अंग
1057
मारू
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गुर कै सबदि हरि नामु वखाणै ॥
गुर कै सबदि हरि नामु वखाणै ॥
अनदिनु नामि रता दिनु राती माइआ मोहु चुकाहा हे ॥8॥
गुर सेवा ते सभु किछु पाए ॥
हउमै मेरा आपु गवाए ॥
आपे क्रिपा करे सुखदाता गुर कै सबदे सोहा हे ॥9॥
गुर का सबदु अंम्रित है बाणी ॥
अनदिनु हरि का नामु वखाणी ॥
हरि हरि सचा वसै घट अंतरि सो घटु निरमलु ताहा हे ॥10॥
सेवक सेवहि सबदि सलाहहि ॥
सदा रंगि राते हरि गुण गावहि ॥
आपे बखसे सबदि मिलाए परमल वासु मनि ताहा हे ॥11॥
सबदे अकथु कथे सालाहे ॥
मेरे प्रभ साचे वेपरवाहे ॥
आपे गुणदाता सबदि मिलाए सबदै का रसु ताहा हे ॥12॥
मनमुखु भूला ठउर न पाए ॥
जो धुरि लिखिआ सु करम कमाए ॥
बिखिआ राते बिखिआ खोजै मरि जनमै दुखु ताहा हे ॥13॥
आपे आपि आपि सालाहे ॥
तेरे गुण प्रभ तुझ ही माहे ॥
तू आपि सचा तेरी बाणी सची आपे अलखु अथाहा हे ॥14॥
बिनु गुर दाते कोइ न पाए ॥
लख कोटी जे करम कमाए ॥
गुर किरपा ते घट अंतरि वसिआ सबदे सचु सालाहा हे ॥15॥
से जन मिले धुरि आपि मिलाए ॥
साची बाणी सबदि सुहाए ॥
नानक जनु गुण गावै नित साचे गुण गावह गुणी समाहा हे ॥16॥4॥13॥
अनदिनु नामि रता दिनु राती माइआ मोहु चुकाहा हे ॥8॥
गुर सेवा ते सभु किछु पाए ॥
हउमै मेरा आपु गवाए ॥
आपे क्रिपा करे सुखदाता गुर कै सबदे सोहा हे ॥9॥
गुर का सबदु अंम्रित है बाणी ॥
अनदिनु हरि का नामु वखाणी ॥
हरि हरि सचा वसै घट अंतरि सो घटु निरमलु ताहा हे ॥10॥
सेवक सेवहि सबदि सलाहहि ॥
सदा रंगि राते हरि गुण गावहि ॥
आपे बखसे सबदि मिलाए परमल वासु मनि ताहा हे ॥11॥
सबदे अकथु कथे सालाहे ॥
मेरे प्रभ साचे वेपरवाहे ॥
आपे गुणदाता सबदि मिलाए सबदै का रसु ताहा हे ॥12॥
मनमुखु भूला ठउर न पाए ॥
जो धुरि लिखिआ सु करम कमाए ॥
बिखिआ राते बिखिआ खोजै मरि जनमै दुखु ताहा हे ॥13॥
आपे आपि आपि सालाहे ॥
तेरे गुण प्रभ तुझ ही माहे ॥
तू आपि सचा तेरी बाणी सची आपे अलखु अथाहा हे ॥14॥
बिनु गुर दाते कोइ न पाए ॥
लख कोटी जे करम कमाए ॥
गुर किरपा ते घट अंतरि वसिआ सबदे सचु सालाहा हे ॥15॥
से जन मिले धुरि आपि मिलाए ॥
साची बाणी सबदि सुहाए ॥
नानक जनु गुण गावै नित साचे गुण गावह गुणी समाहा हे ॥16॥4॥13॥
हिन्दी अर्थ: गुरू के शबद में जुड़ के वह मनुष्य परमात्मा का नाम उचारता है। वह दिन-रात हर वक्त परमात्मा के नाम में मस्त रहता है। (और। इस तरह अपने अंदर से) माया का मोह दूर कर लेता है। 8। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्य हरेक चीज हासिल कर लेते हैं। वह मनुष्य अहंकार-ममता स्वै भाव दूर कर लेता है। हे भाई ! जिस मनुष्य पर सुखों का दाता प्रभू कृपा करता है। वह मनुष्य गुरू के शबद की बरकति से अपना आत्मिक जीवन सुंदर बना लेता है। 9। हे भाई ! गुरू का शबद आत्मिक जीवन देने वाली बाणी है। (इसमें जुड़ के) हर वक्त परमात्मा का नाम सिमरा कर। हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में सदा कायम रहने वाला परमात्मा आ बसता है। उस मनुष्य का वह हृदय पवित्र हो जाता है। 