सतिगुरि सेविऐ सहज अनंदा ॥ हिरदै आइ वुठा गोविंदा ॥ सहजे भगति करे दिनु राती आपे भगति कराइदा ॥4॥ सतिगुर ते विछुड़े तिनी दुखु पाइआ ॥ अनदिनु मारीअहि दुखु सबाइआ ॥ मथे काले महलु न पावहि दुख ही विचि दुखु पाइदा ॥5॥ सतिगुरु सेवहि से वडभागी ॥ सहज भाइ सची लिव लागी ॥ सचो सचु कमावहि सद ही सचै मेलि मिलाइदा ॥6॥ जिस नो सचा देइ सु पाए ॥ अंतरि साचु भरमु चुकाए ॥ सचु सचै का आपे दाता जिसु देवै सो सचु पाइदा ॥7॥ आपे करता सभना का सोई ॥ जिस नो आपि बुझाए बूझै कोई ॥ आपे बखसे दे वडिआई आपे मेलि मिलाइदा ॥8॥ हउमै करदिआ जनमु गवाइआ ॥ आगै मोहु न चूकै माइआ ॥ अगै जमकालु लेखा लेवै जिउ तिल घाणी पीड़ाइदा ॥9॥ पूरै भागि गुर सेवा होई ॥ नदरि करे ता सेवे कोई ॥ जमकालु तिसु नेड़ि न आवै महलि सचै सुखु पाइदा ॥10॥ तिन सुखु पाइआ जो तुधु भाए ॥ पूरै भागि गुर सेवा लाए ॥ तेरै हथि है सभ वडिआई जिसु देवहि सो पाइदा ॥11॥ अंदरि परगासु गुरू ते पाए ॥ नामु पदारथु मंनि वसाए ॥ गिआन रतनु सदा घटि चानणु अगिआन अंधेरु गवाइदा ॥12॥ अगिआनी अंधे दूजै लागे ॥ बिनु पाणी डुबि मूए अभागे ॥ चलदिआ घरु दरु नदरि न आवै जम दरि बाधा दुखु पाइदा ॥13॥ बिनु सतिगुर सेवे मुकति न होई ॥ गिआनी धिआनी पूछहु कोई ॥ सतिगुरु सेवे तिसु मिलै वडिआई दरि सचै सोभा पाइदा ॥14॥ सतिगुर नो सेवे तिसु आपि मिलाए ॥ ममता काटि सचि लिव लाए ॥ सदा सचु वणजहि वापारी नामो लाहा पाइदा ॥15॥ आपे करे कराए करता ॥ सबदि मरै सोई जनु मुकता ॥ नानक नामु वसै मन अंतरि नामो नामु धिआइदा ॥16॥5॥19॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! यदि गुरू की शरण पड़ जाएं तो आत्मिक अडोलता का आनंद मिल जाता है। (गुरू के सन्मुख होने वाले मनुष्य के) हृदय में गोविंद-प्रभू आ बसता है। वह मनुष्य दिन-रात आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा की भगती करता है। हे भाई ! परमात्मा स्वयं ही (अपनी) भगती करवाता है। 4। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू (के चरणों) से विछुड़े हुए हैं। उन्होंने (अपने लिए) दुख ही सहेड़ा हुआ है। वे हर वक्त दुख की चोटें खाते हैं। उनको हरेक किस्म का दुख होता रहता है। (विकारों की कालिख से उनके) मुँह काले हुए रहते हैं (उनके मन मलीन रहते हैं) उनको प्रभू चरणों में ठिकाना नहीं मिलता। हे भाई ! (गुरू चरणों से विछुड़ा हुआ मनुष्य सदा दुख में ही ग्रसा रहता है) दुख में ही ग्रसा रहता है। सदा दुख ही सहता रहता है। 5। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं। वे बड़े भाग्यशाली हो जाते हैं। किसी खास यतन के बिना ही सदा-स्थिर प्रभू के नाम में उनकी लगन लगी रहती है। वह मनुष्य सदा ही सदा-स्थिर हरी नाम सिमरन की कमाई करते हैं। (गुरू उन्हें अपने साथ) मिला के सदा-स्थिर हरी-नाम में मिला देता है। 6। पर। हे भाई ! वह मनुष्य (ही सदा-स्थिर हरी नाम की दाति) प्राप्त करता है जिस को सदा कायम रहने वाला परमात्मा देता है। उस मनुष्य के हृदय में सदा-स्थिर हरी नाम टिका रहता है। (नाम की बरकति से वह मनुष्य अपने अंदर से) भटकना दूर कर लेता है। हे भाई ! सदा-स्थिर प्रभू अपने सदा-स्थिर नाम की दाति देने वाला स्वयं ही है। जिस को देता है। वह मनुष्य सदा-स्थिर हरी नाम हासिल कर लेता है। 7। हे भाई ! वह करतार स्वयं ही सब जीवों का (मालिक) है। ये बात कोई वह मनुष्य ही समझता है जिसको परमात्मा स्वयं समझाता है। हे भाई ! करतार स्वयं ही बख्शिश करता है। स्वयं ही वडिआई देता है। स्वयं ही (गुरू के साथ) मिला के (अपने चरणों में) मिलाता है। 8। हे भाई ! जो मनुष्य ‘मैं बड़ा हूँ’। मैं बड़ा बन जाऊँ’ – इन सोचों में अपनी जिंदगी व्यर्थ गवा देता है। उसके जीवन सफर में (उसके अंदर से) माया का मोह (कभी) नहीं समाप्त होता। (जब) परलोक में धर्म-राज (उनसे मानस जीवन में किये हुए कामों का) हिसाब माँगता है (तब वह ऐसे) पीड़ा जाता है जैसे (कोल्हू में डाली हुई) घाणी के तिल पीड़े जाते हैं। 