सालाहे सचे हरि सचा मंनि वसाइदा ॥15॥
मेरै करतै इक बणत बणाई ॥
इसु देही विचि सभ वथु पाई ॥
नानक नामु वणजहि रंगि राते गुरमुखि को नामु पाइदा ॥16॥6॥20॥
भाणे विचि वडी वडिआई भाणा किसहि कराइदा ॥3॥
जा तिसु भावै ता गुरू मिलाए ॥
गुरमुखि नामु पदारथु पाए ॥
तुधु आपणै भाणै सभ स्रिसटि उपाई जिस नो भाणा देहि तिसु भाइदा ॥4॥
मनमुखु अंधु करे चतुराई ॥
भाणा न मंने बहुतु दुखु पाई ॥
भरमे भूला आवै जाए घरु महलु न कबहू पाइदा ॥5॥
सतिगुरु मेले दे वडिआई ॥
सतिगुर की सेवा धुरि फुरमाई ॥
सतिगुर सेवे ता नामु पाए नामे ही सुखु पाइदा ॥6॥
सभ नावहु उपजै नावहु छीजै ॥
गुर किरपा ते मनु तनु भीजै ॥
रसना नामु धिआए रसि भीजै रस ही ते रसु पाइदा ॥7॥
महलै अंदरि महलु को पाए ॥
गुर कै सबदि सचि चितु लाए ॥
जिस नो सचु देइ सोई सचु पाए सचे सचि मिलाइदा ॥8॥
नामु विसारि मनि तनि दुखु पाइआ ॥
माइआ मोहु सभु रोगु कमाइआ ॥
बिनु नावै मनु तनु है कुसटी नरके वासा पाइदा ॥9॥
नामि रते तिन निरमल देहा ॥
निरमल हंसा सदा सुखु नेहा ॥
नामु सलाहि सदा सुखु पाइआ निज घरि वासा पाइदा ॥10॥
सभु को वणजु करे वापारा ॥
विणु नावै सभु तोटा संसारा ॥
नागो आइआ नागो जासी विणु नावै दुखु पाइदा ॥11॥
जिस नो नामु देइ सो पाए ॥
गुर कै सबदि हरि मंनि वसाए ॥
गुर किरपा ते नामु वसिआ घट अंतरि नामो नामु धिआइदा ॥12॥
नावै नो लोचै जेती सभ आई ॥
नाउ तिना मिलै धुरि पुरबि कमाई ॥
जिनी नाउ पाइआ से वडभागी गुर कै सबदि मिलाइदा ॥13॥
काइआ कोटु अति अपारा ॥
तिसु विचि बहि प्रभु करे वीचारा ॥
सचा निआउ सचो वापारा निहचलु वासा पाइदा ॥14॥
अंतर घर बंके थानु सुहाइआ ॥
गुरमुखि विरलै किनै थानु पाइआ ॥
इतु साथि निबहै सालाहे सचे हरि सचा मंनि वसाइदा ॥15॥
मेरै करतै इक बणत बणाई ॥
इसु देही विचि सभ वथु पाई ॥
नानक नामु वणजहि रंगि राते गुरमुखि को नामु पाइदा ॥16॥6॥20॥
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य को आपका भाणा भा जाता है। वह आपके (चरणों) में लीन हो जाता है। हे भाई ! परमात्मा की रजा में रहने से बड़ी इज्जत मिलती है। पर किसी विरले को रजा में चलाता है। 3। हे भाई ! जब उस परमात्मा को अच्छा लगता है। तब वह (किसी भाग्यशाली को) गुरू से मिलाता है। और। गुरू के सन्मुख होने से मनुष्य परमात्मा का श्रेष्ठ नाम प्राप्त कर लेता है। हे भाई ! ये सारी सृष्टि आपने अपनी रजा में पैदा की है। जिस मनुष्य को आप अपनी रज़ा मानने की ताकत देते हैं। उसको आपकी रजा प्यारी लगती है। 4। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाला और माया के मोह में अंधा हो चुका मनुष्य (अपनी ओर से बहुत सारी) समझदारियाँ करता है। (पर जब तक वह परमात्मा के) किए को मीठा करके नहीं मानता (तब तक वह) बहुत दुख पाता है। मन का मुरीद मनुष्य भटकना के कारण गलत रास्ते पर पड़ा हुआ जनम-मरण के चक्कर में पड़ जाता है। वह कभी भी (इस तरह) परमात्मा के चरणों में जगह नहीं पा सकता। 5। हे भाई ! (जिस मनुष्य को परमात्मा) गुरू मिलवाता है। (उसको लोक-परलोक की) इज्जत बख्शता है। गुरू की बताई हुई कार करने का हुकम धुर से ही प्रभू ने दिया हुआ है। जब मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है तब वह परमात्मा का नाम प्राप्त कर लेता है। और। नाम में जुड़ के ही आत्मिक आनंद पाता है। 6। हे भाई ! नाम (सिमरन) से हरेक (गुण मनुष्य के अंदर) पैदा हो जाता है। नाम (सिमरन) से (हरेक अवगुण मनुष्य के अंदर से) नाश हो जाता है। हे भाई ! गुरू की कृपा से (ही मनुष्य का) मन (मनुष्य का) तन (नाम-रस में) भीगता है। (जब मनुष्य अपनी) जीभ से हरी-नाम सिमरता है। वह आनंद में भीग जाता है। उस आनंद से ही मनुष्य और आत्मिक आनंद प्राप्त करता है। 7। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद द्वारा (अपने) शरीर में परमात्मा का ठिकाना पा लेता है। वह सदा-स्थिर हरी-नाम में चित्त जोड़े रखता है। पर। हे भाई ! जिस मनुष्य को सदा-स्थिर प्रभू अपना सदा-स्थिर हरी-नाम देता है। वही यह हरी-नाम हासिल करता है। और वह हर वक्त इस सदा-स्थिर हरी-नाम में एक-मेक हुआ रहता है। 