10। हे भाई ! (प्रभू के) सेवक (गुरू के) शबद से (प्रभू की) सेवा-भगती करते हैं। सिफत सालाह करते हैं। प्रभू के प्रेम-रंग में मस्त हो के सदा प्रभू के गुण गाते रहते हैं। हे भाई ! जिस मनुष्य को प्रभू स्वयं ही मेहर करके (गुरू के) शबद में जोड़ता है। उस मनुष्य के मन में (मानो) चंदन की सुगंधी पैदा हो जाती है। 11। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद से अकथ प्रभू के गुण बयान करता रहता है। सदा-स्थिर बेपरवाह प्रभू की सिफत-सालाह करता रहता है। गुणों की दाति करने वाला प्रभू स्वयं ही उसको गुरू के शबद में जोड़ के रखता है। उसको शबद का आनंद आने लग जाता है। 12। हे भाई ! मन का मुरीद मनुष्य जीवन के सही रास्ते से टूट जाता है (भटकता फिरता है। उसको कोई) ठिकाना नहीं मिलता। (पर उसके भी क्या वश। उसके पिछले किए कर्मों के अनुसार) जो कुछ धुर से उसके माथे पर लिखा गया है वह कर्म वह अब कर रहा है। माया (के रंग में) मस्त होने के कारण वह (अब भी) माया की तलाश ही करता फिरता है। कभी मरता है कभी पैदा होता है (कभी हर्ष और कभी शोक)। ये दुख उसे लगे रहते हैं। 13। हे भाई ! (अगर कोई भाग्यशाली सिफत-सालाह कर रहा है। तो उसमें बैठा भी प्रभू) स्वयं ही स्वयं सिफत-सालाह कर रहा है। हे प्रभू ! आपके गुण आपके में ही हैं (आपके जैसा और कोई नहीं); हे प्रभू ! आप स्वयं अॅटल हैं। आपकी सिफत सालाह की बाणी अॅटल है। आप स्वयं ही अॅलख और अपार हैं। 14। सिफत-सालाह की दाति देने वाले गुरू के बिना वह नाम की दाति हासिल नहीं कर सकता। हे भाई ! अगर (कोई मनमुख नाम के बिना और-और धार्मिक निहित किए) कर्म करता फिरे। हे भाई ! गुरू की कृपा से जिस मनुष्य के हृदय में हरी-नाम आ बसता है। वह मनुष्य गुरू के शबद से सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह करता रहता है। 15। हे भाई ! जिन मनुष्यों को धुर से अपने हुकम से प्रभू अपने चरणों में मिलाता है वही मिलते हैं। सिफत सालाह की बाणी के द्वारा गुरू के शबद से उनके जीवन सुंदर हो जाते हैं। हे नानक ! प्रभू का सेवक सदा-स्थिर प्रभू के गुण गाता है। आएँ। हम भी गुण गाएं। (जो मनुष्य गुण गाता है। वह) गुणों के मालिक प्रभू में लीन हो जाता है। 16। 4। 13।
निहचलु एकु सदा सचु सोई ॥
मारू महला 3 ॥
निहचलु एकु सदा सचु सोई ॥
पूरे गुर ते सोझी होई ॥
हरि रसि भीने सदा धिआइनि गुरमति सीलु संनाहा हे ॥1॥
अंदरि रंगु सदा सचिआरा ॥
गुर कै सबदि हरि नामि पिआरा ॥
नउ निधि नामु वसिआ घट अंतरि छोडिआ माइआ का लाहा हे ॥2॥
रईअति राजे दुरमति दोई ॥
बिनु सतिगुर सेवे एकु न होई ॥
एकु धिआइनि सदा सुखु पाइनि निहचलु राजु तिनाहा हे ॥3॥
आवणु जाणा रखै न कोई ॥
जंमणु मरणु तिसै ते होई ॥
गुरमुखि साचा सदा धिआवहु गति मुकति तिसै ते पाहा हे ॥4॥
सचु संजमु सतिगुरू दुआरै ॥
हउमै क्रोधु सबदि निवारै ॥
सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाईऐ सीलु संतोखु सभु ताहा हे ॥5॥
हउमै मोहु उपजै संसारा ॥
सभु जगु बिनसै नामु विसारा ॥
बिनु सतिगुर सेवे नामु न पाईऐ नामु सचा जगि लाहा हे ॥6॥
सचा अमरु सबदि सुहाइआ ॥
पंच सबद मिलि वाजा वाइआ ॥
निहचलु एकु सदा सचु सोई ॥
पूरे गुर ते सोझी होई ॥
हरि रसि भीने सदा धिआइनि गुरमति सीलु संनाहा हे ॥1॥
अंदरि रंगु सदा सचिआरा ॥
गुर कै सबदि हरि नामि पिआरा ॥