9। हे भाई ! गुरू की बताई (नाम-सिमरन की) कार बड़ी किस्मत से (ही किसी से) हो सकती है। जब परमात्मा मेहर की निगाह करता है तब ही कोई मनुष्य कर सकता है। आत्मिक मौत उस मनुष्य के नजदीक नहीं आती। वह मनुष्य सदा-स्थिर परमात्मा के चरणों में जुड़ के आत्मिक आनंद पाता है। 10। हे प्रभू ! जो मनुष्य आपको अच्छे लगे उन्होंने ही आत्मिक आनंद पाया। उनकी बड़ी किस्मत कि तूने उनको गुरू की बताई हुई कार में लगाए रखा। सारी (लोक-परलोक की) इज्जत आपके हाथ में है। जिसको आप (यह इज्जत) देता है वह प्राप्त करता है। 11। (हे प्रभू ! जिस पर आप मेहर की निगाह करता है। वह मनुष्य अपने) हृदय में गुरू से आत्मिक जीवन की सूझ प्राप्त करता है। वह (आपका) श्रेष्ठ नाम अपने मन में बसाता है। उसके हृदय में आत्मिक जीवन की सूझ का श्रेष्ठ प्रकाश हो जाता है (जिसकी बरकति से वह अपने अंदर से) जीवन के प्रति बे-समझी का अंधेरा दूर कर लेता है। 12। हे भाई ! माया के मोह में अंधे हो चुके और आत्मिक जीवन से बेसमझ मनुष्य (परमात्मा को छोड़ के) और ही धंधों में लगे रहते हैं। वह बद्किस्मत मनुष्य पानी के बिना (विकारों के पानी में) डूब के आत्मिक मौत मर जाते हैं। जिंदगी के सफ़र में पड़ने से अपना असली घर-बार नहीं दिखता। (ऐसा मनुष्य) जमराज के दर पर बँधा हुआ दुख पाता है। 13। हे भाई ! गुरू की शरण पड़े बिना (माया के मोह से) मुक्ति नहीं होती। बेशक कोई मनुष्य उनको पूछ के देखे जो धार्मिक पुस्तकें पढ़ के निरी कथा-वार्ता चर्चा करने वाले हैं। या जो। समाधियाँ लगाए रखते हैं। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। उसको (लोक-परलोक की) इज्जत मिलती है। वह मनुष्य सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के दर पर आदर प्राप्त करता है। 14। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की बताई हुई कार करता है। उसको परमात्मा स्वयं ही (अपने चरणों में) मिला लेता है। वह मनुष्य (अपने अंदर से) मायावी पदार्थों के कब्जे़ की लालसा छोड़ के सदा-स्थिर हरी-नाम में सुरति जोड़े रखता है। हे भाई ! जो वणजारे जीव सदा-स्थिर हरी-नाम का वणज सदा करते हैं। उनको हरी-नाम का लाभ मिलता है। 15। पर। हे भाई ! करतार स्वयं ही (सब कुछ) करता है। स्वयं ही (जीवों से) करवाता है। (उसकी मेहर से) जो मनुष्य गुरू के शबद से (अपने अंदर से) स्वै भाव त्यागता है। वही (विकारों से) स्वतंत्र हो जाता है। हे नानक ! उस मनुष्य के मन में परमात्मा का नाम टिका रहता है। वह हर वक्त परमात्मा का नाम ही सिमरता रहता है। 16। 5। 19।
मारू महला 3 ॥ जो तुधु करणा सो करि पाइआ ॥ भाणे विचि को विरला आइआ ॥ भाणा मंने सो सुखु पाए भाणे विचि सुखु पाइदा ॥1॥ गुरमुखि तेरा भाणा भावै ॥ सहजे ही सुखु सचु कमावै ॥ भाणे नो लोचै बहुतेरी आपणा भाणा आपि मनाइदा ॥2॥ तेरा भाणा मंने सु मिलै तुधु आए ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: मारू महला 3॥ हे प्रभू ! जो काम आप करना (चाहता) है। वह काम आप अवश्य कर देता है। (ये पता होते हुए भी) कोई विरला मनुष्य आपकी रजा को मीठा करके मानता है। जो मनुष्य आपकी रजा को सिर माथे करके मानता है। वह आत्मिक सुख हासिल करता है। आपकी रजा में रह के आत्मिक आनंद पाता है। 1। हे प्रभू ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य को आपकी रजा अच्छी लगती है। वह आत्मिक अडोलता में रह के सुख पाता है। वह सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन की कमाई करता रहता है। हे भाई ! प्रभू के किए को मीठा मानने की तमन्ना बहुत सारी लुकाई करती है। पर अपनी रज़ा वह स्वयं ही (किसी विरले से) मनवाता है। 2। हे प्रभू ! जो मनुष्य आपकी रजा को मानता है। वह आपको आ मिलता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! यदि गुरू की शरण पड़ जाएं तो आत्मिक अडोलता का आनंद मिल जाता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।