8। परमात्मा का नाम भुला के उसने अपने मन में तन में दुख ही पाया है। हे भाई ! (जिस मनुष्य के मन में हर वक्त) माया का मोह (प्रबल है; उस ने) निरा (आत्मिक) रोग कमाया है। प्रभू के नाम के बिना (मनुष्य का) मन भी रोगी। तन (भाव। ज्ञानेन्द्रियां) भी रोगी (विकारी)। वह नर्क में ही पड़ा रहता है। 9। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम-रंग में रंगे जाते हैं। उनके शरीर विकारों से बचे रहते हैं। उनकी आत्मा पवित्र रहती है। वे (प्रभू चरणों से) प्यार (जोड़ के) सदा आत्मिक आनंद भोगते हैं। हे भाई ! परमात्मा के नाम की सिफत-सालाह करके मनुष्य सदा सुख पाता है। प्रभू-चरणों में उसका निवास बना रहता है। 10। हे भाई ! (जगत में आ के) हरेक जीव वाणज्य-व्यापार (आदि कोई ना कोई कार-व्यवहार) करता है। पर प्रभू के नाम से वंचित रह के जगत में निरा घाटा (ही घाटा) है। (क्योंकि जगत में जीव) नंगा ही आता है (और यहाँ से) नंगा ही चला जाएगा (दुनिया वाली कमाई यहीं रह जाएगी)। प्रभू के नाम से टूटा हुआ दुख ही सहता है। 11। हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा अपना नाम देता है वह (ही यह दाति) हासिल करता है। वह मनुष्य गुरू के शबद से हरी-नाम को अपने मन में बसा लेता है। गुरू की किरपा से उसके हृदय में परमात्मा का नाम बसता है वह हर वक्त हरी-नाम ही सिमरता रहता है। 12। हे भाई ! जितनी भी लुकाई (जगत में) पैदा होती है (वह सारी) परमात्मा का नाम प्राप्त करने की तमन्ना रखती है। पर परमात्मा का नाम उनको ही मिलता है जिन्होंने प्रभू की रजा के अनुसार पिछले जनम में (नाम जपने की) कमाई की हुई होती है। हे भाई ! जिनको परमात्मा का नाम मिल जाता है। वे बड़े भाग्यों वाले बन जाते हैं। (ऐसे भाग्यशालियों को परमात्मा) गुरू के शबद से (अपने साथ) मिला लेता है। 13। हे भाई ! (मनुष्य का यह) शरीर उस बहुत बेअंत परमात्मा (के रहने) के लिए किला है। इस किले में बैठ के परमात्मा (कई किस्मों के) विचार करता रहता है। उस परमात्मा का न्याय सदा कायम रहने वाला है। जो मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन का व्यापार करता है। वह (इस किले में) भटकना से रहित निवास प्राप्त किए रहता है। 14। हे भाई ! (नाम-सिमरन की बरकति से शरीर के मन बुद्धि आदि) अंदर के घर सुंदर बने रहते हैं। हृदय-स्थल भी खूबसूरत बना रहता है। किसी उस विरले मनुष्य को ये स्थान प्राप्त होता है जो गुरू के सन्मुख रहता है। जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह करता रहता है और सदा-स्थिर हरी-नाम को अपने मन में बसाए रखता है। उस मनुष्य की प्रभू के साथ प्रीति इस (मन बुद्धि आदिक वाले) साथ में पूरी तरह से खरी उतरती है। 15। हे भाई ! मेरे करतार ने यह एक (अजीब) बिउंत बना दी है कि उसने मनुष्य के शरीर में (ही उसके आत्मिक जीवन की) सारी राशि-पूँजी डाल रखी है। हे नानक ! जो मनुष्य (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा के नाम का वाणज्य करते रहते हैं। वे उसके प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। हे भाई ! कोई वह मनुष्य ही परमात्मा का नाम प्राप्त करता है जो गुरू के सन्मुख रहता है। 16। 6। 20।
काइआ कंचनु सबदु वीचारा ॥
मारू महला 3 ॥
काइआ कंचनु सबदु वीचारा ॥
तिथै हरि वसै जिस दा अंतु न पारावारा ॥
अनदिनु हरि सेविहु सची बाणी हरि जीउ सबदि मिलाइदा ॥1॥
काइआ कंचनु सबदु वीचारा ॥
तिथै हरि वसै जिस दा अंतु न पारावारा ॥
अनदिनु हरि सेविहु सची बाणी हरि जीउ सबदि मिलाइदा ॥1॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला 3॥ हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद को अपने हृदय में बसाता है। (शबद की बरकति से विकारों से बच सकने से उसका) शरीर सोने जैसा शुद्ध हो जाता है। जिस परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। जिस परमात्मा की हस्ती का इस पार उस पार के छोर का अंत नहीं पाया जा सकता। वह परमात्मा उस (मनुष्य के) हृदय में आ बसता है। हे भाई ! सदा-स्थिर प्रभू की सिफतसालाह की बाणी के द्वारा परमात्मा की सेवा-भगती करते रहा करो। परमात्मा गुरू के शबद में जोड़ के अपने साथ मिला लेता है। 1।
रचयिता और स्रोत
यह मारू राग के क्रम का अंग 1064 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०६४ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।