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अंग 1058

अंग
1058
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सदा कारजु सचि नामि सुहेला बिनु सबदै कारजु केहा हे ॥7॥
खिन महि हसै खिन महि रोवै ॥
दूजी दुरमति कारजु न होवै ॥
संजोगु विजोगु करतै लिखि पाए किरतु न चलै चलाहा हे ॥8॥
जीवन मुकति गुर सबदु कमाए ॥
हरि सिउ सद ही रहै समाए ॥
गुर किरपा ते मिलै वडिआई हउमै रोगु न ताहा हे ॥9॥
रस कस खाए पिंडु वधाए ॥
भेख करै गुर सबदु न कमाए ॥
अंतरि रोगु महा दुखु भारी बिसटा माहि समाहा हे ॥10॥
बेद पड़हि पड़ि बादु वखाणहि ॥
घट महि ब्रहमु तिसु सबदि न पछाणहि ॥
गुरमुखि होवै सु ततु बिलोवै रसना हरि रसु ताहा हे ॥11॥
घरि वथु छोडहि बाहरि धावहि ॥
मनमुख अंधे सादु न पावहि ॥
अन रस राती रसना फीकी बोले हरि रसु मूलि न ताहा हे ॥12॥
मनमुख देही भरमु भतारो ॥
दुरमति मरै नित होइ खुआरो ॥
कामि क्रोधि मनु दूजै लाइआ सुपनै सुखु न ताहा हे ॥13॥
कंचन देही सबदु भतारो ॥
अनदिनु भोग भोगे हरि सिउ पिआरो ॥
महला अंदरि गैर महलु पाए भाणा बुझि समाहा हे ॥14॥
आपे देवै देवणहारा ॥
तिसु आगै नही किसै का चारा ॥
आपे बखसे सबदि मिलाए तिस दा सबदु अथाहा हे ॥15॥
जीउ पिंडु सभु है तिसु केरा ॥
सचा साहिबु ठाकुरु मेरा ॥
नानक गुरबाणी हरि पाइआ हरि जपु जापि समाहा हे ॥16॥5॥14॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! परमात्मा के सदा-स्थिर नाम में जुड़ने से जनम-मनोरथ सफल होता है। गुरू के शबद के बिना कैसा जनम-मनोरथ। (जीवन निष्फल हो जाता हैं)। 7। हे भाई ! (परमात्मा के नाम से टूटा हुआ मनुष्य) घड़ी में हस पड़ता है और घड़ी में ही रो पड़ता है (हर्ष और सोग के चक्कर में ही पड़ा रहता है। सो) माया के मोह में फसा के रखने वाली खोटी मति से जीवन-मनोरथ सफल नहीं होता। (पर। जीवों के भी क्या वश।) (हरी-नाम में) जुड़ना और (हरी नाम से) विछुड़ जाना – (पिछले किए कर्मों के अनुसार) करतार ने स्वयं (जीवों के माथे के ऊपर) लिख रखे हैं। ये पूर्बली कर्म-कमाई (जीव से) मिटाए नहीं मिटती। 8। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद अनुसार जीवन जीता है। वह गृहस्त में रहता हुआ ही निर्लिप है। वह सदा ही परमात्मा की याद में लीन रहता है। गुरू की कृपा से उसको (इस लोक में और परलोक में) आदर मिलता है। उसके अंदर अहंकार का रोग नहीं होता। 9। हे भाई ! (दूसरी तरफ देखें त्यागियों का हाल। जो मनुष्य अपनी ओर से ‘त्याग’ करके खट्टे मीठे कसैले आदि) सारे रसों के खाने खाता रहता है। और अपने शरीर को मोटा किए जाता है। (त्यागियों वाला) धार्मिक पहरावा पहनता है। गुरू के शबद अनुसार जीवन नहीं बिताता। उसके अंदर (चस्कों का) रोग है। ये उसे बहुत बड़ा दुख लगा हुआ है। वह हर वक्त विकारों की गंदगी में लीन रहता है। 10। हे भाई ! (पंडित लोग भी) वेद (आदि धर्म पुस्तकें) पढ़ते हैं। (इनको) पढ़ के निरी चर्चा का सिलसिला छेड़े रखते हैं। जो परमात्मा हृदय में ही बस रहा है। उससे गुरू के शबद से सांझ नहीं डालते। पर। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह तत्व को विचारता है। उसकी जीभ में हरी-नाम का स्वाद टिका रहता है। 11। हे भाई ! जो मनुष्य हृदय घर में बस रहे नाम पदार्थ को छोड़ देते हैं। और बाहर भटकते हैं। वे मन के मुरीद और माया के मोह में अंधे हुए मनुष्य हरी-नाम का स्वाद नहीं ले सकते। अन्य स्वादों में मस्त उनकी जीभ फीके बोल ही बोलती रहती है। परमात्मा के नाम का स्वाद उनको बिल्कुल हासिल नहीं होता। 12। हे भाई ! माया की भटकना मन के मुरीद मनुष्य के शरीर की अगुवाई करती है। (इस) खोटी मति के कारण मनमुख आत्मिक मौत सहेड़ लेता है। और सदा ख्वार होता है। मनमुख अपने मन को काम में। क्रोध में। माया के मोह में जोड़े रखता है। (इस वास्ते) उसको कभी भी आत्मिक आनंद नहीं मिलता। 13। हे भाई ! गुरू का शबद जिस मनुष्य के सोने जैसे पवित्र शरीर का रहनुमा बना रहता है। वह मनुष्य परमात्मा के साथ प्यार बनाए रखता है और हर वक्त परमातमा के मिलाप का आनंद पाता है। वह मनुष्य उस बग़ैर-मकान परमात्मा को हरेक शरीर में (बसता) देख लेता है। उसकी रजा को मीठा मान के उसमें लीन रहता है। 14। पर। हे भाई ! (ये शबद की दाति) दे सकने वाला परमात्मा आप ही देता है। उसके सामने किसी का जोर नहीं चलता। वह स्वयं ही बख्शिश करता है और गुरू के शबद में जोड़ता है। हे भाई ! उस मालिक प्रभू का हुकम बहुत गंभीर है। 15। हे भाई ! ये जिंद और ये शरीर सब कुछ उस परमात्मा का ही दिया हुआ है। हे भाई ! मेरा वह मालिक-प्रभू सदा कायम रहने वाला है। हे नानक ! (कोई भाग्यशाली मनुष्य) गुरू की बाणी के द्वारा उस परमात्मा को पा लेता है। उस हरी के नाम का जाप जप के उस में समाया रहता है। 16। 5। 14।
मारू महला 3 ॥
गुरमुखि नाद बेद बीचारु ॥
गुरमुखि गिआनु धिआनु आपारु ॥
गुरमुखि कार करे प्रभ भावै गुरमुखि पूरा पाइदा ॥1॥
गुरमुखि मनूआ उलटि परावै ॥
गुरमुखि बाणी नादु वजावै ॥
गुरमुखि सचि रते बैरागी निज घरि वासा पाइदा ॥2॥
गुर की साखी अंम्रित भाखी ॥
सचै सबदे सचु सुभाखी ॥
सदा सचि रंगि राता मनु मेरा सचे सचि समाइदा ॥3॥
गुरमुखि मनु निरमलु सत सरि नावै ॥
मैलु न लागै सचि समावै ॥
सचो सचु कमावै सद ही सची भगति द्रिड़ाइदा ॥4॥
गुरमुखि सचु बैणी गुरमुखि सचु नैणी ॥
गुरमुखि सचु कमावै करणी ॥
सद ही सचु कहै दिनु राती अवरा सचु कहाइदा ॥5॥
गुरमुखि सची ऊतम बाणी ॥
गुरमुखि सचो सचु वखाणी ॥
गुरमुखि सद सेवहि सचो सचा गुरमुखि सबदु सुणाइदा ॥6॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: मारू महला 3॥ (जोगी नाद बजाते हैं। पण्डित वेद पढ़ते हैं। पर) हरी-नाम को मन में बसाना ही गुरमुख (गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य) के लिए नाद (का बजाना और) वेद (का पाठ) है। बेअंत प्रभू का सिमरन ही गुरमुख के लिए ज्ञान (-चर्चा) और समाधि है। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य (वह) कार करता है जो प्रभू को अच्छी लगती है (गुरमुख परमात्मा की रजा में चलता है)। (इस तरह) गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य पूरन प्रभू का मिलाप हासिल कर लेता है। 1। हे भाई ! गुरू की शरण रहने वाला मनुष्य (अपने) मन को (माया के मोह से) रोक के रखता है। वह गुरबाणी को हृदय में बसाता है (मानो। जोगी की तरह) नाद बजा रहा है। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम में रंगे रहते हैं। (इस तरह) माया की ओर से निर्लिप रह के प्रभू चरणों में टिके रहते हैं। 2। हे भाई ! जो मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाली गुरबाणी उचारता रहता है। सदा स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह वाली बाणी के द्वारा सदा स्थिर हरी-नाम सिमरता रहता है। उसका ममता में फसने वाला मन सदा हरी-नाम के प्रेम-रंग में रंगा रहता है। वह सदा कायम रहने वाले परमात्मा में ही लीन रहता है। 3। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। उसका मन पवित्र हो जाता है। वह संतोख के सरोवर (हरी-नाम) में स्नान करता है; उसको (विकारों की) मैल नहीं चिपकती। वह सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा में समाया रहता है। वह मनुष्य हर वक्त सदा स्थिर हरी-नाम सिमरन की कमाई करता है। वह मनुष्य सदा साथ निभने वाली भक्ति (अपने हृदय में) पक्के तौर पर टिकाए रखता है। 5। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। उसके वचनों में प्रभू बसता है। उसकी आँखों में प्रभू बसता है (वह हर वक्त नाम सिमरता है। हर तरफ परमात्मा को ही देखता है)। वह सदा स्थिर प्रभू के नाम सिमरन की कमाई करता है। यही उसके लिए करने योग्य काम है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य दिन-रात सदा ही सिमरन करता है। और। औरों को भी सिमरन करने के लिए प्रेरित करता है। 5। हे भाई ! सदा स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह वाली उक्तम बाणी ही गुरमुख (सदा उचारता है)। वह हर वक्त सदा स्थिर प्रभू का नाम ही उच्चारता है। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले बंदे सदा ही सदा-स्थिर परमात्मा की सेवा-भक्ति करते हैं। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है। वह (औरों को भी) बाणी ही सुनाता है। 6।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! परमात्मा के सदा-स्थिर नाम में जुड़ने से जनम-मनोरथ सफल होता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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