नउ निधि नामु वसिआ घट अंतरि छोडिआ माइआ का लाहा हे ॥2॥
रईअति राजे दुरमति दोई ॥
बिनु सतिगुर सेवे एकु न होई ॥
एकु धिआइनि सदा सुखु पाइनि निहचलु राजु तिनाहा हे ॥3॥
आवणु जाणा रखै न कोई ॥
जंमणु मरणु तिसै ते होई ॥
गुरमुखि साचा सदा धिआवहु गति मुकति तिसै ते पाहा हे ॥4॥
सचु संजमु सतिगुरू दुआरै ॥
हउमै क्रोधु सबदि निवारै ॥
सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाईऐ सीलु संतोखु सभु ताहा हे ॥5॥
हउमै मोहु उपजै संसारा ॥
सभु जगु बिनसै नामु विसारा ॥
बिनु सतिगुर सेवे नामु न पाईऐ नामु सचा जगि लाहा हे ॥6॥
सचा अमरु सबदि सुहाइआ ॥
पंच सबद मिलि वाजा वाइआ ॥
हिन्दी अर्थ: मारू महला 3॥ हे भाई ! सदा कायम रहने वाला अटॅल सिर्फ वह परमात्मा ही है। पूरे गुरू से जिन मनुष्यों को ये समझ आ जाती है। वे परमात्मा के नाम-रस में भीगे रहते हैं। सदा परमात्मा का सिमरन करते हैं। गुरू की मति पर चल कर वह मनुष्य अच्छे आचरण का संजोअ (पहने रखते हैं। जिसके कारण कोई विकार उन पर हमला नहीं कर सकते)। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का प्यार है। वह सदा सुर्खरू है। गुरू के शबद की बरकति से वह प्रभू के नाम में प्रेम बनाए रखता है। उसके हृदय में सारे सुखों और पदार्थों का खजाना हरी-नाम बसता है। वह माया को असल कमाई मानना छोड़ देता है। 2। हे भाई ! खोटी मति के कारण हाकिम और प्रजा सब दुबिधा में फंसे रहते हैं। गुरू की शरण पड़े बिना किसी के अंदर एक परमात्मा का प्रकाश नहीं होता। जो मनुष्य सिर्फ परमात्मा को सिमरते हैं। वह आत्मिक आनंद पाते हैं। उनको अटॅल (आत्मिक) राज मिला रहता है। 3। हे भाई ! (परमात्मा के बिना और) कोई जनम-मरण के चक्कर से बच नहीं सकता। ये जनम-मरण (का चक्कर) उस परमात्मा की रज़ा के अनुसार ही होता है। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर सदा-स्थिर प्रभू का नित्य सिमरन करते रहो। ऊँची आत्मिक अवस्था और विकारों से खलासी उस परमात्मा से ही मिलती है। 4। हे भाई ! विकारों से बचने का पक्का प्रबंध गुरू के दर से (प्राप्त होता है)। (जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है वह) गुरू के शबद से (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर लेता है। क्रोध दूर कर लेता है। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने से ही सदा आत्मिक आनंद मिलता है। अच्छा आचरण। संतोख -ये सब कुछ गुरू के दर से ही हैं। 5। हे भाई ! संसार में खचित रहने से (मनुष्य के अंदर) अहंकार पैदा हो जाता है। (इनके कारण) परमात्मा का नाम भुला के सारा जगत आत्मिक मौत सहेड़ लेता है। हे भाई ! गुरू की शरण पड़े बिना परमात्मा का नाम नहीं मिलता। हरी-नाम ही जगत में सदा कायम रहने वाली कमाई है। 6। हे भाई ! गुरू के शबद से (जिस मनुष्य को) परमात्मा का अटल हुकम मीठा लगने लग जाता है। (उसके अंदर इस तरह आनंद बना रहता है जैसे) पाँचों किस्मों के साजों ने मिल के सुंदर राग पैदा किया हुआ है।
रचयिता और स्रोत
यह मारू राग के क्रम का अंग 1057 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग १०५७